Varaha Purana - Adhyaya 77
Varaha PuranaAdhyaya 7732 Shlokas

Adhyaya 77: Measurements of Mount Meru, the Boundary Mountains, and the Four Directional Great Trees

Meru-māna, maryādāparvatāḥ, caturdiśaḥ mahāvṛkṣāś ca

Ancient-Geography (Purāṇic Cosmography)

वराह–पृथ्वी संवाद के क्रम में रुद्र सप्तद्वीपी पृथ्वी के धुरी-रूप स्थिरक पर्वत मेरु का वर्णन करते हैं। वे मेरु की योजन-परिमिति बताते हैं और आठ मर्यादा-पर्वतों का क्रम देते हैं, जिनमें पूर्व दिशा में जठर और देवकूट का नाम आता है। आगे मेरु के चार ‘पाद’ समान आधार-पर्वतसमूह तथा चार दिशागत पर्वत—पूर्व में मन्दर, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व—कहे गए हैं। इन पर्वतों पर क्रमशः कदम्ब, जम्बू, अश्वत्थ और वट/न्यग्रोध महावृक्ष स्थित हैं, जिनसे भद्राश्व, जम्बूद्वीप, केतुमाल और उत्तरकुरु वर्ष-नामों की व्युत्पत्ति समझाई जाती है। जाम्बूनदी के प्रवाह और जाम्बूनद स्वर्ण की उत्पत्ति सहित, यह अध्याय सुव्यवस्थित, संतुलित विश्व-रचना का बोध कराता है।

Speakers

VarāhaPṛthivīRudra

Key Concepts

Meru (axis mundi) and yojana-based measurementMaryādāparvata (boundary-mountain) as spatial delimitationCaturdiśa-parvata and mahāvṛkṣa (directional mountains and great trees)Toponymic etymology of varṣas/dvīpas (Bhadrāśva, Ketumāla, Uttarakuru, Jambūdvīpa)Jāmbūnadī and Jāmbūnada (riverine flow and metallurgical mythos)Terrestrial stability and cosmological balance (earth-support imagery)
Sanskrit recitationVaraha Purana Adhyaya 77

Shlokas in Adhyaya 77

Verse 1

रुद्र उवाच । यदेतत् कर्णिकामूलं मेरोर् मध्यं प्रकीर्तितम् । तद् योजनसहस्राणि संख्यया मानतः स्मृतम् ॥ ७७.१ ॥

रुद्र बोले—जिसे ‘कर्णिका’ का मूल, अर्थात् मेरु का मध्य-प्रदेश कहा गया है, वह माप की संख्या के अनुसार एक सहस्र योजन तक विस्तृत स्मरण किया गया है।

Verse 2

चत्वारिंशत् तथा चाष्टौ सहस्राणि तु मण्डलैः । शैलराजस्य तत्तत्र मेरुमूलमिति स्मृतम् ॥ ७७.२ ॥

वहाँ मण्डलों के द्वारा माप करने पर अड़तालीस सहस्र (इकाइयाँ) हैं। पर्वतराज का वह प्रदेश ‘मेरुमूल’ के नाम से स्मरण किया जाता है।

Verse 3

तेषां गिरिसहस्राणामनेकानां महोच्छ्रयः । दिगष्टौ च पुनस्तस्य मर्यादापर्वताः शुभाः ॥ ७७.३ ॥

उन असंख्य पर्वत-हजारों में अनेक की ऊँचाई अत्यन्त महान है; और फिर आठों दिशाओं में शुभ मर्यादा-पर्वत उसकी सीमा निर्धारित करते हैं।

Verse 4

जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ । पूर्वपश्चायतावेतावर्णवान्तरव्यवस्थितौ । मर्यादापर्वतान् एतानष्टानाहुर्मनीषिणः ॥ ७७.४ ॥

पूर्व दिशा में जठर और देवकूट नामक दो पर्वत हैं। ये दोनों पूर्व से पश्चिम तक विस्तृत हैं और समुद्रों के बीच स्थित हैं। मनीषी इन आठों को ‘मर्यादा-पर्वत’ कहते हैं।

Verse 5

योऽसौ मेरुर्द्विजश्रेष्ठाः प्रोक्तः कनकपर्वतः । विष्कम्भांस्तस्य वक्ष्यामि शृणुध्वं गदतस्तु तान् ॥ ७७.५ ॥

हे द्विजश्रेष्ठो! जो मेरु ‘कनक-पर्वत’ कहा गया है, अब मैं उसके विस्तार (विष्कम्भ) बताऊँगा; मेरे कथन को सुनो।

Verse 6

महापादास्तु चत्वारो मेरोरथ चतुर्दिशम् । यैर्न चचाल विष्टब्धा सप्तद्वीपवती मही ॥ ७७.६ ॥

मेरु के चारों दिशाओं में उसके चार महापाद (महान आधार) हैं; उन्हीं से स्थिर होकर सात द्वीपों वाली पृथ्वी विचलित नहीं हुई।

Verse 7

दशयोजनसाहस्रं व्यायामस्तेषु शङ्क्यते । तिर्यगूर्ध्वं च रचिता हरितालतटैर्वृताः ॥ ७७.७ ॥

उनमें विस्तार दस हजार योजन माना जाता है; वे आड़े और ऊर्ध्व दोनों प्रकार से रचे गए हैं तथा हरिताल के तटों से घिरे हैं।

Verse 8

मनःशिलादरीभिश्च सुवर्णमणिचित्रिताः । अनेकसिद्धभवनैः क्रीडास्थानैश्च सुप्रभाः ॥ ७७.८ ॥

वे मनःशिला-रंजित दर्रों से तथा सुवर्ण और मणियों की विचित्र शोभा से अलंकृत हैं; अनेक सिद्धों के भवनों और क्रीडास्थलों सहित वे अत्यन्त दीप्तिमान् होकर प्रकाशते हैं।

Verse 9

पूर्वेण मन्दरस्तस्य दक्षिणे गन्धमादनः । विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्थितः ॥ ७७.९ ॥

उसके पूर्व में मन्दर, दक्षिण में गन्धमादन; पश्चिम पार्श्व में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व स्थित है।

Verse 10

तेषां शृङ्गेषु चत्वारो महावृक्षाः प्रतिष्ठिताः । देवदैत्याप्सरोभिश्च सेविता गुणसंचयैः ॥ ७७.१० ॥

उन पर्वत-शिखरों पर चार महावृक्ष प्रतिष्ठित हैं, जिनकी सेवा देव, दैत्य और अप्सराएँ करती हैं—वे वृक्ष संचित गुणों से सम्पन्न हैं।

Verse 11

मन्दरस्य गिरेः शृङ्गे कदम्बो नाम पादपः । प्रलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः ॥ ७७.११ ॥

मन्दर पर्वत के शिखर पर ‘कदम्ब’ नामक वृक्ष है; उसकी शाखाएँ दीर्घ और विस्तीर्ण होकर शिखर-रूप मुकुट बनाती हैं, और वह कदम्ब चैत्य-वृक्ष के रूप में मान्य है।

Verse 12

महाकुम्भप्रमाणेश्च पुष्पैर्विकचकेसरैः । महागन्धबनोञ्ञैश्च शोभितः सर्वकालजैः ॥ ७७.१२ ॥

वह महाकुम्भ के प्रमाण के समान विशाल है; पूर्ण-विकसित केसरयुक्त पुष्पों से तथा अत्यन्त सुगन्धित और मनोहर वन-समूहों से अलंकृत है—जो सर्व ऋतुओं में उत्पन्न होने वाली शोभा से युक्त हैं।

Verse 13

समासेन परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः । सहस्रमधिकं सोऽथ गन्धेनापूरयन् दिशः ॥ ७७.१३ ॥

भूतों का पालन करने वाले लोकों से संक्षेप में घिरा हुआ वह, सहस्र से भी अधिक विस्तार में, सुगंध से दिशाओं को भरने लगा।

Verse 14

भद्राश्वो नाम वृक्षोऽयं वर्षाद्रेः केतुसंभवः । कीर्तिमान् रूपवान् श्रीमान् महापादपपादपः । यत्र साक्षाद्धृषीकेशः सिद्धसङ्घैर्निषेव्यते ॥ ७७.१४ ॥

यह ‘भद्राश्व’ नामक वृक्ष है, जो वर्षाद्रि के केतु से उत्पन्न हुआ। यह कीर्तिमान, रूपवान और श्रीमान्—महावृक्ष है; जहाँ साक्षात् हृषीकेश की सिद्ध-संघों द्वारा सेवा होती है।

Verse 15

तस्य भद्रकदम्बस्य तथाश्ववदनो हरिः । प्राप्तवांश्चामरश्रेष्ठः स हि सानुं पुनः पुनः ॥ ७७.१५ ॥

उस शुभ कदम्ब-वृक्ष के ढाल पर अश्वमुख हरि बार-बार पहुँचे; क्योंकि वे ही अमरों में श्रेष्ठ हैं।

Verse 16

तेन चालोकितं वर्षं सर्वद्विपदनायकाः । यस्य नाम्ना समाख्यातो भद्राश्वेति न संशयः ॥ ७७.१६ ॥

उसके द्वारा वह वर्ष-प्रदेश देखा गया; और समस्त द्विपद-नायकों में वह उसके ही नाम से ‘भद्राश्व’ कहलाया—इसमें संशय नहीं।

Verse 17

दक्षिणस्यापि शैलस्य शिखरे देवसेविते । जम्बूः सद्यः पुष्पफलाः महाशाखोपशोभिता ॥ ७७.१७ ॥

दक्षिण पर्वत के देव-सेवित शिखर पर भी जम्बू-वृक्ष है, जो एक साथ पुष्प-फल धारण करता और महान् शाखाओं से शोभित है।

Verse 18

तस्याः ह्यतिप्रमाणानि स्वादूनि च मृदूनि च । फलान्यमृतकल्पानि पतन्ति गिरिमूर्धनि ॥ ७७.१८ ॥

उसके फल अत्यन्त विशाल, मधुर और कोमल हैं; अमृत-तुल्य वे पर्वत-शिखर पर गिरते हैं।

Verse 19

तस्माद् गिरिवरश्रेष्ठात् फलप्रस्यन्दवाहिनी । दिव्या जाम्बूनदी नाम प्रवृत्ता मधुवाहिनी ॥ ७७.१९ ॥

उस श्रेष्ठ पर्वत से फलों के रस को बहाने वाली धारा निकली; ‘जाम्बूनदी’ नाम की दिव्य, मधु-प्रवाहिनी नदी प्रवाहित हुई।

Verse 20

तत्र जाम्बूनदं नाम सुवर्णमनलप्रभम् । देवालङ्कारमतुलमुत्पन्नं पापनाशनम् ॥ ७७.२० ॥

वहाँ ‘जाम्बूनद’ नामक स्वर्ण उत्पन्न हुआ, जो अग्नि-प्रभा के समान दीप्त था; देवताओं का अतुल अलंकार और पाप-नाशक कहा गया।

Verse 21

देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसगुह्यकाः । पपुस्तदमृतप्रख्यं मधु जम्बूफलस्रवम् ॥ ७७.२१ ॥

देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और गुह्यक—जम्बूफल से बहने वाले उस अमृत-प्रख्यात मधु को पीते थे।

Verse 22

सा केतुर्दक्षिणे वर्षे जम्बूलोकेषु विश्रुता । यस्या नाम्ना समाख्याता जम्बूद्वीपेति मानवैः ॥ ७७.२२ ॥

दक्षिण वर्ष में वह ‘केतु’ नाम से प्रसिद्ध है, जम्बूलोकों में विख्यात; और उसी के नाम से मनुष्यों ने ‘जम्बूद्वीप’ कहा है।

Verse 23

विपुलस्य च शैलस्य दक्षिणेन महात्मनः । जातः शृङ्गेति सुमहानश्वत्थश्चेति पादपः ॥ ७७.२३ ॥

महात्मा विपुल पर्वत के दक्षिण भाग में ‘शृङ्ग’ नाम से प्रसिद्ध एक अत्यन्त विशाल अश्वत्थ वृक्ष उत्पन्न हुआ।

Verse 24

महोच्छ्रायो महास्कन्धो नैकसत्त्वगुणालयः | कुम्भप्रमाणै रुचिरैः फलैः सर्वर्त्तुकैः शुभैः || ७७.२४ ||

वह वृक्ष अत्यन्त ऊँचा, विशाल तने वाला, अनेक जीवों और गुणों का आश्रय है; उसमें घड़े के समान बड़े, मनोहर, शुभ और सर्वऋतु में मिलने वाले फल लगते हैं।

Verse 25

स केतुः केतुमालानां देवगन्धर्वसेवितः । केतुमालेति विख्यातो नाम्ना तत्र प्रकीर्तितः । तन्निबोधत विप्रेन्द्रा निरुक्तं नामकर्मणः ॥ ७७.२५ ॥

वह केतु, केतुमालों से सम्बद्ध और देव-गन्धर्वों द्वारा सेवित, वहाँ ‘केतुमाल’ नाम से प्रसिद्ध कहा जाता है। हे विप्रश्रेष्ठो, अब उस नाम और उसके कार्य का निरुक्त अर्थ समझो।

Verse 26

क्षीरोदमथने वृत्ते माला स्कन्धे निवेशिताः । इन्द्रेण चैत्यकेतोस्तु केतुमालस्ततः स्मृतः । तेन तच्छिह्नितं वर्षं केतुमालेति विश्रुतम् ॥ ७७.२६ ॥

क्षीरसागर-मंथन पूर्ण होने पर उसके कंधे पर मालाएँ रखी गईं। तब इन्द्र ने चैत्यकेतु को ‘केतुमाल’ कहा; इसलिए उस चिह्न से युक्त वह वर्ष ‘केतुमाल’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

Verse 27

सुपार्श्वस्योत्तरे शृङ्गे वटो नाम महाद्रुमः । न्यग्रोधो विपुलस्कन्धो यस्त्रियोजनमण्डलः ॥ ७७.२७ ॥

सुपार्श्व पर्वत की उत्तरी चोटी पर ‘वट’ नाम का एक महान वृक्ष है—वह विशाल तने वाला न्यग्रोध (बरगद) है, जिसका फैलाव तीन योजन परिमाण का है।

Verse 28

माल्यदामकलापैश्च विविधैस्तु समन्ततः । शाखाभिर्लम्बमानाभिः शोभितः सिद्धसेवितः ॥ ७७.२८ ॥

वह चारों ओर अनेक प्रकार की मालाओं और पुष्प-गुच्छों से अलंकृत है; लटकती हुई शाखाओं से शोभित है और सिद्धगण उसकी सेवा तथा वंदना करते हैं।

Verse 29

प्रलम्बकुम्भसदृशैर्हेमवर्णैः फलैः सदा । स ह्युत्तरकुरूणां तु केतुवृक्षः प्रकाशते ॥ ७७.२९ ॥

सदा लटकते हुए घड़े के समान और स्वर्णवर्ण फलों से युक्त वह ‘केतुवृक्ष’ उत्तरकुरुओं के देश में प्रकट होता है—ऐसा कहा गया है।

Verse 30

सनत्कुमारावरजाः मानसाः ब्रह्मणः सुताः । सप्त तत्र महाभागाः कुरवो नाम विश्रुताः ॥ ७७.३० ॥

वहाँ सनत्कुमार के अनुज—ब्रह्मा के मानस पुत्र—सात महाभाग थे, जो ‘कुरव’ नाम से प्रसिद्ध थे।

Verse 31

तत्र स्थिरगतैर्ज्ञानैर्विरजस्कैर्महात्मभिः । अक्षयः क्षयपर्यन्तो लोकः प्रोक्तः सनातनः ॥ ७७.३१ ॥

वहाँ स्थिर और सुसंस्थित ज्ञान वाले, रजोगुण-रहित महात्माओं के कारण एक सनातन लोक कहा गया है—अक्षय, परंतु प्रलय की सीमा तक विस्तृत।

Verse 32

तेषां नामाङ्कितं वर्षं सप्तानां वै महात्मनाम् । दिवि चेह च विख्याता उत्तरा: कुरवः सदा ॥ ७७.३२ ॥

उन सात महात्माओं के नामों से वह वर्ष (प्रदेश) अंकित है; और उत्तरी कुरु स्वर्ग में भी और यहाँ (मनुष्यलोक में) भी सदा प्रसिद्ध हैं।

Inside Adhyaya 77

How it unfolds

  1. Where it opens

    Within the ongoing Varāha–Pṛthivī instruction cycle, Rudra continues a cosmographic teaching meant to stabilize the listener’s mental map of the sapta-dvīpa world by first fixing the axis (Meru) and then defining its limits (maryādā-parvatas).

  2. Central event

    Rudra enumerates Meru’s yojana-based dimensions and structural features (including its foundational spread and the imagery of four great supporting ‘feet’), then introduces the eight maryādā-parvatas (boundary mountains), beginning with Jaṭhara and Devakūṭa in the east, to show how space is delimited and held in order.

  3. Climax resolution

    The exposition culminates in the four directional mountains—Mandara (east), Gandhamādana (south), Vipula (west), Supārśva (north)—each crowned by a mahāvṛkṣa (Kadamba, Jambū, Aśvattha, Vaṭa/Nyagrodha). From these trees the chapter derives the names/identities of the surrounding varṣas (Bhadrāśva, Jambūdvīpa, Ketumāla, Uttarakuru) and explains patterned ‘flows’ such as Jāmbūnadī and Jāmbūnada-gold, presenting a balanced world-ecology grounded in stable geography.

Geographical context

Meru; maryādāparvatāḥ (boundary mountains, incl. Jaṭhara and Devakūṭa in the east); Mandara; Gandhamādana; Vipula; Supārśva; Bhadrāśva-varṣa; Ketumāla-varṣa; Uttarakuru; Jambūdvīpa; Jāmbūnadī (divine river); Jāmbūnada (gold).

Ritual instructions

  • BenefitThe chapter functions as cosmographic instruction rather than a prescriptive rite; its implied ‘benefit’ is contemplative orientation—understanding cosmic order (maryādā/limits, directional balance, and stable supports) as a model for equilibrium in the inhabited world.

The narrative frame

  • Rudra (within the Varāha–Pṛthivī instructional frame)Pṛthivī (Earth), with Varāha as the overarching narrator/teacher in the continuing frame · Didactic, enumerative, and cartographic (measurement-and-direction driven)

The emotional journey

  • Dominant RasaAdbhuta (wonder) with a strong Śānta (contemplative) undertone
  • Emotional ProgressionCuriosity about the world’s structure → awe at Meru’s scale and the boundary-mountain ordering → contemplative satisfaction as directions, trees, names, and resource-flows lock into a coherent, balanced cosmogram

Planning a pilgrimage

  • Visit FeasibilityPrimarily mythic-cosmographic (Meru and associated varṣas are not straightforwardly visitable as historical tirthas). For modern devotional travel, practitioners typically substitute ‘Meru’ symbolism via major Śiva/Viṣṇu temples, sacred mountains, or local ‘Meru-sthala’ traditions, but this chapter itself does not anchor a specific terrestrial tirtha itinerary.

Frequently Asked Questions

Rather than prescribing social rules, the chapter’s internal logic emphasizes cosmic and terrestrial order: Meru and its boundary mountains function as an explanatory model for stability, delimitation, and balanced spatial organization. This can be read as a cosmographic analogue to maintaining equilibrium in the inhabited world.

No tithis, lunar phases, vrata timings, or seasonal ritual markers are specified in the provided verses. The content is primarily spatial and descriptive (measurements, directions, and regional naming).

It uses earth-support imagery: Meru is described with four great supporting “feet,” and boundary mountains define limits that keep the world-system steady. The described riverine outflow (Jāmbūnadī) and resource generation (Jāmbūnada-gold) present a patterned ecology where flows and materials arise from stable geographies.

The passage references Rudra as the expositor and mentions Sanatkumāra and his younger brothers as mānasā sons of Brahmā, associated with the Kurus (Uttarakuru context). It also notes divine and semi-divine communities (deva, daitya, apsaras, gandharva, yakṣa, rākṣasa, guhya) as inhabitants/attendants in these regions.

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