
Madhuparkotpatti-dāna-saṅkaraṇa-prakaraṇa
Ritual-Manual
अनेक धर्मोपदेश सुनकर भी पृथ्वी वराह से ‘गुप्त’ स्पष्टीकरण माँगती है—मधुपर्क क्या है, किस देवता से संबंधित है, इससे कितना पुण्य मिलता है, और किन पदार्थों को किसे देना चाहिए। वराह प्रलय के बाद की कथा सुनाते हैं: उनके दाहिने पार्श्व से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट होता है; ब्रह्मा के पूछने पर वराह उसे ‘मधुपर्क’ बताते हैं, जो भक्तों के कल्याण और मोक्ष का साधन है। फिर वे विधि बताते हैं—मधुपर्क के घटक, अर्पण के समय का मंत्र, पात्र/ग्राही का नियम, और शुद्ध रीति से दान करने पर धर्म-स्थापन तथा परम कल्याण का फल।
Verse 1
अथ मधुपर्कोत्पत्तिदानसङ्करणप्रकरणम् ॥ सूत उवाच ॥ एवं श्रुत्वा बहून्धर्मान् धर्मशास्त्रविनिश्चयात् ॥ वराहरूपिणं देवं पुनः पप्रच्छ मेदिनी
अब मधुपर्क की उत्पत्ति, दान और मिश्रित विधियों का प्रकरण। सूत बोले—धर्मशास्त्र के निर्णयानुसार अनेक धर्मों को सुनकर मेदिनी ने वराहरूप धारण करने वाले देव से फिर प्रश्न किया।
Verse 2
धरण्युवाच ॥ एवं शास्त्रं मया देव तव वक्त्राद्विनिःसृतम् ॥ श्रुतं सुबहुशश्चैव तृप्तिर्मम न विद्यते
धरणी बोली—हे देव! आपके मुख से निकला यह शास्त्र मैंने अनेक बार सुना है; फिर भी मेरी तृप्ति नहीं होती।
Verse 3
ममैवानुग्रहार्थाय रहस्यं वक्तुमर्हसि ॥ कीदृशो मधुपर्कश्च किं पुण्यं का च देवता
केवल मेरे अनुग्रह के लिए आप यह रहस्य बताने योग्य हैं—मधुपर्क कैसा है, उससे कौन-सा पुण्य होता है, और उससे कौन-सी देवता संबद्ध है?
Verse 4
कानि द्रव्याणि कस्मै च देयानीति वदस्व मे ॥ इति भूम्या वचः श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः
मुझे बताइए कि कौन-कौन सी वस्तुएँ किसे देनी चाहिए। भूमि के ये वचन सुनकर देवों के देव जनार्दन ने (उत्तर दिया)।
Verse 5
वराहरूपी भगवान् प्रत्युवाच वसुन्धराम् ॥
वराहरूप भगवान् ने वसुंधरा को उत्तर दिया।
Verse 6
श्रीवराह उवाच ॥ शृणु भूमे प्रयत्नेन मधुपर्को यथा कृतः ॥ उत्पत्तिश्चैव दानं च सर्वो यस्य च हीयते ॥
श्रीवराह बोले—हे भूमे! प्रयत्नपूर्वक सुनो कि मधुपर्क कैसे स्थापित हुआ; उसकी उत्पत्ति और उसका दान भी, जिसके द्वारा हर अशुभ न्यूनता क्षीण हो जाती है।
Verse 7
अहं ब्रह्मा च रुद्रश्च कृत्वा लोकस्य संक्षयम् ॥ अव्यक्तानि च भूतानि यानि कानि च सर्वथा ॥
मैं, ब्रह्मा और रुद्र—लोक का संक्षय (प्रलय) करके—समस्त प्रकार के सभी भूतों को अव्यक्त अवस्था में (देखते थे)।
Verse 8
ततो भूमे दक्षिणाङ्गात् पुरुषो मे विनिःसृतः ॥ रूपवान् द्युतिमांश्चैव श्रीमान् ह्रीकीर्तिमान्नरः ॥
तब, हे भूमे! मेरे दाहिने अंग से एक पुरुष प्रकट हुआ—सुन्दर, तेजस्वी, श्रीसम्पन्न, तथा लज्जा और कीर्ति से युक्त।
Verse 9
तत्र पप्रच्छ मां ब्रह्मा मम गात्राद्विनिःसृतः ॥ य एव तिष्ठते विष्णो त्रयाणां च चतुर्थकः ॥
वहाँ ब्रह्मा ने मुझसे उस (पुरुष) के विषय में पूछा जो मेरे शरीर से निकला था—हे विष्णो! जो तीनों के सापेक्ष ‘चतुर्थ’ रूप में स्थित है।
Verse 10
एवं च मे समुद्पन्नः सर्वकर्मसु निष्ठितः ॥ मधुपर्केति विख्यातो भक्तानां भवमोक्षणः ॥
इस प्रकार वह मुझसे उत्पन्न हुआ, समस्त कर्मों में निष्ठावान; ‘मधुपर्क’ नाम से विख्यात हुआ, और भक्तों के लिए भव-बंधन से मोक्ष देने वाला माना गया।
Verse 11
मयात्र संशितं ब्रह्मन् रुद्रे चापि समासतः ॥ साधु विष्णो भागतस्ते एष चापि विनिःसृतः ॥
हे ब्रह्मन्, यह अंश मैंने यहाँ नियत किया और संक्षेप से रुद्र के लिए भी। ‘साधु है, हे विष्णु’—तुम्हारे भाग से यह भी प्रकट हुआ।
Verse 12
उद्भवं मधुपर्कस्य आत्मसम्भवनिश्चयम् ॥ ततस्तु मामब्रवीद् ब्रह्मा कारणं मधुरं वचः ॥
(उन्होंने) मधुपर्क की उत्पत्ति और उसके स्वयंसम्भव होने के निश्चय के विषय में पूछा; तब ब्रह्मा ने उसके कारण के बारे में मुझसे मधुर वचन कहा।
Verse 13
मधुपर्केण किं कार्यम् एतदाचक्ष्व निष्कलम् ॥ पितामहवचः श्रुत्वा मयासौ प्रतिबाषितः ॥
‘मधुपर्क से क्या प्रयोजन है? यह सब पूर्णतः बताइए।’ पितामह के वचन सुनकर मैंने उन्हें प्रत्युत्तर दिया।
Verse 14
कारणं मधुपर्कस्य दानं सङ्करणं तथा ॥ ममार्चनविधिं कृत्वा मधुपर्कं प्रयच्छति ॥
मधुपर्क का कारण उसका दान है और उसका उचित संयोग/संस्कार भी। मेरी अर्चना-विधि करके (भक्त) मधुपर्क अर्पित करता है।
Verse 15
ब्रह्मन् यात्युत्तरं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति॥ तस्य क्रियां प्रवक्ष्यामि मम दानप्रतिग्रहात्॥
हे ब्राह्मण, (इससे) मनुष्य उत्तम लोक को प्राप्त होता है; वहाँ जाकर वह शोक नहीं करता। मेरे द्वारा दान-प्रतिग्रह के प्रसंग से उसकी विधि मैं बताऊँगा।
Verse 16
यस्य दानविधिं प्राप्य यान्ति दिव्यां गतिं मम॥ वृत्तेष्वेवोपचारेषु ये च ब्रह्मन्मम प्रियाः॥
इस दान-विधि को प्राप्त करके वे मेरी दिव्य गति को प्राप्त होते हैं। हे ब्राह्मण, जो सदाचार और उचित उपचार-सेवा में लगे रहते हैं, वे मुझे प्रिय हैं।
Verse 17
संगृह्य मधुपर्कं वै इमं मन्त्रमुदाहरेत्॥
मधुपर्क को तैयार करके इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
Verse 18
मन्त्रः— ॐ एष हि देव भगवंस्तव गात्रसूतिḥ संसारमोक्षणकरो मधुपर्कनामाः॥ भक्त्या मयायं प्रतिपादितोऽद्य गृहाण देवेश नमो नमस्ते॥
मंत्र— ‘ॐ—हे देव, हे भगवन्! यह मधुपर्क नामक अर्पण आपके अंगों का स्पर्श करने वाला है और संसार-बंधन से मोक्ष देने वाला कहा गया है। आज मैंने इसे भक्ति से निवेदित किया है; हे देवेश, इसे स्वीकार करें—आपको बार-बार नमस्कार।’
Verse 19
मध्वेवं दधि सर्पिश्च कुर्याच्चैव समं तथा॥ विधिना मन्त्रपूतेन यदीच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम्॥
इस प्रकार मधु; और दही तथा घी भी समान मात्रा में करना चाहिए। यदि कोई सर्वोत्तम सिद्धि चाहता हो, तो मंत्र से पवित्र किए हुए विधि-नियम के अनुसार करे।
Verse 20
सामासाद्य ततः कृत्वा मम कर्मपरायणः॥ उचितेनोपचारेण यत्त्वया परिपृच्छितम्॥
फिर (उचित रीति से) समीप जाकर, मेरे कर्म में परायण होकर, उचित उपचार के साथ—जैसा तुमने पूछा है—वैसा करना चाहिए।
Verse 21
सरहश्च लघुर्देव एतत्तव न युज्यते॥ ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा मयाप्येवं प्रभाषितम्॥
हे देव! यह बात रहस्यपूर्ण और संक्षिप्त है; यह आपके योग्य नहीं ठहरती। ब्रह्मा के वचन सुनकर मैंने भी इसी प्रकार कहा।
Verse 22
पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व वसुन्धरे॥ यादृशो मधुपर्क्को वै या च तस्य महान् क्रिया॥
हे वसुन्धरे! मैं फिर एक और बात बताता हूँ, उसे सुनो—मधुपर्क कैसा होता है और उसकी महान् क्रिया क्या है।
The chapter frames madhuparka as a regulated act of dāna (gift-offering) integrated with mantra and proper procedure, presenting disciplined giving and correct ritual exchange (including pratigraha) as a means to uphold dharma and to orient the practitioner toward a higher gati, described in liberation-adjacent terms.
No tithi, nakṣatra, month, or seasonal timing is specified in the provided verses. The instructions focus on composition (madhu, dadhi, sarpis) and mantra-empowered procedure rather than calendrical scheduling.
Environmental stewardship is implicit through Pṛthivī’s role as interlocutor: the text positions terrestrial consciousness as asking for precise dharmic regulation. By emphasizing orderly ritual giving and restraint in practice, the narrative suggests that stable social-ritual norms function as a mechanism for maintaining cosmic and terrestrial equilibrium, rather than offering explicit ecological directives.
The passage references major cosmological figures—Varāha/Janārdana (Viṣṇu), Brahmā (Pitāmaha), and Rudra—within an origin narrative. No royal dynasties, human lineages, or historically situated sages are named in the provided excerpt.