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सीताविलापः (Sita’s Lament amid Rākṣasī Threats)
सुन्दरकाण्ड
Sarga 25 presents a concentrated psychological portrait of Sītā in Aśokavatikā after hearing repeated harsh threats from the rākṣasī guards. She weeps, trembles, and physically withdraws into herself; the narration intensifies through a sequence of similes (doe beset by wolves, banana plant felled by wind, braid like a serpent) to map fear onto bodily signs. Clinging to a blossoming Aśoka branch, she broods on Rāma and breaks into lament, calling out to Rāma, Lakṣmaṇa, and her mothers-in-law (Kauśalyā, Sumitrā). She articulates a reflective proverb-like observation: untimely death is said to be rare or impossible, even when life feels unendurable—thereby framing captivity as a prolonged ethical trial rather than a momentary crisis. The chapter underscores her refusal to accept a rākṣasa marriage, her isolation under surveillance, and the moral steadfastness that persists despite despair and the wish to relinquish life.
Verse 1
अथ तासां वदन्तीनां परुषं दारुणं बहु ।राक्षसीनामासौम्यानां रुरोद जनकात्मजा ॥१॥
जब वो राक्षसियाँ बोली, बहुत कठोर बातें की, तो जनक की बेटी रोने लगी।
Verse 2
एवमुक्ता तु वैदेही राक्षसीभिर्मनस्विनी ।उवाच परमत्रस्ता भाष्पग्द्गदया गिरा ॥२॥
राक्षसियों ने सीता से बात की। सीता बहुत डर गई, आँखों में आँसू आ गए। फिर उसने रोते हुए जवाब दिया।
Verse 3
न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति ।कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः ॥३॥
कोई इंसान औरत किसी राक्षस की पत्नी कैसे बन सकती है। तुम लोग मुझे खा भी जाओ, मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी।
Verse 4
सा राक्षसीमध्यगता सीता सुरसुतोपमा ।न शर्म लेभे दुःखार्ता रावणेन च तर्जिता ॥४॥
सीता राक्षसियों के बीच फंसी हुई थी। रावण ने भी धमकाया था। वो बहुत दुखी थी, उसे कोई सुकून नहीं मिल रहा था।
Verse 5
वेपते स्माधिकं सीता विशन्ती वाङ्गमात्मनः ।वने यूथपरिभ्रष्टा मृगी कोकैरिवार्दिता ॥५॥
सीता काँप रही थी, अपने आप को सिकोड़ के बैठ गयी। जैसे जंगल में कोई हिरन अपने ग्रुप से जुदा हो जाए। और भेड़ियों के डर से परेशान हो। वैसे ही वो डर गयी थी।
Verse 6
सा त्वशोकस्य विपुलां शाखामालम्ब्य पुष्पिताम् ।चिन्तयामास शोकेन भर्तारं भग्नमानसा ॥६॥
सीता ने अशोक पेड़ की बड़ी डाल पकड़ ली, जिसमें फूल भी थे। उसका दिल टूट चुका है। वो बस अपने पति राम को सोच रही है।
Verse 7
सा स्नापयन्ती विपुलौ स्तनौ नेत्रजलस्रवैः ।चिन्तयन्ती न शोकस्य तदान्तमधिगच्छति ॥७॥
आँसू उसकी आँखों से बह रहे हैं। उसका सीना गीला हो रहा है। वो इतना सोच रही है पर दुख का कोई एंड नहीं दिख रहा।
Verse 8
सा वेपमाना पतिता प्रवाते कदली यथा ।राक्षसीनां भयत्रस्ता विवर्णवदनाभवत् ॥८॥
सीता काँप रही है, जैसे ज़ोर से हवा चल के केले का पेड़ गिर दे। वो राक्षसियों से इतना डर गई है कि उसका चेहरा साफ़ पड़ गया।
Verse 9
तस्याः सा दीर्घविपुला वेपन्त्या सीतया तदा ।ददृशे कम्पिनी वेणी व्यालीव परिसर्पती ॥९॥
सीता काँप रही थी उस वक्त। उसकी लंबी मोटी चोटी हिल रही थी। वो देखने में बिल्कुल साँप जैसी लग रही थी, जैसे वो रेंग रही हो।
Verse 10
सा निःश्वसन्ती दुःखार्ता शोकोपहतचेतना ।आर्ता व्यसृजदश्रूणि मैथिली विललाप च ॥१०॥
वो दुख में थी, साँस चलती थी, और उसका दिल टूटा हुआ था। मैथिली के आँसू आ गए और वो ज़ोर से रोई।
Verse 11
हा रामेति च दुःखार्ता हा पुनर्लक्ष्मणेति च ।हा श्वश्रु मम कौसल्ये हा सुमित्रेति भामिनी ॥११॥
वो दुख में चीखी, अरे राम, अरे लक्ष्मण। फिर बोली, अरे मेरी सास कौसल्या, अरे सुमित्रा।
Verses 12-13
लोकप्रवादः सत्योऽयं पण्डितैः समुदाहृतः ।अकाले दुर्लभो मृत्युः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा ॥१२॥यदहमेवं क्रूराभी राक्षसीभिरिहार्दिता ।जीवामि हीना रामेण मुहूर्तमपि दुःखिता ॥१३॥
पंडित लोग एक बात बोलते हैं कि वक़्त से पहले मरना आसान नहीं है। न मर्द का, न औरत का। पर मैं इन क्रूअ राक्षसियों के हाथ तंग होके भी जी रही हूँ। राम के बिना, हर पल दुखी होके भी जी रही हूँ।
Verse 14
एषाल्पपुण्या कृपणा विनशिष्याम्यनाथवत् ।समुद्रमध्ये नौः पूर्णा वायुवेगैरिवाहता ॥१४॥
मेरे पास पुण्य कम है, मैं किस्मत वाली नहीं हूँ। कोई सहारे के बिना मैं मर जाऊँगी। जैसे समुंदर में कश्ती होती है, भरी हुई, और हवा उसे तोड़ देती है। वैसे ही मैं डूब रही हूँ।
Verse 15
भर्तारं तमपश्यन्ती राक्षसीवशमागता ।सीदामि खलु शोकेन कूलं तोयहतं यथा ॥१५॥
अपने पति को देख नहीं पा रही, और इन राक्शसियों के कब्ज़े में आ गयी हूँ। ग़म से डूब रही हूँ। जैसे पानी तेज़ चलता है और किनारा गिराता जाता है। वैसे ही मैं गिर रही हूँ।
Verse 16
तं पद्मदलपत्राक्षं सिंहविक्रान्तगामिनम् ।धन्याः पश्यन्ति मे नाथं कृतज्ञं प्रियवादिनम् ॥१६॥
जो लोग मेरे राम को देख पाते हैं, वो खुशनसीब हैं। उसकी आँखें कमल के फूल जैसी हैं। चलने में शेर जैसा तेवर है। दिल में एहसान मानता है, और बातें प्यार से करता है।
Verse 17
सर्वथा तेन हीनाया रामेण विदितात्मना ।तीक्ष्णं विषमिवास्वाद्य दुर्लभं मम जीवितम् ॥१७॥
राम मुझसे जुदा है, और वो अपने आप को जानता है। मैं हर तरह से उसके बिना हूँ। मेरा जीना मुश्किल हो गया है। जैसे कोई तेज़ ज़हर गटक ले। वैसे ही मेरे लिए जीना मुश्किल है।
Verse 18
कीदृशं तु महापापं मया जन्मान्तरे कृतम् ।यनेदं प्राप्यते दुःखं मया घोरं सुदारुणम् ॥१८॥
पिछले जनम में मैंने कैसा बड़ा पाप किया होगा? इसलिए आज मुझे इतना बड़ा दुख मिल रहा है, जो बहुत भयंकर है।
Verse 19
जीवितं त्यक्तुमिच्छामि शोकेन महता वृता ।राक्षसीभिश्च रक्षन्त्या रामो नासाद्यते मया ॥१९॥
मैं बहुत दुख में हूँ और मर जाना चाहती हूँ। पर यह राक्षसियाँ मुझे पकड़ के रखती हैं। मैं राम तक नहीं पहुँच पाती।
Verse 20
धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम् ।न शक्यं यत्परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम् ॥२०॥
इंसान की ज़िन्दगी पे लानत है, और दूसरे के बस में रहने पे भी लानत। अपनी मर्ज़ी से जान देना भी किसी के बस की बात नहीं।
Sītā confronts coercive pressure to accept a rākṣasa marriage; she explicitly refuses, asserting that a human woman is not fit to become a demon’s wife, even if threatened with death—an ethical boundary grounded in fidelity and personal moral agency.
The chapter frames suffering as an extended moral test: even when life appears unbearable, dharma is maintained through refusal of unethical compromise, remembrance of rightful relationships, and endurance when one cannot control outcomes (including life and death).
The Aśoka tree and its blossoming branch function as the immediate landmark of captivity in the grove (Aśokavatikā), serving as a narrative anchor for Sītā’s lament and as a symbolic space where steadfastness is preserved under surveillance.
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