
Trimūrti-aikya-nirdeśaḥ
Philosophical-Theology (Non-dual Triadic Hermeneutics)
इस अध्याय में वराह पुराण के उपदेश-प्रसंग में वराह पृथ्वी से कहते हुए एक गौण संवाद प्रस्तुत करते हैं। अगस्त्य रुद्र से पूछते हैं कि समय-समय पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव में किसकी प्रधानता मानी जाए। रुद्र विष्णु को परब्रह्म बताते हुए समझाते हैं कि शास्त्रों की त्रिविध भाषा कभी-कभी पाठकों को संप्रदायगत भेद में डाल देती है। दिव्य नाम, वैदिक पहचानें और यज्ञ की संरचनाएँ एक ही सत्य की समवेत अभिव्यक्तियाँ हैं। पक्षपात (पक्षपात) से धर्म-हानि और मोक्ष में बाधा होती है; सही समझ यही है कि देवता, वेद और यज्ञ-कर्म एक ही एकीकृत तत्त्व-व्यवस्था हैं।
Verse 1
श्रीवराह उवाच । सर्वज्ञं सर्वकर्त्तारं भवं रुद्रं पुरातनम् । प्रणम्य प्रयतोऽगस्त्यः पप्रच्छ परमेश्वरम् ॥ ७२.१ ॥
श्रीवराह बोले—सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, प्राचीन भवरूप रुद्र को प्रणाम करके, संयमित अगस्त्य ने परमेश्वर से प्रश्न किया।
Verse 2
अगस्त्य उवाच । भवान् ब्रह्मा च विष्णुश्च त्रयमेतत् त्रयी स्मृता । दीपोऽग्निर्दोपसंयोगैः सर्वशास्त्रेषु सर्वतः ॥ ७२.२ ॥
अगस्त्य बोले—आप, ब्रह्मा और विष्णु—यह त्रय ‘त्रयी’ के रूप में स्मरण किया जाता है। जैसे दीपक अपने उपादानों के संयोग से अग्नि द्वारा प्रकाशित होता है, वैसे ही यह तत्त्व सभी शास्त्रों में सर्वत्र प्रतिपादित है॥
Verse 3
कस्मिन् प्रधानः भगवान् काले कस्मिन्नधोक्षजः । ब्रह्मा वा एतदाचक्ष्व मम देव त्रिलोचन ॥ ७२.३ ॥
किस समय भगवान् प्रधान (शासक तत्त्व) होते हैं, और किस समय अधोक्षज (परात्पर) प्रधान होते हैं? हे त्रिलोचन देव, ब्रह्मा की भाँति यह मुझे यथार्थ बताइए॥
Verse 4
रुद्र उवाच । विष्णुरेव परं ब्रह्म त्रिभेदमिह पठ्यते । वेदसिद्धान्तमार्गेषु तन्न जानन्ति मोहतः ॥ ७२.४ ॥
रुद्र बोले—विष्णु ही परम ब्रह्म हैं; यहाँ उसका त्रिविध भेद से पाठ किया जाता है। पर वेद-सिद्धान्त के मार्गों में भी लोग मोहवश उस सत्य को नहीं जानते॥
Verse 5
विषप्रवेशने धातुस्तत्र श्नु प्रत्ययादनु । विष्णुर्यः सर्वदेवेषु परमात्मा सनातनः ॥ ७२.५ ॥
‘विष्’ धातु का अर्थ प्रवेश/व्याप्ति है; वहाँ ‘श्नु’ प्रत्यय के अनुसार (विष्णु शब्द बनता है)। जो विष्णु हैं—समस्त देवों में व्याप्त—वे सनातन परमात्मा हैं॥
Verse 6
योऽयं विष्णुस्तु दशधा कीर्त्यते चैैकधा द्विजाः । स आदित्यो महाभाग योगैश्वर्यसमन्वितः ॥ ७२.६ ॥
हे द्विजो, यह विष्णु दस प्रकार से भी कीर्तित होते हैं और एक (अद्वितीय) रूप से भी। वही महाभाग आदित्य हैं, योग-ऐश्वर्य से सम्पन्न॥
Verse 7
स देवकार्याणि सदा कुरुते परमेश्वरः । मनुष्यभावमाश्रित्य स मां स्तौति युगे युगे । लोकमार्गप्रवृत्त्यर्थं देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ७२.७ ॥
वह परमेश्वर सदा देवताओं के कार्यों को सिद्ध करता है। मनुष्य-भाव धारण करके वह युग-युग में मेरी स्तुति करता है, ताकि लोक-मार्ग प्रवर्तित हो और देवकार्य का प्रयोजन पूर्ण हो।
Verse 8
अहं च वरदस्तस्य द्वापरे द्वापरे द्विज । अहं च तं सदा स्तौमि श्वेतद्वीपे कृते युगे ॥ ७२.८ ॥
और हे द्विज! द्वापर-युग में—हाँ, द्वापर-युग में—मैं उसका वरदाता भी था। और कृत-युग में श्वेतद्वीप पर मैं सदा उसकी स्तुति करता हूँ।
Verse 9
सृष्टिकाले चतुर्वक्त्रं स्तौमि कालो भवामि च । ब्रह्मा देवासुरा स्तौति मां सदा तु कृते युगे । लिङ्गमूर्तिं च मां देवा यजन्ते भोगकाङ्क्षिणः ॥ ७२.९ ॥
सृष्टि-काल में मैं चतुर्वक्त्र (ब्रह्मा) की स्तुति करता हूँ और स्वयं काल भी बन जाता हूँ। कृत-युग में ब्रह्मा देवों और असुरों सहित सदा मेरी स्तुति करता है। और भोग की कामना वाले देव मुझे लिङ्ग-रूप में पूजते हैं।
Verse 10
सहस्रशीर्षकं देवं मनसा तु मुमुक्षवः । यजन्ते यं स विश्वात्मा देवो नारायणः स्वयम् ॥ ७२.१० ॥
मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक मन से उस सहस्रशीर्ष देव का पूजन करते हैं; वही विश्वात्मा देव—स्वयं नारायण है।
Verse 11
ब्रह्मयज्ञेन ये नित्यं यजन्ते द्विजसत्तमाः । ते ब्रह्माणं प्रीणयन्ति वेदो ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥ ७२.११ ॥
जो श्रेष्ठ द्विज नित्य ब्रह्मयज्ञ द्वारा पूजन करते हैं, वे ब्रह्मा को प्रसन्न करते हैं; क्योंकि वेद को ही ब्रह्मा कहा गया है।
Verse 12
नारायणः शिवो विष्णुः शङ्करः पुरुषोत्तमः । एतैस्तु नामभिर्ब्रह्म परं प्रोक्तं सनातनम् । तं च चिन्तामयं योगं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७२.१२ ॥
वह नारायण, शिव, विष्णु, शंकर और पुरुषोत्तम है। इन नामों से सनातन परम ब्रह्म का कथन होता है; और उसी को ज्ञानीजन चिन्तनमय योग कहते हैं।
Verse 13
पशूनां शमनं यज्ञे होमकर्म च यद्भवेत् । तदोमिति च विख्यातं तत्राहं संव्यवस्थितः ॥ ७२.१३ ॥
यज्ञ में पशुओं का शमन और जो होमकर्म होता है, वही ‘ॐ’ नाम से प्रसिद्ध है; और उसी में मैं दृढ़तापूर्वक स्थित हूँ।
Verse 14
कर्मवेदयुजां विप्र ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः । वयं त्रयोऽपि मन्त्राद्या नात्र कार्या विचारणा ॥ ७२.१४ ॥
हे विप्र, कर्म और वेद से युक्त जनों के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—हम तीनों ही मंत्रादि के अधिष्ठाता हैं; इसमें और विचार करने की आवश्यकता नहीं।
Verse 15
अहं विष्णुस्तथा वेदा ब्रह्म कर्माणि चाप्युत । एतत् त्रयं त्वेकमेव न पृथग्भावयेत् सुधीः ॥ ७२.१५ ॥
मैं विष्णु हूँ; वैसे ही वेद, ब्रह्म और कर्म भी (उसी के रूप हैं)। पर यह त्रय वास्तव में एक ही है; बुद्धिमान इसे पृथक् न माने।
Verse 16
योऽन्यथा भावयेदेतत् पक्षपातेन सुव्रत । स याति नरकं घोरं रौरवं पापपूरुषः ॥ ७२.१६ ॥
हे सुव्रत, जो कोई पक्षपात से इस तत्त्व को अन्यथा समझे, वह पापी पुरुष ‘रौरव’ नामक घोर नरक को प्राप्त होता है।
Verse 17
अहं ब्रह्मा च विष्णुश्च ऋग्यजुः साम एव च । नैतस्मिन् भेदमस्यास्ति सर्वेषां द्विजसत्तम ॥ ७२.१७ ॥
मैं ब्रह्मा हूँ और मैं ही विष्णु भी हूँ; मैं ऋग्, यजुः और साम वेद भी हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ, इनमें किसी प्रकार का भेद नहीं है।
The text instructs that Brahmā, Viṣṇu, and Rudra should not be treated as mutually opposed absolutes; instead, scriptural and ritual language expresses a single integrated reality. It frames sectarian partiality (pakṣapāta) as a cognitive-ethical error that distorts interpretation and undermines right understanding.
The chapter uses yuga markers rather than lunar/seasonal timing: it references Kṛta Yuga and Dvāpara Yuga to describe differing devotional roles and modes of praise (stuti). No tithi, nakṣatra, or seasonal calendrics are specified in this excerpt.
Direct ecological prescriptions are not explicit here; however, within the Varāha–Pṛthivī pedagogical frame, the chapter supports “terrestrial balance” indirectly by promoting non-partisan, integrative dharma: recognizing unity among deity, Veda, and yajña is presented as a stabilizing interpretive ethic that underwrites orderly social-ritual practice, which the Purāṇic worldview links to cosmic and terrestrial equilibrium.
Agastya is the named sage interlocutor who poses the inquiry, and Rudra (as Mahādeva/Trilocana in address) provides the response. No royal genealogies, dynastic lineages, or administrative figures appear in this excerpt.