Varaha Purana - Adhyaya 151
Varaha PuranaAdhyaya 15184 Shlokas

Adhyaya 151: The Sacred Greatness of Lohārgala (The ‘Iron-Bolt’ Tīrtha)

Lohārgala-māhātmya

Tīrtha-māhātmya (Pilgrimage Geography & Ritual-Manual)

इस अध्याय में पृथिवी, पूर्व में सुने माहात्म्यों के बाद, वराह से पूछती है कि क्या सानन्दूर से भी बढ़कर कोई और ‘गुह्य’ तथा शुभ क्षेत्र है। वराह हिमालय-प्रदेश में म्लेच्छों के बीच स्थित लोहार्गल तीर्थ का वर्णन करते हैं, जो पुण्यवानों और उनके स्मरण-भक्तों को सुलभ है। वे बताते हैं कि वैष्णवी माया से उन्होंने दिव्य ‘अर्गला’ (रक्षा-बंध/अवरोध) स्थापित कर शत्रु शक्तियों को दबाया और फिर स्नान, उपवास आदि के फल निर्धारित किए। लोहार्गल-परिसर के अनेक कुण्डों का विवरण आता है—उनकी जलधाराओं की संख्या, व्रत-उपवास की विधि, नारद-कुमार-गौरी आदि के दर्शन, तथा क्रमशः मिलने वाली परलोक-गतियाँ; अंत में वराहलोक-प्राप्ति का आश्वासन है। पृथिवी का प्रश्न शुद्धि, अनुशासन और नियत तीर्थ-सेवा से धरती के कल्याण-स्थैर्य की स्थापना को रेखांकित करता है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

Lohārgala-kṣetra as a guhyatīrtha (esoteric pilgrimage complex)Ritual bathing (snāna/abhiṣeka) linked to fasting regimens (ekabhakta, pañcakāla, saptarātra, etc.)Mythic foundation via Vaiṣṇava māyā and cosmic conflict (deva–asura yuddha)Terrestrial sanctification: Earth (Pṛthivī) as interlocutor and beneficiary of regulated sacred geographySoteriological hierarchy: loka-attainments culminating in Varāha’s lokaTextual secrecy and controlled transmission (not to be given to ‘just anyone’)

Shlokas in Adhyaya 151

Verse 1

अथ लोहर्गलमाहात्म्यम् ॥ सूत उवाच ॥ सानन्दूरस्य माहात्म्यमेतच्छ्रुत्वा वसुन्धरा ॥ कृताञ्जलिपुटा भूत्वा वराहं पुनरब्रवीत् ॥

अब लोहर्गल का माहात्म्य आरम्भ होता है। सूतजी बोले—सानन्दूर की महिमा यह सुनकर वसुन्धरा (पृथ्वी) ने हाथ जोड़कर फिर वराह भगवान् से कहा।

Verse 2

धरण्युवाच ॥ श्रुतमेतज्जगन्नाथ विष्णो गुह्यमनुत्तमम् ॥ यच्छ्रुत्वा सुमहाभाग जाता॒स्मि विगतज्वरा ॥

धरणी बोली—हे जगन्नाथ विष्णु! यह अनुपम रहस्य मैंने सुन लिया। इसे सुनकर, हे परम भाग्यशाली, मैं ज्वररहित (दुःखमुक्त) हो गई हूँ।

Verse 3

अपरं वा॒स्ति चेत्किञ्चिद्गुह्यं क्षेत्रं शुभावहम् ॥ सानन्दूरात्परं गुह्यं क्षेत्रमस्ति न वा परम् ॥

यदि कोई और भी कोई गुप्त, शुभफलदायी तीर्थक्षेत्र हो, तो बताइए—क्या सानन्दूर से भी अधिक गुप्त कोई क्षेत्र है, या उससे परे कुछ नहीं?

Verse 4

सुरकरण नृसिंह लोकनाथ युतससुरसुरधीऱ देववीर ॥ कमलदलसहस्रनेत्र रूपो जयति कृतान्तसमानकालरूपः ॥

जय हो उस देववीर नरसिंह की—जो देवों और असुरों में धीर, लोकनाथ है; जिसकी देह कमलदल-सदृश सहस्र नेत्रों से युक्त है, और जिसका कालरूप स्वयं कृतान्त (मृत्यु) के समान है।

Verse 5

गद्गदं वचनं श्रुत्वा पृथिव्याः स जनार्दनः ॥ उवाच मधुरं वाक्यं सर्वलोकार्त्तिहा हरिः ॥

पृथ्वी के गद्गद वचन सुनकर वह जनार्दन—समस्त लोकों के दुःख हरने वाले हरि—ने मधुर वाणी में उत्तर दिया।

Verse 6

श्रीवराह उवाच ॥ शृणु देवि च तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ गुह्यमन्यत्प्रवक्ष्यामि मद्व्रतः कर्मणो जनिः ॥

श्रीवराह बोले—हे देवी, जो तुम मुझसे पूछती हो उसे सत्य रूप से सुनो। मैं एक और गोपनीय विषय बताऊँगा—मेरे व्रत और उसके कर्मकाण्ड की उत्पत्ति।

Verse 7

ततः सिद्धवटे गत्वा त्रिंशद्योजनदूरतः ॥ म्लेच्छमध्ये वरारोहे हिमवन्तं समाश्रितम् ॥

तत्पश्चात् मैं सिद्धवट गया, जो तीस योजन की दूरी पर था। हे सुन्दरी, म्लेच्छों के मध्य स्थित, हिमालय के निकट आश्रय लिया।

Verse 8

तत्र लोहर्गले क्षेत्रे निवासो विहितः शुभः ॥ गुह्यं पञ्चदशायामं समन्तात्पञ्चयोजनम् ॥

वहाँ ‘लोहर्गल’ नामक क्षेत्र में एक शुभ निवास-स्थान स्थापित किया गया। वह स्थान ‘गुप्त’ कहा गया है—लंबाई में पंद्रह (योजन) और चारों ओर पाँच योजन तक विस्तृत।

Verse 9

दुर्गमं दुःसहं चैव पापैः सर्वत्र वेष्टितम् ॥ सुलभं पुण्ययुक्तानां मम चिन्तानुसारिणाम् ॥

वह स्थान दुर्गम और दुःसह है, और सर्वत्र पाप से घिरा हुआ है; परन्तु पुण्ययुक्त—जो मेरी चिन्ता/स्मरण का अनुसरण करते हैं—उनके लिए वह सहज सुलभ है।

Verse 10

ततो मे दानवाः सर्वे क्रमन्तो लोकमुत्तमम् ॥ मया चैवान्तरं कृत्वा कृत्वा मायां च वैष्णवीम् ॥

तत्पश्चात् मेरे सभी दानव उत्तम लोक की ओर बढ़ चले; और मैंने भी बीच में अन्तर (विभाजन) रचकर वैष्णवी माया का प्रादुर्भाव किया।

Verse 11

तत्र ब्रह्मा च रुद्राश्च स्कन्देन्द्रो समुरुद्गणाः ॥ आदित्या वसवो वायुरश्विनौ च महौजसम् ॥

वहाँ ब्रह्मा और रुद्रगण, स्कन्द और इन्द्र मरुतों के समूह सहित थे; आदित्य, वसु, वायु और महान् तेजस्वी अश्विनीकुमार भी थे।

Verse 12

सोमो बृहस्पतिश्चैव ये चान्ये वै दिवौकसः ॥ तेषां चैवार्गलं दत्त्वा चक्रं गृह्य महौजसम् ॥

सोम और बृहस्पति तथा अन्य स्वर्गवासी भी—उन सबको ‘अर्गल’ रूपी रक्षक अवरोध देकर, मैंने महातेजस्वी चक्र को धारण किया।

Verse 13

शतकोटिसहस्राणि शीघ्रमेव निपातितम् ॥ ततश्च देवताः सर्वास्तुष्यमाणा इतस्ततः ॥

सौ कोटि सहस्रों को शीघ्र ही गिरा दिया गया; तत्पश्चात् सभी देवता संतुष्ट होकर इधर-उधर विचरने लगे।

Verse 14

एवं लोहर्गलं नाम क्षेत्रं चैव मया कृतम् ॥ ततो देवासुरे युद्धे हत्वा त्रिदशकण्टकान् ॥

इस प्रकार ‘लोहर्गल’ नामक पवित्र क्षेत्र मैंने स्थापित किया। फिर देव-दानव युद्ध में त्रिदशों के कण्टक—देवों के शत्रुओं—को मारकर (आगे की कथा है)।

Verse 15

तेषां संस्थापनं तत्र कृतं चैव महौजसाम् ॥ यो मां पश्यति तत्रस्थं प्रयत्नेन कदाचन

वहाँ उन महातेजस्वियों की स्थापना भी की गई। जो कोई भी प्रयत्नपूर्वक कभी वहाँ स्थित मुझे देखता है—

Verse 16

सोऽपि भागवतो भूमे भवत्येव सुनिष्ठितः ॥ तस्मिन्कुण्डे तु सुश्रोणि यः स्नाति नियतो नरः

हे भूमे! वह भी निश्चय ही भगवत्-भक्त, दृढ़निष्ठ सेवक बन जाता है। और हे सुश्रोणि! जो संयमी पुरुष उस कुण्ड में स्नान करता है—

Verse 17

उपोष्य च त्रिरात्रं तु विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ततः स्वर्गसहस्रेषु मोदते नात्र संशयः

और विधि में बताए गए कर्म के अनुसार तीन रात्रियों का उपवास करके, तत्पश्चात् वह हजारों स्वर्गों में आनंद करता है—इसमें संशय नहीं।

Verse 18

अथात्र मुञ्चते प्राणान्स्वकर्मपरिनिष्ठितः ॥ सर्वान्स्वर्गान्परित्यज्य मम लोकं प्रपद्यते

फिर यहाँ, अपने कर्तव्य में स्थित होकर, वह प्राणों का त्याग करता है; समस्त स्वर्गों को छोड़कर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 19

चतुर्विंशतिद्वादश्यां मासेन विधिना मम ॥ बलिः प्रदीयते तत्र सर्वकामविशोधनः

मास के (निर्दिष्ट) विधान के अनुसार, चौबीसवीं द्वादशी को वहाँ मेरे विधान से बलि अर्पित की जाती है, जो समस्त कामनाओं का विशोधन करने वाली कही गई है।

Verse 20

अश्वो मे कल्पितस्तत्र सर्वरत्नविभूषितः ॥ श्वेतः कुमुदवर्णाभः शङ्खकुन्दसमप्रभः

वहाँ मेरे लिए एक अश्व की रचना की जाती है, जो समस्त रत्नों से विभूषित होता है—श्वेत, कुमुद के समान वर्ण वाला, शंख और कुन्द के तुल्य प्रभा से युक्त।

Verse 21

मार्गणा मे धनुस्तत्र अक्षसूत्रं कमण्डलुः ॥ आसनं विततं दिव्यं दीयतेऽश्वोपरि स्थिरम्

वहाँ मेरे लिए बाण और धनुष, जपमाला तथा कमण्डलु हैं; और घोड़े पर दृढ़ स्थित दिव्य, विस्तृत आसन दिया जाता है।

Verse 22

श्वेतपर्वतमारोह्य पतमानः कुरून् बहून् ॥ पतितस्तत्र दृश्येत क्षतं तत्र न दृश्यते

श्वेत पर्वत पर चढ़कर अनेक कुरु-परिमाण तक गिरता हुआ वह वहाँ गिरा हुआ दिखाई देता है; पर वहाँ कोई चोट दिखाई नहीं देती।

Verse 23

अनेकान्येव रूपाणि पातयित्वा नभस्तलात् ॥ शान्तो दान्तः परिक्लिष्टः स चाश्वो दिवि वर्तते

आकाश-तल से अनेक रूपों को गिराकर, वह घोड़ा—शान्त, संयमी और परिश्रान्त—स्वर्ग में निवास करता है।

Verse 24

सूत उवाच ॥ ततो भूम्या वचः श्रुत्वा ब्रह्मपुत्रो महामुनिः ॥ विस्मयं परमं प्राप्तो विष्णुमायोपबृंहितः

सूत बोले—तब पृथ्वी के वचन सुनकर ब्रह्मा-पुत्र महामुनि विष्णु की माया से अभिवर्धित अनुभव के कारण परम विस्मय को प्राप्त हुआ।

Verse 25

ततः स विस्मयाविष्टो ब्रह्मपुत्रो महामतिः ॥ सनत्कुमारो भगवान् पुनरेवमभाषत

तब विस्मय से आविष्ट वह महामति ब्रह्मा-पुत्र—भगवान् सनत्कुमार—फिर इस प्रकार बोले।

Verse 26

सनत्कुमार उवाच ॥ धन्यासि देवि सुश्रॊणि सुपुण्यासि वरानने ॥ देवि यल्लोकनाथस्य साक्षाद्दर्शनमागता

सनत्कुमार बोले—हे देवी, तुम धन्य हो; हे सुश्रॊणि, तुम अत्यन्त पुण्यवती हो; हे सुन्दर-मुखी! क्योंकि तुम लोकनाथ के साक्षात् दर्शन के लिए आई हो।

Verse 27

पद्मपत्रविशालाक्षो यत्त्वया परिभाषितः ॥ तेनोक्तं शंस सकलं सर्वेषां सुखवर्धनम्

जिस पद्मपत्र-विशालाक्ष (कमल-पत्र समान विशाल नेत्रों वाले) को तुमने संबोधित किया, उसने जो कहा है उसे पूर्ण रूप से कहो; वह सबके सुख का वर्धन करता है।

Verse 28

ततः स पुण्डरीकाक्षः किमाचष्ट ततः परम् ॥ कर्मणा विधिदृष्टेन सर्वभागवतप्रियः

तब उस पुण्डरीकाक्ष (कमल-नेत्र) ने उसके बाद क्या कहा? वह समस्त भागवतों को प्रिय है और विधि-दृष्ट कर्म के अनुसार (उपदेश) करता है।

Verse 29

(सूत उवाच) ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कुमारस्य महौजसः ॥ उवाच मधुरं वाक्यमाभाष्य ब्रह्मणः सुतम्

सूत बोले—उस महातेजस्वी कुमार के वचन को सुनकर, (उसने) ब्रह्मा के पुत्र से संबोधित होकर मधुर वचन कहा।

Verse 30

शृणु वत्स जगन्नाथो यथा मामाह चोदितः ॥ श्रीवराह उवाच ॥ एवं तत्रैव कर्माणि क्रियन्ते विधिपूर्वकम्

सुनो वत्स, जगन्नाथ ने प्रेरित किए जाने पर मुझसे जैसा कहा था, वैसा (मैं कहता हूँ)। श्रीवराह बोले—इस प्रकार वहीं कर्म (अनुष्ठान) विधिपूर्वक किए जाते हैं।

Verse 31

शोधकानि च पापानां मृदूनि च शुभानि च ॥ अश्वानां तत्कुलीनानामावहन्ति सुमध्यमे

हे सुमध्यमे! वे उस कुलीन वंश के घोड़े अर्पित करते हैं—जो पापों का शोधन करने वाले, कोमल और शुभ माने जाते हैं।

Verse 32

नान्यं वहन्ति ते चाश्वा मम वाहा दुरत्ययाः ॥ कुण्डं पञ्चसरो नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम

वे घोड़े किसी और को नहीं ढोते; वे मेरे वाहन हैं, जिन्हें जीतना कठिन है। ‘पञ्चसरो’ नाम का एक कुण्ड है—वह मेरा गुप्त और परम तीर्थ-क्षेत्र है।

Verse 33

चतुर्धाराः पतन्त्यत्र शङ्खवर्णा मनोजवाः ॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत चतुर्भक्तोषितो नरः

यहाँ चार धाराएँ गिरती हैं—शंख के समान श्वेत और मन के वेग जैसी तीव्र। वहाँ चार भक्ति/भोजन में संतुष्ट रहने वाला पुरुष स्नान करे।

Verse 34

लोकं चैत्राङ्गदं गत्वा गन्धर्वैः सह मोदते ॥ अथ चेन्मुञ्चते प्राणांस्तस्मिन्क्षेत्रे परे मम

‘चैत्राङ्गद’ नामक लोक में जाकर वह गन्धर्वों के साथ आनंद करता है। और यदि वह मेरे उस परम तीर्थ-क्षेत्र में प्राण त्याग दे…

Verse 35

गन्धर्वलोकमुत्सृज्य मम लोकं स गच्छति ॥ ततो नारदकुण्डे तु मम क्षेत्रे परे महत्

गन्धर्व-लोक को छोड़कर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है। फिर मेरे परम और महान तीर्थ-क्षेत्र में स्थित ‘नारद-कुण्ड’ पर (विधिपूर्वक कर्म किया जाए)।

Verse 36

पञ्च धाराः पतन्त्यत्र तालवृक्षसमोपमाः ॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत एकभक्तोषितो नरः

यहाँ पाँच धाराएँ ताल-वृक्ष के समान ऊँची होकर गिरती हैं। वहाँ एकभक्त-व्रत का पालन करके मनुष्य को स्नान करना चाहिए।

Verse 37

प्रमुच्य नारदं दिव्यं मम लोकं च गच्छति ॥ ततो वसिष्ठकुण्डं तु तस्मिन्क्षेत्रं परं मम

दिव्य नारद-कुण्ड में (पाप-बंधन से) मुक्त होकर वह मेरे लोक को भी जाता है। तत्पश्चात वसिष्ठ-कुण्ड है; उसी में मेरा परम क्षेत्र है।

Verse 38

धाराः पतन्ति तिस्रस्तु न स्थूला नाति वै कृशाः ॥ तत्राभिषेकं कुर्वीत पञ्च कालोषितो नरः

वहाँ तीन धाराएँ गिरती हैं—न मोटी, न अत्यन्त पतली। वहाँ पञ्चकाल-व्रत का पालन करके मनुष्य को अभिषेक करना चाहिए।

Verse 39

वासिष्ठं लोकमासाद्य मोदते नात्र संशयः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम कर्मसु निष्ठितः ॥ वासिष्ठं लोकमुत्सृज्य मम लोकं प्रपद्यते ॥ पञ्चकुण्डेति विख्यातं तस्मिन्क्षेत्रे परे मम

वासिष्ठ-लोक को प्राप्त करके वह आनन्दित होता है—इसमें संशय नहीं। फिर यहाँ मेरे कर्मों में निष्ठ होकर वह प्राण त्यागता है। वासिष्ठ-लोक को छोड़कर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है। (आगे) मेरे परम क्षेत्र में ‘पञ्चकुण्ड’ नाम से प्रसिद्ध स्थान है।

Verse 40

पञ्च धाराः पतन्त्यत्र हिमकूटविनिःसृताः ॥ तत्राभिषेकं कुर्वीत पञ्चकालोषितो नरः

यहाँ हिमकूट से निकली हुई पाँच धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पञ्चकाल-व्रत का पालन करके मनुष्य को अभिषेक करना चाहिए।

Verse 41

स तत्र गच्छेद्वै भूमे यत्र पञ्चशिखो मुनिः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम भक्तो जितेन्द्रियः

वह निश्चय ही पृथ्वी पर उस स्थान को जाए जहाँ मुनि पञ्चशिख निवास करते हैं। फिर यहाँ मेरा जितेन्द्रिय भक्त अपने प्राणों का त्याग करता है।

Verse 42

पञ्चचूडं समुत्सृज्य स याति परमां गतिम् ॥ सप्तर्षिकुण्डं विख्यातमस्मिन्क्षेत्रे परे मम

पञ्चचूड से प्रस्थान करके वह परम गति को प्राप्त होता है। इसी मेरे परम क्षेत्र में प्रसिद्ध सप्तर्षि-कुण्ड है।

Verse 43

सप्त धाराः पतन्त्यत्र हिमवत्पर्वतस्थिताः ॥ तत्राभिषेकं कुर्वीत सप्तभक्तोषितो नरः

यहाँ हिमवत् पर्वत पर स्थित सात धाराएँ गिरती हैं। वहाँ ‘सप्तभक्त’ नियम का पालन करके तृप्त हुआ मनुष्य अभिषेक करे।

Verse 44

मोदते ऋषिलोकेषु ऋषिकन्याभिसंवृतः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्रागलोभविवर्जितः

वह ऋषियों के लोकों में ऋषि-कन्याओं से घिरा हुआ आनंदित होता है। फिर यहाँ राग और लोभ से रहित होकर प्राणों का त्याग करता है।

Verse 45

तत्र धारा पतत्येका शरभङ्गश्रिता नदी ॥ स्नानं यस्तत्र कुर्वीत षष्ठभक्तोषितो नरः

वहाँ शरभङ्ग से सम्बद्ध नदी की एक धारा गिरती है। जो मनुष्य वहाँ ‘षष्ठभक्त’ नियम का पालन करके स्नान करे,

Verse 46

मोदते तस्य लोकेषु ऋषिकन्याप्रमोदितः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान् सर्वसङ्गविवर्जितः

वह ऋषि-कन्याओं से प्रसन्न होकर उन लोकों में आनंद करता है। फिर यहीं, समस्त आसक्तियों से रहित होकर, अपने प्राणों का त्याग करता है।

Verse 47

शरभङ्गं समुत्सृज्य मम लोके महीयते ॥ कुण्डमग्निसरो नाम सर्वमायाभिसंवृतम्

शरभङ्ग को त्यागकर वह मेरे लोक में पूजित होता है। ‘अग्निसर’ नामक एक कुण्ड है, जो सम्पूर्णतः माया से आवृत है।

Verse 48

भूमिं नीत्वा जलं तत्र तिष्ठत्येव वरानने ॥ तत्र स्नानं प्रकुर्वीत चाष्टकालोषितो नरः

हे सुन्दर-मुखी! वहाँ जल को भूमि पर लाने पर भी वह वहीं स्थिर रहता है। जो पुरुष आठ-काल का व्रत/निवास कर चुका हो, उसे वहाँ स्नान करना चाहिए।

Verse 49

गच्छत्यङ्गिरसो लोकं सुखभागी न संशयः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम कर्मपरायणः

वह सुख का भागी होकर अङ्गिरस के लोक को जाता है—इसमें संदेह नहीं। फिर यहीं, मेरे कर्मों में तत्पर होकर, अपने प्राणों का त्याग करता है।

Verse 50

अग्निलोकं समुत्सृज्य मम लोकं स गच्छति ॥ कुण्डं बृहस्पतेर्भूमे सर्ववेदोदकाश्रितम्

अग्नि-लोक को त्यागकर वह मेरे लोक को जाता है। हे पृथ्वी! बृहस्पति का एक कुण्ड है, जो समस्त वेदों के जल से आश्रित है।

Verse 51

धारा चैका पतत्यत्र हिमकूटसमाश्रिता ॥ तत्र स्नानं प्रकुर्वीत षष्ठकालोषितो नरः

यहाँ हिमकूट से संबद्ध एक ही धारा गिरती है। षष्ठकाल का व्रत-निवास करने वाला पुरुष वहाँ स्नान करे।

Verse 52

गत्वा बृहस्पतेर्लोकं मुनिकन्याभिमोदितः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम लोकं समाश्रितः

बृहस्पति के लोक में जाकर, मुनि-कन्याओं द्वारा अभिनंदित होकर, फिर यहाँ मेरे लोक का आश्रय लेकर वह प्राणों का त्याग करता है।

Verse 53

सोऽपि याति परां सिद्धिं समुत्सृज्य बृहस्पतिम् ॥ वैश्वानरस्य कुण्डं तु गुह्यं क्षेत्रं परं मम

वह भी बृहस्पति को पीछे छोड़कर परम सिद्धि को प्राप्त होता है। पर वैश्वानर का कुण्ड एक गुह्य तीर्थ-क्षेत्र है—मेरा परम धाम।

Verse 54

गत्वा बृहस्पतेर्लोकं मुनिकन्याभिमोहितः ॥ वैश्वानरेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः

बृहस्पति के लोक में जाकर, मुनि-कन्याओं से मोहित होकर, वह वैश्वानर के लोकों में आनंद करता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 55

अथात्र मुंचते प्राणान्मम कर्मपरायणः ॥ वैश्वानरं समुत्सृज्य मम लोकं स गच्छति

अब जो यहाँ विधि-कर्मों में परायण होकर प्राणों का त्याग करता है, वह वैश्वानर के क्षेत्र से प्रस्थान कर मेरे लोक को जाता है।

Verse 56

कार्त्तिकेयस्य कुण्डं तु गुह्यं क्षेत्रं परं मम ॥ यत्र पञ्चदशा धाराः पतन्ति हिमपर्वतात्

कार्त्तिकेय का यह कुण्ड मेरा परम गुप्त तीर्थ-क्षेत्र है, जहाँ हिमालय पर्वत से पन्द्रह धाराएँ गिरती हैं।

Verse 57

तत्र स्नानं प्रकुर्वीत षष्ठकालोषितो नरः ॥ कुमारं पश्यति व्यक्तं षण्मुखं शुभदर्शनम्

वहाँ जो पुरुष छह काल तक निवास-व्रत का पालन करे, वह स्नान करे; वह कुमार को प्रत्यक्ष—षड्मुख और शुभ-दर्शन—देखता है।

Verse 58

अथात्र मुंचते प्राणान्कृत्वा चान्द्रायणं शुचिः ॥ कार्त्तिकेयं समुत्सृज्य मोदते मम मण्डले

फिर जो यहाँ प्राणों का त्याग करता है—शुद्ध होकर चान्द्रायण व्रत करके—कार्त्तिकेय के मण्डल से निकलकर मेरे मण्डल में आनन्दित होता है।

Verse 59

उमाकुण्डमिति ख्यातं तस्मिन्क्षेत्रे परं मम ॥ सा गौरी यत्र चोत्पन्ना महादेववराङ्गना

वह मेरे परम क्षेत्र में ‘उमा-कुण्ड’ नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ महादेव की वराङ्गना वही गौरी प्रकट हुई।

Verse 60

तत्र स्नानं तु कुर्वीत दशरात्रोषितो नरः ॥ गौरीं देवीं स पश्येत्तु तस्या लोके च मोदते

वहाँ जो पुरुष दस रात्रि तक निवास करे, वह स्नान करे; वह देवी गौरी का दर्शन करता है और उसके लोक में आनन्दित होता है।

Verse 61

अथ प्राणान्प्रमुंचेत दशरात्रोषितो नरः ॥ उमालोकं समुत्सृज्य मम लोकं प्रपद्यते

तब जो पुरुष दस रात वहाँ निवास करता है, वह प्राणों का त्याग कर सकता है; उमा-लोक को छोड़कर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 62

महेश्वरस्य वै कुण्डं यत्र चोद्वाहिताः उमा ॥ कादम्बैश्चक्रवाकैश्च हंससारससेवितम्

निश्चय ही महेश्वर का वह कुण्ड है जहाँ उमा का विवाह हुआ; वह कादम्ब-पक्षियों, चक्रवाकों तथा हंसों और सारसों से सेवित है।

Verse 63

तत्र स्नानं तु कुर्वीत द्वादशाहोषितो नरः ॥ मोदते रुद्रलोकेषु रुद्रकन्याभिरावृतः

वहाँ बारह दिन निवास करने वाला पुरुष स्नान करे; वह रुद्र-लोकों में रुद्र-कन्याओं से घिरा हुआ आनंदित होता है।

Verse 64

अथात्र मुञ्चते प्राणान्कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ रुद्रलोकं समुत्सृज्य मम लोकं च गच्छति

और जो यहाँ अत्यन्त कठिन व्रत-कर्म करके प्राणों का त्याग करता है, वह रुद्र-लोक को छोड़कर मेरे लोक को भी जाता है।

Verse 65

प्रख्यातं ब्रह्मकुण्डं तु वेदा यत्र समुत्थिताः ॥ चतस्रो वेदधारास्तु पतन्ति च हिमालयात् ॥

वह ब्रह्मकुण्ड प्रसिद्ध है—जहाँ वेदों का उद्भव माना गया है; हिमालय से चार वेद-धाराएँ नीचे उतरती हैं।

Verse 66

ततः पूर्वेण पार्श्वेन समा धारा पतेच्छुभा ॥ उच्चा च रमणीया च पाण्डरोदकशोभिता ॥

तब पूर्व दिशा की ओर एक शुभ धारा उतरती है—मार्ग में सम, ऊँची और मनोहर, धवल-स्वच्छ जल से शोभित।

Verse 67

अथ पश्चिमपार्श्वेन यजुर्वेदेन संयुता ॥ अथ दक्षिणपार्श्वेन चाथर्वणसमन्विता ॥

अब पश्चिम पार्श्व में यजुर्वेद से संबद्ध धारा है; और दक्षिण पार्श्व में अथर्व परंपरा से संयुक्त दूसरी धारा है।

Verse 68

एका धारा पतत्यत्र इन्द्रगोपकसन्निभा ॥ यस्तत्र कुरुते स्नानं सप्तरात्रोषितो नरः ॥

यहाँ एक धारा उतरती है, इन्द्रगोपक के समान लालिमा लिए। जो मनुष्य वहाँ सात रात्रि निवास कर स्नान करता है, वह [अगले फल को पाता है]।

Verse 69

ब्रह्मलोकं समासाद्य ब्रह्मणा सह मोदते ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणानहङ्कारविवर्जितः ॥

ब्रह्मलोक को प्राप्त कर वह ब्रह्मा के साथ आनंदित होता है। फिर यहाँ अहंकार से रहित होकर अपने प्राणों का त्याग करता है।

Verse 70

पुनरस्योत्तरे पार्श्वे सुवर्णसदृशोपमा ॥ ऋग्वेदः पतते धारा प्रसन्ना विमलोदका ॥

फिर इसके उत्तर पार्श्व में सुवर्ण के समान दीप्त एक धारा उतरती है—ऋग्वेद से संबद्ध, शांत और निर्मल जल वाली।

Verse 71

ब्रह्मलोकं परित्यज्य मम लोकं प्रपद्यते ॥ गुह्याख्याने महाभागे क्षेत्रे लोहर्गले मम ॥

ब्रह्मलोक को त्यागकर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है। हे महाभाग, यह ‘गुह्याख्यान’ में, मेरे लोहर्गल नामक पवित्र क्षेत्र में कहा गया है।

Verse 72

न तस्य कर्म विद्येत स एवमपि संस्थितः ॥ आख्यानानां महाख्यानं धर्माणां धर्म उत्तमः ॥

उसके लिए कोई बंधनकारी कर्म शेष नहीं रहता—वह इस प्रकार स्थित होता है। यह आख्यानों में महाख्यान है और धर्मों में सर्वोत्तम धर्म है।

Verse 73

पवित्राणां पवित्रं तु न देयं यस्य कस्यचित् ॥ ये पठंति महाभागे स्थिताः शृण्वन्ति मत्पथे ॥

यह पवित्रों में भी परम पवित्र है; इसे किसी को भी नहीं देना चाहिए। हे महाभाग, जो इसका पाठ करते हैं और जो मेरे पथ में स्थित होकर इसे सुनते हैं—

Verse 74

तारितानि कुलानि स्युरुभयत्र दशापि च ॥ एतन्मरणकाले तु न कदाचित्तु विस्मरेत् ॥

उनके कुल दोनों ओर से, दस पीढ़ियों तक भी, तर जाते हैं। और मृत्यु-काल में तो इसे कभी भी नहीं भूलना चाहिए।

Verse 75

यदीच्छेत्पराम् सिद्धिं सर्वसंसारमोक्षणीम् ॥ एतत्ते कथितं भद्रे लोहाङ्गलमनुत्तमम् ॥

यदि कोई समस्त संसार-बंधन से मुक्त करने वाली परम सिद्धि चाहे, तो हे भद्रे, तुम्हें यह अनुत्तम ‘लोहाङ्गल’ बताया गया है।

Verse 76

माहात्म्यं पद्मपत्राक्षि गुह्यं यच्च महौजसम् ॥ माङ्गल्यं च पवित्रं च मम भक्तसुखावहम् ॥

हे पद्मपत्र-नेत्री! यह माहात्म्य गुप्त और महान् तेजस्वी है; यह मंगलकारी, पवित्र तथा मेरे भक्तों को कल्याण देने वाला है।

Verse 77

तत्र तिष्ठाम्यहं भद्रे उदीचीं दिशमाश्रितः ॥ हिरण्यप्रतिमां कृत्वा जातरूपां न संशयः ॥

हे भद्रे! वहाँ मैं उत्तर दिशा का आश्रय लेकर निवास करता हूँ; निःसंदेह मैंने स्वर्ण की, अर्थात् सोने की, प्रतिमा बनायी है।

Verse 78

अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि यत्र तत्परमद्भुतम् ॥ लोकविस्मापनार्थाय मया तत्र च यत्कृतम् ॥

और भी मैं तुमसे कहूँगा कि वह परम अद्भुत कहाँ है; तथा लोक को विस्मित करने के लिए वहाँ मैंने जो किया, वह भी।

Verse 79

यथा यथा वदसि च धर्मसंहितं गुह्यं परं देववरप्रणीतम् ॥ गुणोत्तमं कारणसम्प्रयुक्तं तथा तथा भावयसि मनो मम ॥

जिस प्रकार तुम इस धर्म-संहिता को—गुप्त, परम, देवों में श्रेष्ठ द्वारा प्रणीत, गुणों में उत्तम और कारणों से युक्त—कहती हो, उसी प्रकार तुम मेरे मन को भावित और उन्नत करती हो।

Verse 80

देवर्षिनारदं पश्येन्मोदते तेन वै समम् ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम गुह्यविनिश्चितः ॥

देवर्षि नारद का दर्शन करना चाहिए और उनके समान ही आनन्दित होना चाहिए; तब यहाँ प्राणों का त्याग होता है—यह मेरा गुप्त निश्चय है।

Verse 81

सप्तर्षीन् स समुत्सृज्य मोदते मम संस्थितः ॥ शरभङ्गस्य कुण्डं वै क्षेत्रे गुह्यं परे मम ॥

वह सप्तर्षियों को भी पीछे छोड़कर, मुझमें स्थित होकर आनन्दित होता है। मेरे परम गुप्त क्षेत्र में शरभंग का कुण्ड निश्चय ही है।

Verse 82

धारा चैका पतत्यत्र दृश्यते हिमसंश्रयात् ॥ तत्राभिषेकं कुर्वीत षष्ठभक्तोषितो नरः ॥

यहाँ हिम पर आश्रित होने से एक ही धारा गिरती हुई दिखाई देती है। वहाँ षष्ठ-भक्त व्रत से निर्वाह करने वाला मनुष्य अभिषेक-स्नान करे।

Verse 83

तिस्रो धाराः पतन्त्यत्र हिमवत्पर्वताश्रिताः ॥ स्थूलाश्च रमणीयाश्च न ह्रस्वाश्चातिनिर्मलाः ॥

यहाँ हिमवत् पर्वत पर आश्रित तीन धाराएँ गिरती हैं। वे स्थूल और रमणीय हैं—न छोटी, और अत्यन्त निर्मल।

Verse 84

सिद्धिकामेन मर्त्येन गन्तव्यं नात्र संशयः ॥ समन्तात्पञ्चविंशति योजनानि वरानने ॥

सिद्धि की कामना करने वाले मर्त्य को यहाँ अवश्य जाना चाहिए—इसमें संशय नहीं। हे सुन्दर-मुखी, यह क्षेत्र चारों ओर पच्चीस योजन तक फैला है।

Frequently Asked Questions

The text presents disciplined ritual conduct—fasting, regulated bathing, and mindful remembrance of Varāha—as a mechanism for moral purification and ordered engagement with sacred landscapes. Philosophically, it frames ‘guhya’ knowledge as transformative but requiring restraint in transmission, while Earth’s (Pṛthivī’s) inquiry positions terrestrial well-being as supported by human self-regulation and respectful interaction with sanctified waters.

A specific lunar timing is given: on caturviṃśati-dvādaśyām (interpretable as the 24th day and/or a dvādaśī observance context depending on recension), bali is prescribed “māsena vidhinā” (according to monthly rite). Additional time-structures are expressed through vrata-durations: trirātra (three nights), saptarātra (seven nights), daśarātra (ten nights), dvādaśāha (twelve days), and various ‘kāla’/‘bhakta’ regimens (e.g., ekabhakta, pañcakāla, ṣaṣṭhakāla, saptabhakta).

By making Pṛthivī the questioning interlocutor, the narrative implicitly links sacred geography to Earth’s stability: tīrthas are described as bounded ecological-religious zones (measured extents, difficult terrain, water-stream systems) that become ‘sulabha’ only to ethically qualified practitioners. The repeated emphasis on purity, restraint, and non-random access functions as a proto-conservation logic—protecting sensitive Himalayan water-sites through behavioral regulation and controlled knowledge circulation.

The chapter references divine and sage figures as cultural authorities anchoring the tīrtha network: Brahmā, Rudra/Maheśvara, Skanda/Kārttikeya (Ṣaṇmukha), Indra, Ādityas, Vasus, Vāyu, Aśvins, Soma, Bṛhaspati, Devarṣi Nārada, Vasiṣṭha, the Saptarṣis, and Śarabhaṅga. It also mentions mlecchas as a social-geographical marker for the region’s surrounding human landscape.

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