
In Mandala-yoni, Kautilya treats alliance not as sentiment but as an engineered constraint system. Chapter 7.17 operationalizes saṃdhi by measuring the credibility of a partner’s commitment through the quality of pledges—especially heirs. The Vijigīṣu is instructed to read pledge-offers as signals: low-cost pledges (e.g., a daughter without inheritance claim) do not bind; high-cost pledges (a single capable son, or the best among sons) bind strongly but also invite counter-stratagems. The chapter ranks pledge-types by political utility—succession value, counsel-capacity (mantra-śakti), valor (utsāha), weapons-training (praharaṇa-sampad), and reproductive contingency (many sons vs one). These criteria embed saptāṅga logic: the ally-limb is stabilized by hostage-costs; the minister-limb is protected by guarding mantra-śakti; and the army-limb is safeguarded by reducing the probability of betrayal. Thus, alliance becomes a calculable instrument inside the Vijigīṣu’s expansionary design, not a moral end.
Sutra 1
शमः संधिः समाधिरित्येकोऽर्थः ॥
शम, संधि और समाधि, तीनो का मतलब एक ही है। यह सब शांति या समझौता को कहते हैं।
Sutra 2
राज्ञां विश्वासोपगमः शमः संधिः समाधिरिति ॥
शम, संधि या समाधि तब होता है जब दो राजा एक दूसरे पर भरोसा करते हैं। फिर उनके बीच सब ठीक हो जाता है।
Sutra 3
सत्यं शपथो वा चलः संधिः प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा स्थावरः इत्याचार्याः ॥
आचार्य लोग कहते हैं कि संधि दो तरह की होती है। चंचल संधि सिर्फ सच्चाई या कसम पे चलती है। स्थावर संधि तब होती है जब कोई ज़िम्मेदार बने या कुछ गिरोह दे के पक्का किया जाए।
Sutra 5
सत्यं शपथो वा परत्रेह च स्थावरः संधिः इहार्थ एव प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा बलापेक्षः ॥
सच्चाई या कसम से जो संधि होती है वो इस दुनिया में भी चलती है और आगे भी। लेकिन जब कोई ज़िम्मेदार बनता है या गिरोह लिया जाता है, तो वो सिर्फ इस दुनिया का काम आता है। वो तभी चलता है जब तक पावर है।
Sutra 6
संहिताः स्मः इति सत्यसंधाः पूर्वे राजानः सत्येन संदधिरे ॥
पहले के राजा कहते थे कि हम एक हैं। वो अपनी संधि के सच्चे थे। वो सच्चाई से ही समझौता करते थे।
Sutra 7
तस्यातिक्रमे शपथेन अग्न्युदकसीताप्राकारलोष्टहस्तिस्कन्धाश्वपृष्टरथोपस्थशस्त्ररत्नबीजगन्धरससुवर्णहिरण्यान्यालेभिरे हन्युरेतानि त्यजेयुश्चैनं यः शपथमतिक्रामेत् इति ॥
अगर कोई प्रॉमिस तोड़ता है, तो उस्से कसम दिलवानी चाहिए। कसम यह के आग, पानी, खेत की बाउंड्री, दीवार, मिट्टी का टुकड़ा, सब उसपे लात मारें। हाथी का कंधा, घोड़े का पीठ, रथ की सीट, हथियार, गहने, बीज, इत्र, खाना, सोना और चांदी, यह सब भी उसपे मार करें। जो बंदा कसम तोड़ता है, यह सब उस्से छोड़ दें।
Sutra 8
शपथातिक्रमे महतां तपस्विनां मुख्यानां वा प्रातिभाव्यबन्धः प्रतिभूः ॥
जब कोई कसम तोड़ता है, तो गारंटी के लिए किसी बड़े आदमी की ज़रूरत पड़ती है। कोई तपस्वी बाबा हो, कोई बड़ा मालिक हो, या कोई मेन आदमी हो, उसको गारंटी के लिए पकड़ना चाहिए।
Sutra 9
तस्मिन्यः परावग्रहसमर्थान्प्रतिभुवो गृह्णाति सोऽतिसंधत्ते ॥
इस काम में जो ऐसा गारंटी वाला पकड़ता है जो दूसरी तरफ से भी पकड़ में आ सकता है, वो अपनी तरफ से बहुत टाइट डील कर लेता है।
Sutra 10
विपरीतोऽतिसंधीयते ॥
उल्टा करने से दूसरी तरफ का टाइट हो जाता है।
Sutra 11
बन्धुमुख्यप्रग्रहः प्रतिग्रहः ॥
जब दूसरी तरफ से कोई गारंटी या कोई अपना रिश्तेदार पकड़ के रखते हैं, उसको काउंटर-प्लेज कहते हैं।
Sutra 12
तस्मिन्यो दूष्यामात्यं दूष्यापत्यं वा ददाति सोऽतिसंधत्ते ॥
अगर कोई ऐसा आदमियों को सिक्योरिटी में रखता है जो पैसे से बिकता है, तो वो गलत फैसला है। ऐसा करने वाला अपने आप को बहुत ज़्यादा सेफ समझता है, लेकिन वो गलत है। यह आदमी या वारिस जिससे भी बड़ा रिस्क है, वो भी कंप्रोमाइज़ हो सकता है।
Sutra 13
विपरीतोऽतिसंधीयते ॥
उल्टे काम करने पे भी सेम प्रॉब्लम होती है। मतलब अगर तुम बहुत ज़्यादा केयरफुल हो जाओगे, तो भी गलत हो जाओगे। दोनों तरफ से बहुत ज़्यादा सेफ रहने की कोशिश करना गलत है।
Sutra 14
प्रतिग्रहग्रहणविश्वस्तस्य हि परश्छिद्रेषु निरपेक्षः प्रहरति ॥
जब कोई गारंटी या सिक्योरिटी लेके रिलैक्स हो जाता है, तब दुश्मन उसकी कमज़ोरी पे सीधा हाथ मारता है। वो सोचता है सब ठीक है, लेकिन उसकी गलती उसके लिए बड़ी प्रॉब्लम बन जाती है। दुश्मन उसकी वीकनेस का फ़ायदा उठाता है।
Sutra 15
अपत्यसमाधौ तु कन्यापुत्रदाने ददत्तु कन्यामतिसंधत्ते ॥
अपने बाद वारिस बैठाने के लिए अगर कोई अपनी बेटी की शादी करके बेटा पाना चाहता है, तो वो भी गलत है। बेटी को देके वो अपने आप को बहुत ज़्यादा कमिट कर रहा है। यह भी एक तरह का ओवर-कमिटमेंट है।
Sutra 16
कन्या ह्यदायादा परेषामेवार्थायाक्लेश्या च ॥
बेटी अपने बाप के घर का वारिस नहीं होती। वो दूसरों के घर जाती है और वहाँ का काम करती है। कभी-कभी उसको बड़ा तकलीफ़ भी उठाना पड़ता है। यह बात समझनी पड़ती है।
Sutra 17
विपरीतः पुत्रः ॥
यहाँ 'पुत्र' का मतलब है एजेंट या हेल्पर। विपरीत पुत्र का मतलब है जो बिल्कुल उल्टा टाइप का है।
Sutra 18
पुत्रयोरपि यो जात्यं प्राज्ञं शूरं कृतास्त्रमेकपुत्रं वा ददाति सोऽतिसंधीयते ॥
अगर दो एजेंट्स में से कोई एक अच्छा खासा एजेंट भेजता है, वो पीछे पड़ जाता है। अच्छा खासा मतलब, अच्छे घर का हो, समझदार हो, बहादुर हो, या वॉरफेयर में ट्रेन्ड हो। या फिर अकेला बेटा हो। इन सब में से कोई भी भेजोगे तो दुश्मन उसे आउटविट कर देगा।
Sutra 19
विपरीतोऽतिसंधत्ते ॥
जो उल्टा टाइप का एजेंट है, वो दूसरे को आउटविट कर देता है।
Sutra 20
जात्यादजात्यो हि लुप्तदायादसंतानत्वादाधातुं श्रेयान्प्राज्ञादप्राज्ञो मन्त्रशक्तिलोपात् शूरादशूर उत्साहशक्तिलोपात्कृतास्त्रादकृतास्त्रः प्रहर्तव्यसम्पल्लोपात् एकपुत्रादनेकपुत्रो निरपेक्षत्वात् ॥
अच्छे घर के आदमी के सामने, गरीब घर का आदमी यूज़ कर सकते हो, क्योंकि उसका कोई वारिस नहीं, वो कंट्रोल में रहता है। समझदार के सामने, समझदार नहीं वो जीत सकता है, क्योंकि समझदार का अडवाइस काम नहीं करता। बहादुर के सामने, डरपक जीत सकता है, क्योंकि बहादुर का जोश कम हो जाता है। ट्रेन्ड सोल्जर के सामने, अनट्रेन्ड जीत सकता है, क्योंकि उसके हाथ से हथियार छीन सकते हो। अकेला बेटा हो तो, जिसके पास बहुत बेटे हैं वो जीतेगा, क्योंकि उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
Sutra 21
जात्यप्राज्ञयोर्जात्यमप्राज्ञमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तते प्राज्ञमजात्यं मन्त्राधिकारः ॥
अच्छे घर का आदमी और समझदार आदमी में फरक है। अच्छे घर का आदमी, अगर समझदार नहीं भी हो, तो भी लोग उसके पीछे लगते हैं, पावर उसके साथ रहती है। लेकिन समझदार आदमी, अगर गरीब घर का भी हो, वो अडवाइस देने का काम कर सकता है।
Sutra 22
मन्त्राधिकारेऽपि वृद्धसम्योगाज्जात्यः प्राज्ञमतिसंधत्ते ॥
मंत्रियों की बात में भी, अच्छी जात का आदमी समझदार को पीछे छोड़ सकता है। बस शर्त ये है कि बड़े लोगों के साथ रहता हो। बड़े लोगों की कंपनी में रहके वो असल काम सीख जाता है।
Sutra 23
प्राज्ञशूरयोः प्राज्ञमशूरं मतिकर्मणां योगोऽनुवर्तते शूरमप्राज्ञं विक्रमाधिकारः ॥
समझदार और बहादुर में ये फर्क है। समझदार अगर बहादुर नहीं है, फिर भी लोग उसकी प्लानिंग फॉलो करते हैं। क्योंकि वो दिमाग से काम करता है। बहादुर अगर समझदार नहीं है, तो भी एक्शन में उसका राज है। क्योंकि वो हिम्मत दिखाता है।
Sutra 24
विक्रमाधिकारेऽपि हस्तिनमिव लुब्धकः प्राज्ञः शूरमतिसंधत्तेश् ॥
बहादुरी के काम में भी समझदार बहादुर को चल सकता है। जैसे शिकारी हाथी को पकड़ लेता है। हाथी बड़ा है, ताकत भी है। पर शिकारी का दिमाग उससे तेज़ है।
Sutra 25
शूरकृतास्त्रयोः शूरमकृतास्त्रं विक्रमव्यवसायोऽनुवर्तते कृतास्त्रमशूरं लक्ष्यलम्भाधिकारः ॥
बहादुर और सीखा हुआ में फर्क है। बहादुर अगर सीखा नहीं, फिर भी लोग उसका जोश फॉलो करते हैं। जो सीखा हुआ है, बहादुर नहीं, उसका काम में हाथ है। वो टारगेट मारना जानता है।
Sutra 26
लक्ष्यलम्भाधिकारेऽपि स्थैर्यप्रतिपत्त्यसम्मोषैः शूरः कृतास्त्रमतिसंधत्ते ॥
टारगेट मारना सीखने के बाद भी, बहादुर सीखे हुए को चल सकता है। अगर वो पक्का है, समझता है कि क्या हो रहा है, और घबराता नहीं। दिमाग और हिम्मत दोनों का अपना काम है।
Sutra 27
बह्वेकपुत्रयोर्बहुपुत्र एकं दत्त्वा शेषप्रतिष्टब्धः संधिमतिक्रामति नेतरः ॥
जब दो राजा हो, एक के पास बहुत बेटे, दूसरे के पास सिर्फ एक बेटा, तो जो राजा बहुत बेटे वाला है, वो एक बेटा दे के बाकी बच गए से सेफ फील करता है। इसलिए वो समझोता तोड़ देता है। जो सिर्फ एक बेटा वाला है, वो नहीं तोड़ता।
Sutra 28
पुत्रसर्वस्वदाने संधिश्चेत्पुत्रफलतो विशेषः ॥
अगर समझोता के लिए अपना बेटा और सब कुछ देना पड़ रहा है, तो सबसे इम्पोर्टेंट बात है, उस बेटा की वैल्यू कितनी है। यही फरक बनाता है।
Sutra 29
समफलयोः शक्तप्रजननतो विशेषः ॥
अगर दोनों तरफ से बेटा की वैल्यू बराबर है, तो देखो, कौन ज़्यादा औलाद पैदा कर सकता है। यही बात डिसाइड करेगा।
Sutra 30
शक्तप्रजननयोरप्युपस्थितप्रजननतो विशेषः ॥
अगर दोनों औलाद पैदा कर सकते हैं, तो देखो, जिसके पास पहले से बेटे पैदा हो चुके हैं, उसका नंबर ऊपर होगा।
Sutra 31
शक्तिमत्येकपुत्रे तु लुप्तपुत्रोत्पत्तिरात्मानमादध्यात् न चैकपुत्रमिति ॥
लेकिन अगर एक ही पावरफुल बेटा हो, तो सोचना पड़ेगा, अगर वो बेटा गायब हो गया तो पूरा खानदान खत्म। इसलिए उसे 'सिर्फ एक बेटा' मत समझो, इसका रिस्क बहुत बड़ा है।
Sutra 32
अभ्युच्चीयमानः समाधिमोक्षं कारयेत् ॥
जब दूसरी तरफ ताकत पकड़ती है, तो समझोते से निकल जाना चाहिए। बांधन को ढीला कर दो या पूरा छोड़ दो।
Sutra 33
कुमारासन्नाः सत्त्रिणः कारुशिल्पिव्यञ्जनाः कर्माणि कुर्वाणाः सुरुङ्गया रात्राव् उपखानयित्वा कुमारमपहरेयुः ॥
राजकुमार के पास लोग भेजो जो भिखारी या कारीगर बन के काम करते हैं। रात को सुरंग खोद के राजकुमार को उठा ले जाना।
Sutra 34
नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवप्लवकसौभिका वा पूर्वप्रणिहिताः परमुपतिष्ठेरन् ॥
या फिर नाचने वाले, गाने वाले, बजाने वाले, बोलने वाले, नैया वाले और खेल दिखाने वाले भेजो। इन्हे पहले से ही वहीं बैठा दो ताकि वो आस पास रहें।
Sutra 35
ते कुमारं परं परयोपतिष्ठेरन् ॥
वो धीरे धीरे राजकुमार के काम आ जाते हैं। पास पास रह के उसकी बातें सुनते हैं और उसके साथ घूमते हैं।
Sutra 36
तेषामनियतकालप्रवेशस्थाननिर्गमनानि स्थापयेत् ॥
इनके लिए ऐसे वक्त और रास्ते बनाओ जो फिक्स ना हो। कब जाना है, कहाँ से जाना है, कहाँ से निकलना है, यह सब बदलता रहे।
Sutra 47
अन्यद्वा शरीरं निक्षिप्य स्वगृहमादीपयेदनुपातभयात् ॥
या फिर कोई और लाश वहाँ छोड़ के। अपना घर आग लगा दे, ताकि पीछे न आएँ। डर के मारे यह करना पड़ेगा।
Sutra 48
ततः संधिच्छेदखातसुरुङ्गाभिरपगच्छेत् ॥
फिर दीवार में सीढ़ियाँ, खड्डा या सुरंगों का रास्ता पकड़ के। वहाँ से निकल जाना है।
Sutra 49
काचकुम्भभाण्डभारव्यञ्जनो वा रात्रौ प्रतिष्ठेत ॥
या फिर ऐसे दिखना चाहिए जैसे कोई शीशे के बर्तन और घर का सामान उठा के चल रहा हो। रात को ऐसे ही घूमना है।
Sutra 50
मुण्डजटिलानां प्रवासनान्यनुप्रविष्टो वा रात्रौ तद्व्यञ्जनः प्रतिष्ठेत विरूपव्याधिकरणारण्यचरच्छद्मनामन्यतमेन वा ॥
या फिर उन लोगों के साथ मिल जाना जो गंजे साधु हैं या जिनके बाल जटे हैं। रात को उनकी तरह दिखना है। या फिर कोई बीमार, कोई झूठा रोग वाला, जंगल में घूमने वाला, या कोई दूसरा नाम ले के।
Sutra 51
प्रेतव्यञ्जनो वा गूढैर्निर्ह्रियेत ॥
या फिर वो इंसान को मरा हुआ दिखा के बाहर निकालना है। छुपा के एजेंट्स उसे चुप-चाप ले जाएँ।
Sutra 52
प्रेतं वा स्त्रीवेषेणानुगच्छेत् ॥
या फिर वो लाश के पीछे-पीछे जाए। और खुद औरत के कपड़े पहन के चलना है।
Sutra 53
वनचरव्यञ्जनाश्चैनमन्यतो यान्तमन्यतोऽपदिशेयुः ॥
जंगल में घूमने वाले एजेंट्स भी काम आ जाते हैं। वो एक तरफ दिखा के बोल दें कि वो दूसरी तरफ जा रहा है।
Sutra 54
ततोऽन्यतो गच्छेत् ॥
फिर उसको रास्ता बदलना है। दूसरी तरफ से निकल जाना।
Sutra 55
चक्रचराणां वा शकटवाटैरपगच्छेत् ॥
या गाड़ी-गाड़ी के बीच में मिल के निकल जाना। कार्ट के पीछे छुप के निकलना भी एक तरीका है।
Sutra 56
आसन्ने चानुपाते सत्त्रं वा गृह्णीयात् ॥
जब दुश्मन पास आ जाए, तब सत्तरा ले लो। यह पब्लिक जगह है जहाँ लोग को शेल्टर मिलता है। वहाँ छुप जाना आसान है।
Sutra 57
सत्त्राभावे हिरण्यं रसविद्धं वा भक्ष्यजातमुभयतःपन्थानमुत्सृजेत् ॥
जब कोई सेफ जगह नहीं मिले, तो सोने को छोड़ देना। ज़हर मिला खाना भी छोड़ देना। और जो रास्ता दोनों तरफ से खतरनाक हो, उस रास्ते को भी छोड़ देना।
Sutra 58
ततोऽन्यतोऽपगच्छेत् ॥
फिर दूसरी तरफ निकल जाना। कोई और रास्ता पकड़ना।
Sutra 59
गृहीतो वा सामादिभिरनुपातमतिसंदध्यात् रसविद्धेन वा पथ्यदनेन ॥
अगर पकड़ लिया जाये, तो बात-बात से समझा के भागना। या फिर ज़हर मिला खाना दे के रास्ता बनाना।
Sutra 60
वारुणयोगाग्निदाहेषु वा शरीरमन्यदाधाय शत्रुमभियुञ्जीत पुत्रो मे त्वया हतः इति ॥
या पानी में डूबते वक्त, या आग में, किसी और की लाश रख के दुश्मन के पास जाना। और कहना, तुमने मेरा बेटा मारा है।
Sutra 61
शीघ्रपातैरपसरेद्गूढप्रणिहितैः सह ॥
जल्दी वापस हट जाओ। जो एजेंट्स छुप के बैठाये हैं, उन्हें साथ ले कर।
More stable alliances and fewer surprise betrayals: by demanding/assessing high-cost pledges, the state reduces war-frequency, protects succession-security, and preserves resources for productive governance.
The passage implies coercive consequence rather than a codified fine: breach of saṃdhi after giving a pledge justifies retaliatory measures—seizure of the pledge/hostage, punitive expedition, or escalation from saṃdhi to vigraha—since the pledge is designed to make defection materially unbearable.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.