
युद्धकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः (Sarga 95: Lamentation in Laṅkā and the Causal Chain of Enmity)
युद्धकाण्ड
This chapter presents a wartime audit of devastation and a reflective diagnosis of its causes. It opens with a hyperbolic catalogue of Rāvaṇa’s dispatched forces—fire-colored horses, chariots with banners and golden ornamentation, iron-bar wielding fighters, and shape-shifting rākṣasas—now felled by Rāma’s sharp, glowing, gold-adorned arrows, emphasizing his tireless efficacy (akliṣṭa-karman). The narrative then pivots to interpretive lament: rākṣasī women and survivors gather, bewailing husbands, sons, and kin, while questioning how the chain began—specifically Surpaṇakhā’s ill-fated desire for Rāma and her condemned assault, which precipitated the destruction of Khara and Dūṣaṇa and ultimately the abduction of Sītā. A sequence of exempla is cited as “sufficient proof” of Rāma’s prowess: the slaying of Virādha, the Janasthāna campaign, the deaths of Khara, Dūṣaṇa, Triśiras, Kabandha, and Vāli, and Sugrīva’s restoration. Vibhīṣaṇa’s dharmic counsel is noted as rejected by Rāvaṇa, and the chapter intensifies into collective fear: Laṅkā is imagined as a cremation ground, omens rise, and Rāma is compared to Rudra, Viṣṇu, Indra, or even Antaka (Death). The theological-political backstory of Rāvaṇa’s boon from Brahmā—protection from devas, dānavas, and rākṣasas but not from humans—is recalled to explain why human-born Rāma becomes the instrument of downfall. The sarga closes with the women embracing one another in despondent cries, framing the war not only as military defeat but as a moral reckoning.
Verses 1-3
तानितानिसहस्राणिसारोहाणां च वाजिनाम् ।रथानांत्वग्निवर्णानांसध्वजानांसहस्रशः ॥१॥राक्षसानांसहस्राणिगदापरिघयोधिनाम् ।काञ्चनध्वजचित्राणांशूराणांकामरूपिणाम् ॥२॥निहतानिशरैर्दीस्तीक्ष्णैस्तप्तकाञ्चनभूषणैः ।रावणेनप्रयुक्तानिरामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥३॥
हज़ारों रथ थे, आग जैसी घोड़े जुड़े थे, ऊपर झंडे उड़ जा रहे थे। हज़ारों राक्षस थे जो गदा और बड़े सारिके से लड़ रहे थे। उनके झंडों पे सोना चमक रहा था। यह सब रावण ने भेजे थे। राम ने उन सब को अपने तेज़ तीर से खत्म कर दिया। राम कभी थका नहीं।
Verses 4-5
दृष्टवाश्रुत्वा च सम्भ्रान्ताहतशेषानिशाचराः ।राक्षसीश्चसमागम्यदीनाश्चिन्तापरिप्लुताः ॥४॥विधवाहतपुत्राश्चक्रोशन्त्योहतबान्दवाः ।राक्षस्यःसहसङ्गम्यदुःखार्ताःपर्यदेवयन् ॥५॥
जब राक्षसों को पता चला क्या हुआ, वो सब डर गए। जो बच गए वो काँप रहे थे। राक्षस औरतें इकट्ठी हुई। वो सब बहुत दुखी थी। पति मर गए, बेटे मर गए, रिश्तेदार मर गए। वो सब रो रही थी और चिल्ला रही थी। ग्रुप बना के वो अपना दुख बता रही थी।
Verse 6
कथंशूर्पणखावृद्धाकरालानिर्णतोदरी ।आससादवनेरामंकन्दर्पमिवरूपिणम् ॥६॥
शूर्पनखा बुढ़िया हो गई थी। उसका चेहरा डरावना था, पेट बाहर निकला हुआ था। वो जंगल में राम के पास कैसे आई? राम इतना सुंदर थे जैसे कंदर्प देवता हो।
Verse 7
सुकुमारंमहासत्त्वंसर्वभूतहितेरतम् ।तंदृष्टवालोकनिन्द्यासाहीनरूपाप्रकामिता ॥७॥
राम बहुत नरम दिल के थे, बड़े इंसान थे। वो सबकी भलाई में लगे थे। जब उस बुरी औरत ने राम को देखा, उसका दिल भाग गया। वो औरत सबसे बुरी दिखती थी, लोग उसको पसंद नहीं करते थे। पर उसने राम को देख के अपना मन उसपे लगा लिया।
Verse 8
कथंसर्वगुणैर्हीनागुणवन्तंमहौजसम् ।सुमुखंदुर्मुखीरामंकामयामासराक्षसी ॥८॥
वो राक्षसी में कोई गुण नहीं था, चेहरा भी बुरा था। फिर भी उसने राम को चाहा जो गुणों से भरा था। राम तेज था और चेहरा भी अच्छा था। वो राक्षसी उसके लायक कहां थी?
Verses 9-10
जनस्यास्याल्पभाग्यत्वाद्वलिनीश्वेतमूर्धजा ।अकार्यमपहास्यं च सर्वलोकविगर्हितम् ॥९॥राक्षसानांविनाशायदूषणस्यखरस्य च ।चकाराप्रतिरूपासाराघवस्यप्रधर्षणम् ॥१०॥
इस औरत के किस्मत में अच्छा लिखा ही नहीं था। उसके चेहरे पर झुरियां थी और बाल सफेद हो चुके थे। उसने एक ऐसा काम किया जो सब लोग हंसने लगे और सब ने कहा यह बिलकुल गलत है। उसने राघव को हाथ उठाने की कोशिश की जब वो खुद ऐसी दिख नहीं रही थी। इस गलती से राक्षस तबाह हो गए, दूषण मारा और खर भी।
Verse 11
तन्निमित्तमिदंवैरंरावणेनकृतंमहत् ।वधायसीतासासीतादशग्रीवेणरक्षसा ॥११॥
इसी वजह से रावण ने इतना बड़ा दुश्मनी कर लिया। उसने सीता को उठा लिया, जो जनक की बेटी थी। दस सर वाले राक्षस ने यह किया। अब उसका खुद का खत्मा फिक्स हो गया।
Verse 12
न च सीतांदशग्रीवःप्राप्नोतिजनकात्मजाम् ।बद्धंबलवतावैरमक्षयंराघवेण च ॥१२॥
अब दस सर वाले राक्षस सीता को पा नहीं सकता। सीता जनक की बेटी है। राम ने उसके साथ हमेशा के लिए दुश्मनी कर ली है। यह दुश्मनी कभी खत्म नहीं होगी।
Verse 13
वैदेहींप्रार्थयानंतंविराधंप्रेक्षयराक्षसम् ।हतमेकेनरामेणपर्याप्तंतन्निदर्शनम् ॥१३॥
जब राक्षस विराधा सीता के पीछे पड़ा, राम ने अकेले उसे मार डाला। यह बात ही काफी है जो दिखाए कि उनमे कितना दम था।
Verse 14
चतुर्धशसहस्राणिरक्षसांभीमकर्मणाम् ।निहतानिजनस्थानेशरैरग्निशिखोपमैः ॥१४॥
जनस्थान में चौदह हज़ार राक्षस थे। सबसे बड़े बड़े काम करते थे, लोग डर जाते थे। लेकिन राम के तीर उन सबको मार दिए। वो तीर आग की लौ जैसा था।
Verse 15
खरश्चनिहतःसङ्ख्येदूषणस्त्रिशिरास्तथा ।शरैरादितसङ्काशैःपर्याप्तंतन्निदर्शनम् ॥१५॥
लड़ाई में खर मर गया, और उसके साथ दूषण और त्रिशिरस भी। राम की तीर सूरज की तरह चमक रहे थे। यह भी दिखाता है कि राम कितने ताकतवर थे।
Verse 16
हतोयोजनबाहुश्चकबन्दोरुदिराशनः ।क्रोधान्नादंनदन् सोऽथपर्याप्तंतन्निदर्शनम् ॥१६॥
कबन्ध भी मर गया। उसके हाथ बहुत लम्बे थे, और वो खून पीता था। वो गुस्से से चिल्लाता हुआ आया, फिर भी राम ने उसे मार डाला। यह भी सबित है।
Verse 17
जघानबलिनंरामस्सहस्रनयनात्मजम् ।वालिनंमेरुसङ्काशंपर्याप्तंतन्निदर्शनम् ॥१७॥
राम ने बलि को भी मारा। बलि बहुत ताकतवर था, इंद्र का बेटा था, मेरु पर्वत की तरह बड़ा लगता था। यह भी राम की ताकत का सबित है।
Verse 18
ऋष्यमूकेवसंश्चैवदीनोभग्नमनोरथः ।सुग्रीवःप्रापितोराज्यंपर्याप्तंतन्निदर्शनम् ॥१८॥
सुग्रीव ऋष्यमूक पर रहता था, उसका दिल टूटा हुआ था, उसकी कोई उम्मीद नहीं थी। फिर भी उसको वापस राज्य मिल गया। यह प्रूफ है कि सही इंसान को एंड में फायदा होता है।
Verse 19
धर्मार्थसहितंवाक्यंसर्वेषांरक्षसांहितम् ।युक्तंविभीषणेनोक्तंमोहत्तस्य न रोचते ॥१९॥
विभीषण ने जो बात कही थी, वो धरम के हिसाब से सही थी। सब राक्षसों के लिए अच्छी थी। लेकिन रावण पागल हो गया था, उसको वो बात समझ में नहीं आई। उसने सुन्ना ही नहीं चाहता था।
Verse 20
विभीषणवचःकुर्याद्यदिस्मधनदानुजः ।श्मशानभूतादुःखार्तानेयंलङ्काभविष्यति ॥२०॥
अगर रावण ने विभीषण की बात मान ली होती, तो आज लंका कब्रिस्तान नहीं बनता। इतना दुख न होता। लेकिन उसने सुना नहीं, अब भुगतना पड़ रहा है।
Verse 21
कुम्भकर्णंहतंश्रुत्वाराघवेणमहाबलम् ।अतिकायं च दुर्मर्षंलक्ष्मणेनहतंतदा ॥२१॥प्रियंचेन्द्रजितंपुत्रंरावणोनावबुध्यते ।
रावण को पता चला कि कुम्भकर्ण मर गया, राम ने मारा। अतिकाय भी मर गया, लक्ष्मण ने मारा। उसका अपना बेटा इंद्रजीत भी मर गया। इतना सब सुनने के बाद भी रावण का दिमाग नहीं हिला।
Verse 22
ममपुत्रोममभ्राताममभर्तारणेहतः ॥२२॥इत्येषश्रूयतेशब्दोराक्षसीनांकुलेकुले ।
राक्षसियों के घर घर में यह आवाज़ें गूंज रही थीं। मेरा बेटा मर गया, मेरा भाई मर गया, मेरा पति युद्ध में मर गया, यह सब रो के बोल रही थीं।
Verse 23
रथश्चाश्वाश्चनागाश्चहताःशतसहस्रशः ॥२३॥रणेरामेणशूरेणहताश्चापिपदातयः ।
रथ, घोड़े और हाथी, सब कुछ सौ-सौ, हज़ार-हज़ार की तादाद में टूट गए। युद्ध में राम ने इतना मारा कि पैदल सेना भी बच नहीं पाई।
Verse 24
रुद्रोवायदिवाविष्णुर्महेन्द्रोवाशतक्रतुः ॥२४॥हन्तिनोरामरूपेणयदिवास्वयमन्तकः ।
क्या यह रुद्र है? या विष्णु? या फिर इंद्र? या फिर खुद मृत्यु आया है? राम के रूप में हम सब को मारे जा रहा है।
Verse 25
हतप्रवीरारामेणनिराशाजीवितेवयम् ॥२५॥अपश्य्नत्योभयस्यान्तमनाथाविलपामहे ।
हमारे सबसे बड़े योद्धा राम के हाथ से मर गए। अब जीने की कोई उम्मीद नहीं बची। इस ख़त्म होने का कोई एंड नहीं दिखता। हम जैसे कोई हमारे नहीं हो, वैसे ही रो रहे हैं।
Verse 26
रामहस्ताद्धशग्रीवश्शूरोदत्तमहावरः ॥२६॥इदंभयंमहाघोरंसमुत्पन्नं न बुध्यते ।
दशग्रीव बड़ा योद्धा था, भगवान से बून्स भी मिले थे। लेकिन राम के हाथ से जो ख़तरा उठा है, वो इतना बड़ा है, उससे वो समझ ही नहीं पा रहा।
Verse 27
तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ॥२७॥उपसृष्टंपरित्रातुंशक्तारामेणसम्युगे ।
जब राम लड़ाई में किसी पे टूट पड़ता है, तो उस्से बचाना किसी के बस की बात नहीं है। ना देवता कर सकते हैं, ना गंधर्व, ना पिशाच, ना राक्षस, कोई नहीं बचा सकता।
Verse 28
त्पताश्चापिदृश्यन्तेरावणस्यरणेरणे ॥२८॥कथयन्तिहिरामेणरावणस्यनिबर्हणम् ।
रावण के लिए हर लड़ाई में बुरी निशानियाँ दिख रही हैं। जो भी देख रहा है वो कहता है कि राम के हाथ से रावण का खत्म होना पक्का है।
Verse 29
पितामहेनप्रीतेनदेवदानवराक्षसैः ॥२९॥रावणस्याभयंदत्तंमनुष्येभ्यो न याचितम् ।
ब्रह्मा खुश हो के रावण को वरदान दिया था कि देवता, दानव, राक्षस, कोई उसे मार नहीं सकता। लेकिन इंसान से बचने की बात उसने सोची ही नहीं था।
Verse 30
तदिदंमानुषंमन्येप्राप्तंनिःसंशयंभयम् ॥३०॥जीवितान्तकंघोरंरक्षसांरावणस्य च ।
इसलिए मैं समझता हूँ कि यह डर एक इंसान की वजह से आया है। यह डर पक्का है, और बहुत खतरनाक है। राक्षस और रावण दोनों के लिए यह जान लेवा है।
Verse 31
पीड्यमानास्तुबलिनावरदानेनरक्षसा ॥३१॥दीप्स्सैस्तपोभिर्विबुधाःपितामहमपूजयन् ।
एक राक्षस ने बहुत ताकत पा ली थी। उससे परेशान होके देवता लोग ब्रह्मा के पास गए। उन्होंने अपनी तपस्या से ब्रह्मा की पूजा की। ब्रह्मा को खुश करने के लिए बहुत जाप किया।
Verse 32
देवतानांहितार्थायमहात्मावैपितामहः ॥३२॥उवाचदेवताःसर्वाइदंतुष्टोमहद्वचः ।
ब्रह्मा देवता लोगों की मदद करना चाहते थे। वो खुश हो गए और सब देवता लोगों से बात की। उन्होंने कहा कि अब तुम लोगों की प्रॉब्लम का हल होगा।
Verse 33
अद्यप्रभृतिलोकांस्त्रीन् सर्वेदानवराक्षसाः ॥३३॥भयेनप्रावृतानित्यंविचरिष्यन्तिशाश्वतम् ।
ब्रह्मा ने कहा कि आज से अब असुर और राक्षस लोग डर में रहेंगे। तीनों दुनिया में घूमेंगे मगर हमेशा डर से घबराए हुए। अब उनका वो पुराना दम नहीं रहेगा।
Verse 34
दैवतैस्तुसमागम्यसर्वैश्चेन्द्रपुरोगमैः ॥३४॥वृषध्वजस्त्रिपुरहामहादेवःप्रसादितः ।
फिर सब देवता लोग एक साथ मिलकर शिव के पास गए। इंद्र सबसे आगे था। उन्होंने शिव जी को खुश किया। शिव बड़े देवता हैं और त्रिपुरा नाम के राक्षस को मारा था।
Verse 35
प्रसन्नस्तुमहादेवोदेवानेतद्वचोऽब्रवीत् ॥३५॥उत्पत्स्यतिहितार्थंवोनारीरक्षःक्षयावहा ।
शिव जी खुश हो गए और देवता लोगों से बोले। उन्होंने कहा कि तुम लोगों के भले के लिए एक लड़की पैदा होगी। वो लड़की राक्षस लोगों का नाश करेगी। सब कुछ ठीक कर देगी।
Verse 36
एषादेवैःप्रयुक्तातुक्षुद्यथादानवान् पुरा ॥३६॥भक्षयिष्यतिनःसीताराक्षसघ्नीसरावणान् ।
देवियों ने सीता को इस काम के लिए भेजा है। वो रावण और उसके सारे राक्षस खा जाएगी। जैसे भूख ने पहले दानवों को खा लिया था, वैसे ही यह भी खा जाएंगी।
Verse 37
रावणस्यापनीतेनदुर्विनीतस्यदुर्मतेः ॥३७॥अयंनिष्टानकोघोरंशोकेनसमभिप्लुतः ।
रावण ने बड़ा बुरा काम किया। वो पागल और बुरे इरादे वाला था। अब हम सबके ऊपर बड़ा बड़ा मुसीबत आ गई है। ग़म हमें छोड़ ही नहीं रहा।
Verse 38
तंन पश्यामहेलोकेयोनःशरणदोभवेत् ॥३८॥राघवेणोपसृष्टानां कालेनेव युगक्षये ।
राम ने हमें इतना मारा कि हमें कोई भी नहीं बचा रहा। दुनिया में कोई नहीं है जहाँ हम जा सकें। जैसे युग खत्म होने पर काल सबको खत्म कर देता है, वैसे ही हम भी खत्म हो रहे हैं।
Verse 39
नास्तिनःशरणंकश्चिद्भयेमहतितिष्ठताम् ॥३९॥दावाग्निवेष्टितानांहिकरेणूनांयथावने ।
हम तो बड़े डर में फंस गए हैं। कोई जगह नहीं बची जहाँ हम छुप सकें। जैसे जंगल में आग लग जाए और हाथियाँ फंस जाएँ, वैसे ही हम भी फंस गए हैं।
Verse 40
प्राप्तकालंकृतंतेनपौलस्त्येनमहात्मना ॥४०॥यतएवंभयंदृष्टंतमेवशरणंगतः ।
वो बड़ा आदमी पौलस्त्य वंश का था। उसने देखा कि अब डर्र हो गया है। समझ गया कि वक्त आ गया है। सिर्फ उसी के पास गया और शरण में आ गया।
Verse 41
इतीवसर्वारजनीचरस्त्रियःपरस्परंसम्परिरभ्यबाहुभिः ।विषेदुरार्तातिभयाभिपीडिताविनेदुरुच्चैश्चतदासुदारुणम् ॥४१॥
रात के घूमने वाली सब औरतें एक दूसरे को पकड़ के बैठ गई। बहुत डर्र गई, दिल टूट गया। फिर ज़ोर से रोने लगी, आवाज़ निकल गई जो सुन के डर्र लगता था।
The chapter foregrounds the ethical failure of kingship: Rāvaṇa’s refusal to heed Vibhīṣaṇa’s dharmic counsel and his continuation of adharma (notably Sītā’s abduction) despite clear evidence of Rāma’s capacity, thereby converting a preventable conflict into collective catastrophe.
The sarga teaches that adharma generates a chain of consequences that expands from individual misconduct to societal ruin; counsel aligned with dharma is a stabilizing force, while moha (delusion) in leadership magnifies suffering and accelerates downfall.
Laṅkā is depicted as the war’s social center of mourning and fear; Janasthāna and Ṛṣyamūka are recalled as earlier theatres of Rāma’s decisive actions, used as cultural-memory landmarks to interpret present events and validate Rāma’s prowess.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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