
धूम्राक्षवधः (The Slaying of Dhumrākṣa)
युद्धकाण्ड
Sarga 52 depicts a concentrated battlefield episode in which the rākṣasa commander Dhumrākṣa returns to the front, provoking the vānaras’ war-cry and initiating a tumultuous engagement characterized by close-quarters violence and massed projectile fire. The chapter escalates through alternating descriptions of rākṣasa weaponry (arrows, tridents, clubs, iron bars, maces) and vānaras’ improvised martial ecology (trees, rocks, mountain fragments, fists, feet, teeth, nails). The soundscape is explicitly aestheticized: the twang of bowstrings, neighing, and elephant calls are framed as a kind of “battle-gāndharva” (symphonic metaphor), converting chaos into epic poetics. Dhumrākṣa briefly gains advantage by dispersing the vānaras with arrow-showers; Hanumān, seeing the allied army harassed, intervenes decisively. He hurls a massive rock at Dhumrākṣa’s chariot, forcing the rākṣasa to leap down; the chariot is crushed. The duel then sharpens: Dhumrākṣa strikes Hanumān with a spiked mace, but Hanumān, undeterred, drops a mountain peak onto Dhumrākṣa’s head, killing him. The surviving rākṣasas retreat into Laṅkā in fear, while the vānaras honor Hanumān, marking a morale and command shift within the war’s larger arc.
Verse 1
धूम्राक्षंप्रेक्ष्यनिर्यान्तंराक्षसंभीमविक्रमम् ।विनेदुर्वानरास्सर्वेप्रहृष्टायुद्धकाङ् क्षिणः ॥१॥
धूम्राक्ष नाम का राक्षस बाहर आया। वो बहुत बड़ा बलवान था और डरावना भी। वानर सेना ने उसे देखा और ज़ोर से चिल्लाई। वो सब लड़ने के लिए तैयार थे और खुश भी थे।
Verse 2
तेषांसुतुमुलंयुद्धंसञ्जज्ञेकपिरक्षसाम् ।अन्योन्यंपादपैर्घोरंनिघ्नतांशूलमुद्गरैः ॥२॥
वानरों और रक्षसों में बड़ा जंग शुरू हो गया। वानरों ने पेड़ उखाड़ के मारना शुरू किया। रक्षसों के पास बला और त्रिशूल थी। दोनों तरफ से एक दूसरे पे ज़ोर से वार हो रहे थे।
Verse 3
राक्षसैर्वानराघोराविनिकृत्तस्समन्ततः ।वानरैराक्षसाश्चापिद्रुमैर्भूमिसमीकृताः ॥३॥
चारों तरफ से राक्षस वानरों को काट रहे थे। और वानरों ने पेड़ उखाड़ के राक्षसों को ज़मीन पे गिरा दिया।
Verse 4
राक्षसास्त्वभिसङ्क्रुद्धावानरान्निशितैश्शरैः ।विव्यथुर्घोरसङ्काशैःकङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥४॥
रक्षस गुस्से में आ गए। उन्होंने वानरों तीर से मारना शुरू किया। तीर भी खास थे, उनपर गिद्ध के पंख लगे थे। तीर सीधा निशाने पे जा रहे थे। देखने में भी डरावने लग रहे थे।
Verses 5-6
तेगदाभिश्चभीमाभिःपट्टसैः कूटमुद्गरैः ।घोरैश्चपरिघैश्चित्रैस्त्रिशूलैश्चापिसंश्रितैः ॥५॥विदार्यमाणारक्षोभिर्वानरास्तेमहाबलाः ।अमर्षाज्जनितोद्धर्षाश्चक्रुःकर्माण्यभीतवत् ॥६॥
वोह बड़े बानर भी बहुत ताकतवर थे। राक्षसों ने उन्हे ज़ख्मी किया, फिर भी वोह डरे नहीं। उन्होंने डर्रों वाले हथियार उठा लिए, बड़ी सोटियाँ, कुल्हाड़ियाँ, और लोहे के बड़े बल्ले। त्रिशूल भी उठा लिए। गुस्सा आने पर और हिम्मत बढ़ गयी। अब डर के बिना लड़ने लगे।
Verse 7
शरनिर्भिन्नगात्रास्तेशूलनिर्भिन्नदेहिनः ।जगृहुस्तेद्रुमांस्तत्रशिलाश्चहरियूथपाः ॥७॥
बाणों से उनके हाथ-पैर में चोट लगी थी। शरीर में भी छेद हो गया था। फिर भी बानर सरदार डरे नहीं। वोह वहाँ से पेड़ और पत्थर उठा के लड़ने लगे।
Verse 8
तेभीमवेगाहरयोनर्दमानास्ततस्ततः ।ममन्थूराक्षसान्वीरान्नामानिचबभाषिरे ॥८॥
वोह बानर बड़े तेज़ थे और ज़ोर से दौड़ा रहे थे। यहाँ से वहाँ जा रहे थे और चिल्लाते भी थे। राक्षसों को कुचल दिया और अपने-अपने नाम भी ज़ोर से बोलने लगे।
Verse 9
तद्भभूवाद्भुतंघोरंयुद्धंवानररक्षसाम् ।शिलाभिर्विविधाभिश्चबहुभिश्चैवपादपैः ॥९॥
फिर बंदरों और राक्षसों में बड़ी लड़ाई शुरू हुई। वो पत्थर और पेड़ों से लड़ रहे थे। बहुत बड़ा तमाशा था।
Verse 10
राक्षसामथिताःकेचिद्वानरैर्जितकाशिभिः ।ववमूरुधिरंकेचिन्मुखैरुधिरभोजनाः ॥१०॥
कुछ राक्षसों को वानरों ने कुचल के रख दिया। वानरे डर नहीं जानते थे। कुछ राक्षस खून पीते थे, उनके मुख से खून निकल रहा था।
Verse 11
पार्श्वेषुदारिताःकेचित्केचिद्राशीकृताद्रुमैः ।शिलाभिश्चूर्णिताःकेचित्केचिद्धन्तैर्विदारिताः ॥११॥
कुछों की पसलियाँ फट गई। कुछों को पेड़ से कुचल के ढेर बना दिया। कुछों को पत्थर से पिस के चूरा कर दिया। कुछों को दाँतों से फाड़ दिया।
Verse 12
ध्वजैर्विमथितैर्भग्नैःखङ्गैश्चविनिपातितैः ।रथैर्विध्वंसितैश्चापिपतितैःरजनीचरैः ॥१२॥
झंडे टूट गए, तलवारें गिर गई। रथ बर्बाद हो गए। रात को घूमने वाले राक्षस ज़मीन पर गिर गए। मैदान बर्बाद हो गया।
Verse 13
गजेन्द्रैःपर्वताकारैःपर्वताग्रैर्वनौकसाम् ।मथितैर्वाजिभिःकीर्णंसारोहैर्वसुधातलम् ॥१३॥
ज़मीन पर घोड़े और सवार गिर गए। हाथी भी गिर गए, जो देखने में पहाड़ जैसा बड़े थे। वानरों ने पहाड़ उठा के मारा था।
Verse 14
वानरैर्भीमविक्रान्स्सैराप्लुत्याऽप्लुत्यवेगितैः ।राक्षसाःकरजैस्तीक्ष्णैर्मुखेषुविनिर्तिताः ॥१४॥
वानर उछल उछल के राक्षसों पर टूट पड़े। उनके नाखून बहुत तेज़ थे। उन्होंने राक्षसों के चेहरे फाड़ दिए।
Verse 15
विषण्णवदनाभूयोविप्रकीर्णशिरोरुहाः ।मूढाश्शोणितगन्धेननिपेतुर्धरणीतले ॥१५॥
कुछ लोगों के चेहरे डर से साफ़ पड़ गए। बाल उड्ड गए थे। खून की बदबू में दिमाग घूम गया और वो ज़मीन पर गिर गए।
Verse 16
अन्येतुपरमसङ्कृक्रुद्धाराक्षसाभीमनिश्वनाः ।तलैरेवाभिधावन्तिवज्रस्पर्शसमैर्हरीन् ॥१६॥
बाकी राक्षस बड़े गुस्से में थे। उनकी आवाज़ भी डरावनी थी। वो वानर पर लड़ो और उनपे हाथ से मारे, जैसे बिजली गिर जाए।
Verse 17
वानरैरापतन्तस्तेवेगितावेगवत्तरैः ।मुष्टिभिश्चरणैर्दन्स्सैःपादपैश्चावपोथिता ॥१७॥
बानर तेज़ थे, और और भी तेज़ हो रहे थे। वोह राक्षसों पर टूट पड़े। उन्होंने मुँह से मारा, पैर से मारा, दाँत से भी काटा। पेड़ भी उठा के मारा।
Verse 18
सैन्यंतुविद्रुतंदृष्टवाधूम्राक्षोराक्षसर्षभः ।रोषेणकदनंचक्रेवानराणांयुयुत्सताम् ॥१८॥
धूम्राक्ष राक्षसों का बड़ा सरदार था। उसने देखा कि उसकी सेना भाग रही है। वोह बहुत गुस्सा हो गया। बानरों पर अचानक टूट पड़ा और उनको बर्बाद करने लगा।
Verse 19
प्तासैःप्रमथिताःकेचिद्वानराश्शोणितस्रवाः ।मुद्गरैराहताःकेचित्पातिताधरणीतले ॥१९॥
कुछ वानर भारी ज़ख्मी हो गए, उनमे से खून बहने लगा। कुछ को हथौड़ा मारा, वो ज़मीन पर गिर गए।
Verse 20
परिघैर्मथिताःकेचिद्भिण्डिवालैर्विदारिताः ।पट्टसैराहताः केचिद्विह्वलन्तोगतासवः ॥२०॥
कुछ को लोहे के बड़े डंडे से कुचल दिया। कुछ को ऐसे हथियारों से फाड़ दिया। कुछ को कुल्हाड़ी मारी, वो हिलते हुए मर गए।
Verse 21
केचिद्विनिहताश्शूलैरुधिरार्द्रावनौकसः ।केचिद्विद्रावितानष्टाःसङ्क्रुद्धैराक्षसैर्युधि ॥२१॥
युद्ध में कुछ वानरों को भाले से मार दिया, खून में सने हो गए। कुछ गुस्से भरे राक्षसों के हाथों पीछे हट गए और बरबाद हो गए।
Verse 22
विभिन्नहृदयाःकेचिदेकपार्श्वेनदारिताः ।विदारितास्त्रिशूलैश्चकेचिदान्स्रैर्विनिःसृताः ॥२२॥
कुछ का दिल फट गया। कुछ का एक तरफ फंस गया। कुछ को तीन काँटे मारे, उनका पेट फट गया और अंदर बाहर आ गए।
Verse 23
तत्सुभीमंमहायुद्धंहरिराक्षससङ्कुलम् ।प्रबभौशब्दबहुलंशिलापादपसङ्कुलम् ॥२३॥
यह बहुत बड़ा युद्ध था, वानर और राक्षस भरे थे। आवाज़ इतनी थी कि कान बज रहे थे। पत्थर और पेड़ से भरा हुआ था।
Verse 24
धनुर्ज्यातन्त्रिमधुरंहिक्कातालसमन्वितम् ।मन्धस्न्तितसङ्गीतंतद्युद्धगान्धर्वमाबभौ ॥२४॥
यह लड़ाई एकदम म्यूज़िकल लग रही थी। धनुष की तार की आवाज़ इतनी मधुर थी जैसे कोई साज़ बज रहा हो। घोड़े चीख रहे थे जैसे मंजीरा बज रहा हो। हाथी चिल्लाते थे और उनकी आवाज़ गहरी म्यूज़िक जैसी लग रही थी।
Verse 25
धूम्राक्षस्तुधनुष्पाणिर्वानरान्रणमूर्धनि ।हसन्विद्रावयामासदिशस्तुशरवृष्टिभिः ॥२५॥
धूम्राक्ष हाथ में धनुष लिए आगे खड़ा था। वो हस रहा था और तीर की बारिश कर रहा था। वानर लोग उससे डर के चारों तरफ भाग गए।
Verse 26
धूम्राक्षेणार्दितंसैन्यंव्यथितंप्रेक्ष्यमारुतिः ।अभ्यवर्ततसङ्क्रुद्धःप्रगृह्यविपुलांशिलाम् ॥२६॥
मारुति देख रहा था कि धूम्राक्ष ने पूरा सेना हिला दिया है। वो बहुत गुस्सा हो गया। उसने एक बड़ी पत्थर उठाई और उसकी तरफ मुड़ गया।
Verse 27
क्रोधाद् द्विद्द्विगुणताम्राक्षःपितृस्तुल्यपराक्रमः ।शिलांतांपातयामासधूम्राक्षस्यरथंप्रति ॥२७॥
गुस्से में उसके आँखें लाल हो गई। उसकी ताकत उसके बाप के बराबर थी। उसने वो पत्थर धूम्राक्ष की रथ की तरफ ज़ोर से फेंका।
Verse 28
आपततनींशिलांदृष्टवागदामुद्यम्यसम्भ्रमात् ।रथादाप्लुत्यवेगेनवसुधायांव्यतिष्ठत ॥२८॥
जब वो पत्थर ऊपर से आ रही थी, धूम्राक्ष ने अपना गदा उठा लिया। वो रथ से नीचे कूद गया और ज़मीन पर खड़ा हो गया।
Verse 29
साप्रमथ्यरथंतस्यनिपपातशिलाभुवि ।सचक्रकूबरसाश्वंसध्वजंसशरासनम् ॥२९॥
वो पत्थर उसका रथ तोड़ के ज़मीन पे आ गिरा। रथ के साथ उसके पहिए, एक्सल, घोड़े, झंडा, और धनुष सब टूट के गिर गए।
Verse 30
सभङ् क्त्वातुरथंतस्यहनुमान् मारुतात्मजः ।रक्षसांकदनंचक्रेसस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥३०॥
हनुमान ने उसका रथ तोड़ दिया। वो पवन पुत्र थे। फिर उन्होंने पेड़, तना और डालों से राक्षसों को मारने शुरू किया।
Verse 31
विभिन्नशिरसोभूत्वाराक्षसाश्शोणितोक्षिताः ।द्रुमैःप्रमथिताश्चान्येनिपेतुर्धरणीतले ॥३१॥
राक्षसों के सर फट गए थे और खून से सने पड़े थे। पेड़ों से कुचले हुए वो सब ज़मीन पे गिर गए।
Verse 32
विद्राव्यराक्षसंसैन्यंहनुमान्मारुतात्मजः ।गिरिशशिखरमादायधूम्राक्षमभिदुद्रुवे ॥३२॥
हनुमान ने राक्षसों की पूरी सेना भगा दी। वो पवन पुत्र थे। उन्होंने पहाड़ की चोटी तोड़ ली और धूम्राक्ष के ऊपर टूट पड़े।
Verse 33
तमापतन्तंधूम्राक्षोगदामुद्यम्यवीर्यवान् ।विनर्दमानःसहसाहनूमन्तमभिद्रवत् ॥३३॥
धूम्राक्ष देखता है कि हनुमान आ रहा है। वो अपनी गदा उठाता है। वो ज़ोर से चिल्लाता है और सीधा हनुमान पे टूट पड़ता है।
Verse 34
तस्यक्रुद्धस्यरोषेणगदांतांबहुकण्टकाम् ।पातयामासधूम्राक्षोमस्तकेऽथहनूमतः ॥३४॥
धूम्राक्ष बहुत गुस्सा हो गया है। उसने अपनी गदा उठाई जो काँटे से भरी थी। उसने वो गदा हनुमान के सिर पे मारी।
Verse 35
ताडितःसतयातत्रगदयाभीमरूपया ।सकपिर्मारुतबलस्तंप्रहारमचिन्तयन् ॥३५॥धूम्राक्षस्यशिरोमध्येगिरिशृङ्गमपातयत् ।
मारुत-बल के उस बंदर को भारी गदा मारी, पर उसने उस मारे को ध्यान नहीं दिया। उसने पहाड़ की चोटी उठा के धूम्राक्ष के सिर के बीच में मारी।
Verse 36
सविस्फारितसर्वाङ्गोगिरिशृङ्गेणताडितः ।पपातसहसाभूमौविकीर्णइवपर्वतः ॥३६॥
पहाड़ की चोटी से उसके शरीर के सब हिस्से टूट गए। वो अचानक ज़मीन पर गिर पड़ा, जैसे कोई पहाड़ ही टूट के बिखर जाए।
Verse 37
धूम्राक्षंनिहतंदृष्टवाहतशेषानिशाचराः ॥३७॥त्रस्ताःप्रविविशुर्लङ्कांवध्यमानाःप्लवङ्गमैः ।
जब राक्षस देखे कि धूम्राक्ष मर गया, वो डर के मारे लंका भाग गए। वानर पीछे से मारते जा रहे थे।
Verse 38
सतुपवनसुतोनिहत्यशत्रून्क्षतजवहरिस्सरितश्चसन्निकीर्य ।रिपुवधजनितश्रमोमहात्मामुदमगमत्कपिभिःसुपूज्यमानः ॥३८॥
पवन पुत्र ने दुश्मन मारे, और मैदान में खून की नदी बहा दी। दुश्मन मारकर थक गया था, पर बाकी बंदरों ने उसकी तारीफ की और वो खुश हो गया।
The pivotal action is protective intervention under battlefield distress: Hanumān responds to the allied army’s dispersion by targeting the enemy commander’s mobility (the chariot) and then neutralizing the commander himself, illustrating a war-ethic of safeguarding the collective while ending immediate harm efficiently.
Though largely non-dialogic, the chapter’s upadeśa is conveyed through narrative causality: steadfastness under injury, disciplined courage, and timely leadership can reverse panic. Valor is framed not as rage alone but as purposeful action that restores order and protects allies.
Laṅkā functions as the strategic landmark—both the contested city and the psychological refuge for routed rākṣasas. The repeated use of mountains, rocks, and trees as weapons also foregrounds the epic’s ‘martial landscape,’ where terrain becomes an active instrument of combat.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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