Adhyaya 185
Varaha PuranaAdhyaya 18535 Shlokas

Adhyaya 185: Installation of a Bronze (Kāṁsya) Icon (Arcā)

Kāṁsyārcāsthāpanam

Ritual-Manual

इस अध्याय में वराह भगवान् पृथिवी को गृह-मन्दिर में अपनी कांस्य (काँस्य) अर्चा की स्थापना की विधि बताते हैं—सु-लक्षणयुक्त प्रतिमा का निर्माण, शुभ नक्षत्र व मुहूर्त का चयन, वाद्य-गान और मङ्गलाचार सहित प्रतिमा का आगमन, फिर आवाहन, स्नान, वस्त्र-भूषण और समर्पण का अनुशासित क्रम। एकत्व-प्रतिपादक प्रारम्भिक मन्त्र, देवता-ग्रह-दिक्-भूत-जल-औषधि आदि को समन्वित करने वाला विश्वात्मक आवाहन, तथा स्नान में तीर्थ-आवाहन मन्त्र दिए गए हैं। अधिवासन के बाद कलशों के पवित्र जल से अभिषेक, धूप-गन्ध-परिधान-दान, शान्ति-पाठ, प्रदक्षिणा, भागवतों व ब्राह्मणों का सत्कार, भोजनदान, शान्त्युदक छिड़काव और गुरु-पूजा का विधान है। स्थापना करने वाले और उसके कुलों के लिए पुण्य-फल का वचन देकर कहा गया है कि यह सुव्यवस्थित कर्म गृह और पृथिवी के कल्याण को स्थिर करता है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

kāṁsyārcā (bronze icon) and arcā-sthāpana (installation)nakṣatra-based auspicious timing (jyeṣṭhā, mūla; uttarā orientation)adhivāsana and kalāśa-snāpana (consecration and pot-bathing rite)śāntyudaka, śānti-pāṭha, and ritual pacificationcosmological integration: grahas, lokapālas, directions, elements, waters, and oṣadhiscommunal ethics of ritual: honoring brāhmaṇas, Bhāgavatas, and guru-pūjālineage merit (pitṛja/mātṛja kula) as social continuityPṛthivī-centered stewardship framing: harmonizing household practice with terrestrial order

Shlokas in Adhyaya 185

Verse 1

अथ कांस्यार्चास्थापनम् ॥ श्रीवराह उवाच ॥ कांस्येन प्रतिमां कृत्वा सुरूपां सुप्रतिष्ठिताम् ॥ सर्वाङ्गावयवैर्युक्तां विमलां कर्मनिर्मिताम् ॥

अब कांस्य (पीतल/काँसा) की मूर्ति की स्थापना। श्रीवराह बोले—कांस्य से सुन्दर रूप वाली, स्थापना के योग्य, समस्त अंग-उपांगों से युक्त, निर्मल और कुशल कारीगरी से निर्मित प्रतिमा बनाकर—

Verse 2

ज्येष्ठायां चैव नक्षत्रे मम वेश्मन्युपानयेत् ॥ गीतवादित्रशब्देन बहुभिर्मङ्गलैस्तथा ॥

और ज्येष्ठा नक्षत्र में उसे मेरे मंदिर/गृह में लाए; गान और वाद्यों के शब्दों के साथ तथा अनेक मंगल-क्रियाओं सहित।

Verse 3

अर्घ्यं गृहीय यथान्यायमिमं मन्त्रं उदाहरेत् ।

विधि के अनुसार अर्घ्य लेकर, तब इस मंत्र का उच्चारण करे।

Verse 4

योऽसौ भवान् सर्वयज्ञेषु पूज्यो ध्येयो गोप्ता विश्वकामो महात्मा ॥ प्रसन्नात्मा भगवान् मे प्रसन्नः सुपूजितस्तिष्ठ हि लोकनाथ ।

हे प्रभो! आप समस्त यज्ञों में पूज्य, ध्यानयोग्य, रक्षक, समस्त कामनाओं के पूर्णकर्ता और महात्मा हैं। प्रसन्नस्वरूप भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों। हे लोकनाथ! सम्यक् पूजित होकर यहाँ स्थिर रहें।

Verse 5

अर्घ्यं दत्त्वा यथान्यायं स्थापयेत् तदुदङ्मुखः ॥ यथान्यायेन संस्थाप्य कुर्याच्चैवाधिवासनम् ।

यथाविधि अर्घ्य अर्पित करके, उत्तरमुख होकर उसे स्थापित करे। विधिपूर्वक स्थापित कर लेने पर, फिर ‘आधिवासन’ संस्कार भी करे।

Verse 6

चतुरः कलशांश्चैव पञ्चगव्यसमन्वितान् ॥ सर्वगन्धैश्च लाजैश्च मधुना च विशेषतः ।

और चार कलश भी (तैयार करे), जो पञ्चगव्य से युक्त हों; समस्त सुगन्ध-द्रव्यों से, लाज (भुने धान) से, और विशेषतः मधु से (सम्पन्न हों)।

Verse 7

चतुरः कलशान् पूर्य स्नानार्थं मे समन्त्रकम् ॥ ततश्चास्तंगते सूर्ये शुद्धैर्भागवतैः सह ।

मेरे स्नान के लिए चार कलशों को मन्त्रसहित भरकर; फिर सूर्यास्त हो जाने पर, शुद्ध भागवत-भक्तों के साथ (आगे करे)।

Verse 8

कुर्यात् संस्थापनं तत्र ममार्चायास्तु पूजकः ॥ गृहीत्वा कलशांस्तत्र शुद्धान् भागवतांस्तथा ।

वहाँ पूजक मेरी अर्चा (प्रतिमा) की स्थापना करे। वहाँ कलशों को लेकर, तथा शुद्ध भागवतों को भी (संग में रखकर), (विधि सम्पन्न करे)।

Verse 9

नमो नारायणायेति उक्त्वा मन्त्रं उदाहरेत् ।

“नमो नारायणाय” कहकर, तत्पश्चात् मंत्र का उच्चारण करे।

Verse 10

विकार अविकार अकार सकार शकार षकार स्वच्छन्दरूपः क्षरमक्षरं धृतिरूपः अरूपमिति नमः पुरुषोत्तमायेति ॥ व्यतीतायां तु शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे ॥ अश्वेन च मुहूर्तेन प्राप्ते मूलेषु चोत्तरे ।

“(आप) विकार और अविकार हैं; अ, स, श, ष—ये अक्षर हैं; स्वेच्छारूप हैं; क्षर और अक्षर हैं; धृति-स्वरूप हैं; अरूप हैं”—इस प्रकार: “पुरुषोत्तम को नमस्कार।” और जब रात्रि बीत जाए तथा सूर्य उदित हो, और अश्विन नामक मुहूर्त आ पहुँचे, तथा (चन्द्र) मूल नक्षत्र में और उत्तर दिशा/खण्ड में हो…

Verse 11

पूर्वोक्तेषु विधानेन मम शास्त्रानुदर्शिनाम् ॥ स्थापयेद्द्वारमूले तु मम वेष्मनि सुन्दरि ।

पूर्वोक्त विधि के अनुसार, मेरे शास्त्र का अनुसरण करने वालों के लिए, हे सुन्दरी, मेरे मंदिर/गृह में द्वार के मूल में (उसको) स्थापित करे।

Verse 12

सर्वशान्त्युदकं गृहीय सर्वगन्धफलानि च ॥ नमो नारायणायेति उक्त्वा मन्त्रं उदाहरेत् ।

सर्व-शान्त्युदक और समस्त सुगन्धित द्रव्य तथा फल लेकर, “नमो नारायणाय” कहकर, फिर मंत्र का उच्चारण करे।

Verse 13

मन्त्रः— ॐ इन्द्रो भवान् त्वं च यमः कुबेरो जलेश्वरः सोमबृहस्पती च॥ शुक्रः शनैश्चरबुधौ सह सैहिकेयकेतू रविश्चैव धरात्मजस्त्वम्॥

मंत्र: “ॐ—आप इन्द्र हैं, और यम, कुबेर, जल के ईश्वर भी; आप सोम और बृहस्पति हैं। आप शुक्र हैं; और शनैश्चर तथा बुध, राहु और केतु सहित; तथा आप रवि (सूर्य) और धरात्मज (मंगल) भी हैं।”

Verse 14

तथैव सर्वौषधयो जलानि वायुः च पृथ्वी च स वायुसारथिः॥ नागाः सयक्षाश्च दिशश्च सर्वास्तस्मै नमस्ते पुरुषोत्तमाय इति॥

उसी प्रकार समस्त औषधियाँ, जल, वायु और पृथ्वी—तथा वह जिनका सारथी वायु है; नाग, यक्ष और समस्त दिशाएँ—उन पुरुषोत्तम को नमस्कार है।

Verse 15

अनेनैव तु मन्त्रेण कृत्वा कर्म सुपुष्कलम्॥ मम तां प्रतिमां गृह्य ततो वेश्मन्युपानयेत्॥

इसी मंत्र से विधि को पूर्ण रूप से संपन्न करके, मेरी उस प्रतिमा को लेकर फिर उसे गृह/पवित्र निवास-स्थान में ले जाए।

Verse 16

एकान्ते स्नापयेन मां च जलैः पूर्वाभिमन्त्रितैः॥ प्रगृह्य कलशेभ्यश्च जलं गन्धसमन्वितम्॥

एकांत स्थान में, पूर्व से मंत्राभिमंत्रित जलों से मेरा स्नान कराए; और कलशों से भी सुगंधयुक्त जल लेकर (अभिषेक करे)।

Verse 17

गात्रसंशोधनार्थाय इमं मन्त्रमुदाहरेत्॥

अंग-शुद्धि के लिए इस मंत्र का उच्चारण करे।

Verse 18

मन्त्रः— सरांसि ये ते च समस्तसागराः नद्यश्च तीर्थानि च पुष्कराणि॥ आयान्तु तान्येव तव प्रसादाच्छुद्ध्यै च मे स्युः पुरुषोत्तमाय इति॥

मंत्र— जो सरोवर, समस्त सागर, नदियाँ, तीर्थ और पुष्कर हैं, वे सब आपकी कृपा से यहाँ आएँ और मेरे शुद्धि-हेतु बनें; (नमः) पुरुषोत्तम को।

Verse 19

गन्धधूपादिभिश्चैव यथाविभवशक्तितः॥ पश्चाद्वस्त्राणि मे दद्यान्मम गात्रसुखानि च॥

सुगंध, धूप आदि से अपनी सामर्थ्य के अनुसार (पूजन करके), फिर मुझे ऐसे वस्त्र अर्पित करे जो शरीर को सुख देने वाले हों।

Verse 20

तान्यानयित्वा वस्त्राणि ममाग्रे स्थापयेन्नरः॥ उभौ तौ चरणौ नत्वा इमं मन्त्रमुदाहरेत्॥

वे वस्त्र लाकर मनुष्य उन्हें मेरे सामने रखे; उन दोनों चरणों को नमस्कार करके यह मंत्र उच्चारे।

Verse 21

मन्त्रः— वस्त्राणि देवेन्द्र मया हृतानि सूक्ष्माणि सौम्यानि सुखावहानि॥ गात्रस्य सन्तुष्टिकराणि तुभ्यं गृह्णीष्व देवेश सुलोकनाथ॥

मंत्र— हे देवेन्द्र! मैं ये वस्त्र लाया हूँ—सूक्ष्म, सौम्य और सुखदायक। हे देवेश, हे सुलोकनाथ! शरीर की तृप्ति हेतु इन्हें स्वीकार करें।

Verse 22

वेदोपवेद ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्वणवेद संस्तुत इति नमः परम्परायेति॥ अर्चितालङ्कृतं कृत्वा पूर्वन्यायेन सुन्दरी॥ पश्चान्मे प्रापणं दद्यान्मन्त्रवद्विधिपूर्वकम्॥

‘वेद-उपवेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—से स्तुत’—ऐसा कहकर ‘परंपरा को नमस्कार’ करे। हे सुन्दरी! पूर्वविधि से पूजन व अलंकरण करके, फिर मंत्र सहित विधिपूर्वक मुझे प्रापण (समापन-नैवेद्य) अर्पित करे।

Verse 23

दत्त्वा प्रापणकं तत्र दद्यादाचमनं ततः ॥ शान्तिपाठश्च वै कार्यो मन्त्रेणानेन सुन्दरि

वहाँ प्रापणक अर्पित करके, फिर आचमन हेतु जल दे; उसके बाद, हे सुन्दरी, इसी मंत्र से शान्तिपाठ अवश्य करे।

Verse 24

विद्याः सर्वे ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च ग्रहाः सर्वे सरितः सागराश्च ॥ इन्द्राद्यष्टौ लोकपालाश्च सर्वे पूर्वोक्ता ये सर्वशान्तिं च कुर्युः

समस्त विद्याएँ, ब्रह्म तथा ब्राह्मण; सभी ग्रह, नदियाँ और समुद्र; तथा इन्द्र आदि पूर्वोक्त आठों लोकपाल—ये सब पूर्ण शान्ति और सार्वभौम कल्याण करें।

Verse 25

आयाम यम कामदम वाम ॐ नमः पुरुषोत्तमायेति सूत्रम् ॥ वृत्तेष्वेवोपचारेषु मम कुर्यात्प्रदक्षिणम् ॥ अभिवादनं स्तुतिं चापि कृत्वा भागवतांश्छुचीन्

‘आयाम, यम, कामदम, वाम; ॐ—पुरुषोत्तम को नमस्कार’: यही मन्त्र-सूत्र है। नियत उपचरों के चक्र में मेरी प्रदक्षिणा करे; और अभिवादन व स्तुति करके, शुद्ध भागवत-भक्तों का सम्मान करे।

Verse 26

सम्पूज्य ब्राह्मणान्पश्चाद्भोजयेत् पायसादिभिः ॥ तेभ्यः शान्त्युदकं गृह्य द्विजेभ्यः कमलेक्षणे

ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन करके, फिर उन्हें पायस आदि से भोजन कराए। हे कमल-नेत्र! उनसे शान्त्युदक ग्रहण करे—यह द्विजों से ही प्राप्त किया जाए।

Verse 27

दद्यादभ्युक्षणं मह्यं तेनाहं पूजितोऽभवम् ॥ सर्वान्विसर्जयित्वा तु कुर्याद्वै गुरुपूजनम्

मेरे ऊपर अभ्युक्षण (पवित्र जल का छिड़काव) करे; उससे मैं पूजित हो जाता हूँ। फिर सबको आदरपूर्वक विदा करके, निश्चय ही गुरु-पूजन करे।

Verse 28

तेनाहं पूजितो देवि एवमेतन्न संशयः ॥ ब्राह्मणान्मम भक्तांश्च गुरूंश्चैव हि निन्दति

हे देवि! उससे मैं पूजित होता हूँ—यह निःसंदेह है। पर जो ब्राह्मणों, मेरे भक्तों और गुरुओं की निन्दा करता है, वह इस मर्यादा के विरुद्ध चलता है।

Verse 29

नाशयिष्यामि तं देवि सत्यं मतेद्ब्रवीमि ते ॥ जलस्य बिन्दवो यावन्मम गात्रेषु तिष्ठति

हे देवी, मैं उसे नष्ट कर दूँगा—यह सत्य मैं अपने मत के अनुसार तुमसे कहता हूँ—जब तक जल की बूँदें मेरे अंगों पर ठहरी रहें।

Verse 30

तावद्वर्षसहस्राणि मम लोकेषु तिष्ठति ॥ य एतेन विधानेन स्थापयिष्यति मां नरः

उतने ही सहस्रों वर्षों तक वह मेरे लोकों में निवास करता है—वह मनुष्य जो इस विधि के अनुसार मुझे स्थापित करेगा।

Verse 31

तारितं च कुलं तेन पितृजं मातृजं तथा ॥ एतत्ते कथितं भद्रे कांस्येन स्थापनं मम

उसके द्वारा कुल का उद्धार होता है—पितृकुल और मातृकुल दोनों का। हे भद्रे, यह मैंने तुमसे कहा: कांस्य द्वारा मेरा स्थापन।

Verse 32

कथयिष्यामि ते ह्येवं रौप्येण स्थापनं मम

और अब मैं तुम्हें इसी प्रकार रजत द्वारा मेरा स्थापन बताऊँगा।

Verse 33

मन्त्रः— आदिर्भवान्ब्रह्मयुगान्तकल्पः सर्वेषु कालेष्वपि कल्पभूतः ।। एको भवान्नास्ति कश्चिद्द्वितीय उपागतस्तिष्ठ हि लोकनाथ ॥

मंत्र: आप आद्य हैं, ब्रह्मा-युग के अंत का कल्प हैं; समस्त कालों में भी आप ही कल्प-स्वरूप हैं। आप एक ही हैं, आपका कोई दूसरा नहीं। समीप आए हुए, यहाँ स्थिर रहें, हे लोकनाथ।

Verse 34

एवं मां स्नाप्य विधिना मम कर्मानुसारिणः ।। एवं न्यायेन मां तत्र अर्चयित्वा यथोचितम् ॥

इस प्रकार विधिपूर्वक मेरा स्नान कराकर, मेरे विधानानुसार कर्म करने वाले; इसी न्याययुक्त विधि से वहाँ मेरा यथोचित पूजन करें।

Verse 35

अङ्गुलीयकवासोभिर्दानसम्माननादिभिः ।। यो गुरुं पूजयेद्भूमे भक्तियुक्तेन चेतसा ॥

अंगूठियाँ, वस्त्र, दान, सम्मान आदि से—जो कोई पृथ्वी पर गुरु का भक्तियुक्त चित्त से पूजन करता है।

Frequently Asked Questions

The chapter frames correct ritual installation as an ethics of order: disciplined preparation, non-arbitrary timing, and respectful social conduct (honoring Bhāgavatas, brāhmaṇas, and the guru). Philosophically, the mantras emphasize a unifying cosmic principle—aligning directions, planets, elements, waters, and medicinal plants—so that household practice participates in a wider equilibrium that implicitly supports Pṛthivī (earthly stability and well-being).

The text specifies auspicious timing via nakṣatras and day-night markers: installation is associated with Jyeṣṭhā nakṣatra; additional timing cues include after night has passed (vyatītāyāṁ śarvaryām) and at sunrise (udite divākare), with mention of Mūla and an “uttara” (northern/upper) alignment. It also notes a step performed after sunset (astaṁgate sūrye) in the sequence leading to installation.

Environmental balance appears through ritual ecology: the bathing rite invokes rivers, oceans, lakes, tīrthas, and sacred ponds (puṣkaraṇīs) as purifying networks, and the cosmological mantra includes waters (jalāni), winds (vāyu), earth (pṛthvī), and medicinal plants (oṣadhayaḥ). Read as terrestrial ethics, the chapter depicts human practice as ideally harmonized with hydrological and elemental systems, reinforcing a model of respectful engagement with Pṛthivī’s sustaining resources.

No dynastic or royal lineages are named. The text references cultural-religious roles and groups—brāhmaṇas, Bhāgavatas (devotional adherents), and the guru—alongside cosmological figures (Indra, Yama, Kubera, Soma, Bṛhaspati, Śukra, Śani, Budha, Rāhu/Siṁhikeya, Ketu, Ravi/Sūrya, and Dharātmaja). Lineage is treated generically through pitṛja and mātṛja kula (paternal and maternal lines) as beneficiaries of the rite.