
Dharāṇī–Varāha-saṃvāda-phalaśruti-varṇanam
Phalaśruti (Recitation-Merit) and Tīrtha-Comparative Praise
इस अध्याय में धाराणी–वराह संवाद की औपचारिक फलश्रुति कही गई है। इसके श्रवण, पाठ और संरक्षण से आचार-शुद्धि तथा लोककल्याण होता है। सनत्कुमार बताते हैं कि परमेṣ्ठी/प्रजापति ब्रह्मा ने प्रश्न का निश्चय कर दिया और शेष विवेचन पुलस्त्य को सौंपा; संवाद का ‘सार’ संयमी वर्गों के निरंतर श्रवण हेतु है। यह संवाद मंगलकारी, धर्म–काम–अर्थ साधक, पापहर और आयु-समृद्धि बढ़ाने वाला बताया गया है। इसके सुनने-पढ़ने का पुण्य महायज्ञ, दान और तीर्थ-स्नान के तुल्य कहा गया है। ग्रंथ को लिखना, सुरक्षित रखना और पूजना दीर्घकालीन दैवी अनुग्रह का कारण है; साथ ही पृथ्वी (धाराणी) के सम्मान व संरक्षण को वराह-कथा में सभ्यता-धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
Verse 1
अथ धरणीवराहसंवादफलश्रुतिवर्णनम् ॥ सनत्कुमार उवाच ॥ उक्तं भगवता सर्वं यथावत्परमेष्ठिना ॥ पृष्टेन संशयं सम्यक्परं कृत्वार्थनिश्चयम् ॥
अब धरणी-वराह संवाद की फलश्रुति का वर्णन। सनत्कुमार बोले—परमेष्ठी भगवान ने पूछे जाने पर सब कुछ यथावत कहा; संदेह का पूर्ण निराकरण करके विषय का सही निश्चय स्थापित किया।
Verse 2
भगवद्विश्वरूपस्य स्थाणोरप्रतिमौजसः ॥ क्रीडतो लोकनाथस्य कानने मृगरूपिणः ॥
भगवान् के विश्वरूप—स्थाणु, जिनकी शक्ति अनुपम है—और लोकनाथ, जो मृग-रूप धारण कर वन में क्रीड़ा करते हैं।
Verse 3
यथा शरीरं शृङ्गं च पुण्यक्षेत्रे प्रतिष्ठितम् ॥ हिताय जगतस्तत्र तीर्थानि च यथाभवन् ॥
कैसे शरीर और शृंग पवित्र क्षेत्र में प्रतिष्ठित हुए, और वहाँ जगत् के हित के लिए तीर्थ उत्पन्न हुए—यह (मुझे) बताइए।
Verse 4
तन्मे ब्रूहि महाभाग यथातत्त्वं जगत्पते ॥ ब्रह्मोवाच ॥ पुलस्त्यो वक्ष्यते शेषं यदतोऽन्यन्महामुने ॥
हे महाभाग, हे जगत्पते, उसे मुझे यथातत्त्व कहिए। ब्रह्मा बोले: हे महामुने, शेष तथा इससे आगे का वर्णन पुलस्त्य करेंगे।
Verse 5
सर्वेषामेव तीर्थानामेषां फलविनिश्चयम् ॥ कुरु राज्यं पुरस्कृत्य मुनीनां पुरतो वने ॥
इन सब तीर्थों के फलों का निश्चय करो; वन में मुनियों के समक्ष, राजधर्म को अग्र में रखकर ऐसा करो।
Verse 6
पुत्रो मे मत्समः सम्यग्वेदवेदाङ्गतत्त्ववित् ॥ यच्छ्रुत्वा पुरुषस्तात विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः
मेरा पुत्र मेरे समान है, वह वेद और वेदाङ्गों के तत्त्व का यथार्थ ज्ञाता है। हे तात, इसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
Verse 7
यशस्वी कीर्त्तिमान्भूत्वा वन्द्यते प्रेत्य चेह च ॥ श्रोतव्यमेतत्सततं चातुर्वर्ण्यैः सुसंयुतैः
यश और कीर्ति से युक्त होकर मनुष्य इस लोक में भी और परलोक में भी वंदनीय होता है। यह उपदेश चारों वर्णों में सम्यक् संयमयुक्त जनों को सदा सुनना चाहिए।
Verse 8
माङ्गल्यं च शिवं चैव धर्मकामार्थसाधकम् ॥ श्रीभूतिजननं पुण्यमायुष्यं विजयावहम्
यह मंगलमय और शिवकारी है, धर्म‑काम‑अर्थ की सिद्धि कराने वाला है। यह श्री और भूतिसंपदा को उत्पन्न करता है, पुण्यदायक है, आयुष्य बढ़ाता है और विजय प्रदान करता है।
Verse 9
धन्यं यशस्यं पापघ्नं स्वस्तिकृच्छान्तिकारकम् ॥ श्रुत्वैवं पुरुषः सम्यङ्न दुर्गतिमवाप्नुयात्
यह धन्य है, यश देने वाला, पाप का नाशक, कल्याण और शांति करने वाला है। इसे इस प्रकार सम्यक् सुनकर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
Verse 10
सनत्कुमारं संदिश्य विरराम महायशाः ॥ एतद्वः कथितं सर्वं मया तत्त्वेन सत्तमाः
सनत्कुमार को उपदेश देकर वह महायशस्वी विराम हुआ। ‘हे सत्तमों, यह सब मैंने तुम्हें तत्त्व के अनुसार कहा है।’
Verse 11
वराहभूमिसंवादं सारमुद्धृत्य सत्तमाः ॥ यश्चैव कीर्त्तयेन्नित्यं श्रृणुयाद्वापि भक्तितः
हे सत्तमों, वराह और भूमि के संवाद का सार निकालकर—जो इसे नित्य कीर्तन करता है, अथवा भक्ति से सुनता भी है…
Verse 12
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ प्रभासे नैमिषारण्ये गङ्गाद्वारेऽथ पुष्करे
समस्त पापों से मुक्त होकर वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है—प्रभास में, नैमिषारण्य में, गंगाद्वार में तथा पुष्कर में भी।
Verse 13
प्रयागे ब्रह्मतीर्थे च तीर्थे चामरकण्टके ॥ यत्पुण्यफलमाप्नोति तत्कोटिगुणितं भवेत्
प्रयाग में, ब्रह्मतीर्थ में और अमरकण्टक के तीर्थ में—वहाँ जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वह करोड़ गुना हो जाता है।
Verse 14
कपिलां द्विजमुख्याय सम्यग्दत्त्वा तु यत्फलम् ॥ प्राप्नोति सकलं श्रुत्वा चाध्यायं तु न संशयः
श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक कपिला गौ दान करने से जो फल मिलता है, वही सब इस अध्याय को सुनने से प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं।
Verse 15
श्रुत्वाऽस्यैव दशाध्यायं शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति मानवः
इन दस अध्यायों को सुनकर, शुद्ध होकर और एकाग्रचित्त होकर, मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञों के तुल्य फल प्राप्त करता है।
Verse 16
यः पुनः सततं शृण्वन्नैरन्तर्येण बुद्धिमान् ॥ पारयेत्परया भक्त्या तस्यापि शृणु यत्फलम् ॥
और जो बुद्धिमान पुरुष निरन्तर बिना विराम के सुनता हुआ, परम भक्ति से (इस ग्रन्थ को) पूर्ण करता है—उसका फल भी सुनो।
Verse 17
सर्वयज्ञेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् ॥ सर्वतीर्थाभिषेकेन यत्फलं मुनिभिः स्मृतम् ॥
समस्त यज्ञों में जो पुण्य है, समस्त दानों में जो फल है, और समस्त तीर्थों में स्नान-अभिषेक से जो फल मुनियों ने स्मरण किया है—
Verse 18
तत्प्राप्नोति न सन्देहो वराहवचनं यथा ॥ यदेतत्पारयेद्भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥
वह उसे प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं—वराह के वचन के अनुसार, यदि वह भक्ति से मेरे इस उत्तम माहात्म्य का पारायण पूर्ण करे।
Verse 19
तस्य नारायणो देवः सन्तुष्टः स्याद्धि सर्वदा ॥ यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या नैरन्तर्येण मानवः ॥
उसके लिए देव नारायण सदा प्रसन्न रहते हैं—अर्थात् जो मनुष्य इसे भक्ति से और निरन्तरता के साथ सुनता है।
Verse 20
श्रुत्वा तु पूजयेत्शास्त्रं यथा विष्णुं सनातनम् ॥ गन्धपुष्पैस्तथा वस्त्रैर्ब्राह्मणानां च तर्पणैः ॥
सुनने के बाद शास्त्र का पूजन वैसे ही करे जैसे सनातन विष्णु का—गन्ध और पुष्पों से, वस्त्रों से, तथा ब्राह्मणों के तर्पण से।
Verse 21
यथाशक्ति नृपो ग्रामैः पूजयेत्च वसुन्धरे ॥ श्रुत्वा तु पूजयेद्यः पौराणिकं नियतः शुचिः ॥
यथाशक्ति नृप को ग्रामों (भूमिदान/बस्तियों) द्वारा वसुन्धरा का भी पूजन करना चाहिए। और जो नियत व शुचि होकर सुनकर पौराणिक (वक्ता) का पूजन करता है—
Verse 22
कीर्तयित्वा व्रजेत्त्वर्गं कल्यमुत्थाय मानवः ॥ सूत उवाच ॥ इत्युक्त्वा भगवान्देवः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥
इसे कीर्तन करके मनुष्य शुभ मुहूर्त में उठकर स्वर्ग को प्राप्त होता है। सूत ने कहा—ऐसा कहकर भगवान् देव, परमेष्ठी प्रजापति—
Verse 23
अपुत्रस्य भवेत्पुत्रः सपौत्रस्य सुपौत्रकः ॥ यस्येदं लिखितं गेहे तिष्ठेत्सम्पूज्यते सदा ॥
जिसके पुत्र नहीं है, उसे पुत्र प्राप्त हो; और जिसके पौत्र हैं, उसे सुपौत्र प्राप्त हों—जिसके घर में यह लिखित ग्रंथ रहता है और सदा विधिपूर्वक पूजित होता है।
The chapter frames the Dharāṇī–Varāha dialogue as a normative instructional text: sustained hearing/recitation and respectful preservation of the teaching are presented as practices that cultivate moral purification (pāpa-kṣaya), social auspiciousness, and ordered life-goals (dharma–kāma–artha). It also advances an implicit Earth-centered ethic by treating the Dharāṇī-related discourse as a civilizational ‘sāra’ worthy of continual study and protection.
No explicit tithi, nakṣatra, month (māsa), or seasonal (ṛtu) markers are given. The recommended practice is framed as continuous (satataṃ; nairantaryeṇa) rather than tied to a calendrical observance.
Direct ecological prescriptions are not detailed here; instead, the chapter elevates the Dharāṇī–Varāha saṃvāda as a foundational teaching whose continual transmission benefits the world (jagat-hitāya). By sacralizing the Earth-centered dialogue and linking it to collective welfare, the text indirectly supports an ethic of terrestrial respect and preservation through cultural memory and disciplined practice.
The narrative references major Purāṇic authorities and transmitters—Brahmā (Parameṣṭhin/Prajāpati), Sanatkumāra, Pulastya, and Sūta—functioning as a lineage of instruction and authentication. A royal figure (nṛpa/rājya context) is also invoked in relation to patronage and honoring the tradition, but no specific dynasty is named.