Opening the text

Rishi: Atharvanic tradition (often anonymous/household seer for paustika hymns)
Devata: Gāvaḥ (Cows) with Indra as beneficiary/protector
Chandas: Mixed; predominantly Triṣṭubh-like cadence in Saunaka transmission (as commonly analyzed for this type of prosperity verse)
Mantra 1
गावः। आ गावो॑ अग्मन्नु॒त भ॒द्रम॑क्र॒न्त्सीद॑न्तु गो॒ष्ठे र॒णय॑न्त्व॒स्मे। प्र॒जाव॑तीः पुरु॒रूपा॑ इ॒ह स्यु॒रिन्द्रा॑य पू॒र्वीरु॒षसो॒ दुहा॑नाः
गायें यहाँ आ गई हैं और अच्छा काम कर गई हैं। वो गौशाला में बैठ जाएँ, हमारे बीच खुश रहें। बच्चों वाली और कई रूप वाली गायें यहाँ हों। इंद्र के लिए वो दूध दे, जैसे कई सुबह होती हैं।
Mantra 2
इन्द्रो॒ यज्व॑ने गृण॒ते च॒ शिक्ष॑त॒ उपेद् द॑दाति॒ न स्वं मु॑षायति । भूयो॑भूयो र॒यिमिद॑स्य व॒र्धय॑न्नभि॒न्ने खि॒ल्ये नि द॑धाति देव॒युम्
इंद्र यज्ञ करने वाले और गाना गाने वाले को सही रास्ता दिखाता है। वो देता है, किसी की चीज़ चुराता नहीं। बार-बार उस आदमी की दौलत बढ़ाता है। भगवान पर भरोसा रखने वाले को वो खाली मैदान में खड़ा कर देता है।
Mantra 3
न ता न॑शन्ति॒ न द॑भाति॒ तस्क॑रो॒ नासा॑मामि॒त्रो व्य॒थिरा द॑धर्षति । दे॒वांश्च याभि॒र्यज॑ते॒ ददा॑ति च॒ ज्योगित् ताभिः॑ सचते॒ गोप॑तिः स॒ह
यह गायें कभी खत्म नहीं होती। चोर उने नुकसान नहीं पहुँचा सकता। कोई दुश्मन भी उनसे डरता है, उनपे हाथ नहीं मार सकता। इन गायों से भगवान की पूजा होती है, इन से दान भी मिलता है। गायों के मालिक इनके साथ लंबे टाइम तक रहते हैं।
Mantra 4
न ता अर्वा॑ रे॒णुक॑काटोऽश्नुते॒ न सं॑स्कृत॒त्रमुप॑ यन्ति॒ ता अ॒भि। उ॒रु॒गा॒यमभ॑यं॒ तस्य॒ ता अनु॒ गावो॒ मर्त॑स्य॒ वि च॑रन्ति॒ यज्व॑नः
कोई घोड़ा इन गायों को पकड़ नहीं सकता। कोई जाल भी उनपे काम नहीं करता। जो भगवान सब जगह घूमता है, उसके साथ रहके गायें डर के बिना घूमती हैं। यज्ञ करने वाले आदमी की गायें ऐसे ही आज़ाद फिरती हैं।
Mantra 5
गावो॒ भगो॒ गाव॒ इन्द्रो॑ म इच्छा॒द् गावः॒ सोम॑स्य प्रथ॒मस्य॑ भ॒क्षः । इ॒मा या गावः॒ स ज॑नास॒ इन्द्र॑ इ॒च्छामि॑ हृ॒दा मन॑सा चि॒दिन्द्र॑म्
गाय भगवान की देन है, यह खुशी लाती हैं। इंद्र की यह दुआ है कि वो मुझे चाहें। गाय सोम के पहले हिस्से में आती हैं। यह जो गाय हैं, वो मेरे लिए है। आदमियों में इंद्र सबसे बड़ा है। मैं अपने दिल और दिमाग से इंद्र को चाहता हूँ।
Mantra 6
यू॒यं गा॑वो मेदयथ कृ॒शं चि॑दश्री॒रं चि॑त् कृणुथा सु॒प्रती॑कम्। भ॒द्रं गृ॒हं कृ॑णुथ भद्रवाचो बृ॒हद् वो॒ वय॑ उच्यते स॒भासु॑
गायों से प्रार्थना है। जो गाय कमज़ोर है उसे मोटा बना दो। जो किस्मत से बिछड़ी है उसे अच्छी बना दो। घर को अच्छा बना दो, जहाँ अच्छी बातें हों। तुम्हारी ताकत बड़ी है, सब लोग सभा में यह बात कहते हैं।
Mantra 7
प्र॒जाव॑तीः सू॒यव॑से रु॒शन्तीः॑ शु॒द्धा अ॒पः सु॑प्रपा॒णे पिब॑न्तीः । मा व॑ स्ते॒न ई॑शत॒ माघशं॑सः॒ परि॑ वो रु॒द्रस्य॑ हे॒तिर्वृ॑णक्तु
गायें बच्चे देती हैं, चमकती हैं, अच्छे चरागाहों की तरफ जाती हैं। वो साफ पानी पीती हैं जहाँ पानी अच्छा मिलता है। चोर तुमपे कभी हाथ न डाले, बुरा काम करने वाला तुम्हे कभी न पकड़े। रुद्र की ताकत तुम्हारे आस-पास तुम्हे रखे।
It is used to bring cows safely home, settle them peacefully in the cow-stall, and secure fertility, milk-yield, and overall herd increase under divine protection.
Indra (as Urugāya) provides ‘fearlessness’ that prevents pursuit and snares during grazing, while Rudra is invoked to form a protective enclosure—like a fence—against theft and harmful hostility.
The hymn’s primary ‘materials’ are practical and symbolic: the goṣṭha (stall), good pasture, and clean water. The main protective element is the mantra-informed boundary—recited while settling the herd and encircling them in intention.
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