Adhyaya 157
Varaha PuranaAdhyaya 15750 Shlokas

Adhyaya 157: Praise of the Malayārjuna Sacred Ford and the Mathurā–Yamunā Pilgrimage Cycle

Malayārjuna-tīrtha-prāśaṃsā tathā Mathurā-Yamunā-māhātmya

Ritual-Manual; Sacred Geography (Tīrtha-māhātmya)

इस अध्याय में वराह पृथिवी को यमुना-तट और मथुरा के आसपास के मलयार्जुन तीर्थ आदि पवित्र जल, सरोवर और उपवनों का वर्णन करते हैं। स्नान, उपवास, अर्चना, दान तथा पिण्ड-दान/श्राद्ध को महापाप-नाशक बताकर उनके फलस्वरूप सूर्यलोक, रुद्रलोक, ब्रह्मलोक और “मम लोक” की प्राप्ति कही गई है। ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी और चैत्र शुक्ल द्वादशी जैसे विशेष व्रत-काल निर्दिष्ट हैं। कृष्ण की बाल-लीलाओं—शकट-भंग और यमलार्जुन—से भूगोल को जोड़ा गया है तथा मातलि द्वारा गोपीश्वर की स्थापना का प्रसंग आता है। पृथिवी की भूमिका तीर्थ-रक्षा व अनुशासित आचरण तथा जल-परिदृश्य के सावधान उपयोग वाली धर्मसम्मत तीर्थ-पर्यावरण व्यवस्था के रूप में प्रतिपादित है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

tīrtha-māhātmya (sacred geography as moral pedagogy)snāna–dāna–upavāsa (ritual triad for purification)piṇḍa-dāna and śrāddha (ancestral sustenance rites)tithi-based observance (Jyeṣṭha/Caitra dvādaśī; Bhādrapada kṛṣṇa saptamī)water-body ethics (kuṇḍa, kūpa, hrada as managed sacred resources)

Shlokas in Adhyaya 157

Verse 1

अथ मलयार्जुनतीर्थादिस्नानादिप्रशंसा ॥ श्रीवराह उवाच ॥ यमुनापारमुल्लङ्घ्य तत्रैव च महामुने ॥ मलयार्जुनकं तीर्थं कुण्डं तत्र च विद्यते ॥

श्रीवराह ने कहा—हे महामुने, यमुना के पार उतरकर वहीं मलयार्जुन नामक तीर्थ है, और वहाँ एक कुण्ड भी विद्यमान है।

Verse 2

पर्यस्तं तत्र शकटं भिन्नभाण्डकुटीघटम् ॥ तत्र स्नानोपवासाभ्यामनन्तं फलमश्रुते ॥

वहाँ एक उलटा पड़ा शकट (गाड़ी) है, और टूटे हुए पात्र—कुटी और घट—दिखते हैं। वहाँ स्नान और उपवास से अनन्त फल (पुण्य) कहा गया है।

Verse 3

द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य ज्येष्ठमासे वसुन्धरे ॥ तत्र स्नानेन दानेन महापातकनाशनम् ॥

हे वसुन्धरे, ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को वहाँ स्नान और दान करने से महापातकों का नाश होता है।

Verse 4

ज्येष्ठस्य शुक्लद्वादश्यां स्नात्वा सुनियतेंद्रियः ॥ मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राप्नोति परमां गतिम् ॥

ज्येष्ठ की शुक्ल द्वादशी को स्नान करके, इन्द्रियों को भलीभाँति संयमित कर, मथुरा में हरि के दर्शन करने वाला परम गति को प्राप्त होता है।

Verse 5

यमुनासलिले स्नातः शुचिर्भूत्वा जितेंद्रियः ॥ समभ्यर्च्याच्युतं सम्यक् प्राप्नोति परमां गतिम् ॥

यमुना के जल में स्नान करके, शुद्ध होकर और इन्द्रियों को वश में करके, जो अच्युत का विधिपूर्वक सम्यक् पूजन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

Verse 6

अपि चास्मत्कुले जातः कालिन्दीसलिले प्लुतः ॥ अर्चयिष्यति गोविन्दं मथुरायामुपोषितः ॥

और फिर, हमारे कुल में जन्मा हुआ भी—कालिन्दी (यमुना) के जल में निमग्न होकर और मथुरा में उपवास करके—गोविन्द की आराधना करेगा।

Verse 7

इति गायन्ति पितरः परलोकगताः सदा ॥ द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु समभ्यर्च्य जनार्दनम् ॥

इस प्रकार परलोकगामी पितर सदा गाते हैं—‘ज्येष्ठ मास की द्वादशी को जनार्दन का विधिपूर्वक पूजन करके…’

Verse 8

धन्योऽसौ पिण्डनिर्वापं यमुनायां करिष्यति ॥ तत्रैव तु महातीर्थे वने बहुलसंज्ञके ॥

धन्य है वह जो यमुना में पिण्ड-निर्वाप (पितृ-तर्पण हेतु पिण्डदान) करेगा—वहीं, उस महातीर्थ में, बहुला नामक वन में।

Verse 9

तत्र स्नातो नरो देवि रुद्रलोके महीयते ॥ द्वादश्यां चैत्रमासे तु शुक्लपक्षे वसुन्धरे ॥

हे देवी, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य रुद्रलोक में सम्मानित होता है। और हे वसुन्धरे, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को…

Verse 10

दृश्यन्तेऽहरहस्तत्र आदित्याः शुभकारिणः ॥ तत्र चार्कस्थले कुण्डे स्नानं यः कुरुते नरः ॥

वहाँ प्रतिदिन शुभ करने वाले आदित्यगण दर्शन देते हैं। और वहीं अर्कस्थल के कुण्ड में जो मनुष्य स्नान करता है…

Verse 11

सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोकं व्रजेनरः ॥ तत्राथ मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति ॥

वह समस्त पापों से मुक्त होकर सूर्यलोक को जाता है। फिर वहाँ प्राण त्यागकर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 12

अर्कस्थलसमीपे तु कूपं तु विमलोदकम् ॥ सप्तसामुद्रिकं नाम देवानामपि दुर्लभम् ॥

अर्कस्थल के समीप निर्मल जल वाला एक कूप है, जिसका नाम ‘सप्तसामुद्रिक’ है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

Verse 13

तत्र स्नानेन वसुधे स्वच्छन्दगमनालयः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति ॥

हे वसुधे! वहाँ स्नान करने से मनुष्य को निर्बाध गमन का आश्रय (स्वतंत्र गति का अधिकार) मिलता है। फिर वहीं प्राण त्यागकर वह मेरे लोक को जाता है।

Verse 14

यस्तत्र कुरुते स्नानमेक रात्रोषितो नरः ॥ स मत्प्रसादात्सुश्रोणि वीरलोके महीयते ॥

जो मनुष्य वहाँ एक रात्रि निवास करके उस स्थान पर स्नान करता है, हे सुश्रोणि! वह मेरी कृपा से वीरलोक में सम्मानित होता है।

Verse 15

अथात्र मुञ्चते प्राणान्ममलोकं स गच्छति ॥ कुशस्थलं च तत्रैव पुण्यं पापहरं शुभम् ॥

फिर जो वहाँ अपने प्राण त्यागता है, वह मेरे लोक को जाता है। वहीं कुशस्थल है—पुण्यदायक, शुभ और पापहर।

Verse 16

तत्र स्नातो नरो देवि ब्रह्मलोके महीयते ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति ॥

हे देवी, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है। और जो वहाँ प्राण त्यागता है, वह मेरे लोक को जाता है।

Verse 17

तत्र वीरस्थलं नाम क्षेत्रं गुह्यं परं मम ॥ आसन्नसलिलं चैव पद्मोत्पलविभूषितम् ॥

वहाँ ‘वीरस्थल’ नामक क्षेत्र है—मेरा गूढ़ और परम धाम; जिसके निकट जल है और जो कमल तथा उत्पल से विभूषित है।

Verse 18

तत्र पुष्पस्थलं नाम शिवक्षेत्रमनुत्तमम् ॥ तत्र स्नानेन मनुजः शिवलोके महीयते ॥

वहाँ ‘पुष्पस्थल’ नामक, अनुपम शिव-क्षेत्र है। वहाँ स्नान करने से मनुष्य शिवलोक में सम्मानित होता है।

Verse 19

तत्र गोपीश्वरो नाम महापातकनाशनः ॥ कृष्णस्य रमणार्थं हि सहस्राणि च षोडश ॥

वहाँ ‘गोपीश्वर’ नाम (का तीर्थ/लिंग) है, जो महापातकों का नाशक कहा गया है। कृष्ण के रमणार्थ, वास्तव में, सोलह सहस्र (रूप) थे।

Verse 20

गोप्यो रूपाणि चक्रे च तत्र क्रीडनके हरिः ॥ यदा बालेन कृष्णेन भग्नार्जुनयुगं तथा ॥

वहाँ खेल-खेल में हरि ने गोपियों के रूप धारण किए। और जब बालकृष्ण ने उसी प्रकार अर्जुन के दो वृक्षों को तोड़ डाला…

Verse 21

शकटं च तदा भिन्नं घटभाण्डकुटीरकम् ॥ ताभिस्तत्रैव गोविन्दं क्रीडन्तं च यदृच्छया ॥

तब गाड़ी टूट गई और घड़ों-भांडों वाली कुटिया भी क्षतिग्रस्त हो गई। वहीं संयोग से उन्होंने गोविन्द को खेलते हुए पाया।

Verse 22

परिष्वज्य हि धर्मेण व्याजेन च सुगोपितम् ॥ मातलिस्तत्र चागत्य देवैरुक्तं यथोदितम् ॥

उन्होंने मर्यादा के अनुसार उसे आलिंगन किया और बहाने से उस बात को भली-भाँति छिपा लिया। तब मातलि वहाँ आया; देवताओं ने जैसा कहा था वैसा ही कहा गया।

Verse 23

गोपीमण्डलपातेन स्नापितो हेमकुण्डलः ॥ गोप्यो गायन्ति नृत्यन्ति कृष्ण कृष्ण इति ब्रुवन् ॥

गोपियों के मंडल के प्रवाह/पतन से स्वर्ण-कुंडलधारी (कृष्ण) स्नान-सा हो गया। गोपियाँ ‘कृष्ण, कृष्ण’ कहते हुए गाती और नाचती हैं।

Verse 24

तत्र गोपीश्वरं देवं मातलिः स्थाप्य पूजितम् ॥ कूपं च स्थापयामास माङ्गल्यैः कलशैः शुभैः ॥

वहाँ मातलि ने गोपीश्वर देव की स्थापना करके पूजन किया। और मंगलमय शुभ कलशों के साथ एक कुआँ भी स्थापित कराया।

Verse 25

सप्तसामुद्रिकं नाम कूपं तु विमलोदकम् ॥ देवस्याग्रे तु वसुधे गोपा यस्य महात्मनः ॥

‘सप्तसामुद्रिक’ नाम का निर्मल जल वाला कूप देवता के अग्रभाग में स्थित था—हे वसुधा—उस महात्मा का, जिसका संबंध गोप-स्वरूप से है।

Verse 26

गोपीवेषधरं देवं अभिषेकं चकार ह ॥ आनीय सप्त कलशान् रत्नौषधिपरिप्लुतान् ॥

उसने गोप-वेष धारण करने वाले देव का अभिषेक किया और रत्नों तथा औषधियों से सुवासित/परिप्लुत सात कलश लाकर चढ़ाए।

Verse 27

पितरश्चापि नन्दन्ति पानीयं पिण्डमेव च ॥ सप्तसामुद्रिके कूपे यः श्राद्धं सम्प्रदास्यति ॥

जो ‘सप्तसामुद्रिक’ कूप पर श्राद्ध अर्पित करता है, उसके जल-तर्पण और पिण्ड-दान से पितर भी आनंदित होते हैं।

Verse 28

पितरस्तस्य तृप्यन्ति कोटिवर्षशतान्यलम् ॥ गोविन्दस्य च देवस्य तथा गोपीश्वरस्य च ॥

उसके पितर करोड़ों वर्षों के शत-शत काल तक पूर्णतः तृप्त रहते हैं—यह गोविन्द-देव तथा गोपीश्वर के प्रसंग में कहा गया है।

Verse 29

मध्ये तु मरणं यस्य शक्रस्यैति सलोकताम् ॥ तथा बहुलरुद्रस्य गोविन्दस्यैव मध्यतः ॥

जो इस क्षेत्र के मध्य में देह त्यागता है, वह शक्र के लोक को प्राप्त होता है; और गोविन्द के ठीक मध्य में (मरण होने पर) बहुलरुद्र के लोक को प्राप्त होता है।

Verse 30

तद्वद्ब्रह्माणमाशास्य गोपीशस्यैव मध्यतः ॥ एतेषु स्नानदानेन पिण्डपातेन भामिनि ॥

उसी प्रकार ब्रह्मा के विषय में भी गोपीश के मध्य से यह कहा गया है। हे सुन्दरी! इन स्थानों पर स्नान और दान करने से तथा पिण्ड-प्रदान करने से—

Verse 31

नरस्तारयते पुंसां दश पूर्वान्दशापरान् ॥ एषु स्नातो नरो देवि देवैश्च सह मोदते ॥

मनुष्य अपने से पहले की दस और बाद की दस पीढ़ियों का उद्धार करता है। हे देवी! इन तीर्थों में स्नान करने वाला मनुष्य देवताओं के साथ आनन्दित होता है।

Verse 32

तत्राथ मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति ॥ वसुपत्रं महातीर्थं पुण्यं परममुत्तमम् ॥

फिर जो वहाँ प्राण त्याग देता है, वह मेरे लोक को जाता है। ‘वसुपत्र’ नामक वह महातीर्थ परम पवित्र और सर्वोत्तम है।

Verse 33

मथुरादक्षिणे पार्श्वे क्षेत्रं फाल्गुनकं तथा ॥ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च परलोके महीयते ॥

मथुरा के दक्षिण पार्श्व में ‘फाल्गुनक’ नामक क्षेत्र भी है। वहाँ स्नान करके और (उसका जल) पीकर मनुष्य परलोक में सम्मानित होता है।

Verse 34

तत्र फाल्गुनके चैव तीर्थे परमदुर्लभे ॥ वृषभाञ्जनकं नाम क्षेत्रं मे दुर्लभं महत्

वहाँ ‘फाल्गुनक’ नामक परम दुर्लभ तीर्थ में ‘वृषभाञ्जनक’ नाम का मेरा महान् क्षेत्र है, जो दुर्लभ है।

Verse 35

तत्राभिषेकं यः कुर्यात्स देवैः सह मोदते ॥ तत्र यो मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति

जो वहाँ अभिषेक करता है, वह देवताओं के साथ आनंदित होता है; और जो वहाँ प्राण त्यागता है, वह मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 36

अस्ति तालवनं नाम धेनुकासुररक्षितम् ॥ मथुरापश्चिमे भागे अदूरादर्धयोजनम्

तालवन नाम का एक वन है, जो धेनुकासुर द्वारा रक्षित है; वह मथुरा के पश्चिम भाग में, अधिक दूर नहीं—लगभग आधा योजन—स्थित है।

Verse 37

अस्ति संपिठकं नाम अस्मिन् क्षेत्रे परं मम ॥ तत्र कुण्डं विशालाक्षि प्रसन्नसलिलं शुभम्

मेरे इस क्षेत्र में ‘संपिठक’ नाम का परम स्थान है। वहाँ, हे विशालाक्षि, एक शुभ कुण्ड है, जिसका जल स्वच्छ और शांत है।

Verse 38

तत्र स्नानं च ये कुर्युरेकरात्रोषिता नराः ॥ अग्निष्टोमफलं चैव लभन्ते नात्र संशयः

जो पुरुष वहाँ स्नान करते हैं और एक रात्रि निवास करते हैं, वे अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं—इसमें कोई संदेह नहीं।

Verse 39

अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम लोकं स गच्छति ॥ देवकीगर्भसंभूतो वसुदेवगृहे शुभे

और जो यहाँ प्राण त्यागता है, वह मेरे लोक को जाता है। (अब वृत्तांत:) देवकी के गर्भ से उत्पन्न, वसुदेव के शुभ गृह में…

Verse 40

तत्र पुण्येन हि मया रविराराधितः शुभः ॥ लब्धः प्राज्ञो मया पुत्रो रूपवांश्च गुणान्वितः

वहाँ मैंने अपने पुण्य के बल से शुभ रवि (सूर्य) की आराधना की। उसके फल से मुझे बुद्धिमान, रूपवान और गुणसम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ।

Verse 41

तत्रैवं तु ततो दृष्टः पद्महस्तो दिवाकरः ॥ मासि भाद्रपदे देवी तिग्मतेजा विभावसुः

तब वहाँ उसी प्रकार कमल-हस्त दिवाकर (सूर्य) के दर्शन हुए। हे देवी, भाद्रपद मास में तीक्ष्ण तेज वाला विभावसु प्रकट हुआ।

Verse 42

सप्तम्यां कृष्णपक्षस्य रविस्तिष्ठति सर्वदा ॥ तस्मिन्नहनि यः स्नानं कुर्यात्कुण्डे समाहितः

कृष्णपक्ष की सप्तमी को रवि-व्रत सदा प्रतिष्ठित है। उस दिन जो एकाग्रचित्त होकर कुण्ड में स्नान करता है…

Verse 43

न तस्य दुर्लभं लोके सर्वदाता दिवाकरः ॥ आदित्येऽहनि संप्राप्ते सप्तम्यां तु वसुन्धरे

उसके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता, क्योंकि दिवाकर (सूर्य) सर्वदाता है। हे वसुन्धरे, सप्तमी को जब आदित्य का दिन आता है…

Verse 44

नरो वाप्यथवा नारी प्राप्नोत्यविकलं फलम् ॥ तत्रैव तु तपस्तप्तं राज्ञा शन्तनुना पुरा ॥

चाहे पुरुष हो या स्त्री, वह अखण्ड फल प्राप्त करता है। और उसी स्थान पर प्राचीन काल में राजा शन्तनु ने तप किया था।

Verse 45

आदित्यं तु पुरः स्थाप्य प्राप्तो भीष्मो महाबलः ॥ शन्तनुः प्राप्य तं पुत्रं गतोऽसौ हस्तिनापुरम् ॥

आदित्य को अग्र में स्थापित कर (पूजन का लक्ष्य बनाकर) महाबली भीष्म प्राप्त हुए। शंतनु उस पुत्र को पाकर हस्तिनापुर चले गए।

Verse 46

तत्र स्नातो नरो याति मम लोकं न संशयः ॥ अस्ति भाण्डह्रदं नाम परपारेषु दुर्लभम् ॥

वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य निःसंदेह मेरे लोक को जाता है। वहाँ भाण्डह्रद नाम का एक सरोवर है, जो परले तट पर दुर्लभ है।

Verse 47

ख्याता एते पञ्च देशा महापापविनाशनाः ॥ तेषु स्नानेषु वसुधे ब्रह्मणा सह मोदते ॥

ये पाँच देश महापाप-विनाशक के रूप में प्रसिद्ध हैं। हे वसुधा, इनमें स्नान करने से मनुष्य ब्रह्मा के साथ आनंदित होता है।

Verse 48

पितरस्तारितास्तेन कुलानां सप्तसप्ततिः ॥ सोमवारे त्वमायां वै पिण्डदानं करोति यः ॥

उससे पितर तर जाते हैं और कुलों की सतहत्तर पीढ़ियाँ लाभ पाती हैं। जो अमावस्या के दिन, सोमवार को पिण्डदान करता है, वह निश्चय ही यह पुण्य पाता है।

Verse 49

तत्र कुण्डं स्वच्छजलṃ नीलोत्पलविभूषितम् ॥ तत्र स्नानेन दानेन वाञ्छितं फलमाप्नुयात् ॥

वहाँ एक कुण्ड है, जिसका जल स्वच्छ है और जो नीलकमलों से सुशोभित है। वहाँ स्नान और दान करने से इच्छित फल प्राप्त होता है।

Verse 50

तत्र स्नानेन दानेन वाञ्छितं फलमाप्नुयात् ॥

वहाँ स्नान करने और दान देने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

Frequently Asked Questions

The chapter frames pilgrimage as disciplined, socially ordered conduct: bodily restraint (niyama, jitendriya), responsible ritual use of water sites (kuṇḍa/kūpa/hrada), and reciprocal obligations to ancestors through piṇḍa-dāna/śrāddha. The narrative logic links ethical self-regulation and careful engagement with terrestrial places to purification and communal continuity.

Key timings include Jyeṣṭha-māsa śukla-dvādaśī (noted for bathing, gifting, and seeing Hari in Mathurā), Caitra-māsa śukla-pakṣa dvādaśī (bathing linked to attaining Varāha’s loka), and Bhādrapada-māsa kṛṣṇa-pakṣa saptamī (a Sūrya-focused bathing observance). The text also mentions a Monday (somavāra) context for piṇḍa-dāna in connection with ancestral satisfaction.

By presenting multiple named water bodies and groves as morally charged landscapes, the chapter encourages regulated access—bathing, drinking, and offerings performed with restraint and timing—implicitly promoting preservation of shared freshwater resources. Pṛthivī’s presence as interlocutor positions these tīrthas as Earth’s managed ecologies, where correct practice functions as a cultural mechanism for protecting and sustaining sacred hydroscapes.

The narrative references Kṛṣṇa’s childhood setting in Mathurā/Vraja motifs (including the broken śakaṭa and arjuna pair), the charioteer Mātali (who installs and consecrates Gopīśvara and establishes the Saptasāmudrika well), and royal genealogy motifs involving King Śantanu and Bhīṣma in connection with Sūrya worship and tapas.