
Book 10 operationalizes the Vijigīṣu’s coercive instrument (daṇḍa) by translating strategic intent into battlefield method. Chapter 3 concentrates on the moment of decision: when to accept open battle on one’s own ground, when to shift into kūṭayuddha if conditions invert, and how to convert enemy disorder into destruction. The chapter’s pragmatism is Kautilya’s signature: victory is not a moral pageant but an administrative outcome—neutralize hostile force at minimal risk to one’s own bala and janapada. Home-territory fighting is preferred when strength and preparation are adequate; otherwise, deception, feigned retreat, and attacks on flanks/rear are prescribed to fracture the enemy’s formation and morale. The text treats cohesion as a resource and panic as an opportunity: induce bhaṅga (break), then strike the dispersed. Allied/forest forces and corruptible enemy elements are integrated as force-multipliers, showing the mandala logic inside tactics: even on the battlefield, politics and psychology remain instruments of conquest.
Sutra 1
बलविशिष्टः कृतोपजापः प्रतिविहितर्तुः स्वभूम्यां प्रकाशयुद्धमुपेयात् ॥
जब तुम्हारी ताकत ज़्यादा हो, तब सीधा लड़ाई करो। पहले लोगों को अपने पास कर लो, सब समझदार बना लो। टाइम ठीक से चुनो, अपनी ज़मीन पे लड़ाई लो।
Sutra 2
विपर्यये कूटयुद्धम् ॥
अगर तुम्हारी ताकत कम हो, तो चुपके से करो। सामने से नहीं दिखना चाहिए क्या हो रहा है। चालाकी से काम चलाओ।
Sutra 3
बलव्यसनावस्कन्दकालेषु परमभिहन्यात् अभूमिष्ठं वा स्वभूमिष्ठः प्रकृतिप्रग्रहो वा स्वभूमिष्ठम् ॥
दुश्मन के पास जब कोई मुसीबत आए, तब ही मारो। जब वो गलत जगह पे हो और तुम सही जगह पे हो, तब अटैक करो। या फिर दुश्मन के लोगों को अपने पास करके, अपनी ज़मीन पे रहके मारो।
Sutra 4
दूष्यामित्राटवीबलैर्वा भङ्गं दत्त्वा विभूमिप्राप्तं हन्यात् ॥
दुश्मन के लोगों को अपने पास करो, जंगल वालों को साथ लगाओ। पहले उनको भागने पे मजबूर करो, फिर जब वो गलत जगह पे जाएँ, तब उनको खत्म करो।
Sutra 5
संहतानीकं हस्तिभिर्भेदयेत् ॥
जब दुश्मन एक साथ घटक हो, तो हाथी भेजो। हाथी उनकी लाइन तोड़ देंगे।
Sutra 6
पूर्वं भङ्गप्रदानेनानुप्रलीनं भिन्नमभिन्नः प्रतिनिवृत्य हन्यात् ॥
पहले दुश्मन को लालचाओ। दिखा के कि तुम्हारा फ़ौज टूट रहा है। जब वो फंस जाये और टूट के बिखर जाये, तब तुम अपनी फ़ौज साफ़ रख के पीछे से मार दो।
Sutra 7
पुरस्तादभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पृष्ठतो हस्त्यश्वेनाभिहन्यात् ॥
सामने से दुश्मन पे अटैक करो। अगर वो हिल जाये या पीछे भागने लगे, तो हाथी और घोड़े ले के पीछे से मार दो।
Sutra 8
पृष्ठतोऽभिहत्या प्रचलं विमुखं वा पुरस्तात्सारबलेनाभिहन्यात् ॥
पीछे से दुश्मन को मारो। अगर वो हिल जाये या पीछे मुड़ जाये, तो अपने सबसे स्ट्रांग फ़ौज को सामने से भेजो और मार दो।
Sutra 9
ताभ्यां पार्श्वाभिगातौ व्याख्यातौ ॥
इन दोनों तरीकों से साइड से भी अटैक करना समझ आ जाता है। बिल्कुल सेम है, बस डायरेक्शन अलग है।
Sutra 10
यतो वा दूष्यफल्गुबलं ततोऽभिहन्यात् ॥
जिस साइड से दुश्मन की फ़ौज कमज़ोर है या डर गयी है, उसी साइड से अटैक करो। वही सही टाइम है मारने का।
Sutra 11
पुरस्ताद्विषमायां पृष्ठतोऽभिहन्यात् ॥
जब दुश्मन के सामने ज़मीन ठीक न हो, उसकी तरफ से उगली हो, तो पीछे से मारो। उसकी पीछे वाली तरफ से अटैक करो।
Sutra 12
पृष्ठतो विषमायां पुरस्तादभिहन्यात् ॥
अगर दुश्मन की पीछे ज़मीन खराब हो, तो सामने से मारो। उसके सामने वाली तरफ से अटैक करो।
Sutra 13
पार्श्वतो विषमायामितरतोऽभिहन्यात् ॥
जब दुश्मन के एक तरफ ज़मीन खराब हो, दूसरी तरफ से मारो। जिस तरफ से ज़मीन साफ़ हो, उस तरफ से अटैक करो।
Sutra 14
दूष्यामित्राटवीबलैर्वा पूर्वं योधयित्वा श्रान्तमश्रान्तः परमभिहन्यात् ॥
पहले दुश्मन को कमज़ोर लोगों से लढ़ा दो। जंगल वाले लोगों को भी भेजो। जब वो थक जाए, तब तुम फ्रेश रहके ज़ोर से मारो।
Sutra 15
दूष्यबलेन वा स्वयं भङ्गं दत्त्वा जितमिति विश्वस्तमविश्वस्तः सत्त्रापाश्रयोऽभिहन्यात् ॥
दुश्मन को बोलो कि तुम्हारी टीम टूट गई है, या अपने आप को तोड़ने का नाटक करो। जब वो भरोसा करने लगे, तो छुप के से उस पर वार करो। उसको धोखा दे के मारो।
Sutra 16
सार्थव्रजस्कन्धावारसंवाहविलोपप्रमत्तमप्रमत्तोऽभिहन्यात् ॥
जब दुश्मन का काम बंध हो जाये, उसका माल रस्ता में फंसा हो, या उसका कैंप उजड़ गया हो, तो वो परेशान हो जाता है। उस टाइम वो ध्यान नहीं देता। ऐसे में जाके उसपे हमला करो। लेकिन तुम खुद सावधान रहना।
Sutra 17
फल्गुबलावच्छन्नसारबलो वा परवीराननुप्रविश्य हन्यात् ॥
एक और तरीका है। सामने कम लोग दिखाओ, कमज़ोर लगाओ। पीछे असली ताकत छुपा के रखना। जब दुश्मन के बीच पहुँच जाओ, तो पीछे से असली लोग आके हमला करें।
Sutra 18
गोग्रहणेन श्वापदवधेन वा परवीरानाकृष्य सत्त्रच्छन्नोऽभिहन्यात् ॥
दुश्मन को बाहर निकलने का तरीका। उसके गाय माल को पकड़ लो, या जंगल में जानवर मारो। वो बचाने या देखने के लिए बाहर आएगा। जैसे बाहर आए, छुपा के बैठो और हमला करो।
Sutra 19
रात्राववस्कन्देन जागरयित्वा निद्राक्लान्तानवसुप्तान्वा दिवा हन्यात् ॥
रात को छोटा-छोटा हमला करते रहो, उन्हे जागते रहो। वो नहीं सो पाएंगे, थक जाएंगे। जब दिन में वो सो रहे हों या थके हों, तब असली हमला करो।
Sutra 20
सपादचर्मकोशैर्वा हस्तिभिः सौप्तिकं दद्यात् ॥
हाथियों को भी रात के हमले में यूज़ करो। उनके पाँव पर चमड़ा पहना के भेजो। रात में दुश्मन के कैंप में घुस के हमला करो।
Sutra 21
अहःसम्नाहपरिश्रान्तानपराह्नेऽभिहन्यात् ॥
दोपहर में वक़्त पर हाथ मारो। दुश्मन सुबह से तैयारी में थका हुआ होता है। उस वक़्त वो कमज़ोर होता है।
Sutra 22
शुष्कचर्मवृत्तशर्कराकोशकैर्गोमहिषोष्ट्रयूथैर्वा त्रस्नुभिरकृतहस्त्यश्वं भिन्नमभिन्नः प्रतिनिवृत्तं हन्यात् ॥
सूखे चमडे के बंट उसे, पत्थर और कंकर। गाय, भैंस और ऊंट के झुंड भी भागो। दुश्मन के हाथी और घोडे डर जायेंगे। जब दुश्मन टूट के भागे, तुम उनपे पूरी ताकत से हाथ मारो।
Sutra 23
प्रतिसूर्यवातं वा सर्वमभिहन्यात् ॥
सूरज और हवा का भी फायदा उठाओ। ऐसी जगह खडे हो जाओ कि दुश्मन की आँखों में सूरज और उसके चेहरे पर हवा लगे।
Sutra 24
धान्वनवनसंकटपङ्कशैलनिम्नविषमनावो गावः शकटव्यूहो नीहारो रात्रिरिति सत्त्राणि ॥
छुपने के बहुत तरीके हैं। रेगिस्तान, जंगल, आधा रास्ता बंद, कीचड, पहाड, नीचे ढहा इलाका, उछल-कूद वाली ज़मीन, नाव, गाय-भैंस का झुंड, गाडी की लाइन, कोहरा, और रात।
Sutra 25
पूर्वे च प्रहरणकालाः कूटयुद्धहेतवः ॥
जब पहले से टाइम फिक्स करके हमला करते हैं, वो चालाकी से लड़ाई का एक तरीका है। पहले सोच के प्लान बनाओ, फिर अचानक से हमला कर दो।
Sutra 26
संग्रामस्तु निर्दिष्टदेशकालो धर्मिष्ठः ॥
लेकिन सच्ची लड़ाई तभी सही होती है जब जगह और टाइम फिक्स हो। यह सब के सामने होना चाहिए।
Sutra 27
संहत्य दण्डं ब्रूयात्तुल्यवेतनोऽस्मि भवद्भिः सह भोग्यमिदं राज्यं मयाभिहितैः परोऽभिहन्तव्यः इति ॥
जब सेना इकट्ठी हो जाए, तो राजा उनसे कहता है। मैं भी तुम्हारे बराबर वेतन लेता हूँ। यह राज्य हम सब मिलके अपनाएंगे। मेरी बात सुनके दुश्मन को मारना है।
Sutra 28
वेदेष्वप्यनुश्रूयते समाप्तदक्षिणानां यज्ञानामवभृथेषु सा ते गतिर्या शूराणामिति ॥
वेदों में भी लिखा है कि जब यज्ञ पूरा हो और पंडित को पूरा पैसा मिल जाए। उसके बाद जो लोग बहादुरी से लड़ते हैं, वो स्वर्ग जाते हैं।
Sutra 29
अपीह श्लोकौ भवतः ॥
इस बारे में और भी दो श्लोक हैं। वो भी यहीं लिखे हैं।
Sutra 30
यान्यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तानप्यतियान्ति शूराः प्राणान् सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥
पंडित लोग स्वर्ग पाने के लिए बहुत सारे यज्ञ करते हैं। तपस्या भी करते हैं और दान भी देते हैं। इन सब से वो ऊपर जाते हैं। बहादुर लोग एक पल में आगे निकल जाते हैं। वो अच्छी तरह लड़ते हुए अपनी जान दे देते हैं।
Sutra 31
नवं शरावं सलिलस्य पूर्णं सुसंस्कृतं दर्भकृतोत्तरीयम् । तत्तस्य मा भून्नरकं च गच्छेद् यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् इति ॥
एक नया कटोरा पानी से भरा हुआ। उसे साफ़ करके ऊपर दर्भ घास डालनी है। यह कहते हैं कि जिसने अपने मालिक के लिए नहीं लड़ा, वो नरक में जाए। ऐसा कोई इंसान कभी न हो।
Sutra 32
मन्त्रिपुरोहिताभ्यामुत्साहयेद् योधान्व्यूहसम्पदा ॥
राजा को अपने मंत्री और पुरोहित के ज़रिए सेना को हौसला देना चाहिए। और लड़ाई की अरेंजमेंट भी अच्छी होनी चाहिए।
Sutra 33
कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गः सर्वज्ञदैवतसम्योगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत्परपक्षं चोद्वेजयेत् ॥
अपने लोगों को बोलो कि राजा भगवान की तरफ से आया है। यह बात फैलाओ, अपने लोगों का हौसला बढेगा। दुश्मन डर के पास आयेगा।
Sutra 34
श्वो युद्धमिति कृतोपवासः शस्त्रवाहनं चानुशयीत ॥
जब राजा सोच ले कि कल युद्ध होगा, तो व्रत रख ले। साथ ही अपने हथियार और घोड़े को भी तैयार करके डिसिप्लिन में रख ले।
Sutra 35
अथर्वभिश्च जुहुयात् ॥
और अथर्व वेद के मंत्रों से हवन करना चाहिए।
Sutra 36
विजययुक्ताः स्वर्गीयाश्चाशिषो वाचयेत् ॥
पंडित से आशीर्वाद के शब्द बोलवाएं। जीत के लिए भी और स्वर्ग के लिए भी।
Sutra 37
ब्राह्मणेभ्यश्चात्मानमतिसृजेत् ॥
और ब्राह्मणों को अपना भगवान मानके उनपे भरोसा करना चाहिए।
Sutra 38
शौर्यशिल्पाभिजनानुरागयुक्तमर्थमानाभ्यामविसंवादितमनीकगर्भं कुर्वीत ॥
अपनी सेना में एक बात फैलाओ जो दिल में बैठ जाए। उसमें बहादुरी हो, काम आने का हुनर हो, अच्छे घर का नाम हो और प्यार हो। जो भी बोलो, सच लगे, ना सिर्फ फायदा की बात, ना सिर्फ इज़्ज़त की बात।
Sutra 39
पितृपुत्रभ्रातृकाणामायुधीयानामध्वजं मुण्डानीकं राजस्थानम् ॥
सेना में ऐसे लोग हों जो बाप-बेटा-भाई एक साथ लड़ें। इनका अलग कोई झंडा नहीं होता। इनके बाल छोटे होते हैं ताकि पहचान में आसानी हो। यह सब राजा के पास रहते हैं उसकी हिफाज़त के लिए।
Sutra 40
हस्ती रथो वा राजवाहनमश्वानुबन्धः ॥
राजा हाथी या रथ में सफ़र करे। घोड़े भी साथ रखने चाहिए बैकअप के लिए।
Sutra 41
यत्प्रायसैन्यो यत्र वा विनीतः स्यात्तदधिरोहयेत् ॥
राजा वहाँ बैठना चाहिए जहाँ सेना का ज़्यादा हिस्सा हो। या फिर जहाँ सबसे ज़्यादा ट्रेंड लोग हों।
Sutra 42
राजव्यञ्जनो व्यूहाधिष्ठानमायोज्यः ॥
राजा अपने सारे राजई निशान पहन के बैटल फ़ॉर्मेशन के बीच में खड़ा हो। वो कमांड का मेन पॉइंट होता है।
Sutra 43
सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसंघकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः ॥
सूत और मगध नाम के लोग थे, जो राजा के दरबार में गाते थे। वो सिपाहियों को बोलते थे कि जो बहादुर है वो स्वर्ग जाएगा, और जो डरपोक है उसका बुरा होगा। वो लोगों की तारीफ करते थे, उनकी जात के हिसाब से, उनके काम के हिसाब से, उनके ख़ानदान के हिसाब से, और उनके काम-धरम के हिसाब से।
Sutra 44
पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं ब्रूयुः यन्त्रिकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेषाम् ॥
राजा के पुरोहित और उनके आदमी हैं जो यह बताते हैं, कैसे पूजा करनी है और कैसे दूसरे की कला को तोड़ना है। इंजीनियर्स और जो लोग काम को स्ट्रांग करते हैं, और जो ग्रह-नक्षत्र देखते हैं, वो सब कहते हैं कि हमारा काम चलेगा और दुश्मन का काम फेल हो जाएगा।
Sutra 45
सेनापतिरर्थमानाभ्यामभिसंस्कृतमनीकमाभाषेत शतसाहस्रो राजवधः पञ्चाशत्साहस्रः सेनापतिकुमारवधः दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवधः पञ्चसाहस्रो हस्तिरथवधः साहस्रोऽश्ववधः शत्यः पत्तिमुख्यवधः शिरो विंशतिकं भोगद्वैगुण्यं स्वयं ग्राहश्च इति ॥
सेनापति अपनी सेना को बोलता है, जो लोग प्राइज़ और रिस्पेक्ट से रेडी है। कहता है, दुश्मन राजा को मारो, एक लाख रुपये मिलेगा। उस सेनापति के बेटा को मारो, पचास हज़ार मिलेगा। जो बड़ा फाइटर है उसको मारो, दस हज़ार मिलेगा। हाथी या रथ वाले को मारो, पाँच हज़ार मिलेगा। घोड़े वाले को मारो, एक हज़ार मिलेगा। जो पैदल सबसे आगे चल रहा है उसको मारो, सौ रुपये मिलेगा। सर लेकर आओ, बीस रुपये मिलेगा। जो माल लूट के लाओ, उसका डबल फायदा मिलेगा। ज़िन्दा पकड़ के लाओ, उसका भी प्राइज़ है।
Sutra 46
तदेषां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ॥
जो लोग दस-दस लोगों के ऊपर हैं, उनको यह सब रेट्स और रूल्स पता होना चाहिए।
Sutra 47
चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदस्नेहवस्त्रहस्ताः स्त्रियश्चान्नपानरक्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्षणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः ॥
डॉक्टर लोग साथ में रहते हैं जो इंस्ट्रूमेंट और दवाई, तेल और कपड़ा ले के चलते हैं। औरतें भी साथ होती हैं जो खाना-पीना संभालती हैं और आदमियों को हौसला देती हैं। यह सब पीछे खड़े रहते हैं।
Sutra 48
अदक्षिणामुखं पृष्ठतःसूर्यमनुलोमवातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत ॥
अपनी ज़मीन पर सेना को ऐसे खड़ा करो कि मुँह दक्षिण की तरफ़ न हो। सूरज पीछे हो और हवा पीछे से आए जो तुम्हारे काम आए।
Sutra 49
परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः ॥
जब दुश्मन की ज़मीन पर फ़ॉर्मेशन बना के खड़े हो, तो घोड़े हमेशा चलते रहने चाहिए। यह पैट्रोलिंग के लिए है, ताकि दुश्मन घात ना मार सके।
Sutra 50
यत्र स्थानं प्रजवश्चाभूमिर्व्यूहस्य तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभयथा जीयेत । विपर्यये जयति उभयथा स्थाने प्रजवे च ॥
जहाँ ज़मीन अच्छी हो, रहने के लिए भी और आगे बढ़ने के लिए भी, वहाँ तुम दोनों तरह जीत सकते हो। रुक के भी जीत सकते हो, आगे बढ़ के भी। अगर ज़मीन अच्छी नहीं, तो हार जाओगे। अगर दोनों तरफ़ बराबर है, तो जीत उसपे डिपेंड करती है कि तुम पोज़ीशन और मूवमेंट कैसे यूज़ करते हो।
Sutra 52
समा विषमा व्यामिश्रा वा भूमिरिति पुरस्तात्पार्श्वाभ्यां पश्चाच्च ज्ञेया ॥
ज़मीन को देखो, साफ़ है, गढ़ी है, या दोनों मिक्स है। आगे से देखो, दोनों तरफ़ से देखो, पीछे से भी देखो। पूरा चेक कर लो।
Sutra 53
समायां दण्डमण्डलव्यूहाः विषमायां भोगासंहतव्यूहाः व्यामिश्रायां विषमव्यूहाः ॥
साफ़ ज़मीन पे सीधा या गोल फ़ॉर्मेशन बनाओ। गढ़ी ज़मीन पे टेढ़ा-मेढ़ा या कॉम्पैक्ट फ़ॉर्मेशन रखो। मिक्स ज़मीन में जो भी सिचुएशन के हिसाब से ठीक लगे, वही यूज़ करो।
Sutra 54
विशिष्टबलं भङ्क्त्वा संधिं याचेत ॥
जब दुश्मन के स्पेशल फोर्स को तोड़ दो, उनका मेन पावर तोड़ दो, तब पीस माँगो। क्योंकि अब तुम्हारा अप्पर हैंड है, तोह अच्छी शर्तों पे डील करो।
Sutra 55
समबलेन याचितः संदधीत ॥
जब तुम्हारे बराबर ताकत वाला दुश्मन शांति माँगता है, तो तुम समझौता कर लो। उसके साथ डील पक्की कर दो।
Sutra 56
हीनमनुहन्यात् न त्वेव स्वभूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ॥
जो दुश्मन कमज़ोर है, उसको पीछे से मारना ठीक है। लेकिन जो अपनी धरती पर पहुँच गया है, उसको मत सताना। और जो आदमी मरने के लिए तैयार हो गया है, उसको भी छोड़ दो।
Sutra 57
पुनरावर्तमानस्य निराशस्य च जीविते । अधार्यो जायते वेगस्तस्माद्भग्नं न पीडयेत् ॥
जो दुश्मन वापस मुड़ कर लड़ता है, उसका अलग हिसाब है। और जिसको जीने की उम्मीन छूट गई है, वो भी खतरनाक हो जाता है। ऐसा आदमी पर अटैक करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए जो दुश्मन टूट चुका है, उसको ज़्यादा मत दबाना।
The Vijigīṣu must decide whether to accept open battle on home ground or shift to kūṭayuddha when relative strength, terrain, or readiness is unfavorable, while ensuring enemy disorder is converted into decisive destruction without excessive loss to one’s own bala and janapada.
Prefer battle on one’s own ground when preparation and strength are adequate; if conditions invert, adopt kūṭayuddha—deception, feigned retreat, and flank/rear attacks—to fracture enemy formation and morale. Treat cohesion as a managed resource: induce bhaṅga (break/panic) through tactical and psychological pressure, then strike the dispersed. Integrate allied/forest forces and exploit corruptible enemy elements as force-multipliers, applying mandala politics inside battlefield method.
Victory is framed as an administrative outcome: minimize risk to one’s own forces and territory, maximize enemy disintegration, and finish decisively once disorder appears—using politics, psychology, and opportunistic striking as continuous instruments of conquest.
Army (Daṇḍa/Bala) — with secondary reinforcement of Territory (Janapada) through home-ground advantage and defensive depth
Decision-making under uncertainty: choosing the mode of fighting and converting enemy loss of cohesion into decisive victory at minimal cost.
Prescriptive (operational rules and conditional tactical directives).
Rapid neutralization of enemy force with minimized attrition to one’s own troops and reduced exposure of the janapada; by choosing open battle only under advantage and otherwise using stratagem, the state preserves manpower, prevents raids, and stabilizes revenue and public security.
Not specified in this tactical passage; in Kauṭilya’s daṇḍanīti framework, commanders who disobey royal operational directives or cause avoidable loss through negligence would be subject to disciplinary punishment, removal, and forfeiture proportionate to the damage (daṇḍa calibrated to harm and dereliction).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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