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अयोध्याकाण्डे त्र्यशीति तमः सर्गः · Bharata’s Departure and Encampment on the Gaṅgā (Śṛṅgīberapura)
अयोध्याकाण्ड
Sarga 83 narrates Bharata’s dawn departure in an excellent chariot, driven by a focused longing to see Rama. Ministers and priests proceed in front on sun-like chariots, while the mobilized royal force is quantified with formal precision—elephants, chariots, and mounted horses—signaling state capacity redirected toward reconciliation rather than conquest. The queens (Kaikeyī, Sumitrā, Kausalyā) travel in a resplendent vehicle, and the civic body follows in celebratory solidarity, speaking of Rama’s virtues as a collective antidote to grief. The chapter notably catalogs occupational groups—artisans, merchants, service professions, performers, and fishermen—marking the breadth of urban participation and the social ecology of Ayodhyā. After a long journey by chariots, carriages, horses, and elephants, the procession reaches the Gaṅgā near Śṛṅgīberapura, the domain of Guha, Rama’s ally, portrayed as vigilant and well-governed. The army halts on the bird-graced riverbank; Bharata instructs ministers to camp as convenient, plans to cross the next day, and performs intended water-libations for the departed king. The sarga closes with Bharata reflecting on methods to bring Rama back, framing political action as ethical restoration.
Verse 1
तत स्समुत्थितः काल्यमास्थाय स्यन्दनोत्तमम्।प्रययौ भरतश्शीघ्रं रामदर्शनकाङ्क्षया।।2.83.1।।
सुबह सुबह भरत उठा। उसने एक अच्छी गाड़ी ली और जल्दी से निकल पड़ा। उसे राम को देखने का बहुत मन था।
Verse 2
अग्रतः प्रययुस्तस्य सर्वे मन्त्रिपुरोधसः।अधिरुह्य हयैर्युक्तान्रथान्सूर्यरथोपमान्।।2.83.2।।
सब मंत्री और पुरोहित आगे चले गए। सबने घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर गए। वो रथ ऐसे चमक रहे थे जैसे सूरज का रथ हो।
Verse 3
नवनागसहस्राणि कल्पितानि यथाविधि।अन्वयुर्भरतं यान्तमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम्।।2.83.3।।
नौ हज़ार हाथी थे, सब सही तरीके से रेडी थे। वो सब भरत के पीछे-पीछे चल पड़े। भरत निकल पड़ा था, इक्ष्वाकु खानदान का लाड़ला बेटा।
Verse 4
षष्टी रथसहस्राणि धन्विनो विविधायुधाः।अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्।।2.83.4।।
साठ हज़ार रथ थे, सब में तीर-अंदाज़ बैठ के आए थे। उनके हाथ में अलग-अलग हथियार थे। वो भी भरत के साथ गए, यह जो राजकुमार था, बहुत बड़ा नाम वाला था।
Verse 5
शतं सहस्राण्यश्वानां समारूढानि राघवम्।अन्वयुर्भरतं यान्तं सत्यसन्धं जितेन्द्रियम्।।2.83.5।।
एक लाख घोड़े थे, सब पे सवार बैठ के आए थे। वो भी भरत के पीछे चल दिए। भरत जो है, अपने बोल पे पक्का आदमी है, अपने ऊपर पूरा कंट्रोल रखता है।
Verse 6
कैकेयी च सुमित्रा च कौसल्या च यशस्विनी।रामानयनसंहृष्टा ययुर्यानेन भास्वता।।2.83.6।।
कैकेयी, सुमित्रा और कौसल्या, तीनों रानियाँ, एक चमकदार रथ में बैठ के गई। उनका दिल खुश था, सोच रहे थे कि अब राम को वापस ले आएंगे।
Verse 7
प्रयाताश्चार्यसङ्घाता रामं द्रष्टुं सलक्ष्मणम्।तस्यैव च कथाश्चित्राः कुर्वाणा हृष्टमानसाः।।2.83.7।।
शहर के बड़े-बूढ़े लोग भी निकल पड़े। सब राम और लक्ष्मण को मिलने जा रहे थे। रास्ते में सब अपने बीच में राम की बातें कर रहे थे, खुश हो रहे थे।
Verse 8
मेघश्यामं महाबाहुं स्थिरसत्त्वं दृढव्रतम्।कदा द्रक्ष्यामहे रामं जगत श्शोकनाशनम्।।2.83.8।।
हम कब राम को देखेंगे? बादल जैसा काला रंग, बड़े-बड़े हाथ, दिल में पक्का इरादा। जो दुनिया का दुख मिटा देता है।
Verse 9
दृष्ट एव हि न श्शोकमपनेष्यति राघवः।तम स्सर्वस्य लोकस्य समुद्यन्निव भास्करः।।2.83.9।।
राम को बस देख लो, वो सबका दुख ले लेगा। जैसे सुबह सूरज निकलता है तो अंधेरा दूर हो जाता है, वैसे ही।
Verse 10
इत्येवं कथयन्तस्ते सम्प्रहृष्टाः कथा श्शुभाः।परिष्वजानाश्चान्योन्यं ययुर्नागरिका जनाः।।2.83.10।।
शहर के लोग बहुत खुश थे। वो राम की अच्छी बातें कर रहे थे और एक दूसरे को गले लगा रहे थे। ऐसे ही चलते रहे।
Verse 11
ये च तत्रापरे सर्वे सम्मता ये च नैगमाः।रामं प्रति ययुर्हृष्टा स्सर्वाः प्रकृतयस्तथा।।2.83.11।।
बाकी सब लोग भी गए। जो लोग समाज में बड़े थे, वो भी गए। दुकानदार भी गए। सब प्रजा खुश थी और सब राम की तरफ बढ़ रहे थे।
Verse 12
मणिकाराश्च ये केचित्कुम्भकाराश्च शोभनाः।सूत्रकर्मकृतश्चैव ये च शस्त्रोपजीविनः।2.83.12।।मयूरकाः क्राकचिका रोचका वेधकास्तथा।दन्तकारा स्सुधाकारा स्तथा गन्धोपजीविनः।।2.83.13।।सुवर्णकाराः प्रख्यातास्तथा कम्बलधावकाः।स्नापकोष्णोदका वैद्याधूपकाश्शौण्डिकास्तथा।।2.83.14।।रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तराः।शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्ययुः कैवर्तकास्तथा।।2.83.15।।
सब काम करने वाले लोग भरत के साथ चले गए। जो लोग हीरे-मोती का काम करते थे, वो गए। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले भी गए। कपड़े बुनने वाले और हथियार बनाने वाले भी साथ थे। मोर पंख से गहने बनाने वाले, लकड़ी काटने वाले, छोटे गहने बनाने वाले सब गए। हाथी दाँत का काम करने वाले, दीवार सफेद करने वाले, इत्र बेचने वाले भी साथ थे। सुनार लोग भी गए जो बहुत मशहूर थे। कंबल धोने वाले, गरम पानी से नहलाने वाले, वैद्य, अगरबत्ती बेचने वाले, शराब बेचने वाले सब चले गए। धोबी, दर्जी, गाँव के बड़े लोग, नाटक करने वाले अपनी औरतों के साथ, मछली पकड़ने वाले सब भरत के पीछे चले गए।
Verse 13
मणिकाराश्च ये केचित्कुम्भकाराश्च शोभनाः।सूत्रकर्मकृतश्चैव ये च शस्त्रोपजीविनः।2.83.12।।मयूरकाः क्राकचिका रोचका वेधकास्तथा।दन्तकारा स्सुधाकारा स्तथा गन्धोपजीविनः।।2.83.13।।सुवर्णकाराः प्रख्यातास्तथा कम्बलधावकाः।स्नापकोष्णोदका वैद्याधूपकाश्शौण्डिकास्तथा।।2.83.14।।रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तराः।शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्ययुः कैवर्तकास्तथा।।2.83.15।।
हज़ारों ब्राह्मण भरत के पीछे चले गए। ये लोग शांत थे, वेदों को जानते थे, और अच्छे काम के लिए जाने जाते थे। सब गाड़ियों में बैठे थे।
Verse 14
मणिकाराश्च ये केचित्कुम्भकाराश्च शोभनाः।सूत्रकर्मकृतश्चैव ये च शस्त्रोपजीविनः।2.83.12।।मयूरकाः क्राकचिका रोचका वेधकास्तथा।दन्तकारा स्सुधाकारा स्तथा गन्धोपजीविनः।।2.83.13।।सुवर्णकाराः प्रख्यातास्तथा कम्बलधावकाः।स्नापकोष्णोदका वैद्याधूपकाश्शौण्डिकास्तथा।।2.83.14।।रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तराः।शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्ययुः कैवर्तकास्तथा।।2.83.15।।
सब लोग अच्छे से रेडी थे। साफ कपड़े पहने थे, लाल चंदन लगाया था। सब धीरे-धीरे भरत के पीछे चले, काफी तरह की गाड़ियों में।
Verse 15
मणिकाराश्च ये केचित्कुम्भकाराश्च शोभनाः।सूत्रकर्मकृतश्चैव ये च शस्त्रोपजीविनः।2.83.12।।मयूरकाः क्राकचिका रोचका वेधकास्तथा।दन्तकारा स्सुधाकारा स्तथा गन्धोपजीविनः।।2.83.13।।सुवर्णकाराः प्रख्यातास्तथा कम्बलधावकाः।स्नापकोष्णोदका वैद्याधूपकाश्शौण्डिकास्तथा।।2.83.14।।रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तराः।शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्ययुः कैवर्तकास्तथा।।2.83.15।।
सब काम करने वाले लोग भरत के साथ चले गए। जो लोग हीरे-मोती का काम करते थे, वो गए। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले भी गए। कपड़े बुनने वाले और हथियार बनाने वाले भी साथ थे। मोर पंख से गहने बनाने वाले, लकड़ी काटने वाले, छोटे गहने बनाने वाले सब गए। हाथी दाँत का काम करने वाले, दीवार सफेद करने वाले, इत्र बेचने वाले भी साथ थे। सुनार लोग भी गए जो बहुत मशहूर थे। कंबल धोने वाले, गरम पानी से नहलाने वाले, वैद्य, अगरबत्ती बेचने वाले, शराब बेचने वाले सब चले गए। धोबी, दर्जी, गाँव के बड़े लोग, नाटक करने वाले अपनी औरतों के साथ, मछली पकड़ने वाले सब भरत के पीछे चले गए।
Verse 16
समाहिता वेदविदो ब्राह्मणा वृत्तसम्मताः।गोरथैर्भरतं यान्तमनुजग्मु स्सहस्रशः।।2.83.16।।
हज़ारों ब्राह्मण भरत के पीछे चले गए। ये लोग शांत थे, वेदों को जानते थे, और अच्छे काम के लिए जाने जाते थे। सब गाड़ियों में बैठे थे।
Verse 17
सुवेषा श्शुद्धवसनास्ताम्रमृष्टानुलेपनाः।सर्वे ते विविधैर्यानै श्शनैर्भरतमन्वयुः।।2.83.17।।
सब लोग अच्छे से रेडी थे। साफ कपड़े पहने थे, लाल चंदन लगाया था। सब धीरे-धीरे भरत के पीछे चले, काफी तरह की गाड़ियों में।
Verse 18
प्रहृष्टमुदिता सेना साऽन्वयात्कैकयीसुतम्।भ्रातुरानयने यान्तं भरतं भ्रातृवत्सलम्।।2.83.18।।
पूरा सेना खुशी से भर गई थी। सब लोग भरत के पीछे चले गए। भरत, कैकेयी का बेटा, अपने भाई को वापस लाने निकला था। वो अपने भाई से बहुत प्यार करता था।
Verse 19
ते गत्वा दूरमध्वानं रथयानाश्वकुञ्जरैः।समासेदुस्ततो गङ्गां शृङ्गीबेरपुरं प्रति।।2.83.19।।यत्र रामसखो वीरो गुहो ज्ञातिगणैर्वृतः।निवसत्यप्रमादेन देशं तं परिपालयन्।।2.83.20।।
वो लोग बहुत दूर तक गए। रथ घोड़े और हाथी सब से सफर किया। फिर वो गंगा के पास पहुँच गए। यह शृंगिबेरपुर की तरफ था। वहाँ गुह रहता था जो राम का दोस्त था। गुह बहुत बहादुर था। अपने रिश्तेदारों के साथ रहता था। वो उस जगह की हिफाजत करता था।
Verse 20
ते गत्वा दूरमध्वानं रथयानाश्वकुञ्जरैः।समासेदुस्ततो गङ्गां शृङ्गीबेरपुरं प्रति।।2.83.19।।यत्र रामसखो वीरो गुहो ज्ञातिगणैर्वृतः।निवसत्यप्रमादेन देशं तं परिपालयन्।।2.83.20।।
वो लोग बहुत दूर तक गए। रथ घोड़े और हाथी सब से सफर किया। फिर वो गंगा के पास पहुँच गए। यह शृंगिबेरपुर की तरफ था। वहाँ गुह रहता था जो राम का दोस्त था। गुह बहुत बहादुर था। अपने रिश्तेदारों के साथ रहता था। वो उस जगह की हिफाजत करता था।
Verse 21
उपेत्य तीरं गङ्गायाश्चक्रवाकैरलङ्कृतम्।व्यवातिष्ठत सा सेना भरतस्यानुयायिनी।।2.83.21।।
वो लोग गंगा के किनारे पहुँच गए। वहाँ चक्रवाक पक्षी भी थे जो बहुत अच्छे लगते हैं। भरत की सेना वहाँ रुक गई।
Verse 22
निरीक्ष्यानुगतां सेनां तां च गङ्गां शिवोदकाम्।भरतस्सचिवान्सर्वानब्रवीद्वाक्यकोविदः।।2.83.22।।
भरत ने अपनी पूरी सेना को देखा जो पीछे आ रही थी। उसने गंगा नदी को भी देखा जहाँ पानी बिल्कुल साफ था। फिर उसने अपने सब मंत्रियों को कहा क्योंकि वो समझदार था।
Verse 23
निवेशयत मे सैन्यमभिप्रायेण सर्वतः।विश्रान्ताः प्रतरिष्यामश्श्व इदानीमिमां नदीम्।।2.83.23।।
भरत ने कहा कि सेना को यहाँ कैंप कराओ। सब अपनी जगह ठीक से सेट हो जाएँ। आज रात रेस्ट करो, कल सुबह इस नदी को पार करेंगे।
Verse 24
दातुं च तावदिच्छामि स्वर्गतस्य महीपतेः।और्ध्वदेहनिमित्तार्थमवतीर्योदकं नदीम्।।2.83.24।।
अब मैं नदी में उतरना चाहता हूँ। राजा दशरथ स्वर्ग चले गए हैं। उनके लिए पानी चढ़ाना है ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले।
Verse 25
तस्यैवं ब्रुवतोऽमात्यास्तथेत्युक्त्वा समाहिताः।न्यवेशयंस्तां छन्देन स्वेन स्वेन पृथक्पृथक्।।2.83.25।।
जब भरत ने ऐसा कहा तो सब मंत्री मान गए। उन्होंने कहा ठीक है, ऐसा ही करते हैं। फिर सबने अपनी सेना को अलग-अलग जगह कैंप कर दिया।
Verse 26
निवेश्य गङ्गामनु तां महानदीं चमूं विधानैः परिबर्हशोभिनीम्।उवास रामस्य तदा महात्मनो विचिन्तयानो भरतो निवर्तनम्।।2.83.26।।
सेना गंगा के किनारे कैंप कर गई। बहुत बड़ी सेना थी और अच्छे से लगी हुई थी। भरत वहीं रहा। वो सोच रहा था कि राम को कैसे वापस लाए।
The pivotal action is Bharata’s state-backed journey framed not as coercion but as ethical retrieval—mobilizing royal power to restore rightful order by seeking Rama, while also honoring the deceased king through prescribed water-libations.
Legitimate authority is shown as grounded in restraint, speech-competence, and ritual responsibility: Bharata pauses to rest the army, schedules a lawful crossing, and prioritizes ancestral rites—modeling governance as disciplined dharma rather than impulsive force.
The Gaṅgā riverbank near Śṛṅgīberapura is central, along with Guha’s vigilantly governed territory; culturally, the sarga highlights civic guild participation and the rite of offering water (udaka) for the departed king’s aurdhva-deha welfare.
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