Varaha Purana - Adhyaya 209
Varaha PuranaAdhyaya 20921 Shlokas

Adhyaya 209: Description of the Greatness of the Pativratā (Marital Fidelity and Ethical Devotion)

Pativratāmāhātmya-varṇana

Ethical-Discourse / Social Conduct (Strīdharma, Gṛhastha-ethics)

वराहपुराण के उपदेशात्मक प्रसंग में, वराह–पृथ्वी की पृष्ठभूमि पर एक उपसंवाद आता है। नारद यम से पूछते हैं कि विशेषतः कृष्ण-भक्त लोग ‘उत्तम गति’ कैसे पाते हैं। यम बताते हैं कि नियम, तप, उपवास, दान जैसी बाह्य साधनाएँ गौण हैं; मुख्य साधन पतिव्रता-धर्म है—पत्नी का पति के हित, वाणी और दैनिक चर्या के अनुरूप सतर्क रहना। बार-बार कहा गया है कि ऐसी निष्ठा ‘मृत्यु के द्वार को नहीं देखती’; शौच-आचार, गृह-मार्जन, संयम और गृहस्थ-व्यवस्था को नैतिक रूप से रूपांतरित करने वाली साधना माना गया है, जो समाज-स्थिरता और पृथ्वी के संतुलन का भी आधार बनती है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivīNāradaYama

Key Concepts

pativratā-dharma (ethics of marital fidelity)niyama and tapas contrasted with everyday ethical disciplinemṛtyu-dvāra (the ‘door of death’) as a moral metaphorśauca-ācāra (purity and regulated conduct)gṛhastha-śrama (household labor as ethical practice)bhartṛ-priyahita (prioritizing the spouse’s well-being)devapūjā within domestic lifekīrti (social exemplarity and reputation)
Sanskrit recitationVaraha Purana Adhyaya 209

Shlokas in Adhyaya 209

Verse 1

अथ पतिव्रतामाहात्म्यवर्णनम् ॥ नारद उवाच ॥ कर्मणा केन राजेन्द्र तपसा वा तपोधनाः ॥ उत्तमां च गतिं यान्ति कृष्णवासः प्रशंस मे ॥

अब पतिव्रताओं के माहात्म्य का वर्णन आरम्भ होता है। नारद बोले—हे राजेन्द्र! किस कर्म से अथवा किस तप से तपोधन मुनि उत्तम गति को प्राप्त होते हैं? हे कृष्णवास! मेरे लिए इसका वर्णन कर प्रशंसा करो।

Verse 2

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा नारदेनाब्रवीत्तदा ॥ यम उवाच ॥ न तस्य नियमो विप्र तपो नैव च सुव्रत ॥

नारद द्वारा ऐसा कहे जाने पर धर्मात्मा ने तब उत्तर दिया। यम बोले—हे विप्र, उस (उत्तम गति) के लिए न कोई नियम है, न तप ही है, हे सुव्रत।

Verse 3

उपवासो न दानं वा न देवो वा महामुने ॥ यादृशी तु भवेद्विप्र शृणु तत्त्वं समासतः ॥

हे महामुने! न उपवास, न दान, न (केवल) देव-पूजन। हे विप्र! जैसा (आचरण) होना चाहिए, उसका तत्त्व संक्षेप से सुनो।

Verse 4

प्रसुप्ते या प्रस्वपिति जागर्ति विबुधे स्वयम् ॥ भुङ्क्ते तु भोजिते विप्र सा मृत्युम् जयति ध्रुवम् ॥

जो स्त्री पति के सो जाने पर सोती है, उसके जागने पर स्वयं जागती है और उसके भोजन कर लेने पर ही भोजन करती है—हे ब्राह्मण—वह निश्चय ही मृत्यु पर विजय पाती है।

Verse 5

मौने मौना भवेद्या तु स्थिते तिष्ठति या स्वयम् ॥ सा मृत्युम् जायते विप्र नान्यत्पश्यामि किञ्चन ॥

जो (पति) मौन हो तो मौन रहती है, और वह खड़ा हो तो स्वयं खड़ी रहती है—हे ब्राह्मण—वह मृत्यु को जीतती है; इसके अतिरिक्त मैं कुछ और नहीं देखता।

Verse 6

एकदृष्टिरेकमना भर्त्तुर्वचनकारिणी ॥ तस्या बिभीमहे सर्वे ये तथान्ये तपोधन ॥

जिसकी दृष्टि एक, मन एक और जो पति के वचन का पालन करती है—हे तपोधन—ऐसी स्त्री से हम सब, और अन्य तपस्वी भी, विस्मय-भय से भर उठते हैं।

Verse 7

देवानामपि सा साध्वी पूज्या परमशोभना ॥ भर्त्रा चाभिहिता यापि न प्रत्याख्यायिनी भवेत् ॥

वह साध्वी स्त्री देवताओं में भी पूज्य और परम शोभामयी है; और पति द्वारा संबोधित होने पर भी वह उसके वचनों को ठुकराने वाली न हो।

Verse 8

वर्त्तमानापि विप्रेन्द्र प्रत्याख्यातापि वा सदा ॥ न दैवतं सम्प्रयाति पत्युर्न्यं कदाचन ॥

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, चाहे वह (पति से) अलग रह रही हो, या सदा तिरस्कृत भी हो, फिर भी वह कभी भी पति के अतिरिक्त किसी अन्य ‘दैवत’ की शरण नहीं लेती।

Verse 9

सा न मृत्युमुखं याति एवं या स्त्री पतिव्रता ॥ एवं या तु भवेद्नित्यं भर्त्तुः प्रियहिते रता ॥

जो स्त्री पतिव्रता है, वह मृत्यु के मुख में नहीं जाती। जो सदा पति के प्रिय और हित में लगी रहती है, वही ऐसी कही गई है।

Verse 10

एष माता पिता बन्धुरेष मे दैवतं परम् ॥ एवं शुश्रूषते या तु सा मां विजयते सदा ॥

वह मेरे लिए माता, पिता और बंधु है; वही मेरा परम देवता है। जो स्त्री इस प्रकार पति की सेवा करती है, वह सदा मुझ पर भी श्रेष्ठ ठहरती है।

Verse 11

पतिव्रता तु या साध्वी तस्यां चाहं कृताञ्जलिः ॥ भर्तारमनुध्यायन्ती भर्तारमनुगच्छती ॥

जो साध्वी पतिव्रता है, उसे मैं भी हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। वह पति का ध्यान करती हुई, पति के पथ का अनुसरण करती है।

Verse 12

भर्तारमनुशोचन्ती मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ गीतवादित्रनृत्यानि प्रेक्षणीयान्यनेकशः ॥

पति के लिए व्याकुल/विलपती हुई वह मृत्यु-द्वार को नहीं देखती। गीत, वाद्य और नृत्य—अनेक प्रकार के देखने योग्य तमाशे—

Verse 13

न शृणोति न पश्येद्या मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ स्नान्ती च तिष्ठती वापि कुर्वन्ती वा प्रसाधनम् ॥

जो न सुनती है, न देखती है (ऐसे मनोरंजन)—वह मृत्यु-द्वार को नहीं देखती। चाहे स्नान करती हो, या खड़ी हो, या प्रसाधन करती हो—

Verse 14

नान्यं या मनसा पश्येन्मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ देवतार्चयन्तं वा भुज्यमानमपि द्विज ॥

जो स्त्री मन से किसी अन्य पुरुष की ओर नहीं देखती, वह मृत्यु के द्वार को नहीं देखती। चाहे उसका पति देवताओं की पूजा कर रहा हो या भोजन कर रहा हो, हे द्विज।

Verse 15

पतिं न त्यजते चित्तान्मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ भानौ चानुदिते वापि उत्थाय च तपोधन ॥

जो स्त्री चित्त में अपने पति को नहीं त्यागती, वह मृत्यु के द्वार को नहीं देखती। और सूर्य के उदित न होने पर भी उठकर, हे तपोधन।

Verse 16

गृहं मार्जयते नित्यं मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ चक्षुर्देहश्च भावश्च यस्या नित्यं सुसंवृतम् ॥

जो स्त्री नित्य घर को साफ करती है, वह मृत्यु के द्वार को नहीं देखती। जिसके नेत्र, देह और भाव सदा भली-भाँति संयमित रहते हैं।

Verse 17

शौचाचारसमायुक्ता सापि मृत्युम् न पश्यति ॥ भर्तुर्मुखं प्रपश्येद्या भर्त्तुश्चित्तानुसारिणी ॥

शौच और सदाचार से युक्त वह भी मृत्यु को नहीं देखती। जो अपने पति के मुख का दर्शन करती है और पति के चित्त के अनुसार चलती है।

Verse 18

वर्तते च हिते भर्त्तुर्मृत्युद्वारं न पश्यति ॥ एवं कीर्त्तिमतां लोके दृश्यन्ते दिवि देवताः ॥

जो अपने पति के हित में आचरण करती है, वह मृत्यु के द्वार को नहीं देखती। इस प्रकार कीर्तिमान लोग लोक में वैसे ही दीखते हैं जैसे स्वर्ग में देवता।

Verse 19

मया तस्मात्तु विप्रर्षे यथावृत्तं यथाश्रुतम् ॥ गुह्यमेतत्ततो दृष्ट्वा पूजयामि पतिव्रताः ॥

इसलिए, हे ब्रह्मर्षि, मैंने जैसा घटित हुआ और जैसा सुना, वैसा ही कहा है। इसे गुप्त उपदेश जानकर मैं पतिव्रता स्त्रियों का पूजन करता हूँ।

Verse 20

अनुवेष्टनभावेन भर्त्तारमनुगच्छति ॥ सा तु मृत्युमुखद्वारं न गच्छेद्ब्रह्मसम्भव ॥

सेवा-भाव और दृढ़ संग से वह अपने पति के पीछे चलती है। परन्तु, हे ब्रह्मसम्भव, वह मृत्यु के मुखरूप द्वार पर नहीं जाती।

Verse 21

मानुषाणां च भार्या वै तत्र देशे तु दृश्यते ॥ कथितैव पुरा विप्र आदित्येन पतिव्रता ॥

और मनुष्यों की पत्नी भी उस प्रदेश में दिखाई देती है। हे विप्र, पूर्वकाल में आदित्य (सूर्य) ने पतिव्रता का वर्णन किया था।

Frequently Asked Questions

The text prioritizes pativratā-dharma—steady, self-regulated marital fidelity and attention to a spouse’s welfare—over external ascetic markers such as fasting, donations, or formal vows. Yama’s response frames everyday ethical discipline (speech, attention, household order, and restraint) as a decisive cause of elevated post-mortem destiny and moral power.

No tithi, lunar phase, festival calendar, or seasonal timing is specified in the supplied verses. The only temporal cues are daily-routine markers (e.g., rising before sunrise and maintaining continual attentiveness), indicating an ethic of constant practice rather than date-bound ritual performance.

While it does not explicitly discuss rivers, forests, or land-management, it advances a Purāṇic logic in which social order and disciplined household life stabilize the human sphere that rests upon Pṛthivī. By emphasizing cleanliness (śauca), regulated domestic activity, and non-disruptive conduct, the chapter can be read as indirectly supporting terrestrial balance through norms that reduce disorder and promote sustainable household governance.

The chapter references Nārada (sage-messenger figure) and Yama (administrator of death and moral order). It also gestures to a prior exemplum associated with Āditya (the Sun) concerning a pativratā, but no royal genealogy or named human dynasty is provided in the supplied text.

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