
Dharaṇīvrata-smṛtiḥ, Agastya-bhadrāśva-saṃvādaḥ
Ethical-Discourse (mokṣa-dharma framed through allegorical cosmology)
दुर्वासा द्वारा परम धरणी-व्रत के कथन के बाद वराह पुनः उपदेश देते हैं। वे सत्यतपा के पुष्पभद्रा नदी के निकट हिमवत्-प्रदेश, चित्राशिला शिला और भद्रवट वटवृक्ष के पास जाने का वर्णन करते हैं। पृथिवी कहती है कि उसने अनेक कल्पों तक यह प्राचीन व्रत किया, पर उसे भूल गई थी; वराह की कृपा से उसे जातिस्मरता होकर स्मृति लौट आती है और वह अगस्त्य के राजा भद्राश्व के पास लौटने की बात पूछती है। वराह बताते हैं कि भद्राश्व ने अगस्त्य का सत्कार कर पूछा—कर्मबन्ध और संसार कैसे कटते हैं, तथा देहधारी और अदेह अवस्थाओं में शोक से कैसे बचा जाए। अगस्त्य एक रूपक कथा आरम्भ करते हैं: एक गोपाल-राजा समुद्र के पास जाकर सर्पों से भरे वन में प्रवेश करता है और त्रिवर्ण तथा अनेक प्राणियों से घिर जाता है—यह गुणों/तत्त्वों और देह के जाल में बन्धन का संकेत है, जिससे मुक्ति का उपदेश आगे खुलता है।
Verse 1
श्रीवराह उवाच । श्रुत्वा दुर्वाससो वाक्यं धरणीव्रतमुत्तमम् । ययौ सत्यतपाः सद्यो हिमवत्पार्श्वमुत्तमम् ॥ ५१.१ ॥
श्रीवराह बोले—दुर्वासा के मुख से धरणी-व्रत का उत्तम उपदेश सुनकर सत्यतपा तुरंत ही हिमवत् (हिमालय) के परम श्रेष्ठ प्रदेश की ओर चला गया।
Verse 2
पुष्पभद्रा नदी यत्र शिला चित्रशिला तथा । वटो भद्रवटो यत्र तत्र तस्याश्रमो बभौ । तत्रोपरि महत्तस्य चरितं सम्भविष्यति ॥ ५१.२ ॥
जहाँ पुष्पभद्रा नदी है, और जहाँ शिला तथा चित्रशिला नामक शिलाएँ हैं; जहाँ भद्रवट नाम का वट-वृक्ष है—वहीं उसका आश्रम बना। उसी स्थान पर उसके महान चरित्र का प्रसंग घटित होगा।
Verse 3
धरण्युवाच । बहुकल्पसहस्राणि व्रतस्यास्य सनातन । मया कृतस्य तपस्तन्मया विस्मृतं प्रभो ॥ ५१.३ ॥
धरणी बोली—हे सनातन प्रभो, अनेक सहस्र कल्पों तक इस प्राचीन व्रत के संबंध में जो तप मैंने किया था, वह मुझे भूल गया है।
Verse 4
इदानीं त्वत्प्रसादेन स्मरणं प्राक्तनं मम । जातं जातिस्मरा चास्मि विषोका परमेश्वर ॥ ५१.४ ॥
अब आपके प्रसाद से मेरी पूर्व-स्मृति जाग उठी है। हे परमेश्वर, मैं जातिस्मरा (पूर्वजन्म-स्मरण करने वाली) हो गई हूँ और शोक से रहित हूँ।
Verse 5
यदि नाम परं देव कौतुकं हृदि वर्तते । अगस्त्यः पुनरागत्य भद्राश्वस्य निवेशनम् । यच्चकार स राजा च तन्ममाचक्ष्व भूधर ॥ ५१.५ ॥
यदि, हे परम देव, आपके हृदय में जिज्ञासा है, तो हे भूधर, बताइए कि अगस्त्य भद्राश्व के निवास में लौटकर क्या करने लगे और उस राजा ने भी क्या किया।
Verse 6
श्रीवराह उवाच । प्रत्यागतं ऋषिं दृष्ट्वा भद्राश्वः श्वेतवाहनः । वरासनगतं दृष्ट्वा कृत्वा पूजां विशेषतः । अपृच्छन् मोक्षधर्माख्यं प्रश्नं सकलधारिणि ॥ ५१.६ ॥
श्रीवराह बोले—लौट आए ऋषि को देखकर श्वेतवाहन भद्राश्व ने उन्हें श्रेष्ठ आसन पर विराजमान देखा; विशेष पूजन करके, हे सर्वधारिणि, उसने ‘मोक्ष-धर्म’ नामक प्रश्न पूछा।
Verse 7
भद्राश्व उवाच । भगवन् कर्मणा केन छिद्यते भवसंसृतिः । किं वा कृत्वा न शोचन्ति मूर्तामूर्तोपपत्तिषु ॥ ५१.७ ॥
भद्राश्व बोला—हे भगवन्, किस कर्म से भव-संसार की परिक्रमा कट जाती है? या क्या करके प्राणी मूर्त और अमूर्त जन्मों में शोक नहीं करते?
Verse 8
अगस्त्य उवाच । शृणु राजन् कथां दिव्यां दूरासन्नव्यवस्थिताम् । दृश्यादृश्यविभागोत्थां समाहितमना नृप ॥ ५१.८ ॥
अगस्त्य बोले—हे राजन्, दूर और निकट में स्थित, दृश्य और अदृश्य के विभाग से उत्पन्न यह दिव्य कथा सुनिए; हे नृप, मन को एकाग्र रखिए।
Verse 9
नाहो न रात्रिर्न दिशोऽदिशश्च न द्यौर्न देवा न दिनं न सूर्यः । तस्मिन् काले पशुपालेति राजा स पालयामास पशूननेकान् ॥ ५१.९ ॥
न वहाँ दिन था, न रात; न दिशाएँ थीं, न विदिशाएँ; न स्वर्ग था, न देवता; न दिन का प्रकाश था, न सूर्य। उस समय ‘पशुपाल’ नामक राजा अनेक पशुओं की रक्षा करता था।
Verse 10
तान् पालयन् स कदाचिद् दिदृक्षुः पूर्वं समुद्रं च जगाम तूर्णम् । अनन्तपारस्य महोदधेस्तु तीरे वनं तत्र वसन्ति सर्पाः ॥ ५१.१० ॥
उनकी रक्षा करते हुए वह एक बार पूर्वी समुद्र को देखने की इच्छा से शीघ्र वहाँ गया। अनन्त पार वाले महान् समुद्र के तट पर एक वन है; वहाँ सर्प निवास करते हैं।
Verse 11
अष्टौ द्रुमाः कामवहा नदी च तुर्यक् चोर्ध्वं बभ्रमुस्तत्र चान्ये । पञ्च प्रधानाः पुरुषास्तथैकां स्त्रियं बिभ्रते तेजसा दीप्यमानाम् ॥ ५१.११ ॥
आठ कामना-पूर्ति करने वाले वृक्ष, और एक नदी, तथा चौथे प्रकार से चलने वाले प्राणी, और अन्य ऊपर की ओर चलने वाले—वहाँ विचरते थे। और पाँच प्रधान पुरुष एक ही स्त्री को, जो तेज से दीप्त थी, धारण करते थे।
Verse 12
सा अपि स्त्री स्वे वक्षसि धारयन्ती सहस्रसूर्यप्रतिमं विशालम् । तस्याधरस्त्रिर्विकारस्त्रिवर्ण-स्तं राजानं पश्य परिभ्रमन्तम् ॥ ५१.१२ ॥
वह स्त्री भी अपने वक्ष पर सहस्र सूर्यों के समान विशाल वस्तु धारण किए हुए थी। उस राजा को देखो—जिसका अधर त्रिविध विकार वाला और त्रिवर्ण है—जो इधर-उधर भ्रमण कर रहा है।
Verse 13
तूष्णीम्भूता मृतकल्पा इवासन् नृपोऽप्यसौ तद्वनं संविवेश । तस्मिन् प्रविष्टे सर्व एते विविशु-र्भयादैक्यं गतवन्तः क्षणेन ॥ ५१.१३ ॥
वे मौन हो गए, मानो मृतप्राय हों; और वह राजा भी उस वन में प्रविष्ट हुआ। उसके प्रवेश करते ही वे सब भी भीतर गए—भय से क्षणभर में एकता को प्राप्त हो गए।
Verse 14
तैः सर्पैः स नृपो दुर्विनीतैः संवेष्टितो दस्युभिश्चिन्तयानः । कथं चैतेन भविष्यन्ति येन कथं चैते संसृताः सम्भवेयुः ॥ ५१.१४ ॥
उन दुर्विनीत सर्पों और दस्युओं से घिरा हुआ वह राजा चिंतित होकर मन में विचार करने लगा—“ये लोग इसके कारण कैसे जीवित रहेंगे? और संसार-चक्र में फँसे ये कैसे शुभ परिणति को प्राप्त होंगे?”
Verse 15
एवं राज्ञश्चिन्तयतस्त्रिवर्णः पुरुषः परः । श्वेतं रक्तं तथा कृष्णं त्रिवर्णं धारयन्नरः ॥ ५१.१५ ॥
राजा जब ऐसे चिंतन कर रहा था, तब एक परात्पर त्रिवर्ण पुरुष प्रकट हुआ—जो श्वेत, रक्त और कृष्ण, इन तीनों वर्णों को धारण किए था।
Verse 16
सा संज्ञां कृतवान् मह्यमपरोऽथ क्व यास्यसि । एवं तस्य ब्रुवाणस्य महन्नाम व्यजायत ॥ ५१.१६ ॥
“उसने मेरे लिए एक संज्ञा (नाम) ठहरा दी है; पर अब दूसरा कहाँ जाएगा?” ऐसा कहते हुए उसके लिए एक महान नाम प्रकट हो गया।
Verse 17
तेनापि राजा संवृतः स बुध्यस्वेति चाब्रवीत् । एवमुक्ते ततः स्त्री तु तं राजानं रुरोध ह ॥ ५१.१७ ॥
उससे भी राजा रुक गया; और उसने कहा, “समझो (सावधान होकर जानो)।” ऐसा कहे जाने पर वह स्त्री उस राजा को रोकने लगी।
Verse 18
मायाततं तं मा भैष्ट ततोऽन्यः पुरुषो नृपम् । संवेष्ट्य स्थितवान् वीरस्ततः सर्वेश्वरेश्वरः ॥ ५१.१८ ॥
“माया से फैलाए गए उस (प्रपंच) से मत डरो।” तब दूसरा पुरुष—वीर, सर्वेश्वरों का ईश्वर—राजा को घेरकर (रक्षा करके) वहाँ खड़ा रहा।
Verse 19
ततोऽन्ये पञ्च पुरुषा आगत्य नृपसत्तमम् । संविष्ट्य संस्थिताः सर्वे ततो राजा विरोधितः ॥ ५१.१९ ॥
तब पाँच अन्य पुरुष आए और श्रेष्ठ राजा के पास आकर, उसे घेरकर अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए; तब राजा का विरोध हुआ।
Verse 20
रुद्धे राजनि ते सर्वे एकीभूतास्तु दस्यवः । मथितुं शस्त्रमादाय लीना अन्योन्यं ततो भयात् ॥ ५१.२० ॥
राजा जब रोका गया, तब वे सब दस्यु एकजुट हो गए। मारने के लिए शस्त्र उठाकर, भय से वे फिर एक-दूसरे में छिप गए।
Verse 21
तैर्लीनैर्नृपतेर्वेश्म बभौ परमशोभनम् । अन्येषामपि पापानां कोटिः साग्राभवन्नृप ॥ ५१.२१ ॥
उनके लीन हो जाने से राजा का भवन अत्यन्त शोभायमान हो उठा। और हे नृप, अन्य पापों की भी एक करोड़ संख्या शेष सहित नष्ट हो गई।
Verse 22
गृहे भूसलिलं वह्निः सुखशीतश्च मारुतः । सावकाशानि शुभ्राणि पञ्चैकॊनगुणानि च ॥ ५१.२२ ॥
गृह में पृथ्वी और जल, अग्नि, तथा सुखद और शीतल वायु है; और आकाश से संबद्ध शुभ्र, पवित्र अवकाश भी हैं—इस प्रकार गुण पाँच हैं, और एक कम (गणना) भी कही गई है।
Verse 23
एकैव तेषां सुचिरं संवेष्ट्यासज्यसंस्थिता । एवं स पशुपालोऽसौ कृतवानञ्जसा नृप ॥ ५१.२३ ॥
उनसे लिपटकर और बँधी रहकर वह अकेली ही बहुत समय तक स्थित रही। इस प्रकार, हे नृप, उस ग्वाले ने यह कार्य सहज ही कर दिखाया।
Verse 24
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा रूपं च नृपतेर्मृधे । त्रिवर्णः पुरुषो राजन्नब्रवीद्राजसत्तमम् ॥ ५१.२४ ॥
उसकी वह फुर्ती और युद्ध में राजा का रूप देखकर, हे राजन्, त्रिवर्ण पुरुष ने राजश्रेष्ठ से कहा।
Verse 25
त्वत्पुत्रोऽस्मि महाराज ब्रूहि किं करवाणि ते । अस्माभिर्बन्धुमिच्छद्भिर्भवन्तं निश्चयः कृतः ॥ ५१.२५ ॥
मैं आपका पुत्र हूँ, हे महाराज; बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ? हम, जो बन्धु की खोज में थे, ने आपको ही चुनने का निश्चय किया है।
Verse 26
यदि नाम कृताः सर्वे वयं देव पराजिताः । एवमेव शरीरेषु लीनास्तिष्ठाम पार्थिव ॥ ५१.२६ ॥
यदि, हे देव, हम सब पराजित भी कर दिए गए हों, तो भी; हे पार्थिव, हम इसी प्रकार शरीरों में लीन होकर स्थित रहेंगे।
Verse 27
मर्य्येके तव पुत्रत्वं गते सर्वेषु सम्भवः । एवमुक्तस्ततो राजा तं नरं पुनरब्रवीत् ॥ ५१.२७ ॥
कुछ लोग वास्तव में आपके पुत्रत्व को प्राप्त हुए हैं; और जब वह सबमें व्यतीत हो जाता है, तब पुनः जन्म की सम्भावना रहती है। ऐसा कहे जाने पर राजा ने उस पुरुष से फिर कहा।
Verse 28
पुत्रो भवति मे कर्त्ता अन्येषामपि सत्तम । युष्मत्सुखैर्नरैर्भावैर्नाहं लिप्ये कदाचन ॥ ५१.२८ ॥
हे सत्तम, मेरा पुत्र दूसरों के लिए भी कर्ता बनता है; परन्तु तुम्हारे सुखों से उत्पन्न मानवीय भावों और अवस्थाओं से मैं कभी भी लिप्त नहीं होता।
Verse 29
एवमुक्त्वा स नृपतिस्तमात्मजमथाकरॊत् । तैर्विमुक्तः स्वयं तेषां मध्ये स विरराम ह ॥ ५१.२९ ॥
ऐसा कहकर उस नृपति ने तब अपने पुत्र का कार्य किया (उसकी ओर प्रवृत्त हुआ)। उनके द्वारा मुक्त होकर वह स्वयं उनके मध्य विश्राम को प्राप्त हुआ।
The chapter frames liberation inquiry (mokṣa-dharma) through Bhadrāśva’s questions to Agastya about how karmic action is severed and grief is avoided across states of embodiment. Agastya’s opening allegory—figures enveloping the king—functions as a model for how the person becomes bound by interrelated forces (often read as guṇas/elements and psychosomatic constituents), implying that discernment and disciplined conduct are prerequisites for release.
No explicit tithi, lunar phase, month, or seasonal timing is stated in the provided verses. Chronology is expressed instead through expansive temporal language (bahu-kalpa-sahasrāṇi) indicating repeated cycles across kalpas.
Environmental emphasis appears through the Dharaṇī-vrata frame: Pṛthivī’s vow is positioned as an ‘uttama’ practice tied to Earth (Dharaṇī) and remembered as a long-duration stewardship ethic. The narrative’s detailed placement in river, mountain, banyan, and coastal-forest ecologies foregrounds landscapes as moral-pedagogical settings, supporting a reading of terrestrial care as integral to dharma and memory of cosmic order.
The chapter references the sage Durvāsas (as prior speaker), Satyatapās (as an ascetic moving to Himavat), the sage Agastya (as instructor), and King Bhadrāśva Śvetavāhana (as royal interlocutor). No extended genealogy is supplied in the excerpt, but the king–sage instructional setting reflects a standard Purāṇic courtly pedagogy.