
Śauryavrata-vidhi (Durgā-navamī-vrata)
Ritual-Manual
वराहपुराण के उपदेश-प्रसंग में वराह पृथ्वी को बताते हैं और भीतर से अगस्त्य मुनि का वचन आता है। वे ‘शौर्यव्रत’ की विधि कहते हैं, जो भय को साहस में बदलकर खोया हुआ मान-प्रतिष्ठा और राज्य पुनः दिलाने वाला है। यह व्रत आश्वयुज मास की शुद्धा नवमी को प्रति वर्ष किया जाता है—सप्तमी को संकल्प, अष्टमी को संयम-नियम, और नवमी को पिष्ट (आटे का नैवेद्य) अर्पण, ब्राह्मण-भोजन तथा दुर्गा की महाभागा, महामाया, महाप्रभा रूप में पूजा। एक वर्ष तक इसका अनुष्ठान कर अंत में कुमारियों का पूजन, वस्त्र-आभूषण आदि दान, और उनसे क्षमा-याचना बताई गई है। फल—राज्य की पुनर्प्राप्ति, ज्ञान-लाभ और शौर्य की प्राप्ति।
Verse 1
अगस्त्य उवाच । अथापरं प्रवक्ष्यामि शौर्यव्रतमनुत्तमम् । येन भीरोरपि महच्छौर्यं भवति तत्क्षणात् ॥ ६४.१ ॥
अगस्त्य बोले—अब मैं आगे अनुपम शौर्य-व्रत का वर्णन करूँगा, जिससे भयभीत व्यक्ति में भी उसी क्षण महान साहस उत्पन्न हो जाता है।
Verse 2
मासि चाश्वयुजे शुद्धां नवमीं समुपोषयेत् । सप्तम्यां कृतसंकल्पः स्थित्वाऽष्टम्यां निरोधनः ॥ ६४.२ ॥
आश्वयुज मास में शुद्ध नवमी को उपवास करना चाहिए। सप्तमी को संकल्प करके, अष्टमी को स्थित रहकर संयम का पालन करे।
Verse 3
नवम्यां पारयेत् पिष्टं प्रथमं भक्तितो नृप । ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या देवीं चैव तु पूजयेत् । दुर्गां देवीं महाभागां महामायां महाप्रभाम् ॥ ६४.३ ॥
नवमी को, हे नृप, भक्तिपूर्वक पहले पिष्ट-नैवेद्य से व्रत का पारण करे। भक्तिभाव से ब्राह्मणों को भोजन कराए और देवी दुर्गा—महाभागा, महामाया, महाप्रभा—की पूजा करे।
Verse 4
एवं संवत्सरं यावदुपोष्येति विधानतः । व्रतान्ते भोजयेद्धीमान् यथाशक्त्या कुमारिकाः ॥ ६४.४ ॥
इस प्रकार विधिपूर्वक एक वर्ष तक उपवास-व्रत का पालन करके, व्रत के अंत में बुद्धिमान व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार कुमारियों को भोजन कराए।
Verse 5
हेमवस्त्रादिभिस्तास्तु भूषयित्वा तु शक्तितः । पश्चात्क्षमापयेत् तास्तु देवी मे प्रीयतामिति ॥ ६४.५ ॥
फिर उन्हें यथाशक्ति स्वर्ण, वस्त्र आदि से अलंकृत करके, बाद में उनसे क्षमा याचना करे—“देवी मुझ पर प्रसन्न हों।”
Verse 6
एवं कृते भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं न संशयः । अविद्यो लभते विद्यां भीतः शौर्यं च विदन्ति ॥ ६४.६ ॥
ऐसा करने पर राज्य से भ्रष्ट राजा भी निःसंदेह अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। अविद्वान विद्या पाता है और भयभीत भी शौर्यवान् के रूप में प्रसिद्ध होते हैं।
The text frames courage and social stability as cultivable through disciplined self-restraint (upavāsa/nirodha), reciprocal giving (feeding brāhmaṇas and honoring kumārikās), and accountability through kṣamāpana (asking forgiveness), linking inner transformation to socially restorative action.
The observance is set in the month of Āśvayuja. It centers on the śuddhā navamī, with a sequence across saptamī (saṃkalpa), aṣṭamī (nirodana/restraint), and navamī (offering, feeding brāhmaṇas, Durgā-pūjā). It is repeated according to rule for one year (saṃvatsara).
Environmental stewardship is not explicit in these verses; however, within the Varāha–Pṛthivī framework the chapter can be read as indirect ‘earth-ethics’ by promoting regulated consumption (fasting/restraint) and redistributive hospitality, practices that conceptually reduce excess and reinforce communal sustainability rather than extraction.
Agastya is the named authoritative sage-speaker. The text also references social categories and roles—nṛpa (king), brāhmaṇas, and kumārikās—without specifying dynastic lineages or particular historical rulers.