
परशुरामप्रादुर्भावः · The Appearance of Parasurama on the Return from Mithila
बालकाण्ड
After night passes, Viśvāmitra blesses the Raghu princes and departs toward the northern mountains (Himālaya directionality implied). Daśaratha then takes leave of Janaka and begins the return to Ayodhyā, with Janaka accompanying briefly and bestowing abundant kanyādhana: large herds of cows, fine textiles, precious metals and gems, servants, and the fourfold military components (elephants, horses, chariots, infantry). As Daśaratha proceeds with sages in the lead, ominous avian cries arise while deer move auspiciously to the right; the king, unsettled by mixed portents, questions Vasiṣṭha. Vasiṣṭha interprets the birds as foretelling a formidable, celestial-order event, while the deer indicate pacification—urging the king to abandon grief. A sudden storm and darkness cover the sun; ash-like dust envelops the army, many lose consciousness, while the king, his sons, and principal sages remain composed. In this fearful gloom they behold Bhārgava Jāmadagnya Paraśurāma—dreadful, radiant, matted-haired, bearing an axe and a lightning-like bow with a chief arrow—likened to Śiva as Tripuraghna. The assembled sages, anxious about his past kṣatriya-slaying rage, offer arghya and address him soothingly. Paraśurāma accepts the homage and then turns to speak directly to Rāma Dāśarathi, setting up the ensuing confrontation of ascetic authority, martial legitimacy, and dharmic restraint.
Verse 1
अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनिः ।आपृष्ट्वा तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम् ॥१॥आशीर्भिः पूरयित्वा च कुमारांश्च सराघवान् ।
जब रात गुज़र गई तो विश्वामित्र रिशि ने उठने की तैयारी की। उसने राम और उसके भाइयों को आशीर्वाद दिया। दो राजाओं से मिलकर उसने निकलने का इरादा किया। फिर वो पहाड़ों की तरफ चला गया।
Verse 2
विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम् ।आपृष्ट्वाऽथ जगामाशु राजा दशरथः पुरीम् ॥२॥
जब विश्वामित्र चले गए, तब राजा दशरथ ने मिथिला के राजा जनक से विदाई ली। फिर वो जल्दी से अपनी शहर अयोध्या के लिए निकल पड़े।
Verse 3
गच्छन्तं तं तु राजानमन्वगच्छन्नराधिपः ॥३॥अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु ।
जब राजा दशरथ निकल रहे थे, तब राजा जनक भी उनके साथ चले गए। फिर विदेह के राजा ने अपनी बेटियों के लिए बहुत सारा दहेज दिया।
Verses 4-5
गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वरः ।कम्बलानां च मुख्यानां क्षौमकोट्यंबराणि च ॥४॥हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलङ्कृतम् ।ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम् ॥५॥
मिथिला के राजा ने बहुत बड़ा दान किया। एक लाख गाये दी, अच्छे कंबल, काठन के कपड़े। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना भी दी। नौकर-नौकरान भी दिए जो बहुत खूबसूरत थे और अच्छे से सजाए हुए थे।
Verse 6
हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च ॥६॥ददौ परमसंहृष्टः कन्याधनमनुत्तमम् ।
वो बहुत खुश हो गया। दुलहन के बाप ने कन्यादान में बड़ा दान किया। सोना, गहने, मोती और मूंगा सब दिया।
Verse 7
दत्त्वा बहु धनं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम् ॥७॥प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वरः ।
राजा जनक ने बहुत सारा धन दिया। राजा दशरथ से अनुमति ली और फिर अपने घर मिथिला वापस आ गए।
Verse 8
राजाऽप्ययोध्याधिपतिस्सह पुत्रैर्महात्मभिः ।ऋषीन् सर्वान् पुरस्कृत्य जगाम सबलानुगः ॥८॥
अयोध्या के राजा दशरथ भी निकले। अपने बड़े बेटियों के साथ साथ निकले। रिशियों को आगे भेजा और अपनी सेना पीछे लिए चल दिए।
Verse 9
गच्छन्तं तं नरव्याघ्रं सर्षिसङ्घं सराघवम् ॥९॥घोराः स्म पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति ततस्ततः ।
जब वो निकले थे, रिशियों और रघु वंश के लोगों के साथ। तब पक्षियों ने कहीं कहीं बुरी आवाज़ें निकाली। वो आवाज़ें फिर फिर से सुनाई दी।
Verse 10
भौमाश्चैव मृगा स्सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम् ॥१०॥तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत ।
सारे जानवर जो ज़मीन पर रहते हैं, वो सब दाईं तरफ़ जा रहे हैं। यह देख के राजा ने वशिष्ठ से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है।
Verse 11
असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः ॥११॥किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति ।
पक्छियों की आवाज़ें बुरी लग रही हैं, डर भी लगता है। पर मृग दाईं तरफ़ जा रहे हैं, यह अच्छी बात है। मेरा दिल काँप रहा है और मन दुखी हो रहा है। क्या हो रहा है?
Verse 12
राज्ञो दशरथस्यैतच्छ्रुत्वा वाक्यं महानृषिः ॥१२॥उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत्फलम् ।
राजा दशरथ की बात सुन के बड़े रिशि ने बोला। उन्होंने आराम से कहा, सुनो इसका क्या फल मिलेगा।
Verse 13
उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम् ॥१३॥मृगाः प्रशमयन्त्येते सन्तापस्त्यज्यतामयम् ।
पक्षियों के चिल्लाने से डर लग रहा था। पर यह हिरन आए हैं, जैसे शांत हो गया हो। अब चिंता छोड़ो, टेंशन मत लो।
Verse 14
तेषां संवदतां तत्र वायुः प्रादुर्बभूव ह ॥१४॥कम्पयन् पृथिवीं सर्वां पातयंश्च द्रुमांच्छुभान् ।
जब वो बात कर रहे थे, अचानक हवा चल पड़ी। पूरी ज़मीन हिल गई और अच्छे पेड़ गिरने लगे।
Verse 15
तमसा संवृतस्सूर्य स्सर्वा न प्रबभुर्दिश ॥१५॥भस्मना चावृतं सर्वं संमूढमिव तद्बलम् ।
अंधेरे ने सूरज को ढक लिया। चारों तरफ अंधेरा हो गया। पूरा सेना राख में दबी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो सब बेहोश हो गए हो।
Verse 16
वसिष्ठश्चर्षयश्चान्ये राजा च ससुतस्तदा ॥१६॥संसज्ञा इव तत्रासन् सर्वमन्यद्विचेतनम् ।
वशिष्ठ और बाकी रिशि, और राजा अपने बेटे के साथ, सब ठीक-ठाक रहे। बाकी सब लोग बेहोश हो गए थे।
Verses 17-20
तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः ॥१७॥ददर्श भीमसङ्काशं जटामण्डलधारिणम् ।भार्गवं जामदग्न्यं तं राजराजविमर्दिनम् ॥१८॥कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दुस्सहम् ।ज्वलंतमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः ॥१९॥स्कन्धे चासज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम् ।प्रगृह्य शरमुख्यं च त्रिपुरघ्नं यथा शिवम् ॥२०॥
उस अंधेरे में पूरी सेना दिख रही थी जैसे उसने राख लिपटा ली हो। दशरथ ने देखा एक भयानक रूप वाला रिशि है, जिसके बाल जटे में बंधे हैं। यह भार्गव जमदग्नि का बेटा परशुराम है, जो राजाओं को कुचल देता है। वो कैलाश पर्वत जैसा है, कोई उसको हिला नहीं सकता। वो प्रलय की आग जैसा है, जिसे सहना मुश्किल है। उसमें इतनी ताकत है कि आम लोग उसको देख भी नहीं पा रहे। उसके कंधे पर परशु है, हाथ में धनुष बिजली की तरह चमक रहा है। तीर भी पकड़ा है। वो दिख रहा है जैसे शिव जी त्रिपुर को नष्ट करने के वक्त दिख रहे थे।
Verse 21
तं दृष्ट्वा भीमसङ्काशं ज्वलन्तमिव पावकम् ।वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणाः ॥२१॥सङ्गता मुनयस्सर्वे सञ्जजल्पुरथो मिथः ।
भार्गव राम बहुत भयानक लग रहा था, जैसे आग जल रही हो। वशिष्ठ और बाकी ब्राह्मण रिशि उसे देख के एक जगह इकट्ठे हो गए। यह सब जाप और हवन करते थे। आपस में बात करने लगे।
Verses 22-23
कच्चित्पितृवधामर्षी क्षत्रं नोत्सादयिष्यति ॥२२॥पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वरः ।क्षत्रस्योत्सादनं भूयो न खल्वस्य चिकीर्षितम् ॥२३॥
कहीं यह अपने बाप के मारे का गुस्सा अभी भी नहीं उतरा? पहले भी उसने क्षत्रियों को मारा था, फिर उसका गुस्सा शांत हो गया था। अब क्या फिर से क्षत्रियों को खत्म करना चाहता है?
Verse 24
एवमुक्त्वाऽर्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम् ।ऋषयो राम रामेति वचो मधुरमब्रुवन् ॥२४॥
रिशियों ने ऐसा कहके अर्घ्य उठाया। भार्गव राम डरावना लग रहा था। रिशियों ने प्यार से कहा, राम, राम।
Verse 25
प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान् ।रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्योऽभ्यभाषत ॥२५॥
रिशियों ने परसुराम को बहुत इज्जत दी। वो बड़े पावरफुल थे। उन्होंने सब कुछ अक्सेप्ट किया। फिर उन्होंने दशरथ के बेटे राम से बात की।
The chapter stages a dharma-sensitive response to fear and uncertainty: Daśaratha confronts contradictory omens and must choose between panic and disciplined inquiry; the sages then manage a potentially violent encounter by honoring Paraśurāma with arghya and measured speech, prioritizing restraint and protocol.
Vasiṣṭha’s counsel models nimitta-vicāra without fatalism: unsettling signs may indicate a powerful event, yet one should not abandon steadiness. The sarga also teaches that ritualized respect and calm address can de-escalate confrontation even when immense power is present.
Mithilā and Ayodhyā frame the political geography of departure and return; Viśvāmitra’s movement toward the northern mountains gestures to the Himālaya cultural horizon. Culturally, the sarga highlights kanyādhana (marriage-gift economy) and arghya (hospitality to ascetics) as formal instruments of alliance and social order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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