
Mathurā-kṣetrapāla-darśana-phalaṃ tathā Mathurā-māhātmya-tīrtha-saṅkhyā
Ancient-Geography (Tīrtha-Māhātmya) and Ritual-Efficacy Discourse
पृथ्वी पूछती है कि मथुरा की रक्षा करने वाला कौन है और उसके दर्शन से क्या पुण्य मिलता है। वराह बताते हैं कि मथुरा का क्षेत्रपाल भूतपति है, जो हर/रुद्र ही हैं; उनके मात्र दर्शन से धर्मफल प्राप्त होता है और पाप नष्ट होते हैं। पूर्व प्रसंग में सहस्र-वर्ष तप के बाद हर को वर मिलता है और वे मथुरा में स्थायी निवास मांगते हैं; तब उन्हें क्षेत्रपाल नियुक्त किया जाता है, जिससे उनके दर्शन से ही क्षेत्र के फल सुलभ हो जाते हैं और मथुरा को संसार-बंधन काटने वाला, जगत्-नवनीकरण करने वाला क्षेत्र कहा जाता है। आगे वराह मथुरा की पवित्र सीमा निर्धारित कर अनेक तीर्थों की सूची देते हैं और इसे पूर्व-गुप्त ज्ञान बताकर धर्मयुक्त यात्रा व आचरण का मार्ग दिखाते हैं।
Verse 1
धरण्युवाच ॥ मथुरां रक्षते कोऽसौ क्षेत्रपालो व्यवस्थितः ॥ तेन दृष्टेन यत्पुण्यं कथयस्वाखिलं प्रभो ॥
धरणी ने कहा— मथुरा की रक्षा करने हेतु स्थित वह क्षेत्रपाल कौन है? उसे देखने से जो पुण्य होता है, हे प्रभो, वह सब मुझे बताइए।
Verse 2
श्रीवराह उवाच ॥ दृष्ट्वा भूतपतिं देवं वरदं पापनाशनम् ॥ तस्य दर्शनमात्रेण मथुरायां फलं भवेत् ॥
श्रीवराह ने कहा— भूतों के स्वामी, वरदाता और पापनाशक उस देव का दर्शन करके, केवल उसके दर्शन मात्र से ही मथुरा में (सम्बन्धित) फल प्राप्त होता है।
Verse 3
पुरा वर्षसहस्रं तु तपस्तप्तं सुदारुणम् ॥ पूर्णे वर्षसहस्रे तु मया सन्तोषितो हरः ॥
पूर्वकाल में मैंने एक सहस्र वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप किया। सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर मेरे द्वारा हर (शिव) संतुष्ट हुए।
Verse 4
वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ॥ ईश्वर उवाच ॥ सर्वगस्त्वं हि देवेश मया ज्ञातं सुनिश्चितम् ॥
“वर माँग लो—तुम्हारा कल्याण हो—जो तुम्हारे मन में स्थित है।” ईश्वर बोले: “हे देवेश! आप सर्वव्यापी हैं; यह मैंने निश्चयपूर्वक जान लिया है।”
Verse 5
मथुरायां च देव त्वं क्षेत्रपालो भविष्यसि ॥ त्वयि दृष्टे महादेव मम क्षेत्रफलं भवेत् ॥
और हे देव! मथुरा में आप क्षेत्रपाल होंगे। हे महादेव! आपके दर्शन से मेरे क्षेत्र का फल (पुण्य) प्राप्त होगा।
Verse 6
अन्यथा नाप्नुयात् सिद्धिमेवं एतन्न संशयः ॥ येन यद्यादृशं पुण्यं कृतं तीर्थे प्रयत्नतः ॥
अन्यथा सिद्धि प्राप्त नहीं होती—ऐसा ही है, इसमें संशय नहीं। जिस प्रकार का पुण्य तीर्थ में प्रयत्नपूर्वक किया गया हो…
Verse 7
भजते मनुजः सिद्धिमात्मभावेन तादृशीम् ॥ मम क्षेत्रप्रवेशे च भूमिः संसारनाशिनी ॥
मनुष्य वैसी सिद्धि आत्मभाव (अन्तःकरण की भावना) से प्राप्त करता है। और मेरे क्षेत्र में प्रवेश करने पर यह भूमि संसार-बन्धन का नाश करने वाली है।
Verse 8
मथुरायां च मे स्थानं सदा देव प्रदीयताम् ॥ देवदेव वचः श्रुत्वा हरिर्वचनमब्रवीत् ॥
“और मथुरा में मेरे लिए सदा निवास-स्थान प्रदान किया जाए, हे देव।” देवों के देव के वचन सुनकर हरि ने प्रत्युत्तर में कहा।
Verse 9
इन्द्रस्यैव पुरी रम्या यथा नाकेऽमरावती ॥ जम्बूद्वीपे तथोत्कृष्टा मथुरा मम वल्लभा ॥
“जैसे स्वर्ग में इन्द्र की रमणीय पुरी अमरावती है, वैसे ही जम्बूद्वीप में मथुरा—जो मुझे प्रिय है—सर्वश्रेष्ठ है।”
Verse 10
न मया कथितं देवि ब्रह्मणश्च महात्मनः ॥ रुद्रस्य न मया पूर्वं कथितं च वसुन्धरे ॥
“हे देवी, यह मेरे द्वारा महात्मा ब्रह्मा को भी नहीं कहा गया; और हे वसुन्धरा, पूर्व में रुद्र को भी मैंने नहीं बताया।”
Verse 11
मया सुगोपितं पूर्वं गुह्याद्गुह्यतरं परम् ॥ अत्र क्षेत्रे पुरी रम्या सर्वरत्नविभूषिता ॥
“पूर्व में यह मेरे द्वारा भली-भाँति गुप्त रखा गया था—गुप्त से भी अधिक गुप्त, परम। इस क्षेत्र में एक रमणीय पुरी है, जो समस्त रत्नों से विभूषित है।”
Verse 12
तस्यां तिष्ठन्ति तीर्थानि तानि वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च ॥
उस (क्षेत्र) में तीर्थ प्रतिष्ठित हैं; मैं उन्हें बताऊँगा—उसे सुनो। वे साठ कोटि सहस्र और साठ कोटि शत भी हैं।
Verse 13
तीर्थसंख्या च वसुधे मथुरायां मयोदिता ॥ गोवर्द्धनं तथाक्रूरं द्वे कोटी दक्षिणोत्तरे ॥
हे वसुधा! मथुरा में तीर्थों की संख्या मैंने कही है। गोवर्धन तथा आक्रूर—दक्षिण और उत्तर भागों में दो कोटि (तीर्थ) हैं।
Verse 14
प्रस्कन्दनं च भाण्डीरं कुरुक्षेत्रसमानि षट् ॥ पुण्यात्पुण्यतरं श्रेष्ठमेतद्विश्रान्तिसंज्ञकम् ॥
प्रस्कन्दन और भाण्डीर—ये छह तीर्थ कुरुक्षेत्र के समान हैं। यह श्रेष्ठ है, पुण्य से भी अधिक पुण्यदायक; इसे ‘विश्रान्ति’ कहा जाता है।
Verse 15
असिकुण्डं सवैकुण्ठं कोटितीर्थोत्तमं स्मृतम् ॥ अविमुक्तं सोमतीर्थं यमनं तिन्दुकं ततः ॥
असिकुण्ड, सवैकुण्ठ और कोटितीर्थ—ये उत्तम माने गए हैं। फिर अविमुक्त, सोमतीर्थ, यमन और तिन्दुक (भी हैं)।
Verse 16
चक्रतीर्थं तथाक्रूरं द्वादशादित्यसंज्ञितम् ॥ एतत्पुण्यं पवित्रं च महापातकनाशनम् ॥
चक्रतीर्थ तथा आक्रूर (तीर्थ) ‘द्वादशादित्य’ नाम से प्रसिद्ध है। यह पुण्यकारी, पवित्र और महापातकों का नाश करने वाला है।
Verse 17
कुरुक्षेत्राच्छतगुणं मथुरायां न संशयः ॥ ये पठन्ति महाभागाः शृण्वन्ति च समाहिताः ॥
मथुरा में (पुण्य) कुरुक्षेत्र से सौ गुना है—इसमें संदेह नहीं। जो महाभाग इसे पढ़ते हैं और जो एकाग्र होकर सुनते हैं—
Verse 18
मथुरायास्तु माहात्म्यं ते यान्ति परमं पदम् ॥ कुलानि ते तारयन्ति द्वे शते विंशयोर् द्वयोः ॥
मथुरा के माहात्म्य से वे परम पद को प्राप्त होते हैं। वे अपने कुलों का भी उद्धार करते हैं—दो सौ और दो बार बीस, अर्थात् दो सौ चालीस पीढ़ियों तक।
Verse 19
एतत्ते कथितं देवि सर्वपातकनाशनम् ॥ तीर्थानां चैव माहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥
हे देवी! यह तुम्हें कहा गया—जो समस्त पापों का नाश करने वाला है; और तीर्थों का भी माहात्म्य। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?
Verse 20
विंशतिर्योजनानां हि माठुरं मम मण्डलम् ॥ पदे पदेऽश्वमेधानां फलं नात्र विचारणा ॥
मेरी मथुरा-भूमि बीस योजन तक फैली है। यहाँ प्रत्येक पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है—इसमें कोई संदेह नहीं।
Verse 21
एतन्मरणकाले तु यः स्मरेत्प्रयतो नरः ॥ स गच्छेत्परामां सिद्धिमिह संसारनाशिनीम् ॥
जो मनुष्य संयमपूर्वक मृत्यु-काल में इसका स्मरण करता है, वह यहीं संसार का नाश करने वाली परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
The chapter frames sacred territory as an ethical landscape: the text instructs that mindful approach to a kṣetra (Mathurā) and encounter (darśana) with its guardian-deity mediates access to the kṣetra’s benefits. It also depicts knowledge of place (tīrtha cataloging and boundaries) as a regulated disclosure (guhya), implying responsible movement through and valuation of terrestrial space.
No tithi, nakṣatra, māsa, or seasonal observance is specified in the provided verses. The only explicit temporal marker is a mythic duration—"varṣa-sahasra" (a thousand years) of tapas—used to ground the narrative of boon-granting and the establishment of the kṣetrapāla.
Through the Varāha–Pṛthivī frame, the text treats Earth as a morally charged domain where certain regions are described as saṃsāra-nāśinī (world-negating/world-transcending) by entry itself. By defining Mathurā’s extent (maṇḍala) and enumerating its tīrthas, it models an early form of ‘terrestrial stewardship’ discourse: the land is mapped, valued, and approached via rules of encounter (darśana) and guardianship (kṣetrapāla), reinforcing careful, non-random engagement with place.
The chapter references deities as principal figures rather than human dynasties: Bhūtapati/Hara/Rudra (as the guardian), Indra (via Amarāvatī as a comparison), Brahmā (as a figure to whom the knowledge was not previously disclosed), and Viṣṇu/Varāha as narrator. No royal lineages, named sages, or administrative genealogies appear in the provided passage.