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Rishi: Atharvanic/Angirasic tradition (hymn attributed in the Anukramaṇī to Atharvan-type seers; exact r̥ṣi varies by school lists)
Devata: Urugāya (Viṣṇu) with the Gods as purifiers; also the moral power of Earth’s ‘ūrj’
Chandas: Anuṣṭubh (predominant in AV social-legal hymns; pāda-structure consistent with anuṣṭubh usage)
Mantra 1
ब्रह्मजाया। तेऽवदन् प्रथ॒मा ब्र॑ह्मकिल्बि॒षेऽकू॑पारः सलि॒लो मा॑त॒रिश्वा॑ । वी॒डुह॑रा॒स्तप॑ उ॒ग्रं म॑यो॒भूरापो॑ दे॒वीः प्र॑थम॒जा ऋ॒तस्य॑
लोग कहते हैं यह ब्राह्मण की पत्नी है। पहले पाप में, एक बड़ा पानी है जिसका किनारा नही, मातरिश्वन। यह लोग शर्म हटाते हैं, उनकी तपस्या बहुत तेज़ है, वो भलाई लाते हैं। यह पानी देवियाँ हैं, धरम की पहली पैदाइश।
Mantra 2
सोमो॒ राजा॑ प्रथ॒मो ब्र॑ह्मजा॒यां पुनः॒ प्राय॑च्छ॒दहृ॑णीयमानः । अ॒न्व॒र्ति॒ता वरु॑णो मि॒त्र आ॑सीद॒ग्निर्होता॑ हस्त॒गृह्या नि॑नाय
सोम राजा ने पहले ब्राह्मण की पत्नी को वापस लाया, वो खुद गुस्सा नही था। वरुण और मित्र भी साथ थे। अग्नि ने उसका हाथ पकड़ के उसको ले चला।
Mantra 3
हस्ते॑नै॒व ग्रा॒ह्यऽआ॒धिर॑स्या ब्रह्मजा॒येति॒ चेदवो॑चत्। न दू॒ताय॑ प्र॒हेया॑ तस्थ ए॒षा तथा॑ रा॒ष्ट्रं गु॑पि॒तं क्ष॒त्रिय॑स्य
उसका हाथ पकड़ के ही उसकी गारंटी लेनी है, अगर कोई कहता है कि यह ब्राह्मण की पत्नी है। उसे किसी दूसरे के पास भेजना नही है। ऐसे ही खड़ी रहती है। इससे राजा का राज्य सेफ रहता है।
Mantra 4
यामा॒हुस्तार॑कै॒षा वि॑के॒शीति॑ दु॒च्छुनां॒ ग्राम॑मव॒पद्य॑मानाम्। सा ब्र॑ह्मजा॒या वि दु॑नोति रा॒ष्ट्रं यत्र॒ प्रापा॑दि श॒श उ॑ल्कु॒षीमा॑न्
जिसे लोग तारका कहते हैं, जिसके बाल खुले हैं, वो गाँव में बुराई लेकर आती है। वो ब्राह्मण की पत्नी राज्य को तोड़ देती है जहाँ वो खरगोश निशान के साथ घुस आता है।
Mantra 5
ब्र॒ह्म॒चा॒री च॑रति॒ वेवि॑ष॒द् विषः॒ स दे॒वानां॑ भव॒त्येक॒मङ्ग॑म्। तेन॑ जा॒या मन्व॑विन्द॒द् बृह॒स्पतिः॒ सोमे॑न नी॒तां जु॒ह्वं१ न दे॑वाः
ब्रह्मचारी घूमता है, उसके अंदर एक तागत है जो ज़हर जैसा है। वो देवता लोगों का हिस्सा बन जाता है। इस तागत से मनु को पत्नी मिली। बृहस्पति ने सोम के साथ उसको ले लिया, जैसे देवता लोग हवन की चम्मच चलाते हैं।
Mantra 6
दे॒वा वा ए॒तस्या॑मवदन्त॒ पूर्वे॑ सप्तऋ॒षय॒स्तप॑सा॒ ये नि॑षे॒दुः । भी॒मा जा॒या ब्रा॑ह्म॒णस्याप॑नीता दु॒र्धां द॑धाति पर॒मेव्योऽमन्
पहले के देवता ने इस बारे में बात की थी। सात रिशि तपस्या करके बैठे थे। ब्राह्मण की बीवी जब उसके पास जाती है तो डर लगता है। वो औरत बड़े आदमी को भी बुरा फल देती है, यह लोग मानते हैं।
Mantra 7
ये गर्भा॑ अव॒पद्य॑न्ते॒ जग॒द् यच्चा॑पलु॒प्यते॑ । वी॒रा ये तृ॒ह्यन्ते॑ मि॒थो ब्र॑ह्मजा॒या हि॑नस्ति॒ तान्
जिस बच्चे गिर जाते हैं, जिस दुनिया का सिस्टम खराब हो जाता है, जो कुछ बर्बाद हो जाता है। जो लड़के आपस में लड़ते हैं और कुछ नहीं बचता, ब्राह्मण की बीवी उन सब को मार देती है।
Mantra 8
उत यत् पत॑यो॒ दश॑ स्त्रि॒याः पूर्वे॒ अब्रा॑ह्मणाः । ब्र॒ह्माचेद्धस्त॒मग्र॑ही॒त् स ए॒व पति॑रेक॒धा
और एक और बात। अगर किसी औरत के दस पति थे, वो भी ब्राह्मण नहीं थे। लेकिन अगर ब्राह्मण ने उसका हाथ पकड़ लिया, तो वोही एक पति होगा। कोई दूसरा नहीं।
Mantra 9
ब्रा॒ह्म॒ण ए॒व पति॒र्न रा॑ज॒न्यो॒३ न वैश्यः॑ । तत् सूर्यः॑ प्रब्रु॒वन्ने॑ति प॒ञ्चभ्यो॑ मान॒वेभ्यः॑
सिर्फ ब्राह्मण ही पति है, राजपूत नहीं, वैश्य नहीं। सूरज ने यह बात बोल दी है। यह बात पाँच तरह के लोगों में फैल गई है।
Mantra 10
पुन॒र्वै दे॒वा अ॑ददुः॒ पुन॑र्मनु॒ष्या अददुः । राजा॑नः स॒त्यं गृ॑ह्णा॒ना ब्र॑ह्मजा॒यां पुन॑र्ददुः
पहले देवता ने उस औरत को वापस किया, फिर इंसान ने भी वापस किया। राजा लोग सच पकड़ के ब्राह्मण की बीवी को वापस लाए। यह सब ने सच का सहारा लिया और गलती ठीक की।
Mantra 11
पु॒न॒र्दाय॑ ब्रह्मजा॒यां कृ॒त्वा दे॒वैर्नि॑किल्बि॒षम्। ऊर्जं॑ पृथि॒व्या भ॒क्त्वोरु॑गा॒यमुपा॑सते
ब्राह्मण की बीवी को वापस लौटा दिया, और देवियों के साथ मिल के पाप को डुबोकर खत्म कर दिया। फिर धरती की ताकत बाँट के लोग उस महान भगवान के पास जाके पूजा करते हैं।
Mantra 12
नास्य॑ जा॒या श॑तवा॒ही क॑ल्या॒णी तल्प॒मा श॑ये । यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राज्य में किसी को ब्राह्मण की बीवी के बारे में गलत इरादे के लिए पकड़ा जाता है, वहाँ उसकी बीवी सुहगन भी नहीं होती। वो सौ खुशियाँ लाने वाली बीवी भी शादी के बिस्तर पर नहीं सोती।
Mantra 13
न वि॑क॒र्णः पृ॒थुशि॑रा॒स्तस्मि॒न् वेश्म॑नि जायते । यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राज्य में किसी को ब्राह्मण की बीवी के बारे में गलत इरादे के लिए पकड़ा जाता है, वहाँ उसके घर में कोई बुरा बच्चा पैदा नहीं होता। ना ही कोई कान से फटा हुआ, ना बड़े सिर वाला बच्चा पैदा होता है।
Mantra 14
नास्य॑ क्ष॒त्ता नि॒ष्कग्री॑वः सू॒नाना॑मेत्यग्र॒तः । यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राज्य में किसी को ब्राह्मण की बीवी के बारे में गलत इरादे के लिए पकड़ा जाता है, वहाँ उसका नौकर भी उसके बच्चों के आगे नहीं निकलता। वो हार पहने हुआ नौकर भी इज्जत नहीं पाता।
Mantra 15
नास्य॑ श्वे॒तः कृ॑ष्ण॒कर्णो॑ धु॒रि यु॒क्तो म॑हीयते । यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राज्य में किसी को ब्राह्मण की पत्नी के लिए गलत नज़र आके पकड़ा जाता है, वहाँ उसका कोई भी जानवर सफल नहीं होता। चाहे वो सफेद हो या कान काला हो, गाड़ी में जुता के भी उसकी कोई इज़्ज़त नहीं होती। उस देश में ऐसा आदमी कभी आगे नहीं बढ़ता।
Mantra 16
नास्य॒ क्षेत्रे॑ पुष्क॒रिणी॒ नाण्डीकं॑ जायते॒ बिस॑म्। यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राजा के इलाके में कोई कमल का तालाब नहीं है, वहाँ कमल का फूल भी नहीं उगता। यह वो राज्य है जहाँ सब बंद है। यह वो लोग हैं जो ब्राह्मण की पत्नी के बारे में बुरी नज़र रखते हैं। इसलिए वहाँ कुछ भी अच्छा नहीं होता।
Mantra 17
नास्मै॒ पृश्निं॒ वि दु॑हन्ति॒ येऽस्या॒ दोह॑मु॒पास॑ते । यस्मि॑न् रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या
जिस राजा के राज्य में ऐसी बुरी बात चल रही है, वहाँ गाय भी दूध नहीं देती। लोग दूध निकालना चाहते हैं लेकिन गाय दूध नहीं देती। यह तब होता है जब ब्राह्मण की पत्नी के साथ गलत हरकत होती है।
Mantra 18
नास्य॑ धे॒नुः क॑ल्या॒णी नान॒ड्वान्त्स॑हते॒ धुर॑म्। विजा॑नि॒र्यत्र॑ ब्रह्म॒णो रात्रिं॒ वस॑ति पा॒पया॑
जहाँ बुरा काम होता है, वहाँ गाय अच्छी नहीं होती और बैल गाड़ी नहीं चलाता। वहाँ सब खराब चल रहा है। ब्राह्मण लोग बुरी तरह रात बिताते हैं। यह तब होता है जब कोई ब्राह्मण की इज़्ज़त नहीं करता।
It addresses a grave social and moral offense involving the wrongful taking/withholding of a Brahmin’s wife, and prescribes restitution plus purification so the resulting guilt and instability do not spread through the realm.
They establish a divine precedent and legal-sacral framework: Soma restores, Mitra–Varuṇa represent oversight and order, and Agni is the public witness who ‘leads by the hand.’ Viṣṇu/Urugāya then seals the restored stability and prosperity.
The decisive act is ‘punar-dāya’—giving back again—done openly and truthfully (satya), followed by purification so the sin (kilbiṣa) is said to sink away and Earth’s nourishing strength (ūrj) returns to the community.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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