
Book 10 operationalizes the Saptāṅga theory by converting the ‘senā’ limb into a measurable instrument of conquest. In 10.5 Kautilya prescribes how to approach battle from a fort-positioned base and how to deploy the army with clear frontage, flank, and interval rules. The chapter’s pragmatic objective is to prevent congestion (asambādha), preserve command-and-control, and ensure that each arm—infantry, cavalry, chariots, elephants—has doctrinal spacing proportional to its mobility and turning radius. The text then standardizes tactical geometry through bow-length units, defines ‘joints’ (saṃdhi) of the battle-line, and enumerates the protective complements (pratiyoddhāra, pādagopa) required for horses, chariots, and elephants. Finally, it totals a canonical chariot-array (rathavyūha) and notes scalable increments. Placed within the Vijigīṣu’s power structure, this chapter is the engineering manual that makes royal intention executable: it translates treasury-funded force into battlefield order, reducing uncertainty and maximizing decisive pressure against the enemy’s center while securing wings and supports.
Sutra 1
पञ्चधनुःशतापकृष्टं दुर्गमवस्थाप्य युद्धमुपेयात्भूमिवशेन वा ॥
युद्ध शुरू करने से पहले अच्छी जगह पकड़ लो। तीर की रेंज से पाँच सौ बो दूरी पे पोजीशन लो, या जो ज़मीन का नेचर हो उसके हिसाब से।
Sutra 2
विभक्तमुख्यामचक्षुर्विषये मोक्षयित्वा सेनां सेनापतिनायकौ व्यूहेयाताम् ॥
सेनापति और लीडर पहले मेन फोर्स को अलग करें। जो लोग दुश्मन की नज़र में नहीं आना चाहिए, उनको छुपा दें। फिर अपनी सेना को बैटल फॉर्मेशन में खड़ा करें।
Sutra 3
शमान्तरं पत्तिं स्थापयेत्त्रिशमान्तरमश्वम् पञ्चशमान्तरं रथं हस्तिनं वा ॥
पैदल सेना को एक शामा के फासले पर लगाओ। घोड़े वाले को तीन शामा के फासले पर रखना। और रथ या हाथी को पाँच शामा के फासले पर लगाना है।
Sutra 4
द्विगुणान्तरं त्रिगुणान्तरं वा व्यूहेत ॥
या तो फासला डबल कर दो। या फिर ट्रिपल करके लाइन बनाओ।
Sutra 5
एवं यथासुखमसम्बाधं युध्येत ॥
ऐसे लड़ना चाहिए कि आराम से हो। और भीड़ न हो किसी तरफ।
Sutra 6
पञ्चारत्नि धनुः ॥
एक धनुष पाँच अरत्नी लंबा होता है।
Sutra 7
तस्मिन्धन्विनं स्थापयेत्त्रिधनुष्यश्वम् पञ्चधनुषि रथं हस्तिनं वा ॥
सेना में तीर चलाने वाले को आगे रखना। उसके तीन कदम पीछे घोड़ा, और पाँच कदम पीछे रथ या हाथी। यह डिस्टेंस सही रहना चाहिए।
Sutra 8
पञ्चधनुरनीकसंधिः पक्षकक्षोरस्यानाम् ॥
सेना की लाइन में, दोनों तरफ के हिस्सों और बीच के हिस्से के बीच पाँच धनु की दूरी रखनी है। यह गैप सही रखने से सब ठीक से जुड़ते हैं।
Sutra 9
अश्वस्य त्रयः पुरुषाः प्रतियोद्धारः ॥
हर घोड़े के पास तीन आदमी रखने हैं जो उसकी हिफाज़त करें। यह लोग घोड़े के साथ लड़ने के लिए हैं।
Sutra 10
पञ्चदश रथस्य हस्तिनो वा पञ्च चाश्वाः ॥
रथ के लिए, या हाथी के लिए, पंद्रह आदमी लगाने हैं। और पाँच घोड़े भी साथ में रखने हैं।
Sutra 11
तावन्तः पादगोपा वाजिरथद्विपानां विधेयाः ॥
घोड़ों, रथों और हाथियों के पास इतने ही पैदल सिपाही रखने हैं। यह सब की हिफाज़त के लिए हैं।
Sutra 12
त्रीणि त्रिकाण्यनीकं रथानामुरस्यं स्थापयेत्तावत्कक्षं पक्षं चोभयतः ॥
रथों की लाइन तीन हिस्सों में बाँटनी है। बीच का हिस्सा सही जगह पे रखना है। दोनों तरफ के हिस्से भी वैसे ही रखने हैं।
Sutra 13
पञ्चचत्वारिंशदेवं रथा रथव्यूहे भवन्ति द्वे शते पञ्चविंशतिश्चाश्वाः षट्शतानि पञ्चसप्ततिश्च पुरुषाः प्रतियोधारः तावन्तः पादगोपाः ॥
रथ की लड़ाई की लाइन में पैतालीस रथ होते हैं। दो सौ पच्चीस घोड़े लगते हैं। छह सौ पचहत्तर आदमी लड़ने के लिए होते हैं। उतने ही पाँव के सिपाही भी होते हैं।
Sutra 14
एष समव्यूहः ॥
यह सीधी और बराबर फॉर्मेशन है। इसे समव्यूह कहते हैं।
Sutra 15
तस्य द्विरथोत्तरा वृद्धिरैकविंशतिरथादिति ॥
इस फॉर्मेशन को बढ़ाने के लिए दो रथ एक साथ जोड़ते हैं। शुरू इक्कीस रथ से करते हैं।
Sutra 16
एवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ॥
ऐसे दस तरह की बनावट होती है जब ऑड नंबर में रथ होते हैं।
Sutra 17
पक्षकक्षोरस्यानां मिथो विषमसंख्याने विषमव्यूहः ॥
जब सेना की दोनों तरफ, बीच और साइड में अलग-अलग ताकत हो। एक तरफ ज़्यादा लोग, दूसरी तरफ कम। ऐसे में जो फॉर्मेशन बनता है उसे विषम व्यूह कहते हैं।
Sutra 18
तस्यापि द्विरथोत्तरा वृद्धिरैकविंशतिरथादिति ॥
इस इर्रेगुलर फॉर्मेशन में भी हर स्टेप पे दो-दो रथ बढ़ाने हैं। यह काउंट इक्कीस रथ से शुरू होता है।
Sutra 19
एवमोजा दश विषमव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ॥
इस तरह से दस प्रकार के इर्रेगुलर फॉर्मेशन होते हैं। सब में ऑड नंबर की स्ट्रेंथ होती है।
Sutra 20
अतः सैन्यानां व्यूहशेषमावापः कार्यः ॥
इसलिए सेना की फॉर्मेशन में जो कमी रह जाए, उसे फिल करना चाहिए। यह फिलिंग का काम ज़रूरी है।
Sutra 21
रथानां द्वौ त्रिभागावङ्गेष्वावापयेत् शेषमुरस्यं स्थापयेत् ॥
रथ में से दो-तिहाई हिस्सा साइड्स पे लगाना है। जो बचेगा, उसे बीच में रखना है।
Sutra 22
एवं त्रिभागोनो रथानामावापः कार्यः ॥
ऐसे ही रथ की फिलिंग करनी है। एक-तिहाई हिस्सा साइड में नहीं लगाना, उसे अलग रखना है।
Sutra 23
तेन हस्तिनामश्वानामावापो व्याख्यातः ॥
इसी रूल से हाथी और घोड़ों का फिलिंग समझ आ जाता है। जो पहले बताया था, वही सब पहले लगता है।
Sutra 24
यावदश्वरथद्विपानां युद्धसम्बाधन्ं न कुर्यात्तावदावापः कार्यः ॥
फिलिंग इतना ही करो जितना सही हो। अगर ज़्यादा भर दिया तो जंग के मैदान में घोड़े, रथ और हाथी आपस में फंस जाएंगे। जगह कम पड़ेगी।
Sutra 25
दण्डबाहुल्यमावापः ॥
आवाप का मतलब है दंड वाली ताकत को बढ़ा देना। जैसे पुलिस या गार्ड की ताकत, वो सब बढ़ा दो।
Sutra 26
पत्तिबाहुल्यं प्रत्यापावः ॥
प्रत्यपाव का मतलब है पैदल सेना को बढ़ा देना। जो लोग पैदल लड़ते हैं, उनकी ताकत ज़्यादा कर दो।
Sutra 27
एकाङ्गबाहुल्यमन्वावापः ॥
जब एक तरह की सेना ज़्यादा हो जाए, तो उसे अन्वाप कहते हैं। यह एक्स्ट्रा लोगों को सही जगह लगाने का तरीका है।
Sutra 28
दूष्यबाहुल्यमत्यावापः ॥
जब काम के लोग या सामान ज़्यादा हो जाएँ, उसको अत्यावाप कहते हैं। मतलब आप ने ज़्यादा हिस्सा बना दिया है।
Sutra 29
परावापात्प्रत्यावापाच्च चतुर्गुणादाष्टगुणादिति वा विभवतः सैन्यानामावापः ॥
पिछले हिस्से से और वापस आने के हिस्से से, फ़ौज का बँटवारा चार गुना से आठ गुना तक करो। जो कितना समझ सकते हो, उतना हिस्सा बनाओ।
Sutra 30
रथव्यूहेन हस्तिव्यूहो व्याख्यातः ॥
हाथी की लाइन कैसे बनती है, वो रथ की लाइन से समझो। जैसे रथ खड़े होते हैं, वैसे हाथी भी।
Sutra 31
व्यामिश्रो वा हस्तिरथाश्वानां चक्रान्तेषु हस्तिनः पार्श्वयोरश्वा रथा उरस्ये ॥
या फिर सब मिला के रखना है। पहिये के पास हाथी लगाओ। दोनों तरफ़ घोड़े लगाओ। आगे रथ रखो।
Sutra 32
हस्तिनामुरस्यं रथानां कक्षावश्वानां पक्षाविति मध्यभेदी ॥
हाथी आगे खड़े करो। रथ दोनों तरफ़ सहारा दे। घोड़े पक्ष में। इसको मध्य भेदी कहते हैं, जो बीच से तोड़ के आए।
Sutra 33
विपरीतोऽन्तभेदी ॥
उल्टा अरेंजमेंट भी एक तरह का फॉर्मेशन है। इस्को अंतभेदी कहते हैं। यह दूसरे साइड के एंड या फ्लैंक तोड़ने के लिए यूज़ होता है।
Sutra 34
हस्तिनामेव तु शुद्धः साम्नाह्यानामुरस्यमौपवाह्यानां जघनं व्यालानां कोट्याविति ॥
सिर्फ हाथी वाला फॉर्मेशन भी होता है। इसमें सामने वाले हाथी ब्रेस्ट बनाते हैं। पीछे वाले हाथी रियर में होते हैं। कॉर्नर वाले हाथी साइड्स पे होते हैं।
Sutra 35
अश्वव्यूहो वर्मिणामुरस्यं शुद्धानां कक्षपक्षाविति ॥
घोड़ो का फॉर्मेशन भी अलग होता है। जिन्होने आर्मर पह्ना है वो आगे ब्रेस्ट पे होते हैं। जिन्होने नहीं पह्ना, वो साइड्स और विंग्स पे होते हैं।
Sutra 36
पत्तिव्यूहः पुरस्तादावरणिनः पृष्ठतो धन्विनः ॥
पैदल सेना का फॉर्मेशन में भी रूल है। जिन्होने शील्ड पकड़ा है वो सबसे आगे होते हैं। तीर चलाने वाले आर्चर्स पीछे खड़े होते हैं।
Sutra 37
इति शुद्धाः ॥
तो यह सब स्टैंडर्ड फॉर्मेशन्स हैं। यह सही और शुद्ध तरीके हैं।
Sutra 38
पत्तयः पक्षयोरश्वाः पार्श्वयोः हस्तिनः पृष्ठतो रथाः पुरस्तात्परव्यूहवशेन वा विपर्यासः ॥
पैदल सेना दोनों तरफ बैठाओ। घोड़े साइड पे रखो। हाथी बाजू-बाजू में लगाओ। रथ पीछे रखो, या अगर दुश्मन की फॉर्मेशन अलग है तो उल्टा भी कर सकते हो।
Sutra 39
इति द्व्यङ्गबलविभागः ॥
तो इस तरह दो हिस्सों वाली सेना का डिवीजन समझ में आता है। दोनों पार्ट्स काम में कैसे आते हैं यह क्लियर हो गया।
Sutra 40
तेन त्रङ्गबलविभागो व्याख्यातः ॥
इसी तरह तीन हिस्सों वाली सेना का भी डिवीजन समझ लो। लॉजिक सेम रहेगा, बस एक पार्ट और बढ़ जाएगा।
Sutra 41
दण्डसम्पत्सारबलं पुंसां ॥
इंसान की असली ताकत दो चीज़ों में है। एक, डंडा यानी पावर जो लोगों को कंट्रोल में रखे। दूसरा, पैसा और रिसोर्सेज जो काम आएं।
Sutra 42
हस्त्यश्वयोर्विशेषः कुलं जातिः सत्त्वं वयःस्थता प्राणो वर्ष्म जवस्तेजः शिल्पं स्तैर्यमुदग्रता विधेयत्वं सुव्यञ्जनाचारतेति ॥
हाथी और घोड़े कैसे अच्छे हैं यह देखने के लिए बहुत चीज़ें चेक करनी पड़ती हैं। उनका खानदान, ब्रीड, एज, हेल्थ, बॉडी, स्पीड, एनर्जी, ट्रेनिंग, और नेचर सब देखो। अच्छा चलना और सुनना भी ज़रूरी है।
Sutra 43
पत्त्यश्वरथद्विपानां सारत्रिभागमुरस्यं स्थापयेत्द्वौ त्रिभागौ कक्षं पक्षं चोभयतः अनुलोममनुसारम् प्रतिलोमं तृतीयसारम् फल्गु प्रतिलोमम् ॥
पैदल फ़ौजी, घोड़े, रथ और हाथी, इन सब में से सबसे अच्छे तीसरे हिस्से को आगे लगा दो। बाकी दो-तिहाई हिस्से दोनों तरफ़ साइड में रख दो। पीछे वाले लोग सीधा ऑर्डर में आने चाहिए। तीसरे दर्जे के लोग पीछे, उल्टी तरफ़। हल्की फ़ौजी भी उल्टी तरफ़ लगा देनी है।
Sutra 44
एवं सर्वमुपयोगं गमयेत् ॥
ऐसे ही सब कुछ यूज़ में लाना है। हर तरह की फ़ौजी को काम में लगाना है।
Sutra 45
फल्गुबलमन्तेष्ववधाय वेगाभिहूलिको भवति ॥
जब हल्की या कमज़ोर फ़ौजी को दोनों एंड्स पर लगाते हो, तो फ़ौज जल्दी से मुड़ी भी सकती है और तेज़ी से भी चल सकती है।
Sutra 46
सारबलमग्रतः कृत्वा कोटीष्वनुसारं कुर्यात्जघने तृतियियसारं मध्ये फल्गुबलम् ॥
सबसे अच्छी फ़ौजी आगे लगा दो। साइड में सहायक लोग रख दो। तीसरे दर्जे की अच्छी फ़ौजी पीछे रखनी है। बीच में हल्की फ़ौजी लगा देनी है।
Sutra 47
एवमेतत्सहिष्णु भवति ॥
ऐसे करने से पूरा ग्रुप दबाव सहन कर सकता है। यह अटैक बर्दाश करने की पावर रखता है।
Sutra 48
व्यूहं तु स्थापयित्वा पक्षकक्षोरस्यानामेकेन द्वाभ्यां वा प्रहरेत् शेषैः प्रतिगृह्णीयात् ॥
जब सेना लाइन में खड़ी हो जाये, तोह एक या दो हिस्से से हाम्ल करो। बाकी हिस्से से दुश्मन के हाम्ल को रोको। विंग या फ्लैंक या फ्रंट, कोई भी हिस्सा यूज़ कर सकते हो। बाकी सब डिफेंस के लिए रखो।
Sutra 49
यत्परस्य दुर्बलं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यं कृतोपजापं वा तत्प्रभूतसारेणाभिहन्यात् ॥
दुश्मन जहाँ कमज़ोर हो, वहाँ हाम्ल करो। उसके पास हाथी घोड़ा ना हो, या मंत्री खराब हो, या किसी ने उस्से बिगाड़ दिया हो। वहाँ अपनी पूरी ताकत लगा दो।
Sutra 50
यद्वा परस्य सारिष्ठं तद्द्विगुणसारेणाभिहन्यात् ॥
अगर दुश्मन सबसे मज़बूत हिस्से पे भी हाम्ल करना हो, तोह डबल ताकत लगाओ। उसकी सबसे बड़ी ताकत को भी तोड़ सकते हो अगर तुम उस्से ज़्यादा स्ट्रांग हो।
Sutra 51
यदङ्गमल्पसारमात्मनस्तद्बहुनोपचिनुयात् ॥
अपनी सेना में जो हिस्सा कमज़ोर हो, उसमे और लोग जोड़ो। जहाँ भी ताकत कम है, वहाँ सोल्जर्स और रिसोर्सेज़ बढ़ाओ। कमज़ोर हिस्से को मज़बूत बनाओ।
Sutra 52
यतः परस्यापचयस्ततोऽभ्याशे व्यूहेत यतोत् वा भयं स्यात् ॥
जहाँ से दुश्मन कम हो रहा है, वहाँ के पास अपनी सेना खड़ी करो। या जहाँ से खतरा आ सकता है, वहाँ पोज़ीशन लो। दुश्मन की कमी का फायदा उठाओ।
Sutra 53
अभिसृतं परिसृतमतिसृतमपसृतमुन्मथ्यावधानं वलयो गोमूत्रिका मण्डलं प्रकीर्णिका व्यावृत्तपृष्ठमनुवंशमग्रतः पार्श्वाभ्यां पृष्ठतो भग्नरक्षा भग्नानुपात इत्यश्वयुद्धानि ॥
कैवलरी के यह लड़ाई के तरीके हैं। सीधा आगे बढ़ना, दुश्मन को घेर लेना, ज़्यादा फैल जाना, पीछे हटना। दिखा के डिस्टर्ब करना और फिर से ध्यान से अटैक करना। गोल सर्किल बनाना, साँप की तरह घूमना, गोल फॉर्मेशन में रहना, बिखेर के रहना। पीछे मुड़ के अटैक करना, दुश्मन के पीछे चलना। आगे से, साइड से, पीछे से अटैक करना। दुश्मन की गार्ड तोड़ना और गार्ड टूटने के बाद पीछे दौड़ना।
Sutra 54
प्रकीर्णिकावर्जान्येतान्येव चतुर्णामङ्गानां व्यस्तसमस्तानां वा घातः पक्षकक्षोरस्यानां च प्रभञ्जनमवस्कन्दः सौप्तिकं चेति हसिद्युद्धानि ॥
एलीफैंट फोर्स के लड़ाई के तरीके हैं। बिखेर के रहना छोड़ के बाकी सब तरीके यही हैं। आर्मी के चार हिस्सों पे अटैक करना, अलग अलग या साथ में। विंग, साइड और फ्रंट तोड़ देना। अचानक अटैक करना। रात में चुप के से अटैक करना।
Sutra 55
उन्मथ्यावधानवर्जान्येतान्येव स्वभूमावभियानापयानस्थितयुद्धानीति रथयुद्धानि ॥
चैरियट के लड़ाई के तरीके हैं। दिखा के डिस्टर्ब करना छोड़ के बाकी सब यही हैं। अपनी ज़मीन पे आगे बढ़ना, पीछे हटना, और वहीं खड़े रह के लड़ना।
Sutra 56
सर्वदेशकालप्रहरणमुपांशुदण्डश्चेति पत्तियुद्धानि ॥
पैदल सेना के लड़ाई के तरीके हैं। हर जगह और हर वक़्त काम करने वाले हथियार से अटैक करना। चुप के से डंडा मारना, यानी सीक्रेट में सज़ा देना या धमकाना।
Sutra 57
विभवो यावदङ्गानां चतुर्णां सदृशो भवेत् ॥
जितना बजट है, उतना ही खर्च करो। चारों फौजी हिस्सों की ताकत बराबर रखनी है। कोई भी हिस्सा कमज़ोर नहीं होना चाहिए।
Sutra 58
भिन्नसंघातनं तस्मान्न युध्येताप्रतिग्रहः ॥
जब तक फौज फिर से सही नहीं हो जाती, तब तक लड़ाई मत करो। रिज़र्व वाले सिपाही पीछे ही रहेंगे। वो आगे नहीं भेजने, जब तक ज़रूरत ना हो।
Reduced battlefield chaos, fewer friendly losses, better protection of high-value assets (horses, chariots, elephants), and higher probability of decisive victory—thereby stabilizing the realm and safeguarding revenue and population from prolonged war.
Not specified in 10.5. By Arthashastra administrative logic, commanders who violate deployment orders and cause loss invite royal daṇḍa: removal from command, forfeiture of pay/privilege, and punitive discipline proportionate to the damage to men and material.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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