
Saubhāgyakaraṇa-vrata-vidhiḥ
Ritual-Manual (Vrata and Dāna Prescriptions)
इस अध्याय में स्त्री‑पुरुष दोनों के लिए सौभाग्य बढ़ाने वाले ‘सौभाग्यकरण‑व्रत’ की विधि बताई गई है। फाल्गुन शुक्ल तृतीया से नक्त‑व्रत, शौच‑सत्य आदि नियमों सहित आरम्भ कर, हरि‑श्री की या रुद्र‑उमा/गौरी की संयुक्त उपासना का विधान है और शास्त्रार्थ से उनके अविभाज्यत्व पर बल दिया गया है। अंग‑न्यास सदृश नामक्रम, गन्ध‑पुष्प अर्पण तथा मधु, घृत और तिल से होम का निर्देश मिलता है। मासानुसार आहार‑नियमों के बाद माघ शुक्ल तृतीया को स्वर्ण‑प्रतिमाओं का दान और छह पात्रों का सुव्यवस्थित दान योग्य ब्राह्मण को देकर अनेक जन्मों तक समृद्धि‑सौभाग्य का फल कहा गया है।
Verse 1
अगस्त्य उवाच । अतः परं महाराज सौभाग्यकरणं व्रतम् । शृणु येनाशु सौभाग्यं स्त्रीपुंसामुपजायते ॥ ५८.१ ॥
अगस्त्य बोले—हे महाराज, अब आगे सौभाग्य कराने वाले व्रत को सुनो, जिससे स्त्री-पुरुषों को शीघ्र ही सौभाग्य और कल्याण प्राप्त होता है।
Verse 2
फाल्गुनस्य तु मासस्य तृतीया शुक्लपक्षतः । उपासितव्या नक्तेन शुचिना सत्यवादिना ॥ ५८.२ ॥
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रात्रि-उपवास सहित, शुद्ध और सत्यवादी होकर उपासना करनी चाहिए।
Verse 3
सश्रीकं च हरिं पूज्य रुद्रं वा चोमया सह । या श्रीः सा गिरिजा प्रोक्ता यो हरिः स त्रिलोचनः ॥ ५८.३ ॥
श्री सहित हरि की, अथवा उमा सहित रुद्र की पूजा करके यह समझना चाहिए कि जिसे ‘श्री’ कहा गया है वह गिरिजा (पार्वती) हैं, और जिसे ‘हरि’ कहा गया है वह त्रिलोचन (शिव) हैं।
Verse 4
एवं सर्वेषु शास्त्रेषु पुराणेषु च पठ्यते । एतस्मादन्यथा यस्तु ब्रूते शास्त्रं पृथक्तया ॥ ५८.४ ॥
ऐसा ही सब शास्त्रों और पुराणों में पढ़ाया गया है। पर जो इससे भिन्न होकर शास्त्र का पृथक्-पृथक् (विरोधी) रूप से वर्णन करता है, वह विपरीत व्याख्या करता है।
Verse 5
रुद्रो जनानां मर्त्यानां काव्यं शास्त्रं न तद्भवेत् । विष्णुं रुद्रकृतं ब्रूयात् श्रीर्गौरी न तु पार्थिव । तन्नास्तिकानां मर्त्यानां काव्यं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥ ५८.५ ॥
मर्त्य जनों के लिए रुद्रकृत कहे जाने वाले काव्य को शास्त्र नहीं मानना चाहिए। जो यह कहे कि विष्णु रुद्र से उत्पन्न हुए, या कि श्री ही गौरी हैं, हे पार्थिवी, तो विवेकी जन उसे नास्तिक मर्त्यों का काव्य समझें, शास्त्र नहीं।
Verse 6
एवं ज्ञात्वा सलक्ष्मीकं हरिं सम्पूज्य भक्तितः । मन्त्रेणानेन राजेन्द्र ततस्तं परमेश्वरम् ॥ ५८.६ ॥
ऐसा जानकर, हे राजेन्द्र, लक्ष्मी सहित हरि की भक्ति से सम्यक् पूजा करके, फिर इस मंत्र से उस परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए।
Verse 7
गम्भीरायेति पादौ तु सुभगायेति वै कटिम् । उदरं देवदेवेति त्रिनेत्रायेति वै मुखम् । वाचस्पतये च शिरो रुद्रायेति च सर्वतः ॥ ५८.७ ॥
‘गम्भीराय’—इस मंत्र से पादों का, ‘सुभगाय’—इससे कटि का, ‘देवदेवाय’—इससे उदर का, ‘त्रिनेत्राय’—इससे मुख का, ‘वाचस्पतये’—इससे शिर का, और ‘रुद्राय’—इससे सर्वतः (चारों ओर/समग्र रूप से) न्यास करना चाहिए।
Verse 8
एवमभ्यर्च्य मेधावी विष्णुं लक्ष्म्या समन्वितम् । हरं वा गौरीसंयुक्तं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् ॥ ५८.८ ॥
इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष क्रम से गंध, पुष्प आदि से लक्ष्मी सहित विष्णु की, अथवा गौरी सहित हर (शिव) की विधिपूर्वक पूजा करे।
Verse 9
ततस्तस्याग्रतो होमं कारयेन्मधुसर्पिषा । तिलैः सह महाराज सौभाग्यपतयेति च ॥ ५८.९ ॥
तत्पश्चात्, हे महाराज, उसके सामने मधु और घृत तथा तिल सहित ‘सौभाग्यपतये’ इस मंत्र से हवन कराए।
Verse 10
ततस्त्वक्षारविरसं निस्नेहं धरणीतले । गोधूमान्नं तु भुञ्जीत कृष्णेप्येवं विधिः स्मृतः ॥ आषाढादिद्वितीयां तु पारणं तत्र भोजनम् ॥ ५८.१० ॥
फिर भूमि पर बैठकर क्षार-लवण रहित, तीखे रस से रहित और तेल-घी से रहित गेहूँ का अन्न खाए; कृष्णपक्ष में भी यही विधि कही गई है। आषाढ़ से आरम्भ होने वाली द्वितीया को उसी भोजन से पारण करे।
Verse 11
यवअन्नं तु ततः पश्चात् कार्त्तिकादिषु पार्थिव । श्यामाकं तत्र भुञ्जीत त्रीन् मासान् नियतः शुचिः ॥ ५८.११ ॥
फिर उसके बाद, हे पार्थिव, कार्त्तिक आदि महीनों में (यव/जौ के स्थान पर) वहाँ श्यामाक-अन्न का सेवन करे, और तीन मास तक संयमित व शुद्ध रहे।
Verse 12
ततो माघसिते पक्षे तृतीयायां नराधिप । सौवर्णां कारयेद् गौरीं रुद्रं चैक्त्र बुद्धिमान् ॥ ५८.१२ ॥
फिर, हे नराधिप, माघ शुक्ल पक्ष की तृतीया को बुद्धिमान् पुरुष गौरी की स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाए और रुद्र की भी, तथा दोनों को एक साथ स्थापित करे।
Verse 13
सलक्ष्मीकं हरिं चापि यथाशक्त्या प्रसन्नधीः । ततस्तं ब्राह्मणे दद्यात पात्रभूते विचक्षणे ॥ ५८.१३ ॥
प्रसन्न और शुद्ध बुद्धि से, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, लक्ष्मी सहित हरि का भी अर्पण करे। तत्पश्चात् उस (प्रतिमा/दान) को योग्य पात्र, विवेकी ब्राह्मण को दे।
Verse 14
अन्नेन हीने वेदानां पारगे साधुवर्तिनि । सदाचार इति वा दद्यादल्पवित्ते विशेषतः ॥ ५८.१४ ॥
अन्न के अभाव में भी, यदि कोई वेदों का पारंगत और साधु-आचरण वाला हो, तो भी—विशेषकर अल्प धन होने पर—‘सदाचार’ के नाम से दान अवश्य दे।
Verse 15
षड्भिः पात्रैरुपेतं तु ब्राह्मणाय निवेदयेत् । एकं मधुमयं पात्रं द्वितीयं घृतपूरितम् ॥ ५८.१५ ॥
छः पात्रों से युक्त उस दान को ब्राह्मण को निवेदित करे। एक पात्र मधु से भरा हो और दूसरा घृत (घी) से परिपूर्ण हो।
Verse 16
तृतीयं तिलतैलस्य चतुर्थं गुडसंयुतम् । पञ्चमं लवणैः पूर्णं षष्ठं गोक्षीरसंयुतम् ॥ ५८.१६ ॥
तीसरा (पात्र) तिल के तेल का हो, चौथा गुड़ से युक्त हो। पाँचवाँ लवण (नमक) से भरा हो और छठा गोदुग्ध (गाय के दूध) से युक्त हो।
Verse 17
एतानि दत्त्वा पात्राणि सप्तजन्मान्तरं भवेत् । सुभगो दर्शनीयश्च नारी वा पुरुषोऽपि वा ॥ ५८.१७ ॥
इन पात्रों को दान करके, सात जन्मों तक स्त्री हो या पुरुष—भाग्यवान और दर्शनीय (सुंदर) होता है।
The text instructs disciplined observance (vrata) grounded in purity and truthfulness, and it advances a hermeneutic claim that worship of Hari with Śrī and Rudra with Umā/Gaurī should not be treated as mutually exclusive; it labels separationist readings as non-authoritative within its stated “śāstric” framework.
The observance begins on Phālguna śukla tṛtīyā with nakta practice. A later completion/ritual gift is specified on Māgha śukla tṛtīyā. Intermediate month markers include Āṣāḍha (for pāraṇa/breaking the regimen), and dietary notes extending through Kārttika and subsequent months.
Although Pṛthivī is not directly invoked in the verses provided, the chapter encodes a model of regulated consumption—grain choices and restrictions sequenced by months—alongside calendrical alignment. In an ecological-ethical reading, such restraint can be mapped as a Purāṇic strategy for stabilizing human behavior within seasonal cycles, indirectly supporting terrestrial balance.
The speaking authority is Agastya (agastya uvāca), addressing a royal recipient (mahārāja/narādhipa/rājendra). Deities referenced include Hari/Viṣṇu with Śrī (Lakṣmī) and Rudra/Śiva with Umā/Gaurī/Girijā, framed as an interpretive unity. A qualified brāhmaṇa recipient is described in terms of Vedic learning and conduct rather than a named lineage.