
Phālguṇa-śukla-dvādaśī-narasiṃha-pūjāvidhiḥ (Vatsa-nṛpa-kathā ca)
Ritual-Manual with Exemplary Royal Narrative (Vrata-Māhātmya)
वराह–पृथ्वी संवाद में दुर्वासा ऋषि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के नरसिंह-व्रत का विधान बताते हैं। उपवास के बाद हरि/नरसिंह की पूजा शरीर-अंगों के आवाहन सहित—पाद, जंघा, कटि, वक्ष, कंठ और शिर पर क्रमशः—की जाती है, तथा चक्र और शंख को गंध, पुष्प और फल से सम्मानित किया जाता है। वस्त्र से ढका घट तैयार कर नरसिंह की प्रतिमा स्थापित करें—श्रेष्ठ स्वर्ण की, या तांबे की, अथवा काष्ठ/बांस की भी—और द्वादशी को वेदवेत्ता ब्राह्मण को दान दें। प्रभाव सिद्ध करने हेतु किम्पुरुष-वर्ष के राजा वत्स की कथा आती है: शत्रुओं से राज्य छिनने पर वह वसिष्ठाश्रम में शरण लेकर यह व्रत करता है, आयुध-रूप चक्र पाकर राज्य-व्यवस्था पुनः स्थापित करता है और अंत में विष्णुलोक को प्राप्त होता है; यह व्रत समाज और पृथ्वी के क्रम को स्थिर करने वाला बताया गया है।
Verse 1
दुर्वासा उवाच । तद्वत् फाल्गुनमासे तु शुक्लपक्षे तु द्वादशीम् । उपोष्य प्रोक्तविधिना हरिमाराधयेत् सुधीः ॥ ४२.१ ॥
दुर्वासा बोले—इसी प्रकार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को, बताई हुई विधि के अनुसार उपवास करके, बुद्धिमान व्यक्ति को हरि की आराधना करनी चाहिए।
Verse 2
नरसिंहाय पादौ तु गोविन्दायेत्युरू तथा । कटिं विश्वभुजे पूज्य अनिरुद्धेत्युरस्तथा ॥ ४२.२ ॥
पाँवों का अर्पण ‘नरसिंहाय’ को करे; और जाँघों का ‘गोविन्दाय’ मंत्र से। कटि को ‘विश्वभुज’ मानकर पूजे, और वक्षस्थल को ‘अनिरुद्ध’ नाम से।
Verse 3
कण्ठं तु शितिकण्ठाय पिङ्गकेशाय वै शिरः । असुरध्वंसनायेति चक्रं तोयात्मने तथा । शङ्खमित्येव सम्पूज्य गन्धपुष्पफलैस्तथा ॥ ४२.३ ॥
कंठ का पूजन ‘शितिकण्ठाय’ के लिए करे और शिर का ‘पिङ्गकेशाय’ के लिए; चक्र का ‘असुरध्वंसनाय’ मंत्र से, और शंख का ‘तोयात्मने’ मंत्र से—इन सबका गंध, पुष्प और फल से विधिवत् पूजन करे।
Verse 4
तदग्रे घटमादाय सितवस्त्रयुगान्वितम् । तस्योपरि नृसिंहं तु सौवर्णं ताम्रभाजने । सौवर्णशक्तितः कृत्वा दारुवंशमयेऽपि वा ॥ ४२.४ ॥
फिर उसके आगे श्वेत वस्त्रों की जोड़ी से युक्त जल-घट लेकर, उसके ऊपर ताम्र पात्र में स्वर्णमय नृसिंह की मूर्ति स्थापित करे; सामर्थ्य हो तो स्वर्ण की, अन्यथा लकड़ी या बाँस की भी बना सकता है।
Verse 5
रत्नगर्भघटे स्थाप्य तं संपूज्य च मानवः । द्वादश्यां वेदविदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ४२.५ ॥
रत्नों से युक्त घट में उसे स्थापित करके और विधिपूर्वक पूजन कर, मनुष्य द्वादशी के दिन वेद-विद् ब्राह्मण को उसे अर्पित करे।
Verse 6
एवं कृते फलं प्राप्तं यत् पुरा पार्थिवेन तु । तस्याहं संप्रवक्ष्यामि वत्सनाम्ना महामुने ॥ ४२.६ ॥
इस प्रकार विधि से करने पर जो फल पहले एक राजा ने प्राप्त किया था, उसका मैं अब ‘वत्स’ नाम से, हे महामुने, विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा।
Verse 7
आसीत् किम्पुरुषे वर्षे राजा परमधार्मिकः । भारत इति च विख्यातस्तस्य वत्सः सुतोऽभवत् ॥ ४२.७ ॥
किंपुरुष-वर्ष में परम धर्मात्मा ‘भारत’ नाम से प्रसिद्ध एक राजा था; उसका ‘वत्स’ नामक पुत्र हुआ।
Verse 8
स शत्रुभिर्जितः सङ्ख्ये हृतकोशो द्विपादवान् । वनं प्रायात् सपत्नीको वसिष्ठस्याश्रमेऽवसत् ॥ ४२.८ ॥
वह युद्ध में शत्रुओं से पराजित हुआ; उसका कोश लूट लिया गया, तथापि उसके हाथी शेष थे। वह पत्नी सहित वन को गया और वसिष्ठ के आश्रम में रहने लगा।
Verse 9
कालेन गच्छता सोऽथ वसिष्ठेन महर्षिणा । किं कार्यमिति स प्रोक्तो वसस्यास्मिन् महाश्रमे ॥ ४२.९ ॥
समय बीतने पर महर्षि वसिष्ठ ने वसु के इस महान आश्रम में उससे कहा— “यहाँ आने का प्रयोजन क्या है, क्या कार्य करना है?”
Verse 10
राजोवाच । भगवन् हृतकोशोऽहं हृतराज्यो विशेषतः । शत्रुभिर्हतसंकल्पो भवन्तं शरणं गतः । उपदेशप्रदानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ४२.१० ॥
राजा बोला— हे भगवन्, मेरा कोश (धन) लूट लिया गया है और विशेषतः मेरा राज्य भी छिन गया है। शत्रुओं ने मेरा संकल्प तोड़ दिया है; मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपा करके उपदेश देकर मुझ पर अनुग्रह करें।
Verse 11
एवमुक्तो वसिष्ठस्तु तस्येमां द्वादशीं मुने । विधिना प्रत्युवाचाथ सोऽपि सर्वं तथा अकरोत् ॥ ४२.११ ॥
ऐसा कहे जाने पर वसिष्ठ ने उसे इस द्वादशी-व्रत का विधिपूर्वक उत्तर (उपदेश) दिया; और उसने भी सब कुछ उसी प्रकार ठीक-ठीक किया।
Verse 12
तस्य व्रतान्ते भगवान्नारसिंहस्तुतोष ह । चक्रं प्रादाच्च शत्रूणां विध्वंसनकरं परम् ॥ ४२.१२ ॥
उसके व्रत के अंत में भगवान् नरसिंह प्रसन्न हुए; और शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ परम चक्र उसे प्रदान किया।
Verse 13
तेनास्त्रेण स्वकं राज्यं जितवान् स नृपोत्तमः । राज्ये स्थित्वाऽश्वमेधानां सहस्रमकरोद्विभुः । अन्ते च विष्णुलोकाख्यं पदमाप च सत्तम ॥ ४२.१३ ॥
उस अस्त्र से उस श्रेष्ठ राजा ने अपना राज्य जीत लिया। राज्य में स्थित होकर उस पराक्रमी ने हजार अश्वमेध यज्ञ किए; और अंत में वह उत्तम पुरुष विष्णुलोक नामक पद को प्राप्त हुआ।
Verse 14
एषा धन्या पापहरा द्वादशी भवतो मुने । कथिता या प्रयत्नेन श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ॥ ४२.१४ ॥
हे मुने! यह धन्य और पाप-नाशिनी द्वादशी तुम्हें यत्नपूर्वक बताई गई है; इसे सुनकर तुम अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करो।
The text links disciplined observance (upavāsa, precise pūjā, and dāna) with the restoration of order: personal restraint and correct ritual gifting are presented as mechanisms that re-establish disrupted kingship and social stability, which implicitly supports Pṛthivī’s well-being through renewed governance and reduced conflict.
The observance is assigned to Phālguna-māsa during the śukla-pakṣa on Dvādaśī tithi. The procedure includes fasting on Dvādaśī and making the prescribed offering/gift to a vedavid brāhmaṇa specifically on that Dvādaśī.
While not explicitly ecological in vocabulary, the chapter frames terrestrial balance through socio-political stability: the king’s loss of treasury and realm leads to displacement and disorder, and the rite’s outcome restores governance and security. In the Varāha–Pṛthivī frame, such restoration functions as an indirect ethic of protecting Pṛthivī by re-aligning human conduct, redistribution (dāna), and lawful rule.
Durvāsas functions as the transmitting authority for the rite; Vasiṣṭha appears as the advising maharṣi at whose āśrama the dispossessed King Vatsa takes refuge; Vatsa is the exemplary ruler whose narrative demonstrates the vrata’s promised results (victory, restored rājya, and final attainment of Viṣṇuloka).