Varaha Purana - Adhyaya 95
Varaha PuranaAdhyaya 9572 Shlokas

Adhyaya 95: The Slaying of the Daitya Ruru, the Hymn to Cāmuṇḍā/Kālarātri, and the Doctrine of the Threefold Power

Rurudaityavadhaḥ, Cāmuṇḍā–Kālarātri-stutiḥ, Trīśakti-prakāśaś ca

Mythic-Theology (Devī-Māhātmya) with Ritual/Protective Phalaśruti

इस अध्याय में वराह पृथ्वी से नीलगिरि पर तप करने वाली तामसी रौद्री शक्ति—कालरात्रि/चामुण्डा—का प्रसंग कहते हैं। समुद्र में रत्नसमृद्ध नगरी का स्वामी दैत्य रुरु लोकों पर चढ़ाई करता है; देव पराजित होकर देवी के शरणस्थल पर्वत पर आते हैं। देवी असंख्य सहचरी देवियों को प्रकट कर दैत्य-सेना का संहार कराती हैं। रुरु मोहिनी माया से देवों को सुला देता है, तब देवी उसे मारकर उसकी खाल और सिर लेती हैं और ‘चामुण्डा’ कहलाती हैं। सहचरियाँ भोजन माँगती हैं; रुद्र घर की सीमाओं/द्वार-आदि तथा असुरक्षित व्यक्तियों से जुड़े नियत ‘बलि’ का विधान बताते हैं। फिर रुद्र देवी की स्तुति करते हैं; अंत में श्वेता-सात्त्विकी, रक्ता-राजसी, कृष्णा-तामसी—त्रिशक्ति का सिद्धान्त और श्रवण, पाठ, लेखन, पूजन से रक्षा, लोक-स्थापन तथा राजत्व-प्राप्ति का फल कहा गया है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

raudrī tāmāsī śakti (Kālarātri/Cāmuṇḍā)asura–deva conflict (Ruru)māyā as delusion and mass-sleep motifCāmuṇḍā etymology via taking of carma and muṇḍaRudra’s stuti and boon-framingtrīśakti doctrine (sāttvikī/rājasī/tāmasī)phalaśruti: apotropaic protection and royal restorationlunar-tithi observances: navamī, aṣṭamī, caturdaśī; upavāsa

Shlokas in Adhyaya 95

Verse 1

श्रीवराह उवाच । या सा नीलगिरिं याता तपसे धृतमानसा । रौद्री तमोद्भवा शक्तिस्तस्याः शृणु धरे व्रतम् ॥

श्रीवराह ने कहा—जो नीलगिरि पर तप के लिए गई, जिसका मन दृढ़ था, वह तम से उत्पन्न रौद्री शक्ति—हे धरा-धारिणि! उसका व्रत सुनो।

Verse 2

अश्वास्तथा काञ्चनपीडनद्धा रोहीतमत्स्यैः समतां जलान्तः । व्यवस्थितास्ते सममेव तूर्णं विनिर्ययुः लक्षशः कोटिशश्च ॥

स्वर्ण-आभूषणों से बँधे घोड़े भी जल के भीतर रोहीत मछलियों के समान परिमाण वाले होकर स्थित थे; और वे सब एक साथ शीघ्र ही लक्षों और कोटियों की संख्या में बाहर निकल पड़े।

Verse 3

रथा रविस्यन्दनतुल्यवेगाः सुचक्रदण्डाक्षत्रिवेणुयुक्ताः । सुशस्त्रयन्त्राः परिपीडिताङ्गाः चलत्पताकास्त्वरितं विशङ्काः ॥

रथ सूर्य के रथ के समान वेगवान थे, उत्तम चक्र, दण्ड, अक्ष और त्रिवेणु से युक्त। वे शस्त्रों और यंत्रों से सुसज्जित थे, भीतर बैठे जनों के अंगों को दबाते हुए, फड़फड़ाते ध्वजों सहित, बिना संदेह शीघ्र दौड़ पड़े।

Verse 4

तथैव योधाः स्थगितेतरेतरास्तितीर्षवः प्रवरास्तूर्णपाणयः । रणे रणे लब्धजयाः प्रहारिणो विरेजुरुच्चैरसुरानुगा भृशम् ॥

उसी प्रकार योद्धा भी—एक-दूसरे को आच्छादित करते, आगे बढ़ने को आतुर, श्रेष्ठ और शीघ्र-हस्त—युद्ध पर युद्ध में विजय पाकर प्रहार करते हुए, असुरों के अनुयायी बनकर अत्यन्त ऊँचे स्वर में चमकते प्रतीत हुए।

Verse 5

देवेषु चैव भग्नेषु विनिर्गत्य जलात् ततः । चतुरङ्गबलोपेतः प्रायादिन्द्रपुरं प्रति ॥

और जब देवगण पराजित हो गए, तब वह जल से निकलकर चतुरंगिणी सेना सहित इन्द्रपुरी की ओर चल पड़ा।

Verse 6

युयोध च सूरैः सार्द्धं रुरुर्दैत्यपतिस्तथा । मुद्गरैर्मुषलैः शूलैः शरैर्दण्डायुधैस्तथा । जघ्नुर्दैत्याः सुरान् संख्ये सुराश्चैव तथासुरान् ॥

और दैत्यपति रुरु ने शूरवीरों के साथ युद्ध किया—मुद्गर, मुषल, शूल, शर तथा दण्डायुधों से। संग्राम में दैत्यों ने सुरों को मारा और सुरों ने भी वैसे ही असुरों को मारा।

Verse 7

एवं क्षणमथो युद्धं तदा देवाः सवासवाः । असुरैर्निर्जिताः सद्यो दुद्रुवुर्विमुखा भृशम् ॥

इस प्रकार थोड़ी देर युद्ध होने पर, देवगण इन्द्र सहित असुरों से तुरंत पराजित हो गए और मुख फेरकर अत्यन्त व्याकुलता से भाग खड़े हुए।

Verse 8

देवेषु चैव भग्नेषु विद्रुतेषु विशेषतः । असुरः सर्वदेवानामन्वधावत वीर्यवान् ॥

जब देवगण पराजित होकर विशेषतः भाग रहे थे, तब एक पराक्रमी असुर सब देवताओं का निकट से पीछा करने लगा।

Verse 9

ततो देवगणाः सर्वे द्रवन्तो भयविह्वलाः । नीलं गिरिवरं जग्मुर्यत्र देवी व्यवस्थिताः ॥

तब भय से व्याकुल होकर दौड़ते हुए सभी देवगण नील नामक श्रेष्ठ पर्वत पर गए, जहाँ देवी विराजमान थीं।

Verse 10

औद्री तपोरता देवी तामसी शक्तिरुत्तमा । संहारकारिणी देवी कालरात्रीति तां विदुः ॥

देवी उग्र स्वभाव वाली, तप में रत, तामसी शक्ति की परम स्वरूपा तथा संहार करने वाली हैं; उन्हें ‘कालरात्रि’ कहा जाता है।

Verse 11

सा दृष्ट्वा तान् तदा देवान् भयत्रस्तान् विचेतसः । मा भैष्टेत्युच्चकैर्देवी तानुवाच सुरोत्तमान् ॥

देवी ने तब उन भय से त्रस्त और चित्त-विक्षुब्ध देवताओं को देखकर, श्रेष्ठ सुरों से ऊँचे स्वर में कहा—“मत डरो।”

Verse 12

तपः कृत्वा चिरं कालं पालयाम्यखिलं जगत् । एवमुद्दिश्य पञ्चाग्निं साधयामास भामिनी ॥

“दीर्घ काल तक तप करके मैं समस्त जगत का पालन करूँगी”—ऐसा संकल्प करके उस तेजस्विनी ने पञ्चाग्नि का तप आरम्भ किया।

Verse 13

देव्युवाच । किमियं व्याकुला देवा गतिर् वा उपलक्ष्यते । कथयध्वं द्रुतं देवाः सर्वथा भयकारणम् ॥

देवी ने कहा—हे देवो, यह कैसी व्याकुलता है और कौन-सी गति/घटना दिखाई दे रही है? सब प्रकार के भय का कारण मुझे शीघ्र बताओ।

Verse 14

देवा ऊचुः । अयमायाति दैत्येन्द्रो रुरुर्भीमपराक्रमः । एतस्य भीतान् रक्षस्व त्वं देवान् परमेश्वरि ॥

देवों ने कहा—दैत्येन्द्र रुरु, जिसका पराक्रम भयानक है, आ रहा है। हे परमेश्वरी, उससे भयभीत देवों की आप रक्षा कीजिए।

Verse 15

एवमुक्ता तदा देवैर्देवी भीमपराक्रमा । जहास परया प्रीत्या देवानां पुरतः शुभा ॥

देवों द्वारा ऐसा कहे जाने पर, भयानक पराक्रम वाली शुभा देवी ने देवों के सामने अत्यन्त प्रसन्न होकर हँस दिया।

Verse 16

तस्या हसन्त्या वक्त्रात् तु बह्व्यो देव्यॊ विनिर्ययुः । याभिर्विश्वमिदं व्याप्तं विकृताभिरनेकशः ॥

उसके हँसते हुए मुख से अनेक देवियाँ प्रकट हुईं, जिनके अनेक रूपों से यह समस्त विश्व नाना प्रकार से व्याप्त है।

Verse 17

पाशाङ्कुशधराः सर्वाः सर्वाः पीनपयोधराः । सर्वाः शूलधराः भीमाः सर्वाश्चापधराः शुभाः ॥

वे सब पाश और अंकुश धारण करने वाली थीं; सबकी उरोज पूर्ण थे। वे सब भयानक, शूल धारण करने वाली थीं और सब शुभ, धनुष धारण करने वाली थीं।

Verse 18

ताः सर्वाः कोटिशो देव्यस्तां देवीं वेष्ट्य संस्थिताः । युयुधुर्दानवैः सार्द्धं बद्धतूणा महाबलाः । क्षणेन दानवबलं तत्सर्वं निहतं तु तैः ॥

वे असंख्य देवियाँ उस देवी को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गईं। महान बल वाली, तरकश बाँधे हुए, वे दानवों के साथ मिलकर युद्ध करने लगीं; और क्षण भर में ही उन्होंने दानवों की सारी सेना का संहार कर दिया।

Verse 19

देवाश्च सर्वे संयत्ता युयुधुर्दानवं बलम् । आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवास्तथाश्विनौ । सर्वे शस्त्राणि संगृह्य युयुधुर्दानवं बलम् ॥

सभी देवता पूर्णतः सज्ज होकर दानव-सेना से युद्ध करने लगे—आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव तथा दोनों अश्विन। सबने अपने-अपने शस्त्र धारण कर दानवों के दल से संग्राम किया।

Verse 20

कालरात्र्या बलं यच्च यच्च देवबलं महत् । तत्सर्वं दानवबलमनयद् यमसादनम् ॥

कालरात्रि का जो बल था और देवताओं का जो महान बल था—वह सब मिलकर दानव-सेना को यम के सदन, अर्थात् मृत्यु-लोक, पहुँचा गया।

Verse 21

एक एव महादैत्यो रुरुस्तस्थौ महामृधे । स च मायां महारौद्रीं रौरवीं विससर्ज ह ॥

महायुद्ध में केवल एक महादैत्य—रुरु—डटा रहा। उसने रौरवी नाम की अत्यन्त भयानक, महा-रौद्री माया का प्रक्षेप किया।

Verse 22

सा माया ववृधे भीमा सर्वदेवप्रमोहिनी । तया तु मोहिता देवाः सद्यो निद्रां तु भेजिरे ॥

वह माया अत्यन्त भीषण होकर बढ़ती गई और समस्त देवताओं को मोहित करने वाली बनी। उससे मोहित हुए देवता तत्काल निद्रा के वश हो गए।

Verse 23

तस्याः कालान्तरे देव्यास्तपन्त्यास्तप उत्तमम् । रुरुर्नाम महातेजा ब्रह्मदत्तवरोऽसुरः ॥

कुछ समय बाद, जब वह देवी उत्तम तप कर रही थीं, तब ब्रह्मा के वर से युक्त महान् तेजस्वी रुरु नामक असुर प्रकट हुआ।

Verse 24

देवी च त्रिशिखेनाजौ तं दैत्यं समताड्यत् । तया तु ताडितान्तस्य दैत्यस्य शुभलोचने । चर्ममुण्डे उभे सम्यक् पृथग्भूते बभूवतुः ॥

और देवी ने रण में त्रिशिखा शस्त्र से उस दैत्य को आहत किया। उसके प्रहार से गिर पड़े उस दैत्य के, हे शुभलोचने, ‘चर्म’ और ‘मुण्ड’ दोनों पूर्णतः अलग हो गए।

Verse 25

रुरोस्तु दानवेन्द्रस्य चर्ममुण्डे क्षणाद् यतः । अपहृत्याहरद् देवी चामुण्डा तेन साभवत् ॥

क्योंकि देवी ने दानवों के स्वामी रुरु से क्षणमात्र में ‘चर्म’ और ‘मुण्ड’ को छीनकर ले लिया, इसलिए वह ‘चामुण्डा’ कहलायीं।

Verse 26

सर्वभूतमहाराुद्री या देवी परमेश्वरी । संहारिणी तु या चैव कालरात्रिः प्रकीर्तिता ॥

जो देवी समस्त प्राणियों के प्रति अत्यन्त रौद्ररूपा, परमेश्वरी और संहारिणी हैं—वही ‘कालरात्रि’ कहलाती हैं।

Verse 27

तस्या ह्यनुचरा देव्यो या ह्यसङ्ख्यातकोटयः । तास्तां देवीं महाभागां परिवर्य व्यवस्थिताः ॥

उनकी अनुगामिनी देवियाँ—असंख्य कोटियों में—उस महाभागा देवी को चारों ओर से घेरकर निकट खड़ी रहीं।

Verse 28

या क्यामासुरव्यग्रास्तास्तां देवीं बुभुक्षिताः । बुभुक्षिता वयं देवि देहि नो भोजनं शुभे ॥

वे सेवकगण व्याकुल और पीड़ित होकर भूख से देवी के पास आए और बोले—“हे देवी, हम भूखे हैं; हे शुभे, हमें भोजन प्रदान कीजिए।”

Verse 29

एवमुक्ता तदा देवी दध्यौ तासां तु भोजनम् । न चाध्यगच्छच्च यदा तासां भोजनमन्तिकात् ॥

ऐसा कहे जाने पर देवी ने उनके लिए भोजन का विचार किया; परंतु तब निकट में उनके भोजन की कोई व्यवस्था उन्हें नहीं मिली।

Verse 30

ततो दध्यौ महादेवं रुद्रं पशुपतिं विभुम् । सोऽपि ध्यानात् समुत्तस्थौ परमात्मा त्रिलोचनः ॥

तब उसने महादेव—रुद्र, पशुपति, सर्वव्यापी प्रभु—का ध्यान किया; और वे भी उस ध्यान से उठ खड़े हुए—त्रिलोचन, परमात्मा।

Verse 31

उवाच च द्रुतं देवीं किं ते कार्यं विवक्षितम् । ब्रूहि देवि वरारोहे यत् ते मनसि वर्तते ॥

उन्होंने शीघ्र ही देवी से कहा—“तुम कौन-सा कार्य कहना चाहती हो? हे सुन्दर आरोहणवाली देवी, जो तुम्हारे मन में है, वह बताओ।”

Verse 32

देव्युवाच । भक्ष्यार्थमासां देवेश किञ्चिद् दातुमिहार्हसि । बलात्कुर्वन्ति मामेता भक्षार्थिन्यो महाबलाः । अन्यथा मामपि बलाद् भक्षयिष्यन्ति मां प्रभो ॥

देवी बोलीं—“हे देवेश, इनके खाने के लिए यहाँ कुछ देने योग्य है। ये महाबली, भोजन की इच्छुक, मुझे बलपूर्वक बाध्य कर रही हैं; अन्यथा, हे प्रभो, ये मुझे भी बल से खा जाएँगी।”

Verse 33

रुद्र उवाच । एतासां शृणु देवेशि भक्ष्यमेकं मयोद्यतम् । कथ्यमानं वरारोहे कालरात्रि महाप्रभे ॥

रुद्र बोले—हे देवेशी! इन सबके लिए मैंने एक ही भक्ष्य तैयार किया है। हे वरारोहिणी कालरात्रि, हे महाप्रभा, जो मैं कह रहा हूँ उसे सुनो।

Verse 34

समुद्रमध्ये रत्नाढ्यं पुरमस्ति महावनम् । तत्र राजा स दैत्येन्द्रः सर्वदेवभयंकरः ॥

समुद्र के मध्य रत्नों से समृद्ध एक नगर और विशाल वन है। वहाँ दैत्यों का वह इन्द्र राजा रहता है, जो समस्त देवताओं के लिए भय का कारण है।

Verse 35

या स्त्री सगर्भा देवेशि अन्यस्त्रीपरिधानकम् । परिधत्ते स्पृशेच्चापि पुरुषस्य विशेषतः ॥

हे देवेशी! जो स्त्री गर्भवती हो, यदि वह किसी अन्य स्त्री का वस्त्र पहन ले—या उसे छू भी ले—विशेषतः पुरुष-संबंध के प्रसंग में, तो (प्रसंगानुसार) वह फल भोगती है।

Verse 36

स भागोऽस्तु महाभागे कासाञ्चित् पृथिवीतले । अन्याश्छिद्रेषु बालानि गृहीत्वा तत्र वै बलिम् । लब्ध्वा तिष्ठन्तु सुप्रीता अपि वर्षशतान्यपि ॥

हे महाभागे! पृथ्वी-तल के कुछ स्थानों पर वह भाग नियत हो। अन्याएँ छिद्रयुक्त (असुरक्षित) स्थानों में बालकों को पकड़कर वहाँ बलि प्राप्त करें और संतुष्ट होकर—सैकड़ों वर्षों तक भी—वहीं ठहरी रहें।

Verse 37

अन्याः सूतिगृहे छिद्रं गृह्णीयुस्तत्र पूजिताः । निवसिष्यन्ति देवेशि तथान्या जातहारिकाः ॥

अन्याएँ सूतिगृह में एक छिद्र (अवसर) पकड़ेंगी; वहाँ पूजित होकर निवास करेंगी। हे देवेशी! तथा अन्य—जातहारिकाएँ, जो नवजात को हर लेती हैं—भी वहीं बसेंगी।

Verse 38

गृहे क्षेत्रे तडागेषु वाप्युद्यानेषु चैव हि । अन्यचित्ता रुदन्त्यो याः स्त्रियस्तिष्ठन्ति नित्यशः । तासां शरीराण्याविश्य काश्चित्तृप्तिमवाप्स्यथ ॥

घरों, खेतों, तालाबों, बावड़ियों और उद्यानों में जो स्त्रियाँ नित्य मन से विचलित होकर रोती रहती हैं, उनके शरीरों में प्रवेश करके कुछ (भूत-प्रेत) तृप्ति प्राप्त करेंगे।

Verse 39

एवमुक्त्वा तदा देवीं स्वयं रुद्रः प्रतापवान् । दृष्ट्वा रुरुं च सबलमसुरेन्द्रं निपातितम् । स्तुतिं चकार भगवन् स्वयं देवस्त्रिलोचनः ॥

इस प्रकार देवी से कहकर, प्रतापवान् रुद्र स्वयं—रुरु और बलवान् असुरेन्द्र को गिरा हुआ देखकर—भगवान त्रिलोचन ने स्वयं स्तुति की रचना की।

Verse 40

रुद्र उवाच । जयस्व देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥

रुद्र बोले—जय हो देवी चामुण्डे, जय हो भूतों का अपहरण करने वाली। जय हो सर्वव्यापिनी देवी; हे कालरात्रि, आपको नमस्कार है।

Verse 41

विश्वमूर्त्ते शुभे शुद्धे विरूपाक्षि त्रिलोचने । भीमरूपे शिवे विद्ये महामाये महोदयॆ ॥

हे विश्वरूपिणी, शुभे, शुद्धे; हे विरूपाक्षि, त्रिलोचने; हे भीमरूपे, शिवे, विद्ये; हे महामाये, महोदय!

Verse 42

मनोजवे जये जृम्भे भीमाक्षि क्षुभितक्षये । महामारि विचित्राङ्गे गेयनृत्यप्रिये शुभे ॥

हे मनोजव, हे जय, हे जृम्भा; हे भीमाक्षि, हे क्षुभित का क्षय करने वाली; हे महामारि, हे विचित्राङ्गे; हे गेय-नृत्यप्रिये, हे शुभे!

Verse 43

विकराले महाकालि कालिके पापहारिणि । पाशहस्ते दण्डहस्ते भीमरूपे भयानके ॥

हे विकरालिनी महाकालि, हे कालिके, पापों का हरण करने वाली; पाश-हस्त, दण्ड-हस्त, भीम रूप वाली, भयङ्करी!

Verse 44

चामुण्डे ज्वलमानास्ये तीक्ष्णदंष्ट्रे महाबले । शवयानस्थिते देवि प्रेतासनगते शिवे ॥

हे चामुण्डे, ज्वलमान मुख वाली, तीक्ष्ण दंष्ट्रा वाली, महाबला; हे देवि, शव-यान पर स्थित; हे शिवे, प्रेत-आसन पर आरूढ़!

Verse 45

अनेकशतसाहस्ट्रकोटिकोतिशतॊत्तरैः । असुरैरन्वितः श्रीमान् द्वितीयो नमुचिर्यथा ॥

सैकड़ों, हज़ारों, करोड़ों तथा उनसे भी अधिक करोड़ों की संख्या वाले असुरों से युक्त वह श्रीमान्, मानो दूसरा नमुचि था।

Verse 46

भीमाक्षि भीषणे देवि सर्वभूतभयंकरी । कराले विकराले च महाकाले करालिनि । काली कराली विक्रान्ता कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥

हे भीमाक्षि, हे भीषण देवि, समस्त भूतों में भय उत्पन्न करने वाली; हे कराले, हे विकराले, हे महाकाले, हे करालिनि; हे काली, हे कराली, हे विक्रान्ते—हे कालरात्रि, तुम्हें नमस्कार हो।

Verse 47

विकरालमुखी देवि ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते । सर्वसत्त्वहिते देवि सर्वदेवि नमोऽस्तु ते ॥

हे विकरालमुखी देवि, हे ज्वालामुखि, तुम्हें नमस्कार हो। हे सर्वसत्त्वहिते देवि, हे सर्वदेवि, तुम्हें नमस्कार हो।

Verse 48

इति स्तुता तदा देवी रुद्रेण परमेष्ठिना । तुतोष परमा देवी वाक्यं छेदमुवाच ह । वरं वृणीष्व देवेश यत् ते मनसि वर्तते ॥

इस प्रकार परमेष्ठी रुद्र द्वारा स्तुत की गई वह परम देवी प्रसन्न हुई और ये वचन बोली— “हे देवेश! जो तुम्हारे मन में है, वही वर माँग लो।”

Verse 49

रुद्र उवाच । स्तोत्रेणानेन ये देवि त्वां स्तुवन्ति वरानने । तेषां त्वं वरदा देवि भव सर्वगता सती ॥

रुद्र बोले— हे वरानने देवी! जो इस स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके लिए, हे देवी, सर्वव्यापिनी और सती, वरदायिनी बनो।

Verse 50

यश्चेमं त्रिप्रकारं तु देवि भक्त्या समन्वितः । स पुत्रपौत्रपशुमान् समृद्धिमुपगच्छति ॥

हे देवी! जो भक्तियुक्त होकर इस त्रिविध रूप का (पाठ/आश्रय) करता है, वह पुत्र, पौत्र और पशुओं सहित समृद्धि को प्राप्त होता है।

Verse 51

यश्चेमं शृणुयाद् भक्त्या त्रिशक्त्यास्तु समुद्भवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः पदं गच्छत्यनामयम् ॥

और जो भक्तिपूर्वक त्रिशक्तियों के उद्भव का यह आख्यान सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर निरामय पद को प्राप्त होता है।

Verse 52

एवं स्तुत्वा भवो देवीं चामुण्डां परमेश्वरीम् । क्षणादन्तर्हितो देवस्ते च देवा दिवं ययुः ॥

इस प्रकार परमेश्वरी चामुण्डा देवी की स्तुति करके भव (रुद्र) क्षणभर में अंतर्धान हो गए; और वे देवता स्वर्ग को चले गए।

Verse 53

य एतां वेद वै देव्याः उत्पत्तिं त्रिविधां धरे । सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति ॥

हे धरणीधर! जो देवी की त्रिविध उत्पत्ति को यथार्थ रूप से जानता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम निर्वाण को प्राप्त होता है।

Verse 54

भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः । अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः । संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कण्टकं नृपः ॥

जब कोई राजा राज्य से च्युत हो जाए, और नवमी को संयमी व शुद्ध रहे, तथा अष्टमी और चतुर्दशी को उपवास करे—तो वह राजा एक वर्ष के भीतर निष्कण्टक (निर्विघ्न, शत्रुरहित) राज्य प्राप्त करता है।

Verse 55

एषा त्रिशक्तिरुद्दिष्टा नयसिद्धान्तगामिनी । एषा श्वेता परा सृष्टिः सात्त्विकी ब्रह्मसंस्थिताः ॥

यह त्रिशक्ति नय-सिद्धान्त के अनुसार निर्दिष्ट की गई है। यही श्वेत, परा सृष्टि है—सात्त्विकी स्वभाव वाली—जो ब्रह्म में प्रतिष्ठित है।

Verse 56

कालेन महता चासौ लोकपालपुराण्यथ । जिगीषुः सैन्यसंवीतो देवैर्भयमरॊचयत् ॥

बहुत समय बीतने पर, लोकपालों की प्राचीन कथाओं के प्रसंग में, वह—विजय की इच्छा से और सेना से घिरा हुआ—देवताओं में भय उत्पन्न करने लगा।

Verse 57

एषैव रक्ताऽ रजसि वैष्णवी परिकीर्तिता । एषैव कृष्णा तमसि रौद्री देवी प्रकीर्तिता ॥

यही शक्ति रजोगुण में रक्तवर्ण होकर ‘वैष्णवी’ कही गई है; और यही शक्ति तमोगुण में कृष्णवर्ण होकर ‘रौद्री’ देवी के रूप में प्रसिद्ध है।

Verse 58

परमात्मा यथा देव एक एव त्रिधा स्थितः । प्रयोजनवशाच्छक्तिरेकैव त्रिविधाऽभवत् ॥

जैसे परमात्मा देव एक ही होकर भी त्रिविध रूप से स्थित है, वैसे ही प्रयोजन और कार्य के कारण एक ही शक्ति तीन प्रकार की हो जाती है।

Verse 59

य एतं शृणुयात् सर्गं त्रिशक्त्याः परमं शिवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमाप्नुयात् ॥

जो त्रिशक्ति के इस सर्ग का, परम शिवमय और अत्यन्त मंगलमय वर्णन सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम निर्वाण को प्राप्त होता है।

Verse 60

यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या नवम्यां नियतः स्थितः । स राज्यमतुलं लेभे भयेश्य्च प्रमुच्यते ॥

और जो नवमी के दिन नियमपूर्वक स्थित होकर भक्ति से इसे सुनता है, वह अतुल राज्य-सम्पदा पाता है और भय से मुक्त हो जाता है।

Verse 61

यस्येदं लिखितं गेहे सदा तिष्ठति धारिणि । न तस्याग्निभयं घोरं सर्पचौरादिकं भवेत् ॥

हे धारिणी! जिसके घर में यह लिखित रूप से सदा रखा रहता है, उसे अग्नि का घोर भय नहीं होता, न सर्प, चोर आदि का उपद्रव होता है।

Verse 62

यश्चैतत् पूजयेद् भक्त्या पुस्तकेऽपि स्थितं बुधः । तेन यष्टं भवेत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

और जो बुद्धिमान व्यक्ति इसे—पुस्तक में स्थित होने पर भी—भक्ति से पूजता है, उसके द्वारा मानो समस्त त्रैलोक्य, चर-अचर सहित, पूजित हो जाता है।

Verse 63

जायन्ते पशवः पुत्रा धनं धान्यं वरस्त्रियः । रत्नान्यश्वा गजा भृत्या यानाश्चाशु भवन्त्युत । यस्येदं तिष्ठते गेहे तस्येदं जायते ध्रुवम् ॥

जिसके घर में यह वस्तु प्रतिष्ठित रहती है, उसके यहाँ गौ-धन, पुत्र, धन-धान्य, उत्तम स्त्रियाँ, रत्न, घोड़े, हाथी, सेवक और वाहन भी शीघ्र ही उत्पन्न होते हैं; उसके लिए यह निश्चय ही फलदायक है।

Verse 64

श्रीवराह उवाच । एतदेव रहस्यं ते कीर्तितं भूतधारिणि । रुद्रस्य खलु माहात्म्यं सकलं कीर्तितं मया ॥

श्रीवराह बोले—हे भूतधारिणी! यह वही रहस्य मैंने तुम्हें कहा है; और रुद्र का सम्पूर्ण माहात्म्य भी मैंने विस्तार से वर्णित किया है।

Verse 65

नवकोट्यस्तु चामुण्डा भेदभिन्ना व्यवस्थिताः । या रौद्री तामसी शक्तिः सा चामुण्डा प्रकीर्तिता ॥

चामुण्डा को नौ कोटियों में विभक्त, भेदों के अनुसार पृथक्-पृथक् और व्यवस्थित कहा गया है। जो रौद्री तथा तामसी शक्ति है, वही चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध है।

Verse 66

अष्टादश तथा कोट्यो वैष्णव्या भेद उच्यते । या सा च राजसी शक्तिः पालनी चैव वैष्णवी । या ब्रह्मशक्तिः सत्त्वस्था अनन्तास्ताः प्रकीर्तिताः ॥

वैष्णवी के अठारह कोटि भेद कहे गए हैं। जो राजसी शक्ति है और जो पालन करने वाली है, वही वैष्णवी है। और जो ब्रह्म-शक्ति सत्त्व में स्थित है, वह अनन्त रूपों वाली कही गई है।

Verse 67

उत्तिष्ठतस्तस्य महासुरस्य समुद्रतोयं ववृद्धेऽतिमात्रम् । अनेकनक्रग्रहमीनजुष्टम् आप्लावयत् पर्वतसानुदेशान् ॥

उस महा-असुर के उठते ही समुद्र का जल अत्यधिक बढ़ गया; मगरमच्छों, ग्राही जीवों और मछलियों से भरा हुआ वह जल पर्वतों की ढलानों और प्रदेशों को डुबोने लगा।

Verse 68

एतासां सर्वभेदेषु पृथगेकैकशो धरे । सर्वासां भगवान् रुद्रः सर्वगश्च पतिर्भवेत् ॥

हे धरा, इन शक्तियों के सभी भेदों में, अलग-अलग और एक-एक करके, सर्वव्यापी भगवान रुद्र उन सबके पति (संयोगी) होते हैं।

Verse 69

यावन्त्यस्या महाशक्त्यास्तावद् रूपाणि शङ्करः । कृतवांस्ताश्च भजते पतिरूपेण सर्वदा ॥

इस महाशक्ति के जितने रूप हैं, उतने ही रूप शंकर ने धारण किए हैं; और वे सदा पति-रूप से उनसे संबद्ध होकर उनका भोग/संग करते हैं।

Verse 70

यश्चाराधयते तास्तु रुद्रस्तुष्टो भविष्यति । सिद्ध्यन्ते तास्तदा देव्यो मन्त्रिणो नात्र संशयः ॥

जो उन देवियों की विधिपूर्वक आराधना करता है, रुद्र प्रसन्न होते हैं; तब वे दिव्य शक्तियाँ सिद्ध हो जाती हैं—हे मन्त्रियों, इसमें संदेह नहीं।

Verse 71

अन्तः स्थितानेकसुरारिसङ्घं विचित्रचर्मायुधचित्रशोभम् । भीमं बलं बलिनं चारुयोधं विनिर्ययौ सिन्धुजलाद् विशालम् ॥

समुद्र के विशाल जल से एक भयंकर, महान् बल प्रकट हुआ—जिसके भीतर देवताओं के शत्रुओं के अनेक दल थे; जो विचित्र कवच और आयुधों से दीप्त, अत्यन्त बलवान् और भयावह, तथा सुन्दर योद्धाओं से युक्त था।

Verse 72

तत्र द्विपा दैत्यवरैरुपेता समानघण्टासुसमूहयुक्ताः । विनिर्ययुः स्वाकृतिभीषणानि समन्तमुच्चैः खलु दर्शयन्तः ॥

वहाँ श्रेष्ठ दैत्यों से युक्त हाथी—समरूप घंटियों और सुव्यवस्थित समूहों से सुसज्जित—बाहर निकले; और वे चारों ओर अपनी भयानक आकृतियाँ ऊँचे स्वर में, प्रकट रूप से दिखाते थे।

Frequently Asked Questions

The chapter frames cosmic stability as dependent on disciplined power (śakti) that can manifest in multiple guṇic modes (sāttvikī, rājasī, tāmasī) according to purpose. It also models a governance ethic: when devas fail to protect order, they seek refuge in a higher regulatory principle (the Devī), and restoration follows through coordinated action, hymn/recitation, and prescribed observances. The text further channels dangerous hunger/violence of attendant forces into socially bounded, liminal “allocations,” indicating an attempt to domesticate disruptive energies through rules.

The narrative explicitly mentions navamī as an observance for a dispossessed king (bhraṣṭarājya) undertaken with purity (śuci) and restraint (niyata). It also specifies fasting (upavāsa) on aṣṭamī and caturdaśī. Hearing/reciting the account on navamī is linked to relief from fear and attainment of prosperity/sovereignty within a year.

Environmental imbalance is narrated through the ocean’s abnormal swelling (samudratoyaṃ vavṛdhe) accompanying the asura’s mobilization, which inundates mountain slopes and disrupts space for living beings. The restoration of order occurs when the Devī neutralizes the aggressor and re-stabilizes the threatened worlds. The chapter also maps “earth-care” onto micro-ecologies—fields, ponds, wells, and gardens—treating them as sensitive liminal zones where unmanaged forces must be ritually and socially regulated to preserve household and community safety.

The principal cultural figures are Rudra (Śiva, Paśupati, Trilocana), Indra (via Indrapura), and collective deva groupings (Ādityas, Vasus, Rudras, Viśvedevās, Aśvinau). The antagonist is the daitya king Ruru, described as possessing a Brahmā-granted boon (brahmadattavara). A generic royal figure (a king who has lost his kingdom) appears in the phalaśruti as the beneficiary of navamī/aṣṭamī/caturdaśī observances.

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