
Vaiṣṇava-sarga-prādurbhāvaḥ (Manu-nāma-nimittaṃ Viṣṇoḥ mūrtidhāraṇam)
Cosmogony & Theological-Philosophical Discourse
इस अध्याय में वराह भगवान पृथ्वी को वैष्णव-सर्ग का कारण समझाते हैं। महातपा कहते हैं कि नारायण ने सृष्टि और पालन का विचार करते हुए जाना कि देहधारण के बिना कर्मकाण्ड और यज्ञादि प्रवृत्त नहीं हो सकते; इसलिए उन्होंने एक नियामक मूर्ति प्रकट की। उस रूप में त्रिलोकी उनके शरीर में स्थित बताई गई है और एक आदिम वरदान का स्मरण व पुनः पुष्टि करके विष्णु की सर्वज्ञता तथा जगत-नियमन-शक्ति स्थापित की जाती है। फिर भगवान योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं; उनसे कमल-रचना प्रकट होती है, जिसमें सात द्वीपों वाली पृथ्वी, समुद्र, वन, पाताल तथा मध्य में मेरु का वर्णन है और उसी में ब्रह्मा का उद्भव होता है। शंख, खड्ग, चक्र, गदा, श्रीवत्स, कौस्तुभ और लक्ष्मी-चिह्नों का निरूपण, द्वादशी-व्रत की तारक महिमा तथा अंत में इस वैष्णव सृष्टि-कथा के श्रवण का पुण्य बताने वाली फलश्रुति दी गई है, जिससे पृथ्वी-धारण और विश्व-व्यवस्था का संबंध सूचित होता है।
Verse 1
महातपा उवाच । मनोर् नाम मनुत्वं च यदेतत् पठ्यते किल । प्रयोजनवशाद् विष्णुरसावेव तु मूर्त्तिमान् ॥ ३१.१ ॥
महातपा बोले— ‘मनु का नाम’ और ‘मनु-भाव’ जो यह कहा/पढ़ा जाता है, वह वास्तव में वही विष्णु है, जो प्रयोजन के अनुसार मूर्तिमान होकर प्रकट होता है।
Verse 2
योऽसौ नारायणो देवः परात्परतरॊ नृप । तस्य चिन्ता समुत्पन्ना सृष्टिं प्रति नरोत्तम ॥ ३१.२ ॥
हे नृप! जो वह नारायण देव परात्पर हैं, उस नरोत्तम के मन में सृष्टि के प्रति एक संकल्प उत्पन्न हुआ।
Verse 3
सृष्टा चेयं मया सृष्टिः पालनिया मयैव ह । कर्मकाण्डं त्वमूर्त्तेन कर्तुं नैवेह शक्यते । तस्मान्मूर्त्तिं सृजाम्येकां यया पाल्यमिदं जगत् ॥ ३१.३ ॥
‘यह सृष्टि मेरे द्वारा रची गई है और निश्चय ही इसका पालन भी मुझे ही करना है। परन्तु अमूर्त होकर यहाँ कर्मकाण्ड करना संभव नहीं। इसलिए मैं एक मूर्ति की सृष्टि करता हूँ, जिसके द्वारा यह जगत् पालित और संरक्षित हो।’
Verse 4
एवं चिन्तयतस्तस्य सत्याभिध्यायिनो नृप । प्राक्सृष्टिजातं राजन् वै मूर्त्तिमत् तत्पुरो बभौ ॥ ३१.४ ॥
हे नृप! वह सत्य-संकल्प (सत्याभिध्यायी) होकर ऐसा विचार कर ही रहे थे कि, हे राजन्, आदिसृष्टि से उत्पन्न एक मूर्तिमान रूप उनके सामने प्रकट हो गया।
Verse 5
पुरोभूते ततस्तस्मिन् देवो नारायणः स्वयम् । प्रविशन्तं ददर्शाथ त्रैलोक्यं तस्य देहतः ॥ ३१.५ ॥
जब वह प्राकट्य सामने आया, तब स्वयं देव नारायण को उसमें प्रवेश करते देखा गया; और उनके शरीर से त्रैलोक्य प्रकट हुआ।
Verse 6
ततः सस्मार भगवान् वरदानं पुरातनम् । वागादीनां ततस्तुष्टः प्रादात् तस्य पुनर्वरम् ॥ ३१.६ ॥
तब भगवान् ने प्राचीन वरदान का स्मरण किया; और वाणी आदि से संतुष्ट होकर उन्होंने उसे फिर एक वर प्रदान किया।
Verse 7
सर्वज्ञः सर्वकर्त्ता त्वं सर्वलोकनमस्कृतः । त्रैलोक्यविघ्ननाशाच्च त्वं भव विष्णुः सनातनः ॥ ३१.७ ॥
तुम सर्वज्ञ हो, सर्वकर्ता हो, और समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत हो। त्रैलोक्य के विघ्नों के नाश हेतु तुम सनातन विष्णु बनो।
Verse 8
देवानां सर्वदा कार्यं कर्त्तव्यं ब्रह्मणस्तथा । सर्वज्ञत्वं च भवतु तव देव न संशयः ॥ ३१.८ ॥
देवताओं का कर्तव्य सदा किया जाना चाहिए, और ब्रह्मा का भी वैसा ही। हे देव, तुम्हें सर्वज्ञता प्राप्त हो—इसमें संदेह नहीं।
Verse 9
एवमुक्त्वा ततो देवः प्रकृतिस्थो बभूव ह । विष्णुरप्यधुना पूर्वां बुद्धिं सस्मार च प्रभुः ॥ ३१.९ ॥
ऐसा कहकर देव प्रकृति-स्थित हो गए। और प्रभु विष्णु ने भी अब पूर्व में विद्यमान बुद्धि का स्मरण किया।
Verse 10
तदा सञ्चिन्त्य भगवान् योगनिद्रां महातपाः । तस्यां संस्थाप्य भगवानिन्द्रियार्थोद्भवाः प्रजाः । ध्यात्वा परेण रूपेण ततः सुष्वाप वै प्रभुः ॥ ३१.१० ॥
तब महातपस्वी भगवान् ने योगनिद्रा का चिन्तन किया। उस अवस्था में इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न प्रजाओं को स्थापित करके, परम रूप का ध्यान कर प्रभु सचमुच निद्रा में प्रविष्ट हुए।
Verse 11
तस्य सुप्तस्य जठरान्महत्पद्मं विविसृष्टम् । सप्तद्वीपवती पृथ्वी ससमुद्रा सकानना ॥ ३१.११ ॥
उस सोए हुए प्रभु के उदर से एक महान् कमल प्रकट हुआ; और सात द्वीपों वाली पृथ्वी, समुद्रों तथा वनों सहित, प्रादुर्भूत हुई।
Verse 12
तस्य रूपस्य विस्तारं पातालं नालसंस्थितम् । कर्णिकायां तथा मेरुस्तन्मध्ये ब्रह्मणो भवः ॥ ३१.१२ ॥
उस रूप के विस्तार में पाताल नाल (डंठल) में स्थित है; तथा कर्णिका में मेरु है। उसके मध्य में ब्रह्मा की उत्पत्ति का स्थान है।
Verse 13
एवं दृष्ट्वा परं तस्य शरीरस्य तु सम्भवम् । मुमुचे तच्छरीरस्थो वायुर् वायुं समं सृजत् ॥ ३१.१३ ॥
इस प्रकार उस शरीर की आगे की उत्पत्ति को देखकर, उसी शरीर में स्थित वायु मुक्त हुई और अपने समान वायु को उत्पन्न करने लगी।
Verse 14
अविद्याविजयं चेमं शङ्खरूपेण धारय । अज्ञानच्छेदनार्थाय खङ्गं तेऽस्तु सदा करे ॥ ३१.१४ ॥
इस अज्ञान-विजय को शंख-रूप में धारण करो; और अज्ञान का छेदन करने हेतु तुम्हारे हाथ में सदा खड्ग रहे।
Verse 15
कालचक्रमिमं घोरं चक्रं त्वं धारयाच्युत । अधर्मगजघातार्थं गदां धारय केशव ॥ ३१.१५ ॥
हे अच्युत, इस भयानक कालचक्र—सुदर्शन चक्र—को धारण कीजिए। हे केशव, अधर्मरूपी गज के वध हेतु गदा धारण कीजिए।
Verse 16
मालेयं भूतमाता ते कण्ठे तिष्ठतु सर्वदा । श्रीवत्सकौस्तुभौ चेमौ चन्द्रादित्यच्छलेन ह ॥ ३१.१६ ॥
हे भूतमाता, यह माला सदा आपके कंठ में स्थित रहे। और चन्द्र तथा सूर्य के छद्म से ये दोनों—श्रीवत्स और कौस्तुभ—आपमें विद्यमान रहें।
Verse 17
मारुतस्ते गतिर्वीर गरुत्मान् स च कीर्तितः । त्रैलोक्यगामिनी देवी लक्ष्मीस्तेऽस्तु सदाश्रये । द्वादशी च तिथिस्तेऽस्तु कामरूपी च जायते ॥ ३१.१७ ॥
हे वीर, वायु (मारुत) आपकी गति बने और गरुत्मान (गरुड़) भी आपका यश कहलाए। हे सदाश्रय, त्रैलोक्यगामिनी देवी लक्ष्मी आपकी हो। आपकी द्वादशी तिथि हो, और (भक्त) इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हो जाए।
Verse 18
घृताशनो भवेद्यस्तु द्वादश्यां त्वल्परायणः । स स्वर्गवासी भवतु पुमान् स्त्री वा विशेषतः ॥ ३१.१८ ॥
जो अल्प साधन वाला होकर द्वादशी को घी को आहार बनाता है, वह पुरुष हो या विशेषतः स्त्री—स्वर्ग में वास करे।
Verse 19
एष विष्णुस्तवाख्यातो मूर्तयो देवदानवान् । हन्ति पाति शरीराणि सृजत्यन्यानि चात्मनः ॥ ३१.१९ ॥
यह विष्णु तुम्हें इस प्रकार कहा गया है—देवों और दानवों में मूर्तिरूप होकर। वह शरीरों का संहार करता है, रक्षा करता है, और अपने से अन्य रूप/शरीर भी रचता है।
Verse 20
युगे युगे सर्वगोऽयं वेदान्ते पुरुषो ह्यसौ । न हीनबुद्ध्या वक्तव्यो मनुष्योऽयं कदाचन ॥ ३१.२० ॥
हर युग में यह पुरुष सर्वव्यापी है; वेदान्त में भी यही परम पुरुष कहा गया है। हीन बुद्धि से इसे कभी केवल मनुष्य न कहना चाहिए।
Verse 21
य एवँ शृणुयात् सर्गं वैष्णवं पापनाशनम् । स कीर्तिमिह संप्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ ३१.२१ ॥
जो इस वैष्णव सृष्टिवर्णन को, पाप-नाशक कहा गया है, श्रद्धा से सुनता है, वह इस लोक में कीर्ति पाकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
The chapter frames cosmic stability as requiring embodied governance: the narrative explains that sustaining creation and enabling ritual-social order (karma-kāṇḍa) presupposes a manifest agency (mūrti). It thereby links metaphysical cosmology to practical maintenance of world-order, implying that terrestrial balance (pṛthivī-pālana) depends on structured, intelligible governance rather than unmediated abstraction.
A specific lunar marker is named: Dvādaśī tithi. The text states that one devoted to Viṣṇu on Dvādaśī—described with a ghṛtāśana (ghee-based dietary observance) motif—attains heavenly merit, indicating a calendrical anchoring of devotional-ritual practice.
Environmental balance is approached through cosmographic-terrestrial containment: Earth with oceans and forests (sasamudrā sakānanā) is described as emerging within the deity’s cosmic body and being sustained through deliberate maintenance. By presenting creation as something that must be ‘protected/maintained’ (pālanīyā), the chapter implicitly models an early ecological ethic in which Pṛthivī’s integrity is preserved through ordered stewardship.
The chapter references Manu (via the inquiry into ‘Manu’ and ‘manutva’) and the creator figure Brahmā (arising in the lotus-cosmology). It also names Nārāyaṇa/Viṣṇu and Lakṣmī in the iconographic-theological register; no dynastic royal genealogy or regional court lineage is developed within this excerpt.