दर्शपूर्णमास-प्रकरणम् (सांनाय्य-प्रायाज-सामिधेनी-आघार-प्रवर-निवीतादि-विधयः)
TS 2.5 functions as a dense operational node in the Śrauta calendar by formalizing the monthly hinge between amāvāsyā and paurṇamāsī. It integrates mythic etiologies (arthavāda) with executable vidhi: the Sānnāyya logic of “milk-to-Soma” equivalence, the metrical engineering of Sāmidhenī recitations, and the spatial-temporal choreography of āghāra and priestly selection (pravaravaraṇa). The prapāṭhaka also encodes ritual geometry: triadic repetitions map to the three worlds and three vital currents; fifteenfold structures map to half-month nights; and the alternation of new/full moon becomes a calendrical “vehicle” (devaratha) for ascent. By embedding social typologies (kṣatra/viś/brahman) into stoma-count and chandas choices, it links polity to liturgical form. Overall, TS 2.5 is a procedural bridge-text: it turns cosmology into repeatable monthly action with explicit safeguards against mis-sequencing and mis-addressed speech.
Mantra 1
त्वष्टा हतपुत्रो वीन्द्रꣳ सोमम् आहरत् । तस्मिन्न् इन्द्र उपहवम् ऐच्छत । तं नोपाह्वयत । पुत्रं मेऽवधीः इति । स यज्ञवेशसं कृत्वा प्रासहा सोमम् अपिबत् । तस्य यद् अत्यशिष्यत तत् त्वष्टाहवनीयम् उप प्रावर्तयत् । स्वाहेन्द्रशत्रुर् वर्धस्वेति । यद् अवर्तयत् तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम् । यद् अब्रवीत् स्वाहेन्द्रशत्रुर् वर्धस्वेति तस्माद् अस्य …
त्वष्टा का बेटा मर गया था, फिर भी उसने इंद्र के लिए सोम लाया। इंद्र ने कहा मुझे भी बुलाओ। त्वष्टा ने नहीं बुलाया, बोला तुमने मेरा बेटा मारा। इंद्र ने पूजा का कपड़ा पहन के ज़बरदस्ती सोम पी लिया। जो बचा कुछ था, त्वष्टा ने आग में डाल दिया। बोला स्वाहा, इंद्र का दुश्मन बढ़। उससे वृत्र बना। क्योंकि उसने इंद्र का दुश्मन बोला, इसलिए यह मंत्र ऐसा चलता है।
Mantra 2
इन्द्रः शत्रुर् अभवत् स सम्भवन्न् अग्नीषोमाव् अभि सम् अभवत् स इषुमात्रमिषुमात्रं विष्वङ्ङ् अवर्धत स इमाँ लोकान् अवृणोत् यद् इमाँ लोकान् अवृणोत् तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम् तस्माद् इन्द्रो ऽबिभेत् स प्रजापतिम् उपाधावत् शत्रुर् मे ऽजनीति तस्मै वज्रꣳ सिक्त्वा प्रायछत् एतेन जहीति तेनाभ्य् आयत ताव् अब्रूताम् अग्नीषोमौ मा
इंद्र दुश्मन बन गया, और उसके सामने अग्नि और सोम खड़े हो गए। वो बार-बार बढ़ता गया, जैसे तीर-एक-तीर से माप के। आखिर में उसने सारी दुनिया को अपने में समेट लिया। यही काम वृत्र की ताकत है, सब को रोकना। इंद्र डर गया। वो प्रजापति के पास भागा और बोला, 'मेरा एक दुश्मन पैदा हो गया है।' प्रजापति ने वज्र बनाके उसको दिया और कहा, 'इससे मारो।' इंद्र उस वज्र ले के दुश्मन के पास गया। तब अग्नि और सोम ने मुझे कहा...
Mantra 3
प्र हार् आवम् अन्तः स्व इति मम वै युवꣳ स्थ इत्य् अब्रवीन् माम् अभ्य् एतम् इति तौ भागधेयम् ऐछेताम् ताभ्याम् एतम् अग्नीषोमीयम् एकादशकपालम् पूर्णमासे प्रायछत् ताव् अब्रूताम् अभि संदष्टौ वै स्वो न शक्नुव ऐतुम् इति स इन्द्र आत्मनः शीतरूराव् अजनयत् तच् छीतरूरयोर् जन्म य एवꣳ शीतरूरयोर् जन्म वेद
किसीने कहा बाहर भगाओ, अंदर लाओ, अपने पास रख लो। उसने मुझे कहा तुम दोनों मेरे हो। फिर बोला मेरे पास आओ। दोनों को हिस्सा चाहिए था। उन्होंने फुल मून के टाइम एक स्पेशल ऑफरिंग दी, अग्नि और सोम के लिए ग्यारह पॉटशर्ड्स वाला केक। वो बोले हम जकड़ गए हैं, अपनी जगह नहीं आ पा रहे। तब इंद्र ने अपने आप से दो सितारू पैदा किए। यह उनका जनम है। जो यह जनम जानता है उसको शक्ति मिलती है।
Mantra 4
नैनꣳ शीतरूरौ हतस् ताभ्याम् एनम् अभ्य् अनयत् । तस्माज् जञ्जभ्यमानाद् अग्नीषोमौ निर् अक्रामताम् । प्राणापानौ वा एनं तद् अजहिताम् । प्राणो वै दक्षो ऽपानः क्रतुस् । तस्माज् जञ्जभ्यमानो ब्रूयात् मयि दक्षक्रतू इति । प्राणापानाव् एवात्मन् धत्ते सर्वम् आयुर् एति । स देवता व्रत्रान् निर्हूय वार्त्रघ्नꣳ हविः पूर्णमासे निर् अवपत् । घ्नन्ति वा एनम् पूर्णमास आ ॥
दोनों शक्तियाँ उसे मार नहीं सकी, बल्कि उसे आगे ले गई। इसलिए जब वो परेशान था, तब अग्नि और सोम उसमें से बाहर आए। वो दोनों उसके साँस थे, अंदर की साँस और बाहर की साँस। वो उसे छोड़ के नहीं गए। अंदर की साँस ताकत है, और बाहर की साँस इरादा है। इसलिए जब कोई परेशान हो, वो बोलना चाहिए, 'मेरे अंदर ताकत है और इरादा है।' ऐसे करके वो अपनी साँस को ठीक रखता है और पूरा उमर जीता है। यज्ञ करने वाला बड़ा भी वृत्र जैसी रुकावटों को भगाता है। पूरा चाँद वाले दिन वो एक स्पेशल हवन करता है जो रुकावटें तोड़ता है। क्योंकि पूरा चाँद वाले दिन भी रुकावटों को तोड़ता है।
Mantra 5
अमावास्यायाम् प्याययन्ति तस्माद् वार्त्रघ्नी पूर्णमासे ऽनूच्येते वर्धन्वती अमावास्यायाम् तत् सꣳस्थाप्य वार्त्रघ्नꣳ हविर् वज्रम् आदाय पुनर् अभ्य् आयत ते अब्रूतां द्यावापृथिवी मा प्र हार् आवयोर् वै श्रित इति ते अब्रूताम् वरं वृणावहै नक्षत्रविहिताहम् असानीत्य् असाव् अब्रवीच् चित्रविहिताहम् इतीयम् तस्मान् नक्षत्रविहितासौ चित्रविहिते ऽयम् य एवं द्यावापृथिव्योः
अमावस्या को वो इसका फायदा बढ़ाते हैं। इसलिए पूरा चाँद वाले दिन भी वो स्पेशल मंत्र पढ़ते हैं। अमावस्या को वो वज्र जैसा हवन रखते हैं, जो रुकावटें तोड़ता है। फिर वापस आते हैं। तब धरती और आसमान ने उसे कहा, 'हमें मत छोड़ो, हमारे ऊपर ही तुम स्थित हो।' वो बोले, 'हम एक वरदान माँगते हैं, हम नक्षत्रों से मार्क हो जाएँ।' आसमान ने कहा, 'मैं नक्षत्रों से मार्क हूँ।' धरती ने कहा, 'मैं चित्रा से मार्क हूँ।' इसलिए आसमान नक्षत्रों से मार्क है और धरती चित्रा से मार्क है। जो यह बात जानता है, वो धरती और आसमान के रिश्ते को समझता है।
Mantra 6
वरं वेदैनं वरो गच्छति । स आभ्याम् एव प्रसूत इन्द्रो वृत्रम् अहन् । ते देवा वृत्रꣳ हत्वाग्नीषोमाव् अब्रुवन्—हव्यं नो वहतम् इति । ताव् अब्रूताम्—अपतेजसौ वै त्यौ; वृत्रे वै त्ययोस् तेज इति । तेऽब्रुवन्—क इदम् अच्छैतीति । गौर् इत्य् अब्रुवन् । गौर् वाव सर्वस्य मित्रम् इति साब्रवीत् ॥
जो इस वरदान को जानता है, उसे वो वरदान मिलता है। अग्नि और सोम दोनों उससे मिलके इंद्र को आगे बढ़ाते हैं। इंद्र ने वृत्र को मारा। देवतों ने वृत्र को मारकर अग्नि और सोम से कहा, 'हमारी हवन को ले जाओ।' वो दोनों बोले, 'हमारे पास चमक नहीं है, वृत्र में हमारी चमक थी।' देवतों ने पूछा, 'कौन आ रहा है यहाँ?' वो बोले, 'गाय आ रही है।' गाय ने कहा, 'गाय सब की दोस्त है।'
Mantra 7
वरं वृणै मय्येव सतोऽभयेन भुञ्जाध्वा इति । तद् गौर् आहरत् । तस्माद् गवि सतोऽभयेन भुञ्जते । एतद् वा अग्नेस् तेजो यद् घृतम् । एतत् सोमस्य यत् पयः । य एवम् अग्नीषोमयोस् तेजो वेद तेजस्व्य् एव भवति । ब्रह्मवादिनो वदन्ति किंदेवत्यम् पौर्णमासम् इति । प्राजापत्यम् इति ब्रूयात् । तेनेन्द्रं ज्येष्ठं पुत्रं निरवासाययद् इति । तस्माज् ज्येष्ठं पुत्रं धनेन निरवसाययन्ति ।
कोई बोले, मैं एक वरद माँगता हूँ, मुझे बिना डरे, सही रास्ते पे रह के इसका आनंद लो। तो गाये ने वो वरद ले आया। इसलिए गाये के दूध में बिना डरे, सही रह के आनंद लेते हैं। घी अग्नि की ताकत है, और दूध सोम की शक्ति है। जो यह बात समझ लेता है, उसमें ताकत आ जाती है। पूछते हैं कि पूर्णिमा की पूजा कौनसी देवता की है? जवाब दो, यह प्रजापति की है। इसी विधि से इंद्र ने अपने बड़े बेटे को प्रॉपर्टी से हटाया था। इसलिए लोग आज भी बड़े बेटे को धन दे कर अलग कर देते हैं।
Supports the monthly rite’s deity-allocation logic (notably Agnīṣomau) and the principle that formula precision determines ritual outcome; used as explanatory authority in procedural tradition.
Requires accented saṃhitā/padapāṭha witnesses; digitally, store this anuvāka as ‘accent-unknown’ and attach variant readings (e.g., vṛtra/vṛitra) as apparatus nodes.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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