
औषधिपर्वताहरणम् / The Retrieval of the Herb-Bearing Mountain
युद्धकाण्ड
Sarga 74 records a mass-casualty crisis after Indrajit’s Brahmāstra-network renders Rāma and Lakṣmaṇa unconscious and devastates the vānara host. The leadership field collapses into confusion; Vibhīṣaṇa, as the foremost strategist among the wise, reassures the commanders by framing the event as the unavoidable consequence of honoring a creator-conferred weapon. With Hanumān, he surveys the wounded and fallen, locating the aged Jāmbavān pierced by arrows. A brief but pointed dialogue follows: Jāmbavān, unable to see, identifies Vibhīṣaṇa by voice and insists that hope of survival hinges on Hanumān’s continued life and action. Hanumān then approaches with formal reverence, restoring Jāmbavān’s morale. Jāmbavān issues a precise operational directive: fly beyond the sea to Himavat, locate the herb-mountain between Ṛṣabha and Kailāsa, and bring the four medicines—Mṛtasañjīvanī, Viśalyakaraṇī, Suvarṇakaraṇī, and Sandhānakaraṇī. Hanumān’s takeoff is depicted through cosmic-scale kinetic imagery (earth and ocean shaking, mountains pressed and shattered). Reaching the Himalayas, the herbs conceal themselves; Hanumān uproots the entire peak and returns. The fragrance of the herbs revives the princes and restores vānara warriors instantly, reconstituting the coalition’s fighting capacity.
Verse 1
तयोस्तदासादितयोरणाग्रेमुमोहसैन्यंहरिपुङ्गवानाम् ।सुग्रीवनीलाङ्गदजाम्बवन्तो न चापिकिञ्चित्प्रतिपेदिरेते ॥१॥
जब दोनों योद्धा आगे ही मारे गए तो वानर सेना का पूरा सिस्टम खराब हो गया। सुग्रीव, नील, अंगद और जाम्बवान भी समझ में नहीं आया कि अब क्या करना चाहिए।
Verse 2
ततोविषण्णंसमवेक्ष्यसैन्यंविभीषणोबुद्धिमतांवरिष्ठः ।उवाचशाखमृगराजवीरानाश्वासयन्नप्रतिमैर्वचोभिः ॥२॥
विभीषण देखता है कि सेना का मूड खराब है। वो सबसे बड़ा ज्ञानी है। उसने बंदर के सरदारों को समझाया। उसके बात में इतनी ताकत थी कि सबको कम्फर्ट मिला।
Verse 3
माभैष्टनास्त्यत्रविषादकालोयदार्यपुत्त्रौविवशौविषण्णौ ।स्वयम्भुवोवाक्यमथोद्वहन्तौयत्सादिताविन्द्रजिदस्त्रजालैः ॥३॥
डर्रो मत, यह वक्त नहीं है हाथ पे रखने का। दोनों अच्छे बेटे, जब इंद्रजीत के अस्त्र से मारे गए थे, तब भी ब्रह्मा के नियम को फॉलो कर रहे थे। वो दोनों थके हुए थे, दिल टूटा हुआ था, पर फिर भी लड़ते रहे।
Verse 4
तस्मैतुदत्तंपरमास्त्रमेतत्स्वयम्भुवाब्राह्मममोघवेगम् ।तन्मानयन्तौयुधिराजपुत्रौनिपातितौकोऽत्रविषादकालः ॥४॥
ब्रह्मा ने उसे वोह स्पेशल अस्त्र दिया था जो कभी चूकता नहीं है। अगर वोह अस्त्र इतना पावरफुल है, तो दोनों राजा पुत्र गिर गए होंगे। अब दुख करने का कोई मतलब नहीं बनता।
Verse 5
ब्राह्ममस्त्रंततोधीमान्मानयित्वातुमारुतिः ।विभीषणवचश्श्रुत्वाहनूमांस्तमथाब्रवीत् ॥५॥
मारुति समझदार था। उसने ब्रह्मा के अस्त्र की इज़्ज़त की। विभीषण की बात सुनी। फिर हनुमान ने उसे जवाब दिया।
Verse 6
एतस्मिन्निहतेसैन्येवानराणांतरस्विनाम् ।योयोधारयतेप्राणांस्तंतमाश्वासयाव ॥६॥
अब जब बंदरों की सेना टूट चुकी है, हम क्या करें? चलो हर उस बंदे के पास जाते हैं जो अभी तक साँस ले रहा है। उसका हौंसला बढ़ा देते हैं।
Verse 7
तावुभौयुगपवदीरौहनूमद्राक्षसोत्तमौ ।उल्काहस्तौतदारात्रौरणशीर्षेविचेरतुः ॥७॥
रात के अंधेरे में हनुमान और विभीषण साथ चले। दोनों हाथ में मशाल लिए। वो रणभूमि पर घूम रहे थे। मरे हुए बंदरों के बीच ढूँढ रहे थे कि कौन ज़िन्दा है।
Verses 8-9
भिन्नलाङ्गूलहस्तोरुपादाङ्गुळशिरोधरैः ।स्रवद्भिःक्षतजंगात्रैःप्रस्रवद्भिस्ततस्ततः ॥८॥पतितैःपर्वताकारैर्वानरैरभिसङ्कुलाम् ।शस्सैश्चपतितैर्दीप्तैर्ददृशातेवसुन्धराम् ॥९॥
वो देखते हैं कि ज़मीन पर पहाड़ जैसी बॉडी वाले बंदर पड़े हैं। किसी की पूँछ काटी गई है। किसी की टाँगें टूटी हैं। किसी के हाथ-पैर टूटे हैं। किसी की गर्दन कट गई। खून बह रहा है। बिल्कुल बुरा हाल है।
Verses 10-11
सुग्रीवमङ्गदंनीलंशरभंगन्धमादनम् ।गवाक्षं च सुषेणं च वेगदर्शिनमाहुकम् ॥१०॥मैन्दंनळंज्योतिमुखंद्विविदंपनसंतथा ।विभीषणोहनूमांश्चददृशातेहतान् रणे ॥११॥
विभीषण और हनुमान ने देखा कि रण भूमि में बड़े बड़े लोग गिर पड़े हैं। सुग्रीव, अंगद, नील, शरभ, गंधमादन, गवाक्ष, सुषेण और आहुक सब ज़मीन पे थे। मैन्द, नल, ज्योतिमुख, द्विविद और पनस भी वही थे।
Verse 12
सप्तषष्टिर्हताःकोट्योवानराणांतरस्विनाम् ।अह्नःपञ्चमशेषेणवल्लभेनस्वयम्भुवः ॥१२॥
दिन के आखरी हिस्से में, सत्तर करोड़ के करीब वानर मारे गए। इंद्रजीत ने उन्हे मारा, जो ब्रह्मा का प्यारा था। वो सब तेज़ और ताकतवाले वानर थे।
Verse 13
सागरौघनिभंभीमंदृष्टवाबाणार्दितंबलम् ।मार्गतेजाम्बवन्तंस्मिहनूमान् सविभीषणः ॥१३॥
हनुमान और विभीषण देखते हैं कि बंदरों की सेना पे तीर बरसा दिए गए। जैसे समुंदर में तूफ़ान हो, ऐसे ही सब टूटा हुआ है। अब वो जाम्बवंत को ढूँढने लगे कि वो कहाँ है।
Verse 14
स्वभावजरयायुक्तंवृद्धंशरशतैश्चितम् ।प्रजापतिसुतंवीरंशाम्यन्तमिवपावकम् ॥१४॥दृष्टवातमुपसङ्ग्रम्यपौलस्त्योवाक्यमब्रवीत् ।
जाम्बवान को देखा। उम्र के साथ-साथ बॉडी झुक गयी थी। सौओं के तीर उसमें लगे थे। वो प्रजापति का बेटा था, एक बहादुर वीर। बिल्कुल ऐसी जैसे बुझती हुई आग हो। विभीषण ने उसे देख कर पास जाके बात की।
Verses 15-16
च्चिदार्यशरैस्तीक्ष्णैर्नप्राणाध्वंसितास्तव ॥१५॥विभीषणवचश्श्रुत्वाजाम्बवानृक्षपुङ्गवः ।कृच्छ्रादभ्युग्दिरन्वाक्यमिदंवचनमब्रवीत् ॥१६॥
विभीषण ने कहा, आर्य जाम्बवान, यह तीर तो तुम्हारी जान नहीं ले पाए। जाम्बवान ने यह सुना। मुश्किल से बोलते हुए उसने जवाब दिया।
Verse 17
नैरृतेन्द्रमहावीर्यस्वरेणत्वाऽभिलक्ष्ये ।पीड्यमानशशितैर्बाणैर्नत्वापश्यामिचक्षुषा ॥१७॥
अये राक्षसों के राजा, तुम बहुत बहादुर हो। मैं तुम्हारी आवाज़ से पहचाना। तीरों से दर्द हो रहा है, इसलिए आँखों से देख नहीं पा रहा।
Verse 18
अञ्जनासुप्रजायेनमातरिश्वा च नैरृत ।हनुमान् वानरश्रेष्ठःप्राणान् धारयतेक्वचित् ॥१८॥
अये राक्षस, बताओ क्या हनुमान अभी ज़िंदा है? वो अंजना का बेटा है, पवन देव का बेटा। वो सबसे बड़ा वानर है। क्या उसमें साँस अभी भी चल रही है?
Verse 19
श्रुत्वाजाम्बवतोवाक्यमुवाचेदंविभीषणः ।आर्यपुत्रावतिक्रम्यकस्मात्पृच्छसिमारुतिम् ॥१९॥
जाम्बवान की बात सुन कर विभीषण बोला। आर्य, इतने सारे लोग हैं यहाँ। इन सबको छोड़ के तुमने सिर्फ हनुमान के बारे में क्यों पूछा?
Verse 20
नैवराजनिसुग्रीवेनाङ्गदेनापिराघवे ।आर्यसन्दर्शितस्स्नेहोयथावायुसुतेपरः ॥२०॥
आर्य, तुम इतना प्यार किसी पे नहीं करते। न राजा सुग्रीव पे, न अंगद पे, न राम पे। जो प्यार तुम हनुमान के लिए करते हो, वैसा किसी के लिए नहीं।
Verse 21
विभीषणवचश्श्रुत्वाजाम्बवान्वाक्यमब्रवीत् ।शृणुनैरृतशार्दूलयस्मात् पृच्छामिमारुतिम् ॥२१॥
जाम्बवान ने विभीषण की बात सुनी। फिर बोला, सुनो, तुम राक्षसों में बड़े हो। मैं इसलिए पूछ रहा हूँ कि हनुमान कैसा है।
Verse 22
तस्मिन्जीवतिवीरेतुहतमप्यहतंबलम् ।हनूमत्युज्झितप्राणेजीवन्तोऽपिवयम् हृता ॥२२॥
जब तक हनुमान जिंदा है, तब तक हमारी सेना टूटी भी हो तो कोई बात नहीं। मगर अगर हनुमान मर गया, तो हम सब जिंदा होके भी मर गए जैसे हैं।
Verse 23
धरतेमारुतिस्तातमारुतप्रतिमोयदि ।वैश्वानरसमोवीर्वेजीविताशाततोभवेत् ॥२३॥
बेटा, अगर हनुमान में साँस है, तो उम्मीद है। वो हवा के जैसा है, और अग्नि के जैसी ताकत रखता है। उसकी साँस से हमें जीने की उम्मीद मिलती है।
Verse 24
ततोवृद्धमुपागम्यनियमेनाभ्यवादयत् ।गृह्यजाम्बवतःपादौहनूमान्मारुतात्मजः ॥२४॥
फिर हनुमान वहाँ गया। जाम्बवान बूढ़े थे। हनुमान ने उनके पाँव पकड़े और प्रणाम किया। सब सही तरीके से किया।
Verse 25
श्रुत्वाहनुमतोवाक्यंतदाऽपिव्यथितेन्द्रियः ।पुनर्जातमिवात्मानंमन्यतेप्लवगोत्तमः ॥२५॥
हनुमान की बात सुन के वानरों का सबसे बड़ा सरदार काँप गया था। पर उसके बाद भी उसको लगा जैसे वो फिर से पैदा हो गया हो।
Verse 26
ततोऽब्रवीन्महातेजाहनूमन्तं स जाम्बवान् ।आगच्छहरिशार्दूल वानरांस्त्रातुमर्हसि ॥२६॥
फिर जाम्बवान, जो बहुत तेज था, हनुमान से बोला। बोला, आ जाओ बंदरों के शेर। तुम्हे वानरों को बचाना पड़ेगा।
Verse 27
नान्योवक्रमपर्याप्तस्त्वमेषांपरमस्सखा ।त्वत्पराक्रमकालोऽयंनान्यंपश्यामिकथञ्चन ॥२७॥
कोई और इतना स्ट्रॉन्ग नहीं है। तम उनका सबसे बड़ा दोस्त हो। अब तुम्हारा टाइम है कुछ करना का। मैं किसी और को नहीं देख रहा।
Verse 28
ऋक्ष्वानरवीराणामनीकानिप्रहर्षय ।शल्यौकुरुचाप्येतासादितौरामलक्ष्मणौ ॥२८॥
रिक्ष और वानरों के सेना को खुश कर दो। राम और लक्ष्मण ज़ख्मी होके गिर पड़े हैं। उनसे वो तीर निकाल के ठीक कर दो।
Verse 29
गत्वापरममध्वानमुपर्युपरिसागरम् ।हिमवन्तंनगश्रेष्ठंहनुमन्गन्तुमर्हसि ॥२९॥
हनुमान, तुम्हे बहुत दूर जाना है। समुंदर के ऊपर से उड़ना है। हिमालय पहाड़ों में जाना है, सबसे बड़े पहाड़ पर।
Verse 30
ततःकाञ्चनमत्युच्चमृषभंपर्वतोत्तमम् ।कैलासशिखरंचापिद्रक्ष्यस्यरिनिषूदन ॥३०॥
फिर तुम देखोगे एक बहुत ऊँचा सोना का पहाड़। उसका नाम ऋषभ है, और वो सबसे बड़ा पहाड़ है। उसके साथ तुम कैलाश की चोटी भी देखोगे, दुश्मनों को खत्म करने वाले।
Verse 31
तयोशशिखरयोर्मध्येप्रदीप्तमतुलप्रभम् ।सर्यौषधियुतंवीर द्रक्ष्यस्यौषधिपर्यतम् ॥३१॥
हे वीर, इन दोनों पहाड़ों के बीच में एक और पहाड़ है। वो इतना चमक रहा है जैसे सूरज हो। उसपर सारी दवाइयाँ उग रही हैं, जो लोगों को ठीक करती हैं।
Verse 32
तस्यवानरशार्दूल चतस्रो मूधि सम्भवाः ।द्रक्ष्यस्योषधयोदीप्तादीपय्नत्योदिशोदश ॥३२॥
हे बंदरों के शेर, उस पहाड़ के ऊपर चार दवाइयाँ हैं। वो इतनी चमकदार हैं कि चारों तरफ रोशनी फैल जाती है। दसों दिशा में उनकी चमक दिखती है।
Verse 33
मृतसञ्जीवनींचैवविशल्यकरणीमपि ।सुवर्णकरणींचैवसन्धानकरणींतथा ॥३३॥
यह चार स्पेशल जड़ी-बूटियाँ हैं। मृतसंजीवनी, जो मरने वाले को जीवन दे। विशल्यकरणी, जो भेद भर देती है। सुवर्णकरणी, जो त्वचा को सोना जैसा चमक देती है। और संधानकरणी, जो टूटे हुए अंग को जोड़ देती है।
Verse 34
तास्सर्वाहनुमन्गृह्वक्षिप्रमागन्तुमर्हसि ।आश्वासयहरीन् प्राणैर्योज्यगन्धवहात्मज ॥३४॥
हनुमान, सारी वो जड़ियाँ ले और तुरंत वापस आ जा। पवन पुत्र, बंदरों की जान वापस ला और उन्हे फिर से हिम्मत दे।
Verse 35
श्रुत्वाजाम्बवतोवाक्यंहनूमान् हरिपुङ्गवः ।आपूर्यतबलोद्धर्षैस्तोयवेगैरिवार्णवः ॥३५॥
जाम्बवान की बात सुन के हनुमान, जो बंदरों में बड़ा था, उसमें ताकत भर गई। जैसे समुंदर में पानी की वेव उठ ती है, वैसे ही उसका बल बढ़ गया।
Verse 36
पर्वततटाग्रस्थःपीडयन् पर्वतोत्तमम् ।हनूमान्दृश्यतेवीरोद्वितीयइवपर्वतः ॥३६॥
हनुमान पहाड़ के किनारे खड़ा था और अपने पाँव नीचे उस बड़े पहाड़ को दबा रहा था। वो इतना बड़ा दिखता था जैसे दूसरा पहाड़ खड़ा हो।
Verse 37
हरिपादविनिर्भग्नोनिषसाद स पर्वतः ।न शशाकतदात्मानंसोढुंभृशनिपीडितः ॥३७॥
बंदर के पाँव से दब के वो पहाड़ डूबने लगा। इतना ज़ोर से दबा कि वो अपने आप को नहीं संभाल पाया।
Verse 38
तस्यपेतुर्नगाभूमौहरिवेगाच्चजज्वलुः ।शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्तपीडितस्यहनूमता ॥३८॥
हनुमान की स्पीड से पहाड़ के टुकड़े ज़मीन पर गिरने लगे और चमकने लगे। उसके ऊपर की नोक जैसे शिखर टूट के बिखर गए जब हनुमान ने उसे दबा दिया।
Verse 39
तस्मिन् सम्पीड्यमानेतुभग्नद्रुमशिलातले ।न शेकुर्वानरास्स्थातुंघूर्णमानेनगोत्तमे ॥३९॥
जब वोह पहाड़ दबा रहा था, तो उसके ऊपर पेड़ टूट गए और पत्थर टूट गए। वानर लोग उस पहाड़ पर खड़े नहीं रह पा रहे थे क्योंकि वोह हिल रहा था।
Verse 40
साघूर्णितमहाद्वाराप्रभग्नगृहगोपुरा ।लङ्कात्रासाकुलारात्रौप्रवृत्तेवाभवत्तदा ॥४०॥
लंका के बड़े दरवाज़े हिल रहे थे और घर टूट रहे थे। रात में डर के मारे पूरी लंका ऐसे हिल रही थी जैसे कोई नाच रहा हो।
Verse 41
पृथिवीधरसङ्काशोनिपीड्यधरणीधरम् ।पृथिवींक्षोभयामाससार्णवांमारुतात्मजः ॥४१॥
हनुमान, जो पवन पुत्र है, इतना बड़ा था जैसे कोई पहाड़ हो। उसने वोह पहाड़ को दबा दिया और धरती हिल गई, समुंदर भी हिल गए।
Verses 42-45
आरुरोहतदातस्माद्धरिर्मलयपर्वतम् ।मेरुमन्दरसङ्काशंनानाप्रस्रवणाकुलम् ॥४२॥नानाद्रुमलताकीर्णंविकासिकमलोत्पलम् ।सेवितंदेवगन्धर्वैष्षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥४३॥विद्याधरैर्मुनिगणैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।नानामृगगणाकीर्णंबहुकन्दरशोभितम् ॥४४॥सर्वानाकुलयंस्तत्रयक्षगन्धर्वकिन्नरान् ।हनुमान् मेघसङ्काशोववृधेमारुतात्मजः ॥४५॥
हनुमान उस पहाड़ से फाँद कर मलय पहाड़ पर गया। वो पहाड़ मेरु और मंदर जैसा बड़ा था। वहाँ कई पानी के चश्मे थे, पेड़-बेलियाँ थी, कमल खिले थे। देवी-देवता और गंधर्व वहाँ आते थे। वो पहाड़ साठ योजन ऊँचा था। विद्याधर, अप्सरा और रिशि भी वहाँ थे। हर तरह के हिरन थे, कई गुफा थी। यक्ष, गंधर्व, किन्नर, सब वहाँ रहते थे। हनुमान वहाँ बादल की तरह फैल गया।
Verse 46
पद्भ्यांतुशैलमापीड्यबडबामुखवन्मुखम् ।विवृत्योग्रंननादोच्चैस्त्रासयन्निवराक्षसान् ॥४६॥
उसने पहाड़ को अपने पाँव से दबाया। उसका मुँह खुला जैसे बड़बामुख की तरह। वो ज़ोर से चिल्लाया, राक्षसों को डराने के लिए।
Verse 47
तस्यनानद्यमानस्यश्रुत्वानिनदमद्भुतम् ।लङ्कास्थाराक्षसास्सर्वे न शेकुस्स्पन्दितुंभयात् ॥४७॥
जब वो चिल्लाया तो आवाज़ अजब थी। लंका के सारे राक्षस उस आवाज़ को सुनके डर गए। इतना डर कि हिलना भी नहीं पा रहे थे।
Verse 48
नमस्कृत्वाऽथरामायमारुतिर्भीमविक्रमः ।राघवार्थेपरंकर्मसमीहतपरन्तपः ॥४८॥
फिर मारुति ने राम को प्रणाम किया। वो दुश्मनों के लिए भयानक था। उसने राघव के लिए एक बड़ा काम करने का फैसला किया।
Verse 49
स पुच्छमुद्यम्यभुजङ्गकल्पंविनम्यपृष्ठंश्रवणेनिकुञ्च्य ।विवृत्यवक्त्रंबडबामुखाभमापुफ्लुवेव्योमनिचण्डवेगः ॥४९॥
उसने अपनी दुम उठाई जैसे साँप काँप रहा हो। उसने अपना पीठ झुकाया और कान अंदर कर लिए। मुँह खोला जैसे आग निकल रही हो। फिर वो आसमान में ज़ोर से उड़ गया।
Verse 50
सवृक्षषण्डांस्तरसाजहारशैलान् शिलाःप्राकृतवानरांश्च ।बाहूरुवेगोद्धतसम्प्रणुन्नास्तेक्षीणवेगास्सलिलेनिपेतुः ॥५०॥
वो पेड़ और पहाड़ उठा के ले गया। पत्थर भी उठाए। साथ में कुछ बंदर भी चल पड़े। लेकिन ज़ोर इतना था कि वो गिर के पानी में गिर गए।
Verse 51
तौप्रसार्योरगभोगकल्पौभुजौभुजङ्गारिनिकाशवीर्यः ।जगाममेरुंनगराजमग्य्रंदिशःप्रकर्षन्निववायुसूनुः ॥५१॥
उसने अपने बाहों को फैलाया जैसे साँप काँप रहा हो। पवन पुत्र था, ताकत गरुड़ जैसी थी। वो मेरु पहाड़ की तरफ गया। इतनी तेज़ी से गया जैसे आसमान को खींच के ले जा रहा हो।
Verse 52
स सागरंघूर्णितवीचिमालंतथाभृशंभ्रामितसर्वसत्त्वम् ।समीक्षमाणस्सहसाजगामचक्रंयथाविष्णुकराग्रमुक्तम् ॥५२॥
समुंदर की लहरें घूम रही थीं और उसमे सब जीव हिल रहे थे। उसने यह सब देखा और तुरंत आगे बढ़ा। बिल्कुल वैसे जैसे विष्णु का चक्र हाथ से निकल जाता है।
Verse 53
स पर्वतान्वृक्षगवान् सरांसिनदीस्तटाकानिपुरोत्तमानि ।स्फीतान् जनान्तानपिसम्प्रवीक्ष्यजगामवेगापतितृतुल्यवेगः ॥५३॥
उसने पहाड़ों को देखा, जंगल वाली जगह को, झीलों को, नदियों को और बड़े शहरों को भी। लोग बस रहे थे वहाँ। वो इतनी तेज़ी से गया जैसे उसके बाप की स्पीड हो।
Verse 54
आदित्यपथमाश्रित्यजगाम स गतक्लमः ।हनूमांस्त्वरितोवीरःपितृतुल्यपराक्रमः ॥५४॥
हनुमान थका नहीं था। वो सूरज के रास्ते पर चलता रहा। वो बहुत बहादुर था और उसकी ताकत उसके बाप जैसी थी।
Verse 55
जवेनमहतायुक्तोमारुतिर्मारुतोयथा ।जगामहरिशार्दूलोदिशश्शब्देनपूरयन् ॥५५॥
हनुमान की स्पीड बहुत ज़्यादा थी। वो हवा की तरह उड़ रहा था। उसकी आवाज़ चारों तरफ गूँज रही थी।
Verse 56
स्म्मरन्जाम्बवतोवाक्यंमारुतिर्वातरंहसा ।ददर्शसहसागत्वाहिमवन्तंमहाकपिः ॥५६॥
हनुमान जाम्बवन की बात याद कर रहा था। वो हवा की तरह तेज़ था। अचानक उसने हिमालय पहाड़ को देख लिया।
Verse 57
नानाप्रस्रवणोपेतंनानाकन्दरनिर्घरम् ।श्वेताभ्रचयसङ्काशैशशिखरैश्चारुदर्शनैः ॥५७॥शोभितंविविधैर्वृक्षैरगमत्पर्वतोत्तमम् ।
वो एक बड़ा पहाड़ पे पहुंचा। उसमे कई झरनियाँ थी, गुफाएँ थी, पानी गिर रहा था। हर तरह के पेड़-पौधे थे। पहाड़ की चोटियाँ इतनी सुंदर थी, जैसे सफेद बादल ढेरियाँ पड़ी हैं।
Verse 58
स तंसमासाद्यमहानगेन्द्रमतिप्रवृद्धोत्तमघोरशृङ्गम् ।ददर्शपुण्यानिमहाश्रमाणिसुरर्षिसंघोत्तमसेवितानि ॥५८॥
जब वो उस बड़े पहाड़ के पास गया, तो देखा कि उसकी चोटियाँ बहुत ऊंची और खतरनाक थी। वहाँ बड़े-बड़े आश्रम थे। देवता और रिशि लोग वहाँ आते जाते थे।
Verse 59
स ब्रह्मकोशंरजतालयं च शक्रालयंरुद्रशरप्रमोक्षम् ।हयाननंब्रह्मशिरश्चदीप्तंददर्शवैवस्वतकिङ्करांश्च ॥५९॥
वहाँ उसने ब्रह्मा का स्थान देखा, चाँदी जैसा चमकता हुआ। इंद्र का महल भी देखा। वो जगह भी देखी जहाँ रुद्र ने अपना तीर छोड़ा था। हयग्रीव, घोड़े के चेहरे वाले देवता, भी नज़र आया। ब्रह्मा का सिर जो चमक रहा था वो भी देखा। यम के सेवक भी वहाँ थे।
Verse 60
वज्रालयंवैश्रवणालयं च सूर्यप्रभंसूर्यनिबन्धनंच ।ब्रह्मासनंशङ्करकार्मुकं च ददर्शनाभिं च वसुन्धरायाः ॥६०॥
उसने वज्रालय देखा, कुबेर का घर जो सूरज जैसा चमक रहा था। वहाँ सूरज को बांधा गया था। ब्रह्मा का आसन भी देखा, शंकर का धनुष भी। धरती का भी वो खास हिस्सा देखा।
Verse 61
कैलासमग्य्रंहिमवच्छिलां च तथर्षभंकाञ्चनशैलमग्य्रम् ।सन्दीप्तसर्वौषधिसन्प्रदीप्तंददर्शसर्वौषधिपर्वतेन्द्रम् ॥६१॥
हनुमान ने ऊंची कैलाश पर्वत देखा। हिमालय की चट्टानें भी नज़र आई। फिर उसने ऋषभ पर्वत देखा जो सोना जैसा चमक रहा था। आखरी में वो पर्वत आया जहां सारी दवाइयों की जड़-बूटियां जल रही थिन और चमक रही थिन।
Verse 62
स तंसमीक्ष्यानलरश्मिदीप्तंविसिष्मियेवासवदूतसूनुः ।आवृत्यतंचौषधिपर्वतेन्द्रंतत्रौषधीनांविचयंचकार ॥६२॥
जब हनुमान ने देखा कि वो पर्वत आग की तरह चमक रहा है, तो वो हैरान हो गया। वो वायु पुत्र था और देवता का दूता भी। उसने उस पर्वत के चारों तरफ चक्कर लगाया। वो दवाइयों की जड़-बूटियां ढूंढने लगा कि कौनसी है कौनसी नहीं।
Verse 63
सयोजनसहस्राणिसमतीत्यमहाकपिः ।दिव्यौषधिधरंशैलंव्यचरन्मारुतात्मजः ॥६३॥
हनुमान बहुत बड़ा बंदर था और वायु का बेटा था। उसने हज़ारों योजन का सफ़र किया। फिर उस पर्वत पर गया जहां देवी जड़-बूटियां थिन। वो वहां घूमता रहा और दवाइयां ढूंढता रहा।
Verse 64
महौषध्यस्ततस्सर्वास्तस्मिन् पर्वतसत्तमे ।विज्ञायार्थिनमायान्तंततोजग्मुरदर्शनम् ॥६४॥
उस पर्वत पर बहुत पावरफुल जड़-बूटियां थिन। उन्होंने महसूस किया कि कोई उन्हें लेने आया है। तो वो सब गायब हो गई। कहीं भी नहीं दिख रही थिन।
Verse 65
स तामहात्माहनुमानपश्यंश्चुकोपकोपाच्चभृशंननाद ।अमृष्यमाणोऽनगिनिकाशचक्षुर्महीधरेन्द्रंतमुवाचवाक्यम् ॥६५॥
हनुमान ने जब जड़-बूटियां नहीं देखी तो उसका गुस्सा उबल पड़ा। वो ज़ोर से चिल्लाया। उसकी आंखें आग जैसी लाल हो गई थिन। गुस्से में उसने उस पर्वत से बोला कि तुम कहां छुप गए हो।
Verse 66
कीमेतदेवंसुविनिश्चितंतेयद्राघवेनासिकृतानुकम्प ।पश्याद्यमद्बाहुबलाभिभूतोविकीर्णमात्मानमथोनगेन्द्र ॥६६॥
यह क्या फैसला है तुम्हारा? राघव के लिए तुम्हे बिल्कुल रहम नहीं है? देखो अब, पहाड़ों के राजा। मेरी बाहों की ताकत तुम्हे तोड़ देगी। तुम बिखर के उड़ जाओगे।
Verse 67
स तस्यशृङ्गंसनगंसनागंसकाञ्चनंधातुसहस्रजुष्टम् ।विकीर्णकूटंज्वलिताग्रसानुंप्रगृह्यवेगात्सहसोन्ममाथ ॥६७॥
उसने वो पहाड़ की चोटी पकड़ ली। उसमे पेड़ थे, हाथी थे, सोने की चमक थी, और कई किसम के पत्थर थे। जैसे ही उसने ज़ोर लगाया, पत्थर टूटने लगे। चोटी में आग सी चमक उठी। एक झटके में उसने वो पूरा पहाड़ ऊपर से उखाड़ लिया।
Verse 68
सतसमुत्पाट्यखमुत्पपातवित्रास्यलोकान् ससुरासुरेन्द्रान् ।संस्तूयमानःखचरैरनेकैर्जगामवेगाद्गरुडोग्रवेगः ॥६८॥
उसने वो पहाड़ जड़ से उखाड़ लिया और आसमान में उड़ गया। उसकी स्पीड इतनी थी जैसे गरुड़ की। देवी-देवता और दानव के राजा, सब डर गए। आसमान में उड़ने वाले कई लोग उसकी तारीफ कर रहे थे।
Verse 69
स भास्कराध्वानमनुप्रपन्नस्तंभास्कराभंशिखरंप्रगृह्य ।बभौतदाभास्करसन्निकाशोरवेस्समीपेप्रतिभास्कराभः ॥६९॥
वो सूर्य के रास्ते के पास गया। वो पहाड़ जो उसने उठाया था, सूरज जैसा चमक रहा था। हनुमान भी चमक रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे दूसरा सूरज आ गया हो।
Verse 70
स तेनशैलेनभृशंरराजशैलोपमोगन्धवहात्मजस्तु ।सहस्रधारेणसपावकेनचक्रेणखेविष्णुरिवार्पितेन ॥७०॥
हनुमान उस पहाड़ के साथ चमक रहा था, आग जैसी चमक। वो खुद भी पहाड़ जैसा दिखता था। आसमान में वो ऐसे लगा जैसे विष्णु अपने चक्र के साथ खड़ा हो। वो चक्र में हज़ार धारें थी और आग जैसी चमक रही थी।
Verse 71
तंवानराःप्रेक्ष्यविनेदुरुच्चैस्सतानपिप्रेक्ष्यमुदाननाद ।तेषांसमुध्घुष्टरवंनिशम्यलङ्कालयाभीमतरंविनेदुः ॥७१॥
हनुमान को देख के सारे वानर ज़ोर से चिल्लाए, खुशी से। हनुमान भी उन्हें देख के ज़ोर से गुज्जा। लंका में रहने वाले लोग डर गए। उन्होंने वो आवाज़ सुनी और ज़ोर से चिल्लाए, डर में।
Verse 72
ततोमहात्मानिपपाततस्मिन् शैलोत्तमेवानरसैन्यमथ्ये ।हर्युत्तमेभ्यशशिरसाऽभिवाद्यविभीषणंतत्र स सस्वजे च ॥७२॥
फिर वो बड़ा आदमी उस पहाड़ के साथ नीचे आया। वो सीधा वानर की सेना के बीच में गया। उसने सर झुकाया और सबसे बड़े वानर को नमस्ते किया। वहाँ उसने विभीषण को भी गले लगा लिया।
Verse 73
तावप्युभौमानुषराजपुत्रौतंगन्धमाघ्रायमहौषधीनाम् ।बभूवतुस्तत्रतदाविशल्यावुत्तस्थुरन्ये च हरिप्रवीराः ॥७३॥
दोनों राजकुमार, राम और लक्ष्मण, उस पोधे की खुशबू में साँस लिए। वो दोनों ठीक हो गए, उनमें से भी और तीर नहीं रहे। और भी बहुत सारे वानर जो मारे हुए थे, वो भी उठ खड़े हुए।
Verse 74
सर्वेविशल्याविरुजाःक्षणेनहरिप्रवीराश्चहताश्चयेस्युः ।गन्धेनतासांप्रवरौषधीनांसुप्तानिशान्तेष्विवसम्प्रबुद्धाः ॥७४॥
एक पल में सारे वानर ठीक हो गए। जो भी ज़ख्मी थे और जो गिर पड़े थे, सबके सब उठे। वो पोधे की खुशबू ने सबका काम कर दिया। ऐसा लगा जैसे रात भर सो के सुबह लोग जाग उठें।
Verses 75-76
दाप्रभृतिलङ्कायांयुध्यन्तेहरिराक्षसाः ।तदाप्रभृतिमानार्थमाज्ञयारावणस्य च ॥७५॥येहन्यन्तेरणेतत्रराक्षसाःकपिकुञ्जरैः ।हताहतास्तुक्षिप्यन्तेसर्वएवतुसागरे ॥७६॥
जब से लंका में युद्ध शुरू हुआ, तब से वानर और राक्षस लड़ते आ रहे हैं। रावण का ऑर्डर था कि जो भी राक्षस मर जाए, उसको समुंदर में फेंक दो। इससे कोई प्रूफ नहीं बचता कि कितने लोग मारे। सब राक्षस वही मर गए और समुंदर में फेंक दिए गए।
Verse 77
ततोहरिर्गन्धवहात्मजस्तुतमोषधीशैलमुदग्रवेगः ।निनायवेगाद्धिमवन्तमेवपुनश्चरामेणसमाजगाम ॥७७॥
फिर हनुमान, जो पवन पुत्र है, उसने वो पर्वत उठा लिया जहाँ सारी दवाइयाँ थी। वो तेज़ी से हिमालय ले गया और वापस राम के पास आ गया।
The coalition faces a dharma-critical emergency: whether despair should dissolve duty after the princes fall unconscious. The text resolves it through disciplined action—Vibhīṣaṇa’s reassurance, Jāmbavān’s prioritization of collective survival, and Hanumān’s mission to heal rather than retaliate.
Hope is anchored in responsible agency: when fate manifests as overwhelming force (astra), the proper response is not denial but swift, skillful service (sevā) that restores life and moral order.
The narrative maps a medicinal geography: Himavat (Himalayas), Kailāsa, Ṛṣabha, and the herb-mountain (Oṣadhiparvata). It also preserves cultural protocols—Hanumān’s respectful foot-clasping of the elder Jāmbavān as a marker of disciplined hierarchy in crisis.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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