
Āṣāḍha-śukla-dvādaśī-vrata-vidhiḥ caturvyūha-nyāsaś ca
Ritual-Manual with Etiological Narrative (vrata-māhātmya)
वराह–पृथ्वी संवाद में दुर्वासा द्वारा बताए गए आषाढ़ शुक्ल द्वादशी-व्रत की विधि आती है। साधक गंध-पुष्प से पूजा कर पाद, कटि, जठर, उरः, भुजा, कण्ठ और शिर पर दिव्य नामों का न्यास करता है, फिर वासुदेव की स्वर्ण प्रतिमा को सनातन चतुर्व्यूह सहित स्थापित करता है। पूजा-स्थान के आगे वस्त्र से ढका जल-घट रखा जाता है और पूजित प्रतिमा वेदपाठी ब्राह्मण को दान दी जाती है। व्रत की महिमा हेतु पृथ्वी का अत्याचारपूर्ण भार का विलाप, देवताओं की नारायण से याचना और भगवान का यह निश्चय बताया गया है कि जो स्त्री पति सहित आषाढ़ शुक्ल उपवास करेगी, उसी के गर्भ से वे अवतार लेंगे; उदाहरण में वसुदेव-देवकी द्वादशी-व्रत से समृद्धि और संतान प्राप्त करते हैं।
Verse 1
दुर्वासा उवाच । आषाढेऽप्येवमेवं तु संकल्प्य विधिना नरः । अर्चयेत् परमं देवं गन्धपुष्पैरनेकशः ॥ ४६.१ ॥
दुर्वासा बोले—आषाढ़ मास में भी इसी प्रकार विधिपूर्वक संकल्प करके मनुष्य को परम देव का गन्ध और पुष्पों से बार-बार पूजन करना चाहिए।
Verse 2
वासुदेवाय पादौ तु कटिं संकर्षणाय च । प्रद्युम्नायेति जठरं अनिरुद्धाय वै उरः ॥ ४६.२ ॥
पादों को ‘वासुदेवाय’ अर्पित करे, कटि को ‘संकर्षणाय’; ‘प्रद्युम्नाय’ कहकर जठर को, और ‘अनिरुद्धाय’ कहकर वक्षस्थल को (समर्पित करे)।
Verse 3
चक्रपाणयेति भुजौ कण्ठं भूपतये तथा । स्वनाम्ना शङ्खचक्रौ तु पुरुषायेति वै शिरः ॥ ४६.३ ॥
दोनों भुजाओं को ‘चक्रपाणये’ (समर्पित करे), तथा कण्ठ को ‘भूपतये’। शंख और चक्र को उनके अपने नामों से (उच्चारित करे), और शिर को ‘पुरुषाय’ (समर्पित करे)।
Verse 4
एवमभ्यर्च्य मेधावी प्राग्वत्तस्याग्रतो घटम् । विन्यस्य वस्त्रसंयुक्तं तस्योपरि ततो न्यसेत् । काञ्चनं वासुदेवं तु चतुर्व्यूहं सनातनम् ॥ ४६.४ ॥
इस प्रकार पूजन करके बुद्धिमान साधक पूर्ववत् उसके आगे वस्त्र-सहित कलश स्थापित करे; और फिर उसके ऊपर सनातन चतुर्व्यूह-स्वरूप स्वर्णमय वासुदेव की प्रतिमा स्थापित करे।
Verse 5
तमभ्यर्च्य विधानॆन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । प्राग्वत् तं ब्राह्मणे दद्यात् वेदवादिनि सुव्रते । एवं नियमयुक्तस्य यत्पुण्यं तच्छृणुष्व मे ॥ ४६.५ ॥
विधिपूर्वक क्रमशः गन्ध, पुष्प आदि से उसकी पूजा करके, पूर्ववत् उस दान को वेदपाठी और उत्तम व्रतधारी ब्राह्मण को देना चाहिए। ऐसे नियमयुक्त पुरुष को जो पुण्य मिलता है, वह मुझसे सुनो।
Verse 6
वसुदेवोऽभवद् राजा यदुवंशविवर्धनः । देवकी तस्य भार्या तु समानव्रतधारिणी ॥ ४६.६ ॥
वसुदेव यदुवंश को बढ़ाने वाले राजा हुए। उनकी पत्नी देवकी भी समान व्रत-धारण करने वाली थीं।
Verse 7
सा त्वपुत्राऽभवत् साध्वी पतिधर्मपरायणा । तस्य कालेन महता नारदोऽभ्यगमद् गृहम् ॥ ४६.७ ॥
वह साध्वी पति-धर्म में तत्पर थी, परन्तु निःसंतान रही। बहुत समय बीतने पर नारद उनके घर आए।
Verse 8
वासुदेवेनासौ भक्त्या पूजितो वाक्यमब्रवीत् । वासुदेव शृणुष्व त्वं देवकार्यं ममानघ । श्रुत्वैतां च कथां शीघ्रमागतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥ ४६.८ ॥
वासुदेव ने भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की, तब उन्होंने कहा—“हे वासुदेव, हे निष्पाप, मेरे इस देवकार्य को सुनो। यह कथा सुनकर ही मैं शीघ्र तुम्हारे पास आया हूँ।”
Verse 9
पृथिवी देवसमितौ मया दृष्टा यदूत्तम । गत्वा च जल्पती भारं न शक्ताऽऽहितुं सुराः ॥ ४६.९ ॥
हे यदुओं में श्रेष्ठ, मैंने देवसभा में पृथ्वी को देखा। वहाँ जाकर वह अपना भार कहकर विलाप कर रही थी; देवगण उस भार को धारण करने में समर्थ न थे।
Verse 10
सौभकंसजरासन्धाः पुनर्नरक एव च । कुरुपाञ्चालभोजाश्च बलिनो दानवाः सुराः । पीडयन्ति समेतां मां तान् हनध्वं सुरोत्तमाः ॥ ४६.१० ॥
सौभ, कंस, जरासंध और फिर नरक भी; तथा कुरु, पाञ्चाल और भोज—ये बलवान दानव और सुरोपम शत्रु—एकत्र होकर मुझे पीड़ित कर रहे हैं। हे देवोत्तमों, उनका वध कीजिए।
Verse 11
एवमुक्ताः पृथिव्या ते देवा नारायणं गताः । मनसा स च देवेशः प्रत्यक्षस्तत्क्षणात् बभौ ॥ ४६.११ ॥
पृथिवी द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे देवगण नारायण के पास गए; और मन से स्मरण किए जाते ही वह देवेश उसी क्षण प्रत्यक्ष प्रकट हो गए।
Verse 12
उवाच च सुरश्रेष्ठः स्वयं कार्यमिदं सुराः । साधयामि न सन्देहो मर्त्यं गत्वा मनुष्यवत् ॥ ४६.१२ ॥
तब देवों में श्रेष्ठ ने कहा—“हे देवगण, यह कार्य मैं स्वयं सिद्ध करूँगा; इसमें संदेह नहीं। मैं मर्त्यलोक में जाकर मनुष्य के समान आचरण करूँगा।”
Verse 13
किंत्वाषाढे शुक्लपक्षे या नारी सह भर्तृणा । उपोष्यति मनुष्येषु तस्या गर्भे भवाम्यहम् ॥ ४६.१३ ॥
किन्तु मनुष्यों में जो स्त्री अपने पति सहित आषाढ़ के शुक्लपक्ष में उपवास करती है, उसी के गर्भ में मैं अवतरित होता हूँ।
Verse 14
एवमुक्त्वा गतो देवः स्वयं चाहमिहागतः । उपदिष्टं तु भवतोऽपुत्रस्य विशेषतः । उपोष्य लभते पुत्रं सहभार्यो न संशयः ॥ ४६.१४ ॥
“ऐसा कहकर देवता चले गए; और मैं स्वयं यहाँ आया हूँ। यह उपदेश विशेषतः आपके लिए है, जो पुत्रहीन हैं—पत्नी सहित उपवास करने से पुत्र प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं।”
Verse 15
एतां च द्वादशीं कृत्वा वासुदेवस्तथाप्तवान् । महतिं च श्रियं प्राप्तः पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ ४६.१५ ॥
इस द्वादशी-व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करके वासुदेव ने भी उसका फल पाया। उसने महान् समृद्धि प्राप्त की और पुत्र-पौत्रों से युक्त हुआ।
Verse 16
भुक्त्वा राज्यश्रियं सोऽथ गतः परमिकां गतिम् । एष ते विधिरुद्दिष्ट आषाढे मासि वै मुने ॥ ४६.१६ ॥
राज्य-लक्ष्मी का उपभोग करके वह फिर परम गति को प्राप्त हुआ। हे मुनि, आषाढ़ मास के लिए यह विधि तुम्हें बताई गई है।
The text presents disciplined ritual observance (niyama-yukta vrata) as a means of restoring order when Earth is overburdened by oppressive power. It links personal restraint (upavāsa), correct procedure (vidhi), and socially embedded redistribution (dāna to a vedavādin brāhmaṇa) to broader terrestrial stability, using Pṛthivī’s complaint as an ethical prompt to address imbalance.
The observance is specified for Āṣāḍha (Āṣāḍhe), particularly the śukla-pakṣa (bright fortnight). The narrative emphasizes fasting/observance by a woman together with her husband during this period, and the chapter highlights Dvādaśī as the key tithi through the statement that performing “etāṃ ca dvādaśīm” yields results.
It frames imbalance as Pṛthivī-bhāra—Earth’s inability to bear accumulated burdens caused by powerful destructive forces and rulers. The gods’ consultation and Nārāyaṇa’s decision to intervene translate terrestrial distress into a moral-ecological problem: when governance and power become excessive, corrective action (here, ritual discipline and divine intervention) is narrated as restoring equilibrium.
The chapter references the Yadu lineage (Yaduvaṃśa) through King Vasudeva and his wife Devakī, presented as exemplars of the vrata’s efficacy. It also names Nārada as the messenger who conveys the Earth-burden narrative, Durvāsas as the ritual instructor, and Nārāyaṇa as the divine agent responding to the crisis.
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