Adhyaya 206
Varaha PuranaAdhyaya 20643 Shlokas

Adhyaya 206: Section on the Manifestation of the Fruits of Auspicious Deeds

Śubhakarmaphalodaya-prakaraṇa

Ethical-Discourse (Dāna-phala and Post-mortem Moral Administration)

इस अध्याय में वराह–पृथ्वी संवाद के भीतर एक ऋषि, चित्रगुप्त के संदेश के रूप में मरणोत्तर पुण्य-विचार का वर्णन करता है। जो दयालु दाता अतिथि-सत्कार, अन्नदान और शेष-भोजन बाँटने में तत्पर रहता है, उसे धर्मराज की आज्ञा से मुक्त कर सम्मानित किया जाता है। दिव्य विमान आते हैं; गन्धर्व-अप्सराएँ उसकी स्तुति करती हैं; वह स्वर्गीय निवासों का भोग करता है और फिर मान्य कुल में पुनर्जन्म पाता है। आगे गोदान, गो-सम्बन्धी दान और पञ्चगव्य को परम पवित्र बताकर, गाय के शरीर में देवताओं, नदियों और सद्गुणों का अधिष्ठान निरूपित किया गया है। अंत में संयमित उदारता का फल—अपरिमित स्वर्ग-समृद्धि—दिखाकर, सामाजिक धर्म को गो-आधारित अर्थ और शुद्धि-आचार से पृथ्वी-कल्याण से जोड़ा गया है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivīṚṣi (narrator)Citragupta (reported speech)Dharmarāja/Yama (as authority referenced)

Key Concepts

śubha-karma-phala (fruits of auspicious action)dāna (gift-giving), especially annadāna and go-dānaatithi-satkāra (hospitality to guests)Citragupta as karmic record-keeper and messengerpost-mortem moral administration (Yama/Dharmarāja’s śāsana)pañcagavya and gavyam as medhya (purificatory substances)cosmic mapping of divinities onto the cow (gau-tattva)svarga/Goloka enjoyment and return to human birth (punarjanma)

Shlokas in Adhyaya 206

Verse 1

अथ शुभकर्मफलोदय प्रकरणम् ॥ ऋषिरुवाच ॥ चित्रगुप्तस्य सन्देशो वदतो यो मया श्रुतः ॥ श्रूयतां वै महाभागास्तपःसिद्धा द्विजोत्तमाः ॥

अब शुभ कर्मों के फल के उदय का प्रकरण है। ऋषि बोले—चित्रगुप्त का जो संदेश मैंने कहते हुए सुना है, उसे सुनो, हे महाभाग्यशाली तपःसिद्ध श्रेष्ठ द्विजो।

Verse 2

इमं सर्वातिथिं दान्तं सर्वभूतानुकम्पकम् ॥ समान्नदानदातारं शेषभोजनभोजिनम् ॥

इसको छोड़ो/मुक्त करो—यह संयमी है, सब अतिथियों का सत्कार करने वाला, समस्त प्राणियों पर करुणा करने वाला; समान अन्न-दान देने वाला और शेष भोजन ही खाने वाला है।

Verse 3

मुञ्च मुञ्च महाभृत्य चैष धर्मस्य निर्णयः ॥ अहं कालेन सार्द्धं हि मृत्युना प्रकृतस्तथा ॥

मुक्त करो, मुक्त करो, हे महाभृत्य—यह धर्म का निश्चय है। क्योंकि मैं काल के साथ और उसी प्रकार मृत्यु के साथ नियुक्त/नियत हूँ।

Verse 4

मम स्थास्यन्ति पार्श्वेषु पापा वै विकृतास्तथा ॥ एनं गायस्यन्ति गन्धर्वा गगनेऽप्सरसस्तथा ॥

मेरे दोनों पार्श्वों में पापी—विकृत/पीड़ित—खड़े रहेंगे। और गन्धर्व इसका गान करेंगे; तथा आकाश में अप्सराएँ भी (इसका यश) गाएँगी।

Verse 5

दीयतामासनं दिव्यं तथान्यद्यानमेव च । अन्यान्यान्कामयेत्कामान्मनसा यानि चेच्छति ॥

दिव्य आसन दिया जाए और एक अन्य यान भी। वह मन में जिन-जिन भोगों की इच्छा करे, उन-उन कामनाओं को चाहे।

Verse 6

तत्तु शीघ्रं प्रदातव्यं धर्मराजस्य शासनात् ॥ अक्रियाणि तु दानानि पूर्वं दत्तानि धीमता ॥

परन्तु धर्मराज की आज्ञा से वह शीघ्र ही प्रदान किया जाए। क्योंकि बुद्धिमान द्वारा पूर्व में दिए गए दान निष्फल कर्म नहीं थे।

Verse 7

प्रेक्षतां च महाभागो भोक्तुं चैव सहानुगः ॥ तिष्ठत्येषोऽत्र वै वीरो ममादेशान्महायशाः ॥

उस महाभाग को सब देखें, और वह अपने अनुचरों सहित भोग करे। यह महायशस्वी वीर मेरे आदेश से यहीं स्थित है।

Verse 8

यावत्स्वर्गाद्विमानानि समागच्छन्ति कृत्स्नशः ॥ ततः स प्रवरैर्यानैः सानुगः सपरिच्छदः ॥

जब तक स्वर्ग से समस्त विमान आ न जाएँ; तब वह उत्तम यानों से, अपने अनुचरों और समस्त परिकर सहित (आगे प्रस्थान करे)।

Verse 9

देवानां भवनं यातु दैवतैरभिपूजितः ॥ तत्रैव रमतां वीरो यावल्लोको हि धार्यते ॥

वह देवताओं के भवन को जाए, और स्वयं देवताओं द्वारा पूजित हो। वह वीर वहीं रमण करे, जब तक यह लोक धारण किया जाता है।

Verse 10

नैककन्याप्रदातारं नैकयज्ञकृतं तथा ॥ पूज्यतां सर्वकामैस्तु पदं गच्छतु वैष्णवम् ॥

जिसने अनेक कन्याओं का दान (विवाह-दान) किया है और जिसने अनेक यज्ञ किए हैं—वह सब कामनाओं की सिद्धि सहित पूजित हो; वह वैष्णव पद को प्राप्त करे।

Verse 11

तत्रैष रमतां धीरः सहस्रमयुतं समाः ॥ ततो वै मानुषे लोके आद्ये वै जायतां कुले ॥

वह धीर पुरुष वहाँ दस हज़ार वर्षों तक आनंद करे; फिर मनुष्य-लोक में किसी श्रेष्ठ कुल में जन्म ले।

Verse 12

भूतानुकम्पको ह्येष क्रियतामस्य चार्च्छनम् ॥ वर्षाणामयुतं चायं तत्र तिष्ठतु देववत् ॥

यह प्राणीमात्र पर करुणा करने वाला है; अतः इसका भी पूजन किया जाए। और यह वहाँ देवतुल्य दस हज़ार वर्षों तक निवास करे।

Verse 13

जायते तु ततः पश्चात्सर्वमानुषपूजितः ॥ उपानहौ च छत्रं च जलभाजनमेव च ॥

फिर उसके बाद वह जन्म लेता है और सब मनुष्यों द्वारा सम्मानित होता है—(उसके साथ) पादुका, छत्र और जलपात्र भी (सम्बद्ध होते हैं)।

Verse 14

असकृद्द्येन दत्तानि तस्मै पूजां प्रयच्छथ ॥ सभा यत्र प्रवर्त्तन्ते यस्मिन्देशे सहस्रशः ॥

जिसने इन वस्तुओं का बार-बार दान किया है, उसे पूजन-मान प्रदान करो। जिस देश में सहस्रों सभाएँ प्रवृत्त होती हैं…

Verse 15

हस्तेन संस्पृशत्येष मृदुना शीतलेन च ॥ विद्याधरस्तथा ह्येष नित्यं मुदितमानसः ॥

यह कोमल और शीतल हाथ से स्पर्श करता है। इसलिए यह वास्तव में विद्याधर होता है और सदा प्रसन्नचित्त रहता है।

Verse 16

महापद्मानि चत्वारि तस्मिंस्तिष्ठन्तु नित्यशः ॥ ततश्च्युतश्च कालेन मानुषं लोकमास्थितः ॥

उसके लिए वहाँ चार महापद्म सदा स्थित रहें। फिर समय बीतने पर, उस अवस्था से च्युत होकर वह मनुष्यलोक में आता है।

Verse 17

बहुसुन्दरनारीके कुले जन्म समाप्नुयात् ॥ दधि क्षीरं घृतं चैव येन दत्तं द्विजातिषु ॥

जिसने द्विजों में दही, दूध और घी का दान किया है, वह अनेक सुन्दर स्त्रियों वाले कुल में जन्म प्राप्त करता है।

Verse 18

एष वा यातु नः पार्श्वमस्मै पूजां प्रयच्छथ ॥ नीयतां नीयतां शीघ्रं यत्रयत्र न चालयेत् ॥

अथवा यह हमारे पास आए; इसे पूजन-सम्मान प्रदान करो। इसे ले जाओ—शीघ्र ले जाओ—जहाँ-जहाँ यह विचलित न हो।

Verse 19

ततः पश्चादयं यातु यत्र लोकोऽनसूयकः ॥ तत्रैव रमतां धीरो बहुवर्षशतान्ययम् ॥

इसके बाद यह वहाँ जाए जहाँ के लोग द्वेषरहित हैं। वहीं यह धीर पुरुष अनेक सैकड़ों वर्षों तक संतोषपूर्वक रमण करे।

Verse 20

बहुसुन्दरनारीभिः सेव्यमानो महातपाः ॥ अमराख्यो भवेत् तत्र गोलोकेषु समाहितः ॥

अनेक सुन्दर नारियों द्वारा सेवित वह महातपस्वी, मन से समाहित होकर, वहाँ ‘अमर’ नाम से प्रसिद्ध होता है और गोलोकों में प्रतिष्ठित हो जाता है।

Verse 21

इदमेवापरं चैव चित्रगुप्तस्य भाषितम् ॥ सर्वदेवमया देव्यो सर्ववेदमयास्तथा ॥

और यह आगे का वचन भी चित्रगुप्त ने कहा है— ‘देवियाँ समस्त देवताओं से युक्त हैं; और वैसे ही वे समस्त वेदों से युक्त हैं।’

Verse 22

अमृतं धारयन्त्यश्च प्रचरन्ति महीतले ॥ तीर्थानां परमं तीर्थमतस्तीरथं न विद्यते ॥

वे अमृत को धारण करती हुई पृथ्वी-तल पर विचरती हैं। यह तीर्थों में परम तीर्थ है; इसलिए इससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है।

Verse 23

पवित्रं च पवित्राणां पुष्टीनां पुष्टिरेव च ॥ तस्मात्पुरस्तु दातव्यं गवां वै मेध्यकारणात् ॥

यह पवित्रों में भी परम पवित्र है और पुष्टिकारक वस्तुओं में भी सच्ची पुष्टि है। इसलिए मेध्यता (यज्ञीय शुद्धि) के कारण, विधिपूर्वक अग्रभाग में गोदान करना चाहिए।

Verse 24

दध्ना हि त्रिदशाः सर्वे क्षीरेण च महेश्वरः ॥ घृतेन पावको नित्यं पायसेन पितामहः ॥

दही से समस्त देवता तृप्त होते हैं; दूध से महेश्वर; घी से नित्य पावक (अग्निदेव); और पायस से पितामह ब्रह्मा।

Verse 25

सकृद्दत्तेन प्रीयन्ते वर्षाणां हि त्रयोदश ॥ तां दत्त्वा चैव पीत्वा च प्रीतो मेध्यस्तु जायते ॥

एक बार दान करने से वे तेरह वर्षों तक प्रसन्न रहते हैं। उसे देकर और स्वयं पीकर मन प्रसन्न होता है तथा मेध्यता (यज्ञीय शुद्धि) उत्पन्न होती है।

Verse 26

पञ्चगव्येन पीतेन वाजिमेधफलṃ लभेत् ॥ गव्यं तु परमं मेध्यं गव्यादन्यन्न विद्यते ॥

पञ्चगव्य का पान करने से वाजिमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। गो-सम्बन्धी द्रव्य परम मेध्य है; गोद्रव्य के अतिरिक्त अन्य कोई (ऐसा) मेध्य नहीं माना गया।

Verse 27

गौ दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां तु सरस्वती ॥ खुरमध्ये तु गन्धर्वाः खुराग्रेषु तु पन्नगाः ॥

गाय के दाँतों में मरुत् देवता हैं, और जिह्वा पर सरस्वती हैं। खुर के मध्य में गन्धर्व हैं, और खुरों के अग्रभाग में पन्नग (सर्प) हैं।

Verse 28

अपाने सर्वतीर्थानि प्रस्रावे जाह्नवी नदी ॥ नानाद्वीपसमाकीर्णाश्चत्वारः सागरास्तथा ॥

अपान (गुद) में समस्त तीर्थ हैं, और मूत्र में जाह्नवी नदी (गङ्गा) है। तथा नाना द्वीपों से परिपूर्ण चारों समुद्र भी (वहाँ) हैं।

Verse 29

ऋषयो रोमकूपेषु गोमये पद्मधारिणी ॥ रोम्णि वसन्ति विद्याश्च त्वक्केशेष्वयनद्वयम् ॥

रोमकूपों में ऋषि निवास करते हैं; गोमय में पद्मधारिणी (कमलधारिणी देवी) रहती हैं। रोमों में विद्याएँ वास करती हैं, और त्वचा तथा केशों में दो अयन (उत्तरायण-दक्षिणायण) स्थित हैं।

Verse 30

धैर्यं धृतिश्च शान्तिश्च पुष्टिर्वृद्धिस्तथैव च ॥ स्मृतिर्मेधा तथा लज्जा वपुः कीर्तिस्तथैव च ॥

धैर्य, धृति और शान्ति; तथा पोषण और वृद्धि भी; स्मृति, मेधा और लज्जा; तथा शरीर-कल्याण और कीर्ति भी—ये सब वहाँ विद्यमान कहे गए हैं।

Verse 31

विद्या शान्तिर्मतिश्चैव सन्ततिः परमा तथा ॥ गच्छन्तमनुगच्छन्ति ह्येता गावो न संशयः ॥

विद्या, शान्ति, सद्बुद्धि और परम सन्तति भी—ये गौएँ, निःसन्देह, आगे बढ़ने वाले के पीछे-पीछे चलती हैं।

Verse 32

यत्र गावो जगत्तत्र देवदेवपुरोगमाः ॥ यत्र गावस्तत्र लक्ष्मीः सांख्यधर्मश्च शाश्वतः ॥

जहाँ गौएँ हैं, वहाँ जगत् (समृद्ध व्यवस्था) है; और देवों के देव के अग्रगामी देवगण भी वहाँ होते हैं। जहाँ गौएँ हैं, वहाँ लक्ष्मी और सांख्य-धर्म का शाश्वत स्वरूप भी रहता है।

Verse 33

सर्वरूपेषु ता गावस्तिष्ठन्त्यभिमतास्तथा ॥ भवनॆषु विशालॆषु सर्वप्रासादपङ्क्तिषु ॥

वे गौएँ सभी रूपों में स्थित रहती हैं, और इष्ट व पूज्य मानी जाती हैं; विशाल भवनों में तथा समस्त प्रासाद-पंक्तियों में (उनकी उपस्थिति कही गई है)।

Verse 34

स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव रक्षन्तश्च सुयन्त्रिताः ॥ शयनासनपानेषु ह्युपविष्टाः सहस्रशः ॥

स्त्रियाँ और पुरुष भी—रक्षा करते हुए और सु-नियंत्रित—शय्या, आसन और पान-सेवा के स्थानों पर सहस्रों की संख्या में बैठे रहते हैं।

Verse 35

क्रीडन्ति विविधैर्भोगैर्भोगेषु च सहस्रशः ॥ तत्र पानगृहेष्वन्ये पुष्पमालाविभूषिताः ॥

वे नाना प्रकार के भोगों से क्रीड़ा करते हैं और सहस्रों भोगों में रमते हैं। वहाँ पानगृहों में अन्य लोग पुष्पमालाओं से विभूषित हैं।

Verse 36

भक्ष्याणां विविधानां च भोजनानां च सञ्चयात् ॥ शयनासनपानानि वाजिनो वारणांस्तथा ॥

विविध भक्ष्यों और भोजनों के संचय से वहाँ शय्या, आसन और पान हैं; तथा वैसे ही घोड़े और हाथी भी हैं।

Verse 37

उद्यानॆषु तथा चान्या भवनॆषु च पुण्यतः ॥ अनेन सदृशं नास्ति ह्यस्माद् अन्यन्न विद्यते ॥

अन्य लोग इसी प्रकार उद्यानों में और पुण्य के कारण भवनों में भी (स्थित) हैं। इसके समान कुछ नहीं; इससे भिन्न कोई और (समकक्ष) ज्ञात नहीं है।

Verse 38

अहो सूत्रकृतं शिल्पमहो रत्नैरलङ्कृतम् ॥ एवं गृहाद्गृहं गच्छन्नहं तत्र ततोऽस्तमः ॥

अहो! सूत्रों से रचा हुआ क्या शिल्प है; अहो! रत्नों से अलंकृत! इस प्रकार घर-घर जाता हुआ मैं वहाँ, उसी स्थान पर, ठहर गया (मेरी गति समाप्त हुई)।

Verse 39

ततस्तु निखिलं सम्यग्दृष्ट्वा कर्म महोदयम् ॥ पुनरेवागतः पार्श्वं यमस्य द्विजसत्तमाः ॥

तब कर्म के महान् उदय (फल) को सम्यक् रूप से पूर्णतः देखकर, हे द्विजश्रेष्ठो, वह पुनः यम के पार्श्व में लौट आया।

Verse 40

स कृतार्थः सदा लोके यत्रैषोऽभिप्रयास्यति ॥ तत्र मेध्यं पवित्रं च यत्र स्थास्यत्ययं शुचिः ॥

वह जहाँ-जहाँ जाने का संकल्प करता है, वहाँ-वहाँ इस लोक में सदा कृतार्थ होता है; और जहाँ यह शुद्ध पुरुष निवास करता है, वह स्थान मेध्य और पवित्र माना जाता है।

Verse 41

गोरसस्य तु पूर्णानि भाजनानि सहस्रशः ॥ यत्र दत्त्वा च पीत्वा च बान्धवेभ्यो विभागशः ॥

वहाँ गोरस से भरे हुए पात्र सहस्रों की संख्या में थे; जिन्हें देकर और स्वयं पीकर, बान्धवों में यथोचित भागों के अनुसार बाँटा गया।

Verse 42

सर्वसन्धिषु साध्याश्च चन्द्रादित्यौ तु लोचने ॥ ककुदे सर्वक्षत्राणि लाङ्गूले धर्म आश्रितः ॥

उसके समस्त संधि-स्थानों में साध्यगण हैं; चन्द्र और सूर्य उसके दो नेत्र हैं। ककुद (कूबड़) पर समस्त क्षात्र-शक्तियाँ हैं; और पूँछ में धर्म प्रतिष्ठित है।

Verse 43

अपश्यन् विविधास्तत्र स्त्रियश्च शुभलोचनाः ॥ शोभयन्ति स्त्रियः काश्चिज्जलक्रीडा गतास्तथा ॥

उसने वहाँ शुभ नेत्रों वाली विविध स्त्रियों को देखा; और कुछ स्त्रियाँ जलक्रीड़ा के लिए गई हुई भी उस स्थान को शोभित कर रही थीं।

Frequently Asked Questions

The text prioritizes dāna-centered social ethics—especially hospitality (atithi-satkāra), food-giving (annadāna), and go-related gifts (go-dāna)—as actions that generate auspicious karmic outcomes. Merit is portrayed as administratively recognized through Citragupta’s report and Dharmarāja’s command, leading to honor, celestial enjoyment, and favorable rebirth.

No specific tithi, lunar month, vrata-day, or seasonal calendar marker is stated in this excerpt. Time is expressed in generalized durations (e.g., sahasra/ayuta years) describing the length of celestial enjoyment rather than ritual scheduling.

While not framed as ecology in modern terms, the chapter links ethical living to terrestrial sustainability by elevating cattle-centered giving and purification (gavyam, pañcagavya) and by depicting the cow as a microcosm containing rivers (e.g., Jāhnavī), tirthas, and deities. This implies a worldview where protecting and supporting cattle-based resources contributes to social order, ritual cleanliness, and the maintenance of a stable inhabited world.

The excerpt references administrative and mythic figures associated with moral governance and record-keeping: Citragupta (as messenger/recorder of deeds) and Dharmarāja/Yama (as the authority issuing commands). A generic ṛṣi narrator addresses accomplished ascetics (tapaḥ-siddhāḥ) and dvijas, but no specific royal dynasty or named human lineage is provided.