Character · Bhagavatam
Narada in the Bhagavatam
नारदNamed in 446 verses
In this book
- Named as
- Devarṣi Nārada, Devarṣi
- Places
- Dvaraka, Kurukshetra, Vrindavan, Sarasvati River
Key chapters
The chapters where Narada matters most.
Dhruva’s Humiliation, Sunīti’s Counsel, and Nārada’s Bhakti-Yoga Instruction
Guru who tests, diagnoses, and then prescribes: he channels…
The Deliverance of Nalakūvara and Maṇigrīva (Yamala-Arjuna Līlā Prelude and Culmination)
Agent of compassion and moral diagnosis
Puruṣa-sūkta Logic of the Virāṭ: Cosmic Anatomy, Sacrifice, and the Lord’s Transcendence
Ideal disciple whose inquiry draws out the synthesis of…
Dhruva’s Benediction from Kuvera and His Ascension to Viṣṇuloka (Dhruvaloka)
Implicit guiding presence whose earlier bhakti-seed now flowers
Nārada Instructs Prācīnabarhiṣat: The Purañjana Narrative Begins (City of Nine Gates)
Compassionate reformer and spiritual diagnostician
Nārada’s Arrival, the Nine Yogendras, and the Foundations of Bhāgavata-dharma
Guru-figure who confirms bhakti as the eternal dharma and…
Bhagavān’s Avatāras, Their Protections (Poṣaṇa), and the Limits of Knowing Him
Ideal disciple and future transmitter
Vidura’s Return; Dhṛtarāṣṭra’s Departure; Nārada’s Instruction on Kāla and Detachment
Divine messenger who universalizes the episode into a doctrine…
Kṛṣṇa’s Daily Life in Dvārakā; the Captive Kings’ Appeal; Nārada Announces the Rājasūya
Divine catalyst who praises Kṛṣṇa’s inconceivable māyā and…
Nārada Sees Lord Kṛṣṇa’s Yoga-māyā in the Palaces of the Queens (Dvāra-kā-līlā)
Witness, tester, and celebrant of the Lord’s inconceivable…
Key episodes
Dhruva, the Pole Star
Bhagavatam 4.8-4.12
Prahlada, the Child Devotee
Bhagavatam 7.4-7.10
Every verse that names Narada
446 verses
- 1.3.8
तीसरा अवतार रिशियों के टाइम में आया। भगवान ने नारद रिशि का रूप लिया। वो देवता भी थे और रिशि भी। उन्होंने भक्ति के बारे में जो बात सिखाई, उसका नाम सात्वत तंत्र है। इससे करना सीखो, पर रिज़ल्ट के चक्कर में मत पड़ो।
- 1.4.32
व्यास अपने आप को अधूरा समझ के दुखी हो रहे थे। तभी नारद वहाँ आ गए। यह वही आश्रम है सरस्वती नदी के पास जिसका पिछले में ज़िक्र किया था।
- 1.4.33
जैसे ही व्यास ने नारद को देखा, वो तुरंत खड़े हो गए। उन्होंने नारद की बहुत इज़्ज़त की। नारद इतने बड़े हैं कि देवता भी उनकी पूजा करते हैं। व्यास ने भी वैसे ही स्वागत किया।
- 1.5.1
सूत ने कहा कि नारद वहाँ आराम से बैठे थे। उनके हाथ में वीणा थी और मुस्कुराते हुए लग रहे थे। उन्होंने व्यास से बात शुरू की जो पास ही बैठे थे।
- 1.5.2
नारद ने पूछा, 'पराशर के बेटा, बहुत खुशकिस्मत हो तुम। बताओ, अंदर से सच में खुश हो? या फिर बॉडी को ही खुद मान के, या सिर्फ दिमाग में खुश ढूंढ रहे हो?'
- 1.5.4
तुमने वो सच्चा ज्ञान भी पढ़ा है जो सनातन है। फिर भी प्रभु, तुम अंदर से उदास क्यों हो? ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारा काम पूरा नहीं हुआ।
- 1.5.5
व्यास ने कहा, 'जो तुमने कहा वो सही है। पर अंदर से मन शांत नहीं हो रहा। इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ कि मेरे मन की बात का असली रीज़न क्या है। तुम ब्रह्मा के बेटा हो, तुम्हे सब पता है।'
- 1.5.8
नारद ने कहा, आपने भगवान की महिमा ठीक से नहीं गाई। जो बात भगवान के दिल को खुश नहीं करती, मैं उसे खाली समझता हूँ, कोई वैल्यू नहीं।
- 1.5.11
पर जो बातें लोगों के बड़े काम की हैं, उसमे हर लाइन में भगवान के नाम और महिमा है, चाहे लैंग्वेज थोड़ी वीक हो। ऐसे बातों को संत लोग सुनते हैं, गाते हैं और मानते हैं।
- 1.5.14
अगर तुम भगवान को छोड़ के कुछ और बताओगे तो वो बात सीधा काम नहीं आती। उससे सिर्फ अलग-अलग नाम और रूप बनेंगे और दिमाग में गड़बड़ होगी। ऐसा दिमाग कहीं भी शांत नहीं होता, जैसे कश्ती हवा में पकड़ के उड़ रही हो और उसे कोई जगह नहीं मिल रही।
- 1.5.16
समझदार आदमी वोही है जो दुनिया के मज़े छोड़ के भगवान को जानता है। भगवान का तो कोई एंड नहीं, वो बहुत बड़े हैं। जो लोग दुनिया में फंसे हैं, उनके लिए तुम भगवान के काम की बात करो। वोही उन्हें सही रास्ता दिखायेगा।
- 1.5.18
इसलिए समझदार इंसान सिर्फ वही चीज़ के पीछे लगे जो ऊपर से नीचे तक घूमने पे भी नहीं मिलती। खुशी और दुख आपने आप टाइम पे आ जाते हैं। इसलिए वाइज लोग सिर्फ भगवान की भक्ति में लगते हैं।
- 1.5.20
यह पूरा दुनिया भगवान खुद है, लेकिन वो इसमें नहीं फंसा। इस दुनिया का आना, रहना और खत्म होना सब उसमें है। आपको यह सब पता है, मैंने बस थोड़ा सा बताया है।
- 1.5.22
बड़े लोगों ने सोचा है कि तपस्या, वेद पढ़ना, यज्ञ करना, भजन गाना, और दान देने का असली मतलब क्या है। वो कहते हैं कि सब काम भगवान की गुणों को गाने में खत्म होता है। यह सब काम उसी के लिए है।
- 1.5.34
इंसान के सारे काम उसे जनम-जनम के चक्कर में फंसा देते हैं। लेकिन जब वो काम भगवान के लिए हो, तो वही काम उस चक्कर को तोड़ देता है। जो बाँधता था, वही अब खोल देता है।
- 1.5.35
जो काम भगवान के लिए किया जाता है, उसे भक्ति-योग कहते हैं। और जो ज्ञान है, वो भी भक्ति के साथ चलता है। ज्ञान अकेला नहीं, वो भक्ति के साथ है।
- 1.5.36
जब इंसान भगवान कृष्ण के बोल के हिसाब से काम करता है, तो उसको कृष्ण का नाम लिया जाता है। वो कृष्ण के गुण गाता है और उसे याद करता रहता है। काम भी चलता है, नाम भी चलता है।
- 1.6.1
सूत ने कहा, ब्राह्मण लोगों, जब व्यास जी ने नारद के बारे में सुना कि उनका जन्म कैसा हुआ और उन्होंने क्या किया, तब व्यास जी ने फिर से सवाल किया। व्यास जी सत्यवती के बेटे थे और भगवान का रूप भी थे।
- 1.6.2
व्यास ने कहा, जिन्होंने तुम्हे सिखाया था वो सब रिशि चले गए। अब बताओ, जनम लेने के बाद पहले क्या किया था? उस टाइम क्या काम किया था?
- 1.6.5
नारद ने कहा, जो रिशि मुझे सिखाके गए थे वो चले गए। फिर मैंने अपना जीवन ऐसे ही बिताया।