Opening the text

In this segment, Kauṭilya treats conquest as an organic process of mandala-management rather than a single military event. The pragmatic objective is to convert ‘upānata’ (those who have submitted) into stable, intergenerational adherents by safeguarding their status and local bases under a framework of conciliatory protection (sāma) backed by credible danda. The text warns that if a victor humiliates or destroys the submitted—by killing, imprisoning, or seizing land, wealth, sons, and wives—he manufactures systemic fear (‘udvigna maṇḍala’), inviting rebellion and coalition-formation against him. The danger is amplified when the king’s own ministers are rooted in independent territorial bases; their anxiety pushes them to seek refuge in rival mandalas or to prize their own survival and sovereignty over loyalty. Thus Book 7, as the manual of the aspiring conqueror, places consolidation and elite-retention at the center of expansion: a conqueror must preserve the defeated elite’s continuity and regulate his own elite’s autonomy to prevent the state-body from turning its limbs against the head.
Sutra 1
কZ_০৭.১৬.০১ ॥
Sutra 2
विपर्यये कृतप्रतीकारो यायात् ॥ कZ_०७.१६.०२ ॥
अगर सिचुएशन खराब हो जाए, तो पहले अपना काम कर ले। अपनी हिफाज़त कर ले, नुकसान रोक ले। उसके बाद वापस हट जाना।
Sutra 3
सामदानाभ्यां दुर्बलानुपनमयेत्भेददण्डाभ्यां बलवतः ॥ कZ_०७.१६.०३ ॥
जो कमज़ोर है, उन्हें बात-बात से मनाना। इनाम देना, खुश करना। जो स्ट्रॉन्ग है, उन्हें तोड़ना। उनकी फ़ौज तोड़ दो या ज़ोर से दबाना।
Sutra 4
नियोगविकल्पसमुच्चयैश्चोपायानामनन्तरैकान्तराः प्रकृतीः साधयेत् ॥ कZ_०७.१६.०४ ॥
अलग-अलग तरीके यूज़ करना। कभी सीधा बोलना, कभी रास्ता बदलना, कभी दो-तीन चीज़ें साथ चलाना। इससे अपने लोगों को संभालना। कभी तुरंत करना, कभी थोड़ा टाइम रुक के।
Sutra 5
ग्रामारण्योपजीविव्रजवणिक्पथानुपालनमुज्झितापसृतापकारिणां चार्पणमिति सान्त्वमाचरेत् ॥ कZ_०७.१६.०५ ॥
लोगों को खुश रखना। गाँव की हिफाज़त करना। जंगल में रहने वाले लोगों का ख़याल रखना। पालतू जानवर वाले, दुकानदार, सबकी मदद करना। रास्ते साफ़ रखना। जो लोग भाग गए थे या निकाल दिए गए थे, उन्हें वापस लेने का रास्ता दिखाना।
Sutra 6
भूमिद्रव्यकन्यादानमभयस्य चेति दानमाचरेत् ॥ कZ_०७.१६.०६ ॥
लोगों को खुश करने के लिए इनाम देना। ज़मीन देना, पैसा देना। बेटी की शादी करवा के रिश्ता जोड़ना। और उन्हें यक़ीन दिलाना कि तुम उनका ख़याल रखोगे, कोई डर नहीं।
Sutra 7
सामन्ताटविकतत्कुलीनापरुद्धानामन्यतमोपग्रहेण कोशदण्डभूमिदाययाचनमिति भेदमाचरेत् ॥ कZ_०७.१६.०७ ॥
राजा को तोड़े का काम करना है। किसी सरहद के सरदार को, जंगल के लीडर को, या किसी बड़े खानदान के बुढ़े को अपने पास रखो। या किसी कैदी को भी अपना लो। इनके ज़रिए माँगो, ख़ज़ाना, फ़ौज, या ज़मीन। इससे उनकी आपस में फूट पड़ेगी।
Sutra 8
प्रकाशकूटतूष्णीं युद्धदुर्गलम्भोपायैरमित्रप्रग्रहणमिति दण्डमाचरेत् ॥ कZ_०७.१६.०८ ॥
दबाने का तरीका ये है, दुश्मन को पकड़ लो। खुले आम करो, या छुप के, या कोई बोलने बिना। युद्ध करो, किले लो, या जो भी तरीका काम करे। दुश्मन को घुटने पे ला दो।
Sutra 9
एवमुत्साहवतो दण्डोपकारिणः स्थापयेत्स्वप्रभाववतः कोशोपकारिणः प्रज्ञावतो भूम्युपकारिणः ॥ कZ_०७.१६.०९ ॥
अब लोगों को काम के हिसाब से लगाओ। जो जोश में है, वो फ़ौज का काम संभाले। जो लोगों में बोल चाल है, वो ख़ज़ाने का काम देखो। जो समझदार है, उनसे ज़मीन और इलाके का काम लो।
Sutra 10
तेषां पण्यपत्तनग्रामखनिसंजातेन रत्नसारफल्गुकुप्येन द्रव्यहस्तिवनव्रजसमुत्थेन यानवाहनेन वा यद्बहुश उपकरोति तच्चित्रभोगम् ॥ कZ_०७.१६.१० ॥
इन सब जगह से जो फ़ायदा आता है, मंडी से, शहर से, गाँव से, या खान से। हीरे-मोती, धातु, माल, पैसा, हाथी, जंगल, या गाय-भैंस। गाड़ी और सवारी से भी जो आता है। यह सब अलग-अलग तरीका का फ़ायदा है।
Sutra 11
यद्दण्डेन कोशेन वा महदुपकरोति तन्महाभोगम् ॥ कZ_०७.१६.११ ॥
जो फ़ायदा बहुत बड़ा हो, फ़ौज से मिले या ख़ज़ाने से। वो सबसे बड़ा फ़ायदा है।
Sutra 12
यद्दण्डकोशभूमीभिरुपकरोति तत्सर्वभोगम् ॥ कZ_०७.१६.१२ ॥
जो आपकी सेना से काम करे, खजाना से मदद करे, और ज़मीन दे सके, वो बहुत खास इंसान है। ऐसे मित्र को पूरा समझो, वो सब कुछ दे सकता है।
Sutra 13
यदमित्रमेकतः प्रतिकरोति तदेकतोभोगि ॥ कZ_०७.१६.१३ ॥
जो पार्टी एक तरफ से दुश्मन को रोक सके, उसे एक-तरफा फायदा बोलते हैं। मतलब वो सिर्फ एक साइड पे काम आता है।
Sutra 14
यदमित्रमासारं चोभयतः प्रतिकरोति तदुभयतोभोगि ॥ कZ_०७.१६.१४ ॥
जो पार्टी दोनों तरफ से दुश्मन और उसके साथी दोनों को रोक सके, उसे दो-तरफा फायदा कहते हैं। यह दोनों साइड पे काम आता है।
Sutra 15
यदमित्रासारप्रतिवेशाटविकान् सर्वतः प्रतिकरोति तत्सर्वतोभोगि ॥ कZ_०७.१६.१५ ॥
जो पार्टी चारों तरफ से दुश्मन को, उसके साथियों को, पड़ोसी राज्यों को, और जंगल वाले लोगों को भी रोक सके, उसे चारों-तरफा फायदा कहते हैं। यह हर तरफ से काम आता है।
Sutra 16
अलब्धव्यायामयोत्साहिनं शूययारिपक्षीयं कर्शितयापवाहितं महाक्षयव्ययनिवेशया गतप्रत्यागतमनपाश्रयया प्रत्यपसृतम् परेणानधिवास्यया स्वयमेव भर्तारमुपग्राहयेत् ॥ कZ_०७.१६.१६च् ॥
जब दुश्मन के पास वाला अकेले तुम्हारे पास आना चाहे, तो उसे पकड़ के रखो। वो बंदा जो काम न पा रहा हो, जिसका कोई काम न हो, जिसका जोश चला गया हो। जो दुश्मन के टीम में जाके अपने पुराने आदमी से नाराज़ हो गया हो। जिसे तकलीफ ने भगा दिया हो। जिसे बड़ा नुकसान, खर्चा और घर-बैठक ने इधर-उधर भटकती हुई। जिसके पास कोई ठिकाना न हो, इसलिए वो पीछे हट गया हो। जिसे लोग रहे ही न दें। ऐसा बंदा खुद-ब-खुद नया मालिक मान लेगा।
Sutra 17
तेषां महोपकारं निर्विकारं चानुवर्तयेत् ॥ कZ_०७.१६.१७ ॥
ऐसे लोगों के साथ पक्का रहना। कभी-कभी हाथ मत बदलो। और उनका बड़ा काम करो, मदद करो।
Sutra 18
प्रतिलोममुपांशुना साधयेत् ॥ कZ_०७.१६.१८ ॥
दुश्मन के लोगों को अपनी तरफ करने का काम चुप-चाप करना। किसी को पता न चले।
Sutra 19
उपकारिणमुपकारशक्त्या तोषयेत् ॥ कZ_०७.१६.१९ ॥
जो तुम्हारा काम करता है, उसे तुम अपनी हिम्मत के हिसाब से खुश रखना। जितना तुम कर सकते हो, उतना दो।
Sutra 20
प्रयासतश्चार्थमानौ कुर्याद्व्यसनेषु चानुग्रहम् ॥ कZ_०७.१६.२० ॥
मेहनत करके दिखाना चाहिए, पैसा और इज़्ज़त दोनों देनी चाहिए। जब कोई मुसीबत में हो, उसकी हेल्प करनी चाहिए।
Sutra 21
स्वयं आगतानां यथेष्टदर्शनं प्रतिविधानं च कुर्यात् ॥ कZ_०७.१६.२१ ॥
जो लोग खुद आके मिलने आते हैं, उन्हे उनकी मर्ज़ी के हिसाब से मिलो। उनके लिए सही इंतज़ाम भी करो।
Sutra 22
परिभवोपघातकुत्सातिवादांश्चैषु न प्रयुञ्जीत ॥ कZ_०७.१६.२२ ॥
उनके साथ बुरा मत बोलो। ना तो उन्हे बेज़्ज़त करो, ना दुख पहुँचाओ, ना ही उनकी बातों को हल्का समझो।
Sutra 23
दत्त्वा चाभयं पितेवानुगृह्णीयात् ॥ कZ_०७.१६.२३ ॥
उन्हे यक़ीन दिलाओ कि तुम उन्हे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाओगे। फिर उनके साथ ऐसा भाव रखो जैसे बाप अपने बेटे के साथ रखता है।
Sutra 24
यश्चास्यापकुर्यात्तद्दोषमभिविख्याप्य प्रकाशमेनं घातयेत् ॥ कZ_०७.१६.२४ ॥
अगर कोई उन्हे गलत काम करता है, तो उसकी गलती को सामने-सामने सबको बताओ। फिर उसे सामने-सामने सज़ा दो।
Sutra 25
परोद्वेगकारणाद्वा दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेत ॥ कZ_०७.१६.२५ ॥
या फिर दूसरों को गुस्सा न दिलाने के लिए, कानून के हिसाब से काम करो। जैसे पुलिस वाले कानून के हिसाब से काम करते हैं, वैसे ही स्ट्रिक्ट रहो।
Sutra 26
न च हतस्य भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत ॥ कZ_०७.१६.२६ ॥
जिस आदमी को मारा गया है, उसकी ज़मीन, पैसा, बेटे और बीवी पर हक़ नहीं जमाना चाहिए। उसकी चीज़ें उसकी रहने दो।
Sutra 27
कुल्यानप्यस्य स्वेषु पात्रेषु स्थापयेत् ॥ कZ_०७.१६.२७ ॥
उसके परिवार के लोगों को भी अपने पास रखना। अपनी टीम में उनके लिए सही जगह दे दो।
Sutra 28
कर्मणि मृतस्य पुत्रं राज्ये स्थापयेत् ॥ कZ_०७.१६.२८ ॥
अगर वो राज के काम में मर गया है, तो उसके बेटे को उसकी जगह बिठा दो। उसके बेटे को वो पद दे दो।
Sutra 29
एवमस्य दण्डोपनताः पुत्रपौत्राननुवर्तन्ते ॥ कZ_०७.१६.२९ ॥
जब सज़ा से सब सीधे हो जाते हैं, तो वो और उनके बेटे-पोते सब उसके साथ रहते हैं। आगे तक वो लोग उसी के साथ चलते हैं।
Sutra 30
यस्तूपनतान् हत्वा बद्ध्वा वा भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत तस्योद्विग्नं मण्डलमभावायोत्तिष्ठते ॥ कZ_०७.१६.३० ॥
जब लोग हाथ जोड़ के आगे आ जाते हैं, उन्हें मार दिया या जेल में डाल दिया। या उनकी ज़मीन, पैसा, बेटा-बेटी, और बीवी अपने पास रख ली। ऐसा करने वाले के आस-पास के राजा डर जाते हैं। वो सब मिलकर उसकी बरबादी के लिए उठ पड़ते हैं।
Sutra 31
ये चास्यामात्याः स्वभूमिष्वायत्तास्ते चास्योद्विग्ना मण्डलमाश्रयन्ते ॥ कZ_०७.१६.३१ ॥
उसके जो मंत्री या अफ़सर अपनी जगह पे जम के बैठे हैं, वो भी डर जाते हैं। जब डर लगता है, वो लोग आस-पास के राजा के पास भाग जाते हैं।
Sutra 32
स्वयं वा राज्यं प्राणान्वास्याभिमन्यन्ते ॥ कZ_०७.१६.३२ ॥
कभी-कभी वो लोग खुद राज्य पे कब्ज़ा कर लेते हैं। या फिर उसकी जान भी ले लेते हैं।
Sutra 33
भवन्त्यनुगुणा राज्ञः पुत्रपौत्रानुवर्तिनः ॥ कZ_०७.१६.३३च्द् ॥
तब वो राजा के साथ हो जाते हैं। उसके बाद उसके बेटा और पोते भी उनका साथ देते रहते हैं।
Durable peace after conquest: submitted rulers and local elites remain productive in their territories, revenue flows continue without costly repression, and loyalty becomes hereditary—reducing revolt-risk and stabilizing the mandala for long-term prosperity.
The text’s effective ‘penalty’ is strategic rather than tariffed: excessive coercion triggers an udvigna-maṇḍala that rises for the king’s destruction (rebellion, elite-defection, hostile coalitions). Administratively, the corrective is to restrain confiscation and punitive excess and to discipline/replace ministers whose territorial autonomy enables disloyalty.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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