Adhyaya 173
Varaha PuranaAdhyaya 17314 Shlokas

Adhyaya 173: Account of Gokarṇa’s Śuka-Satra, Temple Consecration, and the Resulting Merit

Gokarṇa-śuka-satra-pratiṣṭhā-phala-kathana

Ritual-Manual (Tīrtha-Māhātmya and Dāna-Śrāddha Praxis)

वराह पृथ्वी से गोकरण के शुभ निवास के बाद की कथा कहते हैं। गोकरण शुक, उसके माता‑पिता और धर्मशील गृहस्थ का सत्कार करता है तथा मथुरा में सामूहिक पूजा और उत्सव कराता है। क्रमबद्ध अतिथि‑सेवा, सार्वजनिक धर्म‑पोषण, निर्विघ्न महाकर्म और ब्राह्मणों को नियमित अन्नदान का महत्त्व बताया गया है। वह शुक के नाम पर ‘शुकेश्वर’ नामक महान शिवालय की प्रतिष्ठा करता है और ब्राह्मणों के लिए विशाल सत्‍त्र‑भोज करता है, जो ‘शुक‑सत्र’ कहलाता है। तीर्थ‑स्नान, श्राद्ध, सुवर्ण‑गोदान और सामुदायिक अनुष्ठान से लोककल्याण तथा शुक (और एक शाबर दम्पति) की परलोक‑उन्नति व मुक्ति का फल बताया गया है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

tīrtha-māhātmya (merit of Sarasvatī-saṅgama and Mathurā)satkāra and dāna (hospitality, food-gifts, suvarṇa-dāna, go-dāna)śrāddha praxis and ancestral/social obligationliṅga/āyatana-pratiṣṭhā (Śukeśvara installation)satra (large-scale Brahmin-feeding rite) and community welfaremokṣa and svarga as narrative outcomes of ritual economyecological sacrality of river confluences (saṅgama as protected landscape)

Shlokas in Adhyaya 173

Verse 1

श्रीवराह उवाच ॥ तत्र स्थित्वा यथान्यायं गोकरणः सर्वमङ्गलम् ॥ शुकं च मातापितरौ साधुभार्याचतुष्टयम्

श्रीवराह बोले—वहाँ विधिपूर्वक ठहरकर, सर्वमंगलस्वरूप गोकर्ण ने शुक, अपने माता-पिता तथा चारों साध्वी पत्नियों का यथोचित सम्मान किया।

Verse 2

सम्मान्य पूजयामास यथाविभवशक्तितः ॥ मथुरावासिभिर्लोकैरुद्यानं कारयंस्तदा

उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबका आदर कर पूजा की; और तब मथुरा-निवासी लोगों के साथ मिलकर एक उद्यान बनवाया।

Verse 3

स्वयं च कृतवांस्तत्र अविघ्नस्य महामखम् ॥ भक्ष्यभोज्ये ब्राह्मणेभ्यो ददौ दानानि नित्यशः

और उसने स्वयं वहाँ विघ्न-निवारण हेतु एक महान यज्ञ किया; तथा ब्राह्मणों को नित्य भोजन और भक्ष्य आदि दान में देता रहा।

Verse 4

गीतवादित्रमाङ्गल्यं पुत्रवृद्धौ यथोचितम् ॥ तत्सर्वं कृतवाँल्लोको गोकरणस्य महात्मनः

पुत्रवृद्धि और समृद्धि के लिए यथोचित गीत, वाद्य और मंगलोत्सव—यह सब महात्मा गोकर्ण के लिए लोगों ने किया।

Verse 5

एकैकं च परिष्वज्य प्रणिपत्य यथाक्रमम् ॥ मातापित्रोः प्रणम्याथ शिरसा पादपङ्कजे

एक-एक को आलिंगन कर क्रम से प्रणाम करके, फिर माता-पिता के चरण-कमलों पर सिर रखकर उसने वंदना की।

Verse 6

शुकं हृदि समालोक्य प्ररुरोद स वै वणिक् ॥ यस्य प्रसादाज्जीवश्च धर्मश्चानुत्तमा गतिः

हृदय में शुक को देखकर वह वणिक् रो पड़ा; जिसकी कृपा से जीवन, धर्म और परम उत्तम गति प्राप्त होती है।

Verse 7

विशिष्टेन मया प्राप्तो राज्ञो लाभः सुपुष्कलः ॥ शुक पुत्रान्मया प्राप्तमिह लोके परत्र च

आपकी विशिष्ट कृपा से मैंने राजा से अत्यन्त प्रचुर लाभ पाया; और हे शुक, पुत्रों के द्वारा इस लोक और परलोक—दोनों में सिद्धि प्राप्त की।

Verse 8

एवं वसन्सुखं तत्र गोकरणः सह बन्धुभिः ॥ शुक नाम्ना कृतं तेन शिवस्यायतनं महत्

इस प्रकार वहाँ बन्धुओं सहित सुखपूर्वक रहते हुए गोकर्ण ने शुक के नाम से शिव का एक महान् आयतन (मन्दिर) बनवाया।

Verse 9

शुकेश्वरं प्रतिष्ठाप्य दिव्यं सत्रं चकार ह ॥ ब्राह्मणानां शते द्वे च मिष्टान्नवरभोजने

शुकेश्वर की प्रतिष्ठा करके उसने दिव्य सत्र किया; और दो सौ ब्राह्मणों के लिए मधुर अन्नों सहित उत्तम भोजन का आयोजन हुआ।

Verse 10

शुकप्रदाने गोकर्णः फलं स्नानस्य सङ्गमात्॥ श्राद्धं सुवर्णैर्गोदानं कृत्वा तस्मै ददौ च सः॥

शुक के दान में गोकर्ण ने संगम-स्नान का फल प्राप्त किया। उसने सुवर्ण सहित श्राद्ध और गोदान करके वह सब उसे अर्पित किया।

Verse 11

शबराय सभार्याय तेन स्वर्गं गतश्च ह॥ शुकोदरेण सहितो विमानवरमास्थितः॥

उस पुण्य के प्रभाव से वह शबर और उसकी पत्नी के साथ स्वर्ग को गया। शुकोदर सहित होकर उसने उत्तम दिव्य विमान पर आरूढ़ हुआ।

Verse 12

एतत्ते कथितं सर्वं मथुरायां महत्फलम्॥ सरस्वतीसङ्गमस्य गोकर्णस्य शिवस्य च॥

यह सब तुम्हें कहा गया—मथुरा में प्राप्त होने वाला महान फल: सरस्वती-संगम का, गोकर्ण का और शिव का भी।

Verse 13

गोकर्णस्य तु सन्तानमक्षयं धर्मतोऽव्ययम्॥ सम्भूतं स सुखं भुक्त्वा ततो मोक्षमवाप्नुयात्॥

गोकर्ण के लिए एक वंश उत्पन्न हुआ—अक्षय, और धर्म के कारण अव्यय। वह सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करे।

Verse 14

शुकसत्रमिति ख्यातं मृत्तो मुक्तिमवाप सः॥ विमानवरमारुह्य स्वर्गलोकं गतः शुकः॥

यह ‘शुक-सत्र’ नाम से प्रसिद्ध हुआ; मृत्यु के बाद उसने मुक्ति पाई। उत्तम विमान पर चढ़कर शुक स्वर्गलोक को गया।

Frequently Asked Questions

The chapter models dharma as socially embedded practice: orderly honoring of parents and guests, sustained charitable giving (especially food-gifts), and public religious patronage are presented as producing communal well-being and stable moral continuity, with liberation/ascension framed as narrative consequences.

No explicit tithi, lunar month, or seasonal marker is stated in the provided verses. The practices are described as ongoing (e.g., nityaśaḥ dāna to Brahmins) and occasion-based (satra, śrāddha) without calendrical specification here.

Environmental ethics appear indirectly through the sacralization of place: the Sarasvatī-saṅgama and Mathurā are treated as landscapes where bathing, ritual order, and collective restraint confer ‘mahat-phala.’ This frames river confluences as protected ecological-cultural zones whose integrity is maintained through regulated, communal religious use rather than exploitative activity.

The narrative references Gokarṇa (central agent), Śuka (recipient and eponym of the satra and shrine), Śiva (as the deity of the installed āyatana/Śukeśvara), a rājā (king) mentioned as a source of material gain, and a Śabara with his wife as beneficiaries of the ritual economy; no explicit dynastic genealogy is provided in these verses.