
Aparādha-nirdeśaḥ prāyaścitta-vidhiś ca; Saukara–Mathurā-tīrtha-māhātmyaṃ
Ritual-Manual and Sacred-Geography (Prāyaścitta + Tīrtha-māhātmya)
पृथिवी धर्म‑कर्म की शुद्ध व्यवस्था को लेकर पूछती है कि ‘अपराध’ कैसे उत्पन्न होता है और अशुद्ध आचरण से पूजा‑फल कैसे नष्ट होता है। वराह तीस‑तीन अपराधों का निरूपण करते हैं—निषिद्ध भोजन, स्पर्श‑वर्जन, मंदिर में अनुचित व्यवहार और भक्ति‑शिष्टाचार की त्रुटियाँ। फिर वे प्रायश्चित्त बताते हैं—उपवास, पंचगव्य‑पंचामृत आदि से शोधन, तथा प्राजापत्य, चान्द्रायण, पराक आदि व्रत, जिनसे विष्णु‑पूजा का अधिकार पुनः प्राप्त होता है। मानवों की व्यापक भूलों से व्याकुल पृथिवी सरल उपाय चाहती है; वराह सौकर तीर्थ और मथुरा में स्नान‑व्रत द्वारा वार्षिक व स्थान‑विशेष शुद्धि की सलाह देते हैं, जो संचित पाप हरकर लोक‑धर्म और सामाजिक संतुलन को पुनः स्थापित करती है।
Verse 1
धरण्युवाच ॥ तवापराधाद्देवेश वर्ज्योऽयं वैष्णवेन च ॥ विनापराधो मनुजः सापराधश्च जायते ॥
धरणी बोली—हे देवेश! तुम्हारे प्रति अपराध के कारण यह व्यक्ति वैष्णव द्वारा भी त्याज्य है। मनुष्य जो निरपराध होता है, वह अपराध के कारण ही सापराध बन जाता है।
Verse 2
कर्मणाचरणेनैव करणेन जुगुप्सितः ॥ तच्च पूजाफलं सर्वं ज्ञायते तद्वदस्व मे ॥
कर्म के द्वारा—उसके आचरण और साधन के द्वारा भी—मनुष्य निंदनीय हो जाता है; और उससे पूजा का समस्त फल प्रभावित होता है। वह बात मुझे बताइए।
Verse 3
श्रीवराह उवाच ॥ कर्मणा मनसा वाचा ये पापरुचयो जनाः ॥ भक्षणं दन्तकाष्ठस्य राजान्नस्य तु भोजनम् ॥
श्रीवराह बोले—जो लोग कर्म, मन और वाणी से पाप में रुचि रखते हैं, वे (ऐसे अनुचित कर्म करते हैं जैसे) दंतकाष्ठ का भक्षण और राजान्न का भोजन।
Verse 4
मैथुनं शवसंस्पर्शं पुरीषोत्सर्गमेव च ॥ सूतकीउदक्याप्रेक्षा च स्पर्शनं मेहनं तथा ॥
(ऐसे कर्मों में) मैथुन, शव का स्पर्श, मलोत्सर्ग, सूतकी/उदक्यावस्था वाली स्त्री को देखना, (ऐसे प्रसंगों में) स्पर्श करना तथा मूत्रत्याग भी है।
Verse 5
अभाष्य भाषणं चैव पिण्याकस्य च भक्षणम् ॥ रक्तपारक्यमलिनवस्त्रधारित्वनीलिजम् ॥
जो नहीं बोलना चाहिए उसका बोलना, और पिण्याक (तेल-खली) का भक्षण; तथा रक्त-सम्बन्धी अशौच, परकीय-संसर्ग, मैले वस्त्र धारण करना और नीलि (नील/नीला रंग) से जुड़ी अशुद्धि—ये भी दोष हैं।
Verse 6
गुरोश्चालीकनिर्बन्धः पतितान्नस्य भक्षणम् ॥ अभक्ष्य भक्षणं चैव तण्डुलीयविभीतकम् ॥
गुरु के प्रति झूठा आरोप/हठ, पतित (आचारभ्रष्ट) व्यक्ति के अन्न का भक्षण, और अभक्ष्य का भक्षण; तथा तण्डुलीय और विभीतक आदि का भी यहाँ निषिद्ध सूची में ग्रहण—ये दोष हैं।
Verse 7
अदानं तुवरान्नस्य जालपादवराकयोः ॥ भक्षणं देवतागारे सोपानत्कोपसर्पणम् ॥
तुवरा-अन्न का दान न करना, और जाल-, पाद-, वराक आदि का भक्षण; तथा देवालय में सोपान (सीढ़ी) तक अनुचित रीति से पहुँचना/चलना—ये भी (यहाँ) दोष माने गए हैं।
Verse 8
तथैव देवपूजायां निषिद्धकुसुमार्च्चनम् ॥ अनुत्तार्य च निर्माल्यं पूजा क्षीणान्धकारयोः ॥
देव-पूजा में निषिद्ध पुष्पों से अर्चन करना दोष है; और निर्माल्य (उपयोग हो चुके/मुरझाए हार-फूल) को हटाए बिना पूजा करना भी दोष है; तथा क्षीण-अन्धकार (मंद प्रकाश/अँधेरा) की अवस्था में की गई पूजा भी नियमबद्ध विषय के रूप में कही गई है।
Verse 9
पानं सुराया देवस्य अन्धकारे प्रबोधनम् ॥ तावत्कर्मार्च्चने विष्णोरनमस्करणं तथा
सुरा का पान, अन्धकार में देवता को जगाना, और उसी प्रकार विष्णु के अर्चन-कर्म में नमस्कार न करना—ये पूजा के दोष बताए गए हैं।
Verse 10
दूरस्थो न नमस्कारं कुर्यात्पूजा तु राक्षसी ॥ एकरात्रं द्विरात्रं वा त्रिरात्रं स्नानमेव च ॥ सवासाः पञ्चगव्याशी मलसंवस्त्रकं क्रमात् ॥ नीलिरक्षापनॊदार्थं गोमयेन प्रघर्षणम् ॥ प्राजापत्येन शुद्धिः स्यान्नीलिवस्त्रस्य धारणात्
दूर से नमस्कार नहीं करना चाहिए; इस प्रकार की पूजा ‘राक्षसी’ कही गई है। एक, दो या तीन रात तक स्नान करे। वस्त्र सहित रहकर पंचगव्य का सेवन करे और मैला वस्त्र क्रम से शुद्ध करे। ‘नीली’ दोष दूर करने हेतु गोबर से घर्षण करे। नीली-रंजित वस्त्र धारण करने पर प्राजापत्य व्रत से शुद्धि होती है।
Verse 11
चान्द्रायणद्वयं कुर्याद्गुरोः क्षयितमुत्तमम् ॥ चान्द्रायणं पराकं च पतितान्नस्य भक्षणात्
गुरु से संबंधित क्षयित/उपभुक्त दोष के लिए उत्तम प्रायश्चित्त रूप में द्वि-चान्द्रायण करना चाहिए। और पतित के अन्न का भक्षण करने पर चान्द्रायण तथा पराक—दोनों करने चाहिए।
Verse 12
चान्द्रायणं पराकं च प्राजापत्यं तथैव च ॥ गोप्रदानं च भोज्यं च अभक्ष्यस्य च भक्षणे
अभक्ष्य (वर्जित) वस्तु के भक्षण पर चान्द्रायण, पराक और प्राजापत्य—ये व्रत करने चाहिए; साथ ही गोदान करना और भोजन-दान/भोज कराना भी चाहिए।
Verse 13
उपवासस्तु पञ्चाहं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ सोपानत्कश्चरेत्पाद कॄच्छ्रस्य द्विरभोजनम्
पाँच दिन का उपवास पंचगव्य से शुद्ध/सम्पन्न होता है। कॄच्छ्र व्रत का ‘पाद’ (चतुर्थांश) सोपानत्क होकर, विधि अनुसार दो बार भोजन करते हुए करना चाहिए।
Verse 14
पुष्पाभावेऽर्च्चनं स्नानं देवस्पर्शं च कारयन् ॥ अनिर्माल्यनमस्कारं स्नानं पञ्चामृतॆन तु
फूल न होने पर स्नान द्वारा अर्चन करे और देवता का (विधिपूर्वक) स्पर्श कराए। यदि निर्माल्य (माला-प्रसाद) हटाए बिना नमस्कार किया हो, तो पंचामृत से स्नान करना विधान है।
Verse 15
सुरापाने द्विजातीनां चान्द्रायणचतुष्टयम् ॥ तथैव द्वादशाब्दं तु प्राजापत्यत्रयं चरेत्
द्विजों द्वारा मदिरापान करने पर चार चान्द्रायण व्रत का विधान है; इसी प्रकार बारह वर्ष का अनुशासन और तीन प्राजापत्य प्रायश्चित्त भी करना चाहिए।
Verse 16
ब्रह्मकूर्च्चेन शुद्धिः स्याद्गोप्रदानत्रयेण च ॥ त्रयाणामेकरात्रेण पञ्चामृतनिषेवणात्
ब्रह्मकूर्च व्रत से तथा तीन बार गोदान करने से शुद्धि होती है; और इन तीनों (प्रकरणों) में एक रात्रि के व्रत में पंचामृत सेवन करने से भी शुद्धि होती है।
Verse 17
मुच्यते त्वपराधैस्तु तथा विष्णोः स्तवं पठन् ॥ एतत्ते कथितं गुह्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि
और ऐसे अपराधों से विष्णु का स्तवन-पाठ करने से मुक्ति मिलती है। यह गुप्त उपदेश तुम्हें कहा गया; अब और क्या सुनना चाहते हो?
Verse 18
मुहूर्तमात्रे सा देवी संज्ञां प्राप्येदमब्रवीत् ॥ अपराधे कृते देव सूतकी हि प्रजायते
क्षणमात्र में वह देवी होश में आकर बोली— “हे देव! अपराध होने पर सूतक (अशौच) की अवस्था अवश्य उत्पन्न होती है।”
Verse 19
प्रायश्चित्तानि भूरीणि कृतानि तु नरैः सदा ॥ तेन मे मनसो मोहः दुःखदो यः समभ्ययात् ॥
“लोग सदा अनेक प्रायश्चित्त करते रहते हैं; उसी कारण मेरे मन में दुःख देने वाला मोह उत्पन्न हो गया है।”
Verse 20
अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र येन त्वं नृषु तुष्यसि ॥ पूजितः सफलश्चासि अपराधविशोधनम् ॥
क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है जिससे आप मनुष्यों से प्रसन्न हों—जिससे पूजित होकर आप फलदायक हों और अपराधों का शोधन हो जाए?
Verse 21
श्रीवराह उवाच ॥ संवत्सरस्य मध्ये तु तीर्थे सौकरवे मम ॥ कृतोपवासः स्नानेन गङ्गायां शुद्धिमाप्नुयात् ॥
श्रीवराह ने कहा: वर्ष के भीतर, मेरे सौकरव तीर्थ में, जो उपवास करता है वह गङ्गा में स्नान से शुद्धि प्राप्त करता है।
Verse 22
मथुरायां तथाप्येवं सापराधः शुचिर्भवेत् ॥ अनयोस्तीर्थयोरेवं यः सेवेत सकृन्नरः ॥
इसी प्रकार मथुरा में भी, अपराधयुक्त व्यक्ति भी शुद्ध हो सकता है। इस प्रकार जो मनुष्य इन दोनों तीर्थों का एक बार भी सेवन करता है…
Verse 23
सहस्रजन्मसु कृतानपराधाञ्जहाति सः ॥ स्नानात्पानात्तथा ध्यानात्कीर्तनाद्धारणात्तथा ॥
…वह सहस्र जन्मों में किए हुए अपराधों को त्याग देता है—स्नान से, तीर्थजल-पान से, तथा ध्यान से, कीर्तन से और धारण (एकाग्रता) से भी।
Verse 24
श्रवणान्मननाच्चैव दर्शनाद्याति पातकम् ॥ पृथिव्युवाच ॥ मथुरा सूकरं चैव द्वावेतौ तव वल्लभौ ॥
श्रवण से, मनन से और दर्शन से भी पाप दूर हो जाता है। पृथिवी ने कहा: मथुरा और सूकर—ये दोनों ही आपको प्रिय हैं।
Verse 25
विशिष्टमनयोः किं च सत्यं ब्रूहि सुरेश्वर ॥ श्रीवराह उवाच ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रसरांसि च ॥
“इन दोनों में विशेषता क्या है? हे देवेश! सत्य कहिए।” श्रीवराह बोले—“पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, और समुद्र तक के सरोवर तथा जलाशय भी…”
Verse 26
कुब्जाम्रकं प्रशंसन्ति सदा मद्भावभाविताः ॥ तस्मात्कोटिगुणं गुह्यं सौकरतीर्थमुत्तमम् ॥
जो मेरे भाव से भावित हैं, वे सदा कुब्जाम्रक की प्रशंसा करते हैं। इसलिए उत्तम सौकर-तीर्थ गुप्त है और कोटि-गुणा श्रेष्ठ (फलदायक) है।
Verse 27
गुह्याद्गुह्यतरं पुण्यं माथुरं मम मण्डलम् ॥ फलं परार्द्धगुणितं सिततीर्थान्न संशयः ॥
गुप्त से भी अधिक गुप्त, पवित्र माथुर-मण्डल मेरा ही क्षेत्र है। उसका फल परार्ध-गुणित है; सीता-तीर्थ से भी बढ़कर—इसमें संशय नहीं।
Verse 28
अटित्वा सर्वतीर्थानि कुब्जाम्रादीनि नित्यशः ॥ अघं विनश्यते क्षिप्रं मथुरामागतस्य च ॥
कुब्जाम्रक आदि समस्त तीर्थों में नित्य भ्रमण करके भी, जो मथुरा में आ गया है—उसका पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है।
Verse 29
विश्रमणाच्च विश्रान्तिस्तेन संज्ञा वरा मम ॥ सारात्सारतरं स्नानं गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्
विश्रमण से ही विश्रान्ति होती है; इसलिए वही मेरा श्रेष्ठ नाम है। यह स्नान सारों का भी सार है—गुह्यों में परम गुह्य और उत्तम।
Verse 30
गतिरन्वेषणीयानां मथुरा परमा गतिः ॥ कुब्जाम्रके सौकरे च मथुरायां विशेषतः
साधकों द्वारा खोजे जाने योग्य परम लक्ष्य मथुरा है। विशेषतः कुब्जाम्रक और सौकर में, और मथुरा में तो विशेष ही।
Verse 31
विना सांख्येन योगेन मुच्यते नात्र संशयः ॥ या गतिर्योगयुक्तस्य ब्राह्मणस्य मनीषिणः
सांख्य और योग के बिना मुक्ति नहीं होती—इसमें कोई संशय नहीं। योगयुक्त बुद्धिमान ब्राह्मण की जो परम अवस्था होती है—
Verse 32
सा गतिस्त्यजतः प्राणान्मथुरायां न संशयः ॥ एतत्ते कथितं सारं मया सत्येन सुव्रते ॥ न तीर्थं मथुराया हि न देवः केशवात्परः
वही परम अवस्था मथुरा में प्राण त्यागने वाले को भी निःसंदेह प्राप्त होती है। हे सुव्रते, यह सार मैंने तुम्हें सत्यपूर्वक कहा है: मथुरा के समान कोई तीर्थ नहीं, और केशव से बढ़कर कोई देव नहीं।
Verse 33
अपराधास्त्रयस्त्रिंशत्समाख्याता मया धरे ॥ एभिर्युक्तस्तु पुरुषो विष्णुं नैव प्रपश्यति
हे धरा, मैंने तैंतीस अपराध बताए हैं। इनसे युक्त पुरुष विष्णु का यथार्थ दर्शन नहीं कर पाता।
Verse 34
पुनः पुनरुवाचेदं देवदेवो जनार्दनः ॥ मोहङ्गता तु शृणुते नष्टसंज्ञेव लक्ष्यते
देवदेव जनार्दन ने यह बात बार-बार कही। पर मोह में पड़ा व्यक्ति सुनता तो है, किंतु ऐसा प्रतीत होता है मानो उसकी चेतना नष्ट हो गई हो।
Verse 35
एकाहं मार्गशीर्ष्यां च द्वादश्यां सितवैष्णवम् ॥ गङ्गासागरिकं नाम पुराणेषु च पठ्यते
मार्गशीर्ष मास की एकादशी तथा शुक्ल द्वादशी को वैष्णव-व्रत कहा गया है; और ‘गंगा-सागरिका’ नाम भी पुराणों में पढ़ा जाता है।
The chapter frames ethical life as disciplined eligibility (adhikāra) for worship: improper conduct becomes aparādha that obscures devotional perception, while regulated expiation (prāyaścitta) restores social-ritual order. Through Pṛthivī’s anxiety about widespread human error, the narrative links personal discipline to broader terrestrial stability, implying that correct conduct and purification practices help sustain a balanced human–earth relationship.
The text specifies an annual timing (“within the year,” saṃvatsarasya madhye) for observance at Saukara tīrtha, and mentions Mārgaśīrṣa with a Vaiṣṇava dvādaśī (bright fortnight, śukla/sita dvādaśī) in connection with the Gaṅgā-sāgarika designation. It also uses counted-night observances (eka-rātra, dvi-rātra, tri-rātra) and longer vow-frames such as dvādaśābda (twelve-year) prescriptions in certain cases.
By placing Pṛthivī as the questioner and emotional barometer, the chapter treats ritual-ethical disorder as a burden on the earth: widespread aparādha produces social impurity and distress, while tīrtha-based bathing, fasting, and regulated conduct function as mechanisms for restoring harmony. The elevation of specific landscapes (Saukara, Mathurā, Gaṅgā-sāgara) presents the environment as an active moral-ecological resource—sites where human behavior can be recalibrated toward cleanliness, restraint, and renewal.
The chapter does not invoke explicit royal dynasties or named sage lineages in this excerpt. The principal figures are Varāha (as teacher and locus of tīrtha authority) and Pṛthivī (as the terrestrial interlocutor). Social categories appear indirectly through references to dvijāti conduct and guru-related offenses, indicating normative Brahmanical disciplinary contexts rather than specific historical genealogies.