
Droṇī-varṇanaṃ: Śrīsaraḥ–Śrīvana–Bilvavana–Tālavana-prasaṅgaḥ
Ancient-Geography (Sacred Ecology and Cosmographic Topography)
वराहपुराण के वराह–पृथिवी संवाद में यह अध्याय मेरु पर्वत के निकट स्थित ‘द्रोणी’ नामक अंतःकुंडों/घेरों का भूगोल-आधारित वर्णन देता है। प्राप्त अंश में रुद्र वक्ता होकर श्रीसरस, श्रीवन, बिल्ववन और तालवन आदि उज्ज्वल सरोवरों, वनों और पर्वतान्तरों का क्रमशः उल्लेख करते हैं; योजन-क्रोश में माप, बिल्व-ताल जैसे वनस्पति-चिह्न, तथा सिद्ध आदि प्राणियों की उपस्थिति बताई जाती है। श्रीसरस के कमल में और श्रीवन में श्री (लक्ष्मी) के निवास का वर्णन कर पवित्र जल, उर्वरता और मंगलमय भू-दृश्य को जोड़ा गया है। जल-शुद्धि, उपवन-रक्षा और समृद्ध आवास-व्यवस्था को ब्रह्माण्डीय संतुलन व शुभ-व्यवस्था के संकेत रूप में प्रस्तुत किया गया है।
Verse 1
रुद्र उवाच । सीतान्तस्याचलेन्द्रस्य कुमुदस्यान्तरेण च । द्रोण्यां विहङ्गपुष्टायां नानासत्त्वनिषेवितम् ॥ ७९.१ ॥
रुद्र ने कहा—अचलेन्द्र सीतान्त और कुमुद (पर्वत) के बीच, पक्षियों से पोषित एक द्रोणी (घाटी) है, जहाँ नाना प्रकार के प्राणी निवास करते और विचरते हैं।
Verse 2
त्रियोजनशतायामं शतयोजनविस्तृतम् । सुरसामलपानीयं रम्यं तत्र सुरोचनम् ॥ ७९.२ ॥
वह (प्रदेश) सौ योजन लंबा और सौ योजन चौड़ा है; वहाँ सुरसा और आमला के समान मधुर-निर्मल पेयजल है; वह स्थान रमणीय, प्रकाशमान और मनोहर है।
Verse 3
द्रोणमात्रप्रमाणैश्च पुण्डरीकैः सुगन्धिभिः । सहस्रशतपत्रैश्च महापद्मैरलङ्कृतम् ॥ ७९.३ ॥
वह द्रोण-परिमाण के सुगंधित श्वेत कमलों तथा सहस्र या शत-पत्रों वाले महापद्मों से सर्वथा अलंकृत था।
Verse 4
देवदानवगन्धर्वैर्महासर्पैरधिष्ठितम् । पुण्यं तच्छ्रीसरो नाम सप्रकाशमिहेह च ॥ ७९.४ ॥
देव, दानव, गंधर्व और महा-सर्पों द्वारा अधिष्ठित वह पुण्य सरोवर ‘श्रीसर’ नाम से प्रसिद्ध है; यह यहाँ भी और परलोक में भी प्रकाशमान-प्रसिद्ध है।
Verse 5
प्रसन्नसलिलैः पूर्णं शरण्यं सर्वदेहिनाम् । तत्र त्वेकं महापद्मं मध्ये पद्मवनस्य च ॥ ७९.५ ॥
स्वच्छ और शांत जल से परिपूर्ण वह सरोवर समस्त देहधारियों के लिए शरण-स्थल है। वहाँ पद्मवन के मध्य में एक ही महापद्म स्थित है।
Verse 6
कोटिपत्रप्रकलितं तरुणादित्यवर्चसम् । नित्यं व्याकोशमधुरं चलत्वादतिमण्डलम् ॥ ७९.६ ॥
वह करोड़ों पंखुड़ियों से रचित, नवोदित सूर्य के समान तेजस्वी—सदा मधुर और पूर्ण विकसित था; तथा अपने स्पंदन से अत्यंत मंडलाकार प्रतीत होता था।
Verse 7
चारुकेसरजालाढ्यं मत्तभ्रमरनादितम् । तस्मिन्मध्ये भगवती साक्षात् श्रीर्नित्यमेव हि । लक्ष्मीस्तु तं तदावासं मूर्त्तिमन्तं न संशयः ॥ ७९.७ ॥
सुंदर केसर-जाल से समृद्ध और मत्त भौंरों के गुंजार से निनादित उस कमल के भीतर मध्य में भगवती—साक्षात् श्री—नित्य विराजती हैं। और लक्ष्मी निःसंदेह उस स्थान को अपना मूर्तिमान निवास मानती हैं।
Verse 8
सरसस्तस्य तीरे तु तस्मिन् सिद्धनिषेवितम् । सदा पुष्पफलṃ रम्यं तत्र बिल्ववनं महत् ॥ ७९.८ ॥
उस सरोवर के तट पर, सिद्धों द्वारा सेवित उस स्थान में सदा पुष्प-फल से युक्त, रमणीय एक विशाल बिल्ववन है।
Verse 9
शतयोजनविस्तीर्णं द्वियोजनशतायतम् । अर्द्धक्रोशोच्छशिखरैर्महावृक्षैः समन्ततः । शाखासहस्रकलितैर्महास्कन्धैः समाकुलम् ॥ ७९.९ ॥
वह वन सौ योजन तक फैला था और दो सौ योजन लंबा था; चारों ओर आधे क्रोश ऊँचे शिखरों वाले महावृक्षों से घिरा था और हजारों शाखाओं वाले विशाल तनों से घना था।
Verse 10
फलैः सहस्रसङ्काशैः हरितैः पाण्डुरैस्तथा । अमृतस्वादुसदृशैर्भेरीमात्रैः सुगन्धिभिः ॥ ७९.१० ॥
वहाँ सहस्र के समान प्रभा/प्रचुरता वाले फल थे—कुछ हरे, कुछ पांडुर; अमृत-तुल्य मधुर, भेरी (नगाड़े) के समान बड़े और सुगंधित।
Verse 11
शीऱ्यद्भिश्च पतद्भिश्च कीर्णभूमिवनान्तरम् । नाम्ना तच्छ्रीवनं नाम सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७९.११ ॥
सूखते और गिरते वृक्षों से बिखरा हुआ उस वन का अंतरभाग था; उसका नाम ‘श्रीवन’ था, जो समस्त लोकों में प्रसिद्ध था।
Verse 12
देवादिभिः समाकीर्णमष्टाभिः ककुभिः शुभम् । बिल्वाशिभिश्च मुनिभिः सेवितं पुण्यकारिभिः । तत्र श्रीः संस्थिता नित्यं सिद्धसङ्घनिषेविता ॥ ७९.१२ ॥
आठों दिशाओं में शुभ यह स्थान देवताओं आदि से परिपूर्ण है; बिल्वफल-आहार करने वाले पुण्यकारक मुनि इसे सेवित करते हैं। वहाँ श्री सदा स्थित रहती हैं, और सिद्ध-समूह उनकी सेवा करते हैं।
Verse 13
एकैकस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरम् । शतयोजनविस्तीर्णं द्वियोजनशतायतम् ॥ ७९.१३ ॥
प्रत्येक पर्वतराज और मणिशैल पर्वत के बीच का अंतर सौ योजन चौड़ा और दो सौ योजन लंबा है।
Verse 14
विमलं पङ्कजवनं सिद्धचारणसेवितम् । पुष्पं लक्ष्म्या धृतं भाति नित्यं प्रज्वलतीव ह ॥ ७९.१४ ॥
निर्मल कमल-वन, सिद्धों और चारणों द्वारा सेवित है; वहाँ लक्ष्मी के द्वारा धारण किया हुआ एक पुष्प सदा मानो प्रज्वलित-सा चमकता है।
Verse 15
अर्द्धक्रोशं च शिखरैर्महास्कन्धैः समावृतम् । प्रफुल्लशाखाशिखरं पिञ्जरं भाति तद्वनम् ॥ ७९.१५ ॥
आधा क्रोश तक फैला वह वन शिखरों और महान् वृक्ष-स्कन्धों से घिरा है; उसकी शाखाओं के अग्रभाग पुष्पित हैं, इसलिए वह वन पिंगल-सुवर्ण-सा दीप्त होता है।
Verse 16
द्विबाहुपरिणाहैस्तैस्त्रिहस्तायामविस्तृतैः । मनःशिलाचूर्णनिभैः पाण्डुकेसरशालिभिः ॥ ७९.१६ ॥
उनका घेरा दो बाहु-परिमाण का था और वे तीन हस्त तक लंबाई में फैले थे; वे मनःशिला के चूर्ण के समान वर्ण वाले, तथा पाण्डु-केसर (श्वेत-पराग/तंतु) से युक्त थे।
Verse 17
पुष्पैर्मनोहरैर्व्याप्तं व्याकोशैर्गन्धशोभिभिः । विराजति वनं सर्वं मत्तभ्रमरनादितम् ॥ ७९.१७ ॥
मनोहर पुष्पों से व्याप्त, पूर्ण विकसित और सुगंध-शोभा से युक्त उन फूलों से वह समस्त वन सुशोभित है; और मत्त भ्रमरों के नाद से गूँजता रहता है।
Verse 18
तद्वनं दानवैर्दैत्यैर्गन्धर्वैर्यक्षराक्षसैः । किन्नरैरप्सरोभिश्च महाभोगैश्च सेवितम् ॥ ७९.१८ ॥
वह वन दानवों और दैत्यों, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों द्वारा, तथा किन्नरों और अप्सराओं द्वारा भी—महाभोगी और तेजस्वी प्राणियों से—सेवित था।
Verse 19
तत्राश्रमो भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः । सिद्धसाधुगणाकीर्णं नानाश्रमसमाकुलम् ॥ ७९.१९ ॥
वहाँ भगवान् प्रजापति कश्यप का आश्रम था, जो सिद्धों और साधुओं के समूहों से परिपूर्ण था और नाना प्रकार के आश्रम-निवास तथा तपश्चर्याओं से व्याप्त था।
Verse 20
महानीलस्य मध्ये तु कुम्भस्य च गिरेस्तथा । मध्ये सुखा नदी नाम तस्यास्तीरे महद्वनम् ॥ ७९.२० ॥
महानील और कुम्भ नामक पर्वत के बीच के प्रदेश में ‘सुखा’ नाम की नदी है; उसके तट पर एक महान वन स्थित है।
Verse 21
पञ्चाशद्योजनायामं त्रिंशद्योजनमण्डलम् । रम्यं तालवनं श्रीमत् क्रोशार्द्धोच्छ्रितपादपम् ॥ ७९.२१ ॥
वह श्रीसम्पन्न, रमणीय तालवन पचास योजन लम्बा और तीस योजन परिमण्डल वाला है; उसके वृक्ष आधे क्रोश की ऊँचाई तक उठे हुए हैं।
Verse 22
महाबलैर्महासारैः स्थिरैरविचलैः शुभैः । महदञ्जनसंस्थानैः परिवृत्तैर्महाफलैः ॥ ७९.२२ ॥
वे वृक्ष महाबलवान् और महासारयुक्त हैं—स्थिर, अचल और शुभ; अञ्जन-श्याम विशाल पिण्डों के समान आकृतिवाले, सुगोल तथा महाफलों से युक्त हैं।
Verse 23
मृष्टगन्धगुणोपेतैरुपेतं सिद्धसेवितम् । ऐरावतस्य करिणस्तत्रैव समुदाहृतम् ॥ ७९.२३ ॥
उत्तम सुगंध और गुणों से युक्त, सिद्धों द्वारा सेवित—वहीं ऐरावत के गजराज का भी उल्लेख किया गया है।
Verse 24
ऐरावतस्य रुद्रस्य देवशैलस्य चान्तरे । सहस्रयोजनायामा शतयोजनविस्तृता ॥ ७९.२४ ॥
ऐरावत, रुद्र और देवशैल के बीच वह (प्रदेश) लंबाई में सहस्र योजन और चौड़ाई में शत योजन विस्तृत है।
Verse 25
सर्वा ह्येकशिला भूमिर्वृक्षवीरुधवर्जिता । आप्लुता पादमात्रेण सलिलेन समन्ततः ॥ ७९.२५ ॥
समस्त भूमि एक ही शिला-प्रसार थी, वृक्ष और लताओं से रहित; और चारों ओर केवल एक पाद-प्रमाण जल से आप्लावित थी।
Verse 26
इत्येताभ्यन्तरद्रोण्यो नानाकाराः प्रकीर्त्तिताः । मेरोह् पार्श्वेन विप्रेन्द्रा यथावदनुपूर्वशः ॥ ७९.२६ ॥
इस प्रकार, हे विप्रश्रेष्ठो, मेरु पर्वत के पार्श्व में स्थित विविध आकार की ये आन्तरिक द्रोणियाँ यथावत् क्रमशः वर्णित की गईं।
Rather than issuing a direct moral injunction, the chapter teaches through description: balanced waters (prasanna-salila), protected groves, and abundant flora/fauna are presented as markers of auspicious cosmic order. The narrative associates Śrī (Lakṣmī) with lotus-lakes and forests, implying that prosperity depends on maintaining terrestrial habitats and water purity—an indirect ecological ethic consistent with Pṛthivī-centered stewardship themes.
No explicit calendrical markers (tithi, nakṣatra, māsa, or ṛtu) are stated in the provided adhyāya passage. The text focuses on spatial measurements and landscape qualities rather than ritual timing.
Environmental balance is conveyed through an idealized geography: clear, full waters; lotus proliferation; fruiting forests; and stable mountains. The repeated emphasis on flourishing groves (bilvavana, tālavana), non-degraded water bodies, and ‘siddha-sevita’ sanctity frames the landscape as something maintained and safeguarded—suggesting that Pṛthivī’s well-being is tied to conserving water systems and forest ecologies.
The chapter references Rudra as the describing authority and mentions the āśrama of Kaśyapa Prajāpati, situating the landscape within a sage-centered cultural geography. It also names Airāvata (associated with Indra’s elephant in broader tradition) and refers to communities such as siddhas, cāraṇas, gandharvas, yakṣas, rākṣasas, kinnaras, apsarases, daityas, and dānavas as inhabitants/visitors, indicating a multi-tiered cosmological population rather than a royal genealogy.
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