
कुम्भकर्णप्रस्थानम् तथा अङ्गदप्रेरणा (Kumbhakarna’s sortie and Angada’s rallying of the Vanaras)
युद्धकाण्ड
Sarga 66 stages a morale crisis and its resolution. Kumbhakarṇa, विशालः गिरिकूटोपमः, swiftly crosses Laṅkā’s boundary and roars so that the ocean reverberates, projecting psychological dominance. The Vānara forces, judging him ‘unassailable’ even by major deities, scatter in fear; some leap away without looking back, some fall into the sea, some seek caves, mountains, or trees, and some collapse as if dead. Aṅgada (Vāli’s son) intervenes as a battlefield leader: he commands a return, argues that flight without weapons invites social shame, and reframes death in righteous combat as preferable—either fame through victory or attainment of Brahmaloka if slain. His speech also critiques earlier self-praise now contradicted by panic. The routed troops respond that Kumbhakarṇa has wrought dreadful havoc and that life is dear; nevertheless, Aṅgada (with Hanumān’s supportive persuasion and exempla) restores cohesion. Re-formed commanders—Ṛṣabha, Śarabha, Mainda, Dhūmra, Nīla, Kumuda, Suṣeṇa, Gavākṣa, Rambha, Tārā, Dvivida, Panasa, and Hanumān—advance swiftly back to the रण, while rocks and blossoming trees hurled at Kumbhakarṇa shatter on his limbs, underscoring his terrifying durability as the battle resumes.
Verse 1
स लङ्घयित्वाप्राकारंगिरिकूटोपमोमहान् ।निर्ययौनगरात्तूर्णंकुम्भकर्णोमहाबलः ॥१॥
कुंभकर्ण बहुत बड़ा था, पहाड़ जैसा। उसने शहर की दीवार पार कर दी। फिर जल्दी से शहर से बाहर निकल गया।
Verse 2
ननाद च महानादंसमुद्रमभिनादयन् ।विजयन्निवनिर्घातन्विधमन्निवपर्वतान् ॥२॥
उसने एक बहुत बड़ा शोर मचाया। समुंदर गूँज गया जैसे किसी ने जीत का शोर किया हो। ऐसा लगा जैसे पहाड़ तोड़ दिए हो।
Verse 3
तमवध्यंमघवतायमेनवरुणेनवा ।प्रेक्ष्यभीमाक्षमायान्तंवानराविप्रदुद्रुवुः ॥३॥
जब वो आगे बढ़ने लगा, उसकी आँखें बहुत भयानी लग रही थीं। उस्से मारना मुश्किल था, इंद्र, यम या वरुण भी उसे नहीं मार सकते थे। यह देख के सारे वानरे डर के भाग गए।
Verse 4
तांस्तुविप्रद्रुतान् दृष्टवाराजपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।नलंनीलंगवाक्षं च कुमुदं च महाबलम् ॥४॥
वानर सेना डर के मारे भाग रही थी। यह देख के राजकुमार अंगद ने बोला। उसने नल, नील, गवाक्ष और कुमुद को बुलाया। वो सब बड़े बलवान थे।
Verse 5
आत्मानमत्रविस्मृत्यवीर्याण्यभिजनानि च ।क्वगच्छतभयत्रस्ताःप्राकृताहरयोयथा ॥५॥
तुम लोग अपने आप को भूल गए हो क्या? तुम्हारा खून, तुम्हारी हिम्मत - सब भूल गए? डर के मारे कहाँ भाग रहे हो? ऐसे भागो जैसे कोई साधरण बंदर हो।
Verse 6
साधुसौम्या निवर्तध्वंकिप्राणान्परिरक्षथ ।नालंयुद्धायवैरक्षोमहतीयंबिभीषका ॥६॥
अरे भैया, शांत हो जाओ। वापस जाओ। इतना डर के क्यों चिपके हो जान को बचाने के लिए? यह राक्षस लड़ने लायक नहीं है। बस दिखने में डरावना है, और कुछ नहीं।
Verse 7
महतीमुथतितामेनांराक्षसानांबिभीषिकाम् ।विक्रमाद्विधमिष्यामोनिवर्तध्वंप्लवङ्गमाः ॥७॥
भाई लोग, पीछे हट जाओ। हम अपनी ताकत से यह बड़ा डर तोड़ देंगे जो राक्षसों ने फैलाया है। पीछे हो जाओ, बंदर सेना।
Verse 8
कृच्छ्रेणतुसमाश्वस्यसङ्गम्य च ततस्ततः ।वृक्षाद्रिहस्ताहरयस्सम्प्रतस्थूरणाजिरम् ॥८॥
मुश्किल से अपने आप को संभाला। फिर सब जगह से एक जगह आ के जुड़ गए। हाथ में पेड़ और पत्थर लिए, वानर सेना मैदान की तरफ निकल पड़ी।
Verse 9
तेनिवृत्यतुसङ्कृद्धाःकुम्भकर्णंवनौकसः ।निर्जघ्नुःपरमक्रुद्धास्समदाइवकुञ्जराः ॥९॥
गुस्से में पीछे मुड़ गए। वानर लोग कुंभकर्ण पर टूट पड़े। इतना गुस्सा कि जैसे पागल हाथी हो।
Verse 10
प्रांशुभिर्गिरिशृङ्गैश्चशिलाभिश्चमहाबलः ।पादपैःपुष्पिताग्रैश्चहन्यमानो न कम्पते ॥१०॥
पहाड़ की चोटियाँ, पत्थर और फूलों वाले पेड़ से मारे जा रहे थे। वो बहुत ताकत वाला था। उसने एक बार भी हिलना नहीं।
Verse 11
तस्यगात्रेषुपतिताभिद्यन्तेशतशश्शिलाः ।पादपाःपुष्पिताग्राश्चभग्नाःपेतुर्महीतले ॥११॥
जब पत्थर उसके बदन पर गिरे तो सौओं के सौ टूट गए। फूलों वाले पेड़ भी टूट के ज़मीन पर गिर गए।
Verse 12
सोऽपिसैन्यानिसङ्क्रुद्धोवानराणांमहौजसाम् ।ममन्थपरमायत्तोवनान्यग्निरिवोत्थितः ॥१२॥
वो भी बहुत गुस्से में था। उसने उन वानर सेना को कुचल दिया। जैसे जंगल में आग लग जाए और सब कुछ जला दे।
Verse 13
लोहितार्द्रास्तुबहवश्शेरतेवानरर्षभाः ।निरस्तांपतिताभूमौताम्रपुष्पाइवद्रुमाः ॥१३॥
बहुत सारे बड़े वानर वहाँ ज़मीन पर पड़े थे। खून से सने हुए थे। गिराए हुए पेड़ जैसे ज़मीन पर पड़े हैं।
Verse 14
लङ्घयन्तःप्रधावन्तोवानरानावलोकयन् ।केचित्समुद्रेपतिताःकेचिद्गगनमास्थिताः ॥१४॥
वानर उछल उछल के भाग रहे थे। पीछे मुड़ के भी नहीं देख रहे थे। कुछ समुंदर में गिर गए। कुछ आसमान में उड़ गए।
Verse 15
वध्यमानास्तुतेवीराराक्षसेन च लीलया ।सागरंयेनतेतीर्णाःपथातेनदुद्रुवुः ॥१५॥
यह वीर लोग थे, लेकिन उस राक्षस ने उन्हे ऐसे मारा जैसे खेल रहा हो। वो लोग वही रास्ता पकड़ के भाग गए जिस से वो समुंदर पार किए थे।
Verse 16
तेस्थलानितदानिम्नंविवर्णमानाभयात् ।ऋक्षावृक्षान् समारूढाःकेचित्पर्वतमाश्रिताः ॥१६॥
डर के मारे उनका चेहरा पीला पड़ गया। कुछ लोग नीचे भाग गए। कुछ भालू पेड़ पर चढ़ गए और कुछ पहाड़ में छुप गए।
Verse 17
ममज्जुरर्णवेकेचिद्गुहाःकेचित्समाश्रिताः ।निपेतुःकेचिदपरेकेचिन्नैवावतस्थिरे ॥१७॥केचिद्भूमौनिपतिताःकेचित्सुप्तामृताइव ।
कुछ समुंदर में डूब गए। कुछ गुफाओं में भाग गए। कुछ वहीं गिर गए, कुछ अपनी जगह भी नहीं टिक पाए। कुछ ज़मीन पर गिर पड़े और कुछ ऐसे पड़े थे जैसे मर गए हो या गहरी नींद में हो।
Verse 18
तान्समीक्ष्याङ्गदोभग्नान्वानरानिदमब्रवीत् ॥१८॥अवतिष्ठतयुध्यामोनिवर्तध्वंप्लवङ्गमाः ।
अंगद ने देखा कि वानर लोग टूट चुके हैं और भाग रहे हैं। उसने कहा, "रुको, वापस जाओ बंदर लोग। चलो लड़ाई करते हैं।"
Verse 19
भग्नानांवो न पश्यामिपरिगम्यमहीमिमाम् ॥१९॥स्थानंसर्वेनिवर्तध्वंकिंप्राणान् परिरक्षथ ।
जो लोग हार के भाग रहे हैं, मैं उनके लिए कोई सेफ जगह नहीं देख रहा। पूरी दुनिया घूम लो, कोई जगह नहीं मिलेगी। सब लोग वापस जाओ। जान बचाने के लिए इज़्ज़त और धरम कैसे छोड़ सकते हो?
Verse 20
निरायुधानांद्रवतामसङ्गगतिपौरुषाः ॥२०॥दाराह्युपहसिष्यन्ति स वैघातस्तुजीवताम् ।
अरे बहादुर लोग, अगर तुम बिना हथियार के भाग जाओगे तो तुम्हारी अपनी बीवियाँ तुम्हारा मज़ाक उड़ाएंगी। ऐसे शर्मनाक हाल में जीना, मौत से भी बुरा है।
Verses 21-22
कुलेषुजातास्सर्वेस्मविस्तीर्णेषुमहत्सु च ॥२१॥क्वगच्छतभयत्रस्ताःहरयःप्राकृतायथा ।अनार्याःखलुयद्भीतास्त्यक्त्वावीर्यंप्रधावत ॥२२॥
तुम सब बड़े बड़े खानदान में पैदा हुए हो। तो फिर तुम डर के मारे भाग क्यों रहे हो जैसे साधारण बंदर हो? अपनी बहादुरी छोड़ के डर के भागना अच्छे लोगों के काम नहीं है।
Verse 23
विकत्थनानिवोयानि तदावैजनसंसदि ।तानिवःक्वनुयातानिसोदग्राणिम हितानि च ॥२३॥
जब सब लोगों के सामने तुमने इतनी बड़ी-बड़ी बातें की थी, इतनी शेखी थी। वो सब कहाँ गई अब? अब कहाँ गए वो बड़े जोश के बोल?
Verse 24
भीरुप्रवादाश्श्रूयन्तेयस्तुजीवतिधिक्कृतः ।मार्गस्सत्पुरुषैर्जष्टःसेव्यतांत्यज्यतांभयम् ॥२४॥
जो आदमी बुरा वक्त के बाद भी जी रहा है, लोग उस्से दरपोक बोलते हैं। अच्छे लोगों का रास्ता पकड़ो। उस रास्ते पे चलो। डर को छोड़ो।
Verse 25
शयामहेऽनिहताःपृथिव्यामल्पजीविताः ।दुष्प्रापंब्रह्मलोकंवाप्राप्नुयामोयुधिसूदिता ॥२५॥
अगर हमारी उमर कम भी हो और युद्ध में मर भी जाएँ, तो कोई बात नहीं। ऐसे मरने से हम ब्रह्मा के पास पहुँच जाएँगे। यह जगह पाना बहुत मुश्किल है।
Verse 26
सम्प्राप्नुयामःकीर्तिंवानिहत्वाशत्रुमाहवे ।जीवितंवीरलोकस्यमोक्ष्यामोवसुवानराः ॥२६॥
अगर हम दुश्मन को युद्ध में मार दें, तो हमारा नाम बन जाएगा। और अगर हम अपनी जान दे दें, तो हम वीरों की दुनिया में जाएँगे। हे वानर सेना के योद्धा।
Verse 27
न कुम्भकर्णःकाकुत्स्थंदृष्टवाजीवन् गमिष्यति ।दीप्यमानमिवासाद्यपतङ्गोज्वलनंयथा ॥२७॥
कुम्भकर्ण राम को देख के ज़िन्दा नहीं बचेगा। जैसे पतंगा आग में जाती है, वैसे ही वो भी उस्से बच नहीं पाएगा।
Verse 28
लायनेनचोद्धिष्टाःप्राणान् रक्षामहेवयम् ।एकेनबहवोभग्नायशोनाशंगमिष्यति ॥२८॥
हम बड़े योद्धा हैं, मगर अगर हम भाग के अपनी जान बचा लें, तो हमारी बदनामी हो जाएगी। एक आदमी से भागना शर्म की बात है। इज़्ज़त चली जाएगी।
Verse 29
एवंब्रुवाणंतंशूरमङ्गदंकनकाङ्गदम् ।द्रवमाणास्ततोवाक्यमूचुःशूरुविगर्हितम् ॥२९॥
अंगद ने जो बात कही, वो सुन के भागने वाले वानरे बोलने लगे। अंगद ने सोना पहने हुए हाथ में, और वो लोगों ने ऐसी बात कही जो किसी भी बहादुर के काबिल नहीं थी।
Verse 30
कृतंनःकदनंघोरंकुम्भकर्णेनरक्षसा ।न स्थानकालोगच्छामोदयितंजीवितंहिनः ॥३०॥
कुंभकर्ण ने हम पे बहुत बड़ा हमला किया है, बहुत लोग मारे हैं। अब यहाँ रुकने का टाइम नहीं है, भागो। जान बचाना ज़रूरी है, जान प्यारी है।
Verse 31
एतावदुक्त्वावचनंसर्वेतेभेजिरेदिशः ।भीमंभीमाक्षमायान्तंदृष्टवावानरयूथपाः ॥३१॥
इतना बोल के सारे वानरे भाग गए, हर तरफ भाग गए। उन्होंने देखा वो भयानी आँखों वाला आगे आ रहा है, डर के भाग गए।
Verse 32
द्रवमाणस्तुतेवीराअङ्गदेनवलीमुखाः ।सान्त्वैश्चैहनुमानैश्चततस्सर्वेनिवर्तिताः ॥३२॥
जब वो बहादुर भाग रहे थे, तब अंगद और हनुमान ने उन्हे रोका। उन्होंने समझाया, उत्साह दिया, और सारे वानरे वापस आ गए।
Verse 33
प्रहर्षमुपनीताश्चवालिपुत्रेणधीमता ।आज्ञाप्रतीक्षास्तस्थुश्चसर्वेवानरयूथपाः ॥३३॥
वाली के बेटे ने सब वानर सेना के कमांडर्स को फिर से हिम्मत दी। वो सब समझदार थे। अब वो सब तैयार खड़े थे, बस ऑर्डर का वेट कर रहे थे।
Verse 34
ऋषभशरभमैन्दधूम्रनीलाःकुमुदसुषेणगवाक्षरम्भताराः ।द्विविदपनसवायुपुत्रमुख्यास्त्वरिततराभिमुखंरणं ॥३४॥
ऋषभ, शरभ, मैंद, धूम्र, नीला और कुमुद, सुषेण, गवाक्ष, रम्भा, तारा - यह सब आगे बढ़ने लगे। द्विविद और पनस और पवन पुत्र सबसे आगे थे। जल्दी से युद्ध भूमि की तरफ जा रहे थे।
The dilemma is battlefield flight versus steadfast duty: the Vānara troops abandon formation under fear of Kumbhakarṇa, and Aṅgada confronts the dharmic cost of retreat—loss of honor, social ridicule, and betrayal of collective responsibility.
Aṅgada teaches that courage is a moral discipline: preserve dignity by returning to rightful action, accept death in dharma-yuddha as meaningful (fame or higher attainment), and treat fear as a condition to be mastered through reasoned exhortation and communal resolve.
Laṅkā’s प्राकार (defensive boundary) and the समुद्र/सागर (ocean crossed by the Vānara host) frame the episode, while caves, mountains, and trees function as flight-shelters that map the troops’ dispersal and subsequent reassembly.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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