Adhyaya 83
Varaha PuranaAdhyaya 838 Shlokas

Adhyaya 83: Description of the Bhadrāśva and Ketumāla Regions: Niṣadha’s Western Janapadas and River Systems

Bhadrāśva–Ketumāla–Niṣadha-janapada-nadī-varṇanam

Ancient-Geography

इस अध्याय में वराह–पृथिवी उपदेश-परंपरा के भीतर रुद्र के वचन रूप से भद्राश्व और केतुमाल प्रदेशों का नामोल्लेख किया गया है। फिर निषध के पश्चिम भाग में स्थित कुलपर्वतों तथा उनसे संबद्ध जनपदों का क्रमबद्ध वर्णन आता है, और बताया गया है कि स्थानीय जनसमुदाय इन स्थान-नामों से पहचाने जाएँ। यह भी कहा गया है कि जनपद निकटवर्ती पर्वतों से निकलने वाली नदियों का ‘पान’ करते हैं—अर्थात उनका जीवन जल-आश्रित है। इसके बाद प्रमुख नदियों की सूची दी जाती है और अंत में असंख्य छोटी नदियों के शेष रहने का संकेत है; यह अध्याय पर्वत, जनपद और नदी-परिस्थितिकी को जोड़ने वाली भौगोलिक अनुक्रमणिका है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivīRudra

Key Concepts

janapada (territorial polities) as place-name taxonomykulaparvata (regional mountain systems) as hydrological sourcesnadī-catalogue as ecological infrastructurecosmographical mapping of Bhadrāśva, Ketumāla, and Niṣadha

Shlokas in Adhyaya 83

Verse 1

रुद्र उवाच।

रुद्र ने कहा:

Verse 2

निसर्ग एष भद्राश्वानां कीर्तितः केतुमालानां विस्तरेण कथितम्।

भद्राश्व का यह प्राकृतिक (प्रदेशीय) विन्यास कहा गया; और केतुमाल का विस्तार से वर्णन किया गया।

Verse 3

नैषधस्याचलेनद्रस्य पश्चिमेन कुलाचलजनपदनद्यः कीर्त्यन्ते।

पर्वतराज नैषध के पश्चिम में कुलाचल पर्वत-श्रेणियाँ, जनपद और नदियाँ गिनाई जाती हैं।

Verse 4

तथा च विशाखकम्बलजयन्तकृष्णहरिताशोकवर्द्धमानाः इत्येतॆषां सप्तकुलपर्वतानां कोटिशः प्रसूतिः।

तथा—विशाख, कंबल, जयंत, कृष्ण, हरिताशोक और वर्द्धमान—इन सात कुलपर्वतों की कोटि-कोटि शाखाएँ/प्रसार हैं।

Verse 5

तन्निवासिनो जनपदास्तन्नामान एव द्रष्टव्याः।

वहाँ निवास करने वाले जो जनपद हैं, उन्हें उन्हीं नामों से युक्त समझना चाहिए।

Verse 6

तद्यथा सौरग्रामात्तसांतपो कृतसुराश्रवण कम्बलमाहेयाचलकूटवासमूलतपक्रौञ्चकृष्णाङ्गमणिपङ्कजचूडमलसोमीयसमुद्रान्तक कुरकुञ्चसुवर्णः तटकुह श्वेताङ्गकृष्णपाटविदकपिलकर्णिकमहिषकुब्जकरनाटमहोट्कटशुकनासगजभूमककुरञ्जन मनाहकिकिङ्किसपार्णभौमकचोरकधूमजन्म अङ्गारजातिवनजीवलौकिलवाचां सहाङ्गमधुरेयशुकेचकेयश्रवणमत्त कासिकगोदावामकुलपञ्जावर्ज्जहमोदशालक एते जनपदास्तत्पर्वतोत्था नदीः पिबन्ति।

जैसे—सौरग्राम, अत्तसांतप, कृतसुराश्रवण, कम्बल, माहेय, अचलकूटवास, मूलतप, क्रौञ्च, कृष्णाङ्गमणि, पङ्कजचूड, मलसोमीय, समुद्रान्तक, कुरकुञ्च, सुवर्ण, तटकुह, श्वेताङ्ग, कृष्णपाट, विदक, कपिलकर्णिक, महिषकुब्ज, करनाट, महोट्कट, शुकनास, गजभूमक, कुरञ्जन, मनाहक, किङ्किस, पार्ण, भौमक, चोरक, धूमजन्म, अङ्गारजाति, वनजीव, लौकिलवाचां, सहाङ्ग, मधुरेय, शुकेचके, यश्रवणमत्त, कासिक, गोदावाम, कुलपञ्जा, वर्ज्जह, मोदशालक—ये जनपद उन पर्वतों से उत्पन्न नदियों का जल पीते हैं।

Verse 7

तद्यथा प्लक्षा महाकदम्बा मानसि श्यामा सुमेधा बहुला विवर्णा पुण्खा माला दर्भवती भद्रानदी शुकनदी पल्लवा भीमा प्रभञ्जना काम्बा कुशावती दक्षा कासवती तुङ्गा पुण्योदा चन्द्रावती सुमूलावती ककुद्मिनी विशाला करन्टका पीवरी महामाया महिषी मानुषी चण्डा एता नदीः प्रधानाः।

जैसे—प्लक्षा, महाकदम्बा, मानसि, श्यामा, सुमेधा, बहुला, विवर्णा, पुण्खा, माला, दर्भवती, भद्रानदी, शुकनदी, पल्लवा, भीमा, प्रभञ्जना, काम्बा, कुशावती, दक्षा, कासवती, तुङ्गा, पुण्योदा, चन्द्रावती, सुमूलावती, ककुद्मिनी, विशाला, करन्टका, पीवरी, महामाया, महिषी, मानुषी और चण्डा—ये प्रधान नदियाँ हैं।

Verse 8

शेषाः क्षुद्रनद्यः सहस्रशश्चेति।

शेष नदियाँ क्षुद्र हैं—वे सहस्रों की संख्या में हैं।

Frequently Asked Questions

The chapter is primarily descriptive rather than prescriptive: it models a cosmographical method that links mountains, settlements, and rivers, implicitly presenting environmental dependency (human habitation relying on mountain-born waters) as a structural principle of terrestrial order.

No explicit chronological markers (tithi, nakṣatra, māsa) or seasonal timings are stated in the provided passage; the content functions as a geographic catalogue rather than a ritual calendar.

Environmental balance is conveyed through hydrological causality: janapadas are said to drink rivers arising from nearby mountains, presenting river systems as the sustaining infrastructure of human regions and implying that terrestrial stability depends on the integrity of mountain–river relationships.

The passage attributes speech to Rudra but does not provide genealogies, royal dynasties, or named sage lineages; the emphasis remains on place-names (janapadas), mountain systems (kulaparvatas), and river lists.