
Book 3 situates the Vijigīṣu’s internal strength in adjudicable order: wealth is not merely collected; it is made possible by reliable exchange. Chapter 14 regulates the wage-contract (bhṛtaka) by defining when non-performance becomes punishable, when incapacity excuses, and how substitution is permitted without enabling collusion or coercive obstruction. The state’s pragmatic objective is to prevent ‘paid idleness’ and ‘forced exclusivity’ that can paralyze production, while still recognizing genuine inability (illness, calamity, degrading work) as grounds for remission or lawful delegation. Kautilya also refines a doctrinal dispute: some ācāryas treat mere presence as completion, but Kautilya insists wages attach to actual performance, with partial-performance rules to prevent employer bad faith. Finally, guild-hired labour is placed under time-bound pledge (ādhi) and procedural duties: replacement and completion are allowed, but the guild cannot remove or impose workers without notifying the employer. This integrates private contracting into state-supervised predictability—an economic precondition for conquest-capacity.
Sutra 1
गृहीत्वा वेतनं कर्माकुर्वतो भृतकस्य द्वादशपणो दण्डः संरोधश्चाकरणात् ॥
जब किसी को जॉब पे लगाया जाता है और उसको पैसा मिल जाता है। अगर वो काम नहीं करता, तो उसपर 12 पना का जुर्माना लगता है। और उसे पकड़ के रखना भी हो सकता है जब तक काम न करे।
Sutra 2
अशक्तः कुत्सिते कर्मणि व्याधौ व्यसने वानुशयं लभेत परेण वा कारयितुम् ॥
अगर कोई काम करने के हालात में नहीं हो, तो उसकी माफ़ी भी हो सकती है। जैसे काम बूरा हो, या बीमारी हो, या कोई मुसीबत आ जाए। या फिर वो किसी और से करवा भी सकता है।
Sutra 3
तस्यव्ययकर्मणा लभेत भर्ता वा कारयितुम् ॥
उसका काम उसके खर्चे पे हो जाएगा। या फिर मालिक किसी और से करवा सकता है।
Sutra 4
नान्यस्त्वया कारयितव्यो मया वा नान्यस्य कर्तव्यमित्यवरोधे भर्तुरकारयतो भृतकस्याकुर्वतो वा द्वादशपणो दण्डः ॥
अगर मालिक रोक के कहे कि तुम किसी और से मत करवाओ, या नोकर कहे कि मैं किसी और के लिए नहीं करूँगा। फिर भी काम नहीं हुआ तो सज़ा लगती है। दोनों में से जो गलत होगा उसको बारह पना जुर्माना देना पड़ेगा।
Sutra 5
कर्मनिष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् ॥
जब तक मालिक का काम पूरा नहीं हो जाता, किसी और काम में मत लग जाओ। अगर तुमने किसी और से पैसे ले लिए हैं, तो उस काम को अभी मत करो जो यहाँ काम खत्म होने में दिक्कत करे।
Sutra 6
उपस्थितमकारयतः कृतमेव विद्यादित्याचार्याः ॥
आचार्यों का कहना है कि अगर नोकर काम करने के लिए हाज़िर था। पर मालिक ने उसे काम नहीं करवाया। तो मान लो काम हो गया है। नोकर को पैसे मिलने चाहिए।
Sutra 8
कृतस्य वेतनं नाकृतस्यास्ति ॥
जिस काम किया है उसका पैसा मिलेगा। जिस काम नहीं किया, उसका पैसा नहीं मिलेगा।
Sutra 9
स चेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्कृतमेवास्य विद्यात् ॥
अगर किसी काम में थोड़ा सा भी हो गया, और बाकी नहीं हुआ, तो जो भी हो गया उसी को काम मान लो। उस हिसाब से पैसे देना होगा।
Sutra 10
देशकालातिपातनेन कर्मणामन्यथाकरणे वा नासकामः कृतमनुमन्येत ॥
अगर टाइम या जगह गलत हो गई, या काम अलग तरह करना पड़ा, और काम पूरा नहीं हुआ, तो उसमें उसका दोष नहीं है। जो भी काम किया है, वो मान लो।
Sutra 11
सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं न मोघं कुर्यात् ॥
अगर किसी ने अग्रीमेंट से ज़्यादा काम कर दिया, तो उसकी मेहनत वेस्ट नहीं जानी चाहिए। उसका भी हिसाब होना चाहिए।
Sutra 12
तेन संघभृता व्याख्याताः ॥
यह जो रूल्स हैं, वो ग्रुप के लोगों पर भी लागू होते हैं। जो लोग ग्रुप में काम करते हैं, उनके लिए भी यही बात है।
Sutra 13
तेषामाधिः सप्तरात्रमासीत ॥
उनका काम रोक के रखना है तो मैक्सिमम सात रात तक ही रख सकते हो। उससे ज़्यादा नहीं।
Sutra 14
ततोऽन्यमुपस्थापयेत्कर्मनिष्पाकं च ॥
फिर किसी और को काम पे लगाओ। और देखना कि काम पूरा भी हो जाए।
Sutra 15
न चानिवेद्य भर्तुः संघः कंचित्परिहरेदुपनयेद्वा ॥
मालिक को बताए बिना, किसी को काम से नहीं हटाना। नया आदमी भी बताए बिना नहीं लगाना।
Sutra 16
तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः ॥
अगर यह रूल तोड़ दिया, तो जुर्माना लगता है। चौबीस पना देना पड़ेगा।
Sutra 17
संघेन परिहृतस्यार्धदण्डः । इति भृतकाधिकारः ॥
अगर किसी को निकाल दिया, तो आधा जुर्माना लगेगा। यह था काम करने वाले लोगों का हिसाब।
Sutra 18
संघभृताः सम्भूयसमुत्थातारो वा यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् ॥
जब लोग मिल कर काम करते हैं, उनको पैसे बाँटने का दो तरीका है। या तो जैसे पहले बात हुई थी वैसे बाँटो, या फिर सबको बराबर बाँट दो।
Sutra 19
कर्षणवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसानान्तरे सन्नस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दद्युः ॥
किसान और मज़दूर जो बीच में काम छोड़ देते हैं, उन्हे सिर्फ उतना पैसा मिलेगा जितना काम किया है। जब तक फसल पूरा नहीं होता, अगर कोई रुक जाता है, तो उसका हिसाब लगाया जायेगा। जो काम किया है, उसके हिसाब से पैसे मिलेंगे।
Sutra 20
पुरुषोपस्थाने समग्रमंशं दद्युः ॥
जब मज़दूर काम के लिए रेडी हो, तो उसको पूरा पैसे मिलने चाहिए। अगर वो समय पर आ गया और काम करने को तैयार है, उसका पूरा हिस्सा देना पड़ेगा। काम के दिन पूरा पैसा मिलता है।
Sutra 21
संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यंशं दद्युः ॥
अगर माल सही से पक्का हो गया है और फिर कोई मज़दूर छोड़ के चला गया, तो उसको उसी वक़्त उसका हिस्सा मिल जायेगा। देरी नहीं करनी, तुरंत पैसे देना होगा। जो काम किया है, उसका हिसाब वहीं क्लियर हो जायेगा।
Sutra 22
सामान्या हि पथिसिद्धिश्चासिद्धिश्च ॥
सफ़र में काम में कभी सक्सेस होता है, कभी फेल भी होता है। यह आम बात है, कोई नयी चीज़ नहीं। कभी माल पहुँच जाता है, कभी रास्ते में प्रॉब्लम आ जाती है। दोनों चीज़ें होती रहती हैं।
Sutra 23
प्रक्रान्ते तु कर्मणि स्वस्थस्यापक्रामतो द्वादशपणो दण्डः ॥
अगर काम शुरू हो गया है और कोई बिना किसी वजह छोड़ के चला गया, तो उसपर जुर्माना लगेगा। बारह पण का दंड है। बीमार हो तो अलग बात है, लेकिन सही-सलामत हो और काम छोड़ दे, तो पैसे देने पड़ेंगे।
Sutra 24
न च प्राकाम्यमपक्रमणे ॥
जब काम हाथ में ले लिया, तो मर्ज़ी से पीछे हटने का कोई ऑप्शन नहीं होता।
Sutra 25
चोरं त्वभयपूर्वं कर्मणः प्रत्यंशेन ग्राहयेद्दद्यात्प्रत्यंशमभयं च ॥
चोर को पहले बोलो कि उससे कुछ नहीं होगा। फिर उससे चोरी का माल वापस करवाओ, जितना गलत काम किया है उतने हिसाब से। और उससे सेफ भी रखना।
Sutra 26
पुनःस्तेये प्रवासनमन्यत्रगमने च ॥
अगला बार फिर चोरी करेगा, तो उससे शहर से बाहर भेज देना। अगर वो कंडीशन्स तोड़ के कहीं और भाग गया, तो भी यही सज़ा।
Sutra 27
महापराधे तु दूष्यवदाचरेत् ॥
लेकिन अगर बड़ा क्राइम हो गया, तो उससे बड़े क्रिमिनल की तरह ही ट्रीट करना।
Sutra 28
याजकाः स्वाप्रचारद्रव्यवर्जं यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् ॥
पूजा करने वाले पंडित अपना हिस्सा बाँट लें। अपने खर्चे निकाल के बाकी पैसे। जैसे पहले बात हुई थी वैसे या बराबर बाँट लें।
Sutra 29
अग्निष्टोमादिषु च क्रतुषु दीक्षणादूर्ध्वं तृतीयमंशं मध्यमोपसद ऊर्ध्वमर्धमंशं सुत्ये प्रातःसवनादूर्ध्वं पादोनमंशम् ॥
बड़े यज्ञ जैसे अग्निष्टोम में, दीक्षा के बाद एक-तिहाई हिस्सा मिलता है। बीच वाले उपसद के बाद आधा हिस्सा मिल जाता है। सोम पीने के टाइम, सुबह के पहले छानने के बाद तीन-चौथाई हिस्सा मिलता है।
Sutra 30
माध्यन्दिनात्सवनादूर्ध्वं समग्रमंशं लभेत ॥
दोपहर के छानने के बाद पूरा हिस्सा मिल जाता है। कोई काट-छाँट नहीं।
Sutra 31
नीता हि दक्षिणा भवन्ति ॥
दक्षिणा के पैसे एक रूल से दिए जाते हैं। कोई भी अपनी मर्ज़ी से नहीं दे सकता।
Sutra 32
बृहस्पतिसववर्जं प्रतिसवनं हि दक्षिणा दीयन्ते ॥
हर छानने पर दक्षिणा दी जाती है। बस बृहस्पति-सव को छोड़ के, उसमें अलग रूल है।
Sutra 33
तेनाहर्गणदक्षिणा व्याख्याताः ॥
इसी रूल से दिन गिन कर दक्षिणा देना भी क्लियर हो गया। सब कुछ सेट है।
Sutra 34
सनानामादशाहोरात्राच्छेषभृताः कर्म कुर्युः अन्ये वा स्वप्रत्ययाः ॥
दसवें दिन के बाद जो लोग बाकी काम संभालते हैं, वो काम करेंगे। या कोई और भी कर सकता है, बस अपनी कैपेबिलिटी होनी चाहिए।
Sutra 35
कर्मण्यसमाप्ते तु यजमानः सीदेदृत्विजः कर्म समापय्य दक्षिणां हरेयुः ॥
अगर काम पूरा नहीं हुआ और जो आदमी काम करवा रहा था वो रुक गया, तो पंडित लोग काम पूरा करेंगे। फिर अपना पैसा ले लेंगे।
Sutra 36
असमाप्ते तु कर्मणि याज्यं याजकं वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः ॥
अगर काम पूरा होने से पहले किसी ने दूसरे को छोड़ दिया, चाहे यजमान पंडित को छोड़े या पंडित यजमान को, तो पहले वाला जुर्माना लगेगा।
Sutra 37
अनाहिताग्निः शतगुरुयज्वा च सहस्रगुः । सुरापो वृषलीभर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥
जिसने अग्नि नहीं जलाई, उसका जुर्माना सौ गाय का है। जो सौ यज्ञ कर चुका है, उसका जुर्माना हज़ार गाय का है। चार बड़े गुनाहगार माने जाते हैं कानून के हिसाब से। जो दारू पीते हैं। जो नीची जाति की औरत को बीवी बनाके रखते हैं। जो किसी ब्राह्मिन को मार देते हैं। और जो गुरु की बीवी के साथ गलत काम करते हैं।
Sutra 38
असत्प्रतिग्रहे युक्तः स्तेनः कुत्सितयाजकः । अदोषस्त्यक्तुमन्योन्यं कर्मसंकरनिश्चयात् ॥
जो लोग गलत तोहफे लेते हैं, वो चोर जैसा है। जो पंडित बुरी पूजा करते हैं, वो भी खराब है। इन सब को अलग से देखते हैं। इन सब की गलती जुड़ी हुई है। एक दूसरे को छोड़ के नहीं बच सकते। सब मिलके करते हैं तो सब पे ब्लेम आता है।
Wage-contracts (bhṛtaka) can be exploited through paid idleness, strategic non-performance, coerced exclusivity (blocking substitutes), and collusive guild practices—undermining production, exchange reliability, and thus the king’s internal strength.
Define performance-based wage entitlement; specify when non-performance is punishable versus excused (illness, calamity, degrading/impermissible work); allow controlled substitution/delegation to ensure completion while preventing obstruction and collusion; add partial-performance rules to deter employer bad faith; regulate guild-hired labour via time-bound pledge (ādhi) and mandatory notice/procedure for replacement or withdrawal.
By tying wages to verifiable work, carving out narrow excuses, and proceduralizing substitution and guild conduct, the state converts private labour contracting into predictable, enforceable exchange—supporting steady production and fiscal-military capacity.
Treasury (Kośa) strengthened via enforceable labour-contracts; secondarily Territory (Janapada) via predictable market order.
Performance-conditioned wages with calibrated excuses and regulated substitution, including guild procedure, to prevent production paralysis and contracting abuse.
Primarily prescriptive (rules and penalties) with limited interpretive/dialectical notes (ācāryāḥ vs. Kauṭilya).
Higher trust in hiring and payment, fewer labour disputes, steadier production and service delivery, and reduced opportunistic default—supporting prices, supply reliability, and thus the Kośa and Janapada’s stability.
For a hired worker who takes wages but does not perform: a fine of 12 paṇas plus confinement (saṃrodha). In cases of obstructive exclusivity (employer preventing substitution or worker refusing performance under ‘only you/only me’ conditions), a 12-paṇa fine applies to the obstructing party.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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