
Triśakti-varṇana (Sṛṣṭi–Vaiṣṇavī–Raudrī Devī-stuti)
Theological-Philosophical Discourse (Śakti, Cosmology, Mantra-ontology)
इस अध्याय में वराह पृथिवी (वरारोहा/विशालाक्षी) को उपदेश देते हुए शिव/परमेष्ठी की त्रिशक्ति का सिद्धान्त बताते हैं। प्रथम सृजन-शक्ति ‘सृष्टि’ श्वेतवर्णा, शुभ, एकाक्षरा तथा सर्वाक्षरमयी कही गई है; वही वागीशी, सरस्वती, विद्येश्वरी, अमिताक्षरा आदि नामों से वाणी, ज्ञान और प्राकट्य की अधिष्ठात्री रूप में वर्णित है। दूसरी शक्ति अपरा/वैष्णवी रक्तवर्णा है और तीसरी रौद्री ‘परापरा’ कहलाती है। फिर ब्रह्मा उसकी स्तुति करते हैं—उसे स्वाहा-स्वधा, ओंकार-निवासिनी और समस्त प्राणियों की जननी-कारणरूपा कहते हैं। वाणी व अनुशासित ज्ञान के द्वारा विश्व-व्यवस्था और पृथिवी की स्थिरता का संकेत मिलता है।
Verse 1
श्रीवराह उवाच । शृणु चान्यं वरारोहे तस्या देव्या महाविधिम् । या सा त्रिशक्तिरुद्दिष्टा शिवेन परमेष्ठिना ॥
श्रीवराह ने कहा—हे वरारोहे, उस देवी के महान विधान/विधि को और सुनो, जिसे परमेष्ठी शिव ने ‘त्रिशक्ति’ के रूप में उपदिष्ट किया है।
Verse 2
सर्वज्ञे त्वं वरारोहे सर्वसिद्धिप्रदायिनी । सिद्धिबुद्धिकरी देवि प्रसूतिः परमेश्वरि ॥
हे वरारोहे, तुम सर्वज्ञ हो और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हो। हे देवी, तुम सिद्धि और बुद्धि को उत्पन्न करने वाली हो; हे परमेश्वरी, तुम ही प्रसूति-स्वरूपा हो।
Verse 3
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देवि त्वमुत्पत्तिर्वरानने । त्वमोङ्कारस्थितादेवि वेदोत्पत्तिस्त्वमेव च ॥
हे देवी, तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो; हे वरानने, तुम ही उत्पत्ति-स्वरूपा हो। हे देवी, तुम ओंकार में स्थित हो; और वेदों की उत्पत्ति भी तुम ही हो।
Verse 4
देवानां दानवानां च यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । पशूनां वीरुधां चापि त्वमुत्पत्तिर्वरानने ॥
हे वरानने! देवों और दानवों, यक्षों, गन्धर्वों और राक्षसों की, तथा पशुओं और वनस्पतियों की भी उत्पत्ति का कारण तुम ही हो।
Verse 5
विद्या विद्येश्वरी सिद्धा प्रसिद्धा त्वं सुरेश्वरी । सर्वज्ञा त्वं वरारोहे सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥
तुम ही विद्या हो; तुम विद्या की अधीश्वरी—सिद्ध और प्रसिद्ध—तथा देवों की स्वामिनी हो। हे वरारोहे! तुम सर्वज्ञ हो और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हो।
Verse 6
सर्वगा गतसन्देहा सर्वशत्रुनिबर्हिणी । सर्वविद्येश्वरी देवी नमस्ते स्वस्तिकारिणि ॥
हे देवी! तुम सर्वत्र व्याप्त, संदेह-रहित, और समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। सर्वविद्या की अधीश्वरी, कल्याण करने वाली—तुम्हें नमस्कार है।
Verse 7
ऋतुस्नातां स्त्रियं गच्छेद्यस्त्वां स्तुत्वा वरानने । तस्यावश्यं भवेत्सृष्टिस्त्वत्प्रसादात्प्रजेश्वरि । स्वरूपा विजया भद्रा सर्वशत्रुप्रमोहिनी ॥
हे वरानने! जो पुरुष तुम्हारी स्तुति करके ऋतुस्नाता स्त्री के पास जाता है, हे प्रजेश्वरि, तुम्हारे प्रसाद से उसके यहाँ अवश्य संतान-उत्पत्ति होती है। तुम स्वरूपा, विजया, भद्रा और समस्त शत्रुओं को मोहित करने वाली हो।
Verse 8
तत्र सृष्टिः पुरा प्रोक्ता श्वेतवर्णा स्वरूपिणी । एकाक्षरेति विख्याता सर्वाक्षरमयी शुभा ॥
वहाँ सृष्टि का पूर्व में वर्णन किया गया है—श्वेतवर्ण, अपने स्वरूप में स्थित; ‘एकाक्षरी’ के नाम से विख्यात, शुभ, और समस्त अक्षरों से युक्त।
Verse 9
वागीशेति समाख्याता क्वचिद्देवी सरस्वती । सैव विद्येश्वरी देवी सैव क्वाप्यमिताक्षरा । सैव ज्ञानविधिः क्वापि सैव देवी विभावरी ॥
कहीं वह ‘वागीशी’ कहलाती है, कहीं देवी ‘सरस्वती’। वही विद्या की अधीश्वरी देवी है, वही कहीं ‘अमिताक्षरा’ कही जाती है। वही कहीं ज्ञान की विधि है, वही देवी ‘विभावरी’ है।
Verse 10
यानि सौम्यानि नामानि यानि ज्ञानोद्भवानि च । तानि तस्या विशालाक्षि द्रष्टव्यानि वरानने ॥
जो कोमल नाम हैं और जो ज्ञान से उत्पन्न नाम हैं—हे विशालाक्षि, हे वरानने—वे सब उसी देवी के नाम समझकर विचार करने योग्य हैं।
Verse 11
या वैष्णवी विशालाक्षी रक्तवर्णा सुरूपिणी । अपरा सा समाख्याता रौद्री चैव परापरा ॥
जो वैष्णवी है—विशालाक्षि, रक्तवर्णा, सुरूपिणी—वह ‘अपरा’ कहलाती है; और वही ‘रौद्री’ तथा ‘परापरा’ भी है।
Verse 12
एतास्त्रयोऽपि सिद्ध्यन्ते यो रुद्रं वेत्ति तत्त्वतः । सर्वगेयं वरारोहे एकैव त्रिविधा स्मृता ॥
जो रुद्र को तत्त्वतः जानता है, उसके लिए ये तीनों भी सिद्ध हो जाते हैं। हे वरारोहे, यह सर्वत्र गेय है—वह एक ही है, पर त्रिविधा रूप से स्मरण की गई है।
Verse 13
एषा सृष्टिर्वरारोहे कथिता ते पुरातनी । तया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥
हे वरारोहे, यह प्राचीन सृष्टि-कथा तुम्हें कही गई है। उसी से यह समस्त जगत्—स्थावर और जङ्गम—व्याप्त है।
Verse 14
या सा आदौ वर्धिता सृष्टिर्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । तया तुल्यां स्तुतिं चक्रे तस्या देव्याः पितामहः ॥
जो सृष्टि आदि में अव्यक्त-उद्गम वाले ब्रह्मा द्वारा विस्तारित की गई थी, उसी देवी के लिए पितामह ब्रह्मा ने उसके समान योग्य स्तुति की।
Verse 15
ब्रह्मोवाच । जयस्व सत्यसम्भूते ध्रुवे देवि वराक्षरे । सर्वगे सर्वजननि सर्वभूतमहेश्वरि ॥
ब्रह्मा बोले—जय हो, हे सत्य से उत्पन्न होने वाली; हे ध्रुव, हे देवी, हे श्रेष्ठ अक्षरों को धारण करने वाली; हे सर्वव्यापिनी, हे सर्वजननी, हे समस्त भूतों की महेश्वरी।
The text presents a philosophical model in which a single all-pervading power (śakti) manifests in three modes (sṛṣṭi, vaiṣṇavī/aparā, raudrī/parāparā). It links cosmic stability to disciplined knowledge and speech (Vāc/Sarasvatī), implying that orderly creation—and by extension the well-being of the terrestrial world addressed through Pṛthivī—depends on right understanding of the underlying creative principle.
No tithi, lunar phase, month (māsa), seasonal (ṛtu) timing, or calendrical ritual schedule is specified in the provided passage. The only temporal phrasing is cosmological (“ādau,” ‘in the beginning’) rather than liturgical.
Environmental balance is approached indirectly through cosmology: the chapter states that the primordial sṛṣṭi-śakti pervades the entire world (jagat), including stationary and moving beings (sthāvara-jaṅgama). By framing creation as universally suffused by a regulating principle grounded in knowledge and sacred sound, the narrative supports a Pṛthivī-oriented reading in which terrestrial order is maintained through alignment with that pervasive creative law.
The passage references Brahmā (Pitāmaha) as the speaker of the hymn and invokes Śiva/Parameṣṭhin as the authority who has indicated the triśakti. No royal dynasties, human genealogies, or named sage lineages appear in these verses.