Adhyaya 145
Varaha PuranaAdhyaya 145122 Shlokas

Adhyaya 145: The Greatness of the Śālagrāma Sacred Region

Śālagrāma-kṣetra-māhātmya

Sacred-Geography (Tīrtha-Māhātmya) and Ethical-Discourse

पृथिवी वराह से पूछती है कि मोक्षदायक क्षेत्र में तपस्वी सालङ्कायन ने तप क्यों किया। वराह बताते हैं कि अद्भुत शाल-वृक्ष के पास उसने दीर्घ तप किया, पर दिव्य माया से वह वराह का दर्शन नहीं कर सका। वैशाख शुक्ल द्वादशी को उसे दर्शन होता है; वराह वृक्ष के चारों दिशाओं में विचरते हुए ऋग्-यजुः-साम वेद के स्तोत्रों से की गई उसकी स्तुति सुनते हैं। प्रसन्न होकर वराह वर देते हैं—नन्दिकेश्वर नामक पुत्र—और फिर बताते हैं कि वह शाल-वृक्ष का गुप्त स्वरूप स्वयं वराह ही है। आगे अनेक गुप्त तीर्थों, स्नान-व्रतों, रात्रि-निवास के नियमों और उनके कर्मफल का मानचित्र-सा वर्णन होता है। अंत में क्षेत्र को हरिहर (विष्णु-शिव) अभेद भाव से प्रतिष्ठित कर, उपदेश केवल योग्य शिष्यों को देने की चेतावनी दी जाती है तथा नदियों, ऋतुओं और संयमित आचरण से जुड़ा यह नैतिक-पर्यावरणीय तीर्थ-आश्रय बताया जाता है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī (Dharaṇī)

Key Concepts

kṣetra-māhātmya (sacred geography as pedagogy)tapas and boon-bestowal (vara-pradāna)darśana mediated by māyāVedic stuti across Ṛg/Yajur/Sāma traditionstīrtha-vrata (night-stay fasts: trirātra, saptarātra, etc.)phala-śruti (ritual merit equivalences: aśvamedha, vājapeya, atirātra, etc.)Harihara identity (non-separation of Viṣṇu and Śiva)adhikāra (eligibility) and ethical transmission of scriptureenvironmental sacralization of rivers, groves, and waterscapes

Shlokas in Adhyaya 145

Verse 1

अथ शालग्रामक्षेत्रमाहात्म्यम् ॥ धरण्युवाच ॥ भगवन्देवदेवेश सालङ्कायनको मुनिः ॥ किं चकार तपः कुर्वंस्तव क्षेत्रे विमुक्तिदे ॥

अब शालग्राम-क्षेत्र की महिमा (कथित होती है)। धरणी बोली—हे भगवन्, देवों के देवेश! मुक्तिदाता आपके क्षेत्र में तप करते हुए मुनि सालङ्कायन ने क्या किया, क्या सिद्धि प्राप्त की?

Verse 2

श्रीवराह उवाच ॥ अथ दीर्घेण कालेन स ऋषिः संहितव्रतः ॥ तप्यमानो यथान्यायं पश्यन् वै सालमुत्तमम् ॥

श्रीवराह बोले—फिर बहुत समय बीतने पर वह ऋषि, व्रतों में दृढ़, विधिपूर्वक तप करते हुए, निश्चय ही एक उत्तम शाल-वृक्ष को देखने लगा।

Verse 3

अभिन्नमतुलच्छायं विशालं पुष्पितं तथा ॥ मनोज्ञं च सुगन्धं च देवानामपि दुर्लभम् ॥

वह अखण्ड और अतुलनीय छाया वाला, विशाल तथा पुष्पित था; मन को प्रिय और सुगन्धित, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

Verse 4

ऋषिर्ज्ञानपरिश्रान्तः सालङ्कायनकोऽद्भुतम् ॥ ददर्श च पुनः सालं शुभानां शुभदर्शनम् ॥

ज्ञान-साधना से परिश्रान्त ऋषि सालङ्कायन ने फिर उस अद्भुत शाल-वृक्ष को देखा, जो शुभ जनों के लिए शुभ दर्शन है।

Verse 5

ततो दृष्ट्वा महासालं परिश्रान्तो महामुनिः ॥ विश्रामं कुरुते तत्र द्रष्टुकामोऽथ मां मुनिः ॥

तब उस महान शाल-वृक्ष को देखकर परिश्रान्त महामुनि वहीं विश्राम करने लगे; और फिर वह मुनि मुझे देखने की इच्छा करने लगे।

Verse 6

सालस्य तस्य पूर्वेण स्थितः पश्चान्मुखो मुनिः ॥ मायया मम मूढात्मा शक्तो द्रष्टुं न मामभूत् ॥

वह मुनि उस शाल-वृक्ष के पूर्व में खड़ा होकर पश्चिम की ओर मुख किए था; मेरी माया से उसका चित्त मोहित हो गया, इसलिए वह मुझे देखने में समर्थ न हुआ।

Verse 7

ततः पूर्वेण पार्श्वेन तस्य सालस्य सुन्दरी ॥ वैशाखमासद्वादश्यां मद्दर्शनमुपागतः ॥

तब, हे सुन्दरी, वैशाख मास की द्वादशी को वह उस शाल-वृक्ष के पूर्वी पार्श्व में आया और मेरा दर्शन प्राप्त किया।

Verse 8

दृष्ट्वा मां तत्र स मुनिस्तपस्वी संहितव्रतः ॥ तुष्टाव वैदिकैः सूक्तैः प्रणम्य च पुनःपुनः ॥

वहाँ मुझे देखकर वह तपस्वी मुनि, व्रतों में दृढ़, वैदिक सूक्तों से मेरी स्तुति करने लगा और बार-बार प्रणाम किया।

Verse 9

मत्तेजसा ताडिताक्षः शनैरुन्मील्य लोचने ॥ यावत्पश्यति मां तत्र स्तुवन्स तपसान्वितः ॥

मेरे तेज से आहत नेत्रों वाला वह धीरे-धीरे आँखें खोलकर, जितनी देर वहाँ मुझे देखता रहा, उतनी देर तप से युक्त होकर स्तुति करता रहा।

Verse 10

स्थित्वा मत्प्रमुखे चैव स्तुवन्नेवं मम प्रियम् ॥ ततोऽहं स्तूयमानो वै ऋग्वेदस्यैव ऋग्गतैः ॥

मेरे सामने खड़े होकर इस प्रकार स्तुति करता हुआ वह मुझे प्रिय हुआ; तब मैं ऋग्वेद की ऋचाओं से स्तुत होकर (आगे प्रत्युत्तर देने लगा)।

Verse 11

स्तोत्रैः सम्पूज्यमानो हि गतोऽहं पश्चिमां दिशम् ।। ततः पश्चिमपार्श्वे तु स्थितस्तत्रैव माधवि ।।

स्तोत्रों से विधिवत् पूजित होकर मैं पश्चिम दिशा की ओर गया; फिर, हे माधवी, पश्चिम पार्श्व में वहीं स्थित रहा।

Verse 12

यजुर्वेदोक्तमन्त्रेण संस्तुतः पश्चिमां गतः ।। स्तुवतीत्थं मुनौ देवि गतोऽहं चोत्तरां दिशम् ।।

यजुर्वेद में कहे गए मंत्र से स्तुत होकर मैं पश्चिम दिशा की ओर गया। इस प्रकार मुनि स्तुति करते रहे, हे देवी, और मैं भी उत्तर दिशा की ओर प्रस्थित हुआ।

Verse 13

तत्रापि सामवेदोक्तैर्मन्त्रैस्तुष्टाव मां मुनिः ।। ततोऽहं स्तूयमानो वै ऋषिमुख्येन सुन्दरि ।।

वहाँ भी मुनि ने सामवेद में कहे गए मंत्रों से मेरी स्तुति की। तब, हे सुंदरी, उस श्रेष्ठ ऋषि द्वारा स्तुत होता हुआ मैं—

Verse 14

प्राप्तश्च परमां प्रीतिं तमवोचमृषिं तदा ।। साधु ब्रह्मन्महाभाग सालङ्कायन सत्तम ।।

परम प्रसन्नता प्राप्त करके मैंने तब उस ऋषि से कहा— “साधु, हे ब्राह्मण! हे महाभाग सालङ्कायन, हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ!”

Verse 15

तपसानेन सन्तुष्टः स्तुत्या चैवानया तव ।। वरं वरय भद्रं ते संसिद्धस्तपसा भवान् ।।

तुम्हारे इस तप से और इसी स्तुति से भी मैं संतुष्ट हूँ। वर माँगो—तुम्हारा कल्याण हो; तप से तुम सिद्ध हो गए हो।

Verse 16

एवमुक्तः स तु मया सालङ्कायनको मुनिः ।। सालवृक्षं समाश्रित्य निभृतेनान्तरात्मना ।।

मेरे द्वारा ऐसा कहे जाने पर मुनि सालङ्कायन शाल-वृक्ष का आश्रय लेकर अंतःकरण से शांत और संयत हो गए।

Verse 17

ततो मां भाषते देवि स ऋषिः संहितव्रतः ।। तवैवाराधनार्थाय तपस्तप्तं मया हरे ।।

तब संहित-व्रत वाले उस ऋषि ने, हे देवी, मुझसे कहा— “हे हरि, केवल आपकी आराधना के लिए मैंने तप किया है।”

Verse 18

पर्यटामि महीं सर्वां सशैलवनकाननाम् ।। इदानीं खलु दृष्टोऽसि चक्रपाणे महाप्रभो ।।

मैं पर्वतों, वनों और काननों सहित सारी पृथ्वी पर भटका हूँ। अब सचमुच आप दर्शन दे रहे हैं, हे चक्रपाणि, हे महाप्रभो।

Verse 19

तदा देहि जगन्नाथ ममेश्वर समं सुतम् ।। एष एव वरो मह्यं दीयतां मधुसूदन ।।

तब मुझे मेरे समान ऐश्वर्य वाला पुत्र प्रदान कीजिए, हे जगन्नाथ। मेरे लिए यही वर है—इसे दीजिए, हे मधुसूदन।

Verse 20

एवं वरं याचितोऽस्मि मुनिना भीमकर्मणा ।। पुत्रकामेन विप्रेण दीर्घकालं तपस्यता ।।

इस प्रकार भयंकर तप करने वाले उस मुनि—पुत्र की कामना रखने वाले, दीर्घकाल से तपस्या करने वाले ब्राह्मण—ने मुझसे ऐसा वर माँगा।

Verse 21

एवं तस्य वचः श्रुत्वा ब्राह्मणस्य तपस्विनः ॥ मधुरां गिरमादाय प्रत्यवोचमृषिं प्रति ॥

उस तपस्वी ब्राह्मण के वचन सुनकर मैंने मधुर वाणी धारण की और उस ऋषि से प्रत्युत्तर कहा।

Verse 22

चिरकालं व्रतस्थेन यत्त्वया चिन्तितं मुने ॥ स कामस्तव सञ्जातः सिद्धोऽसि तपसा भवान् ॥

हे मुने! व्रत में स्थिर रहकर तुमने जो दीर्घकाल तक चिंतन किया था, वही कामना अब तुम्हारे लिए प्रकट हुई है; तपस्या से तुम सिद्धि को प्राप्त हुए हो।

Verse 23

ईश्वरस्य परा मूर्तिर्नाम्ना वै नन्दिकेश्वरः ॥ त्वद्दक्षिणाङ्गादुद्भूतः पुत्रस्तव मुनीश्वर ॥

हे मुनीश्वर! ईश्वर की परम मूर्ति, जो नन्दिकेश्वर नाम से प्रसिद्ध है, तुम्हारे दाहिने अंग से उत्पन्न होकर तुम्हारा पुत्र बना है।

Verse 24

संहरस्व तपो ब्रह्मञ्शान्तिं गच्छ महामुने ॥ अथ चैतस्य जातस्य कल्पा वै सप्त सप्त च ॥

हे ब्राह्मण! अपनी तपस्या को समेटो; हे महामुने! शान्ति को प्राप्त हो। और इस उत्पन्न हुए के लिए कल्प सात और सात, अर्थात् चौदह हैं।

Verse 25

त्वं न जानासि विप्रर्षे स जातो नन्दिकेश्वरः ॥ मायायोगबलोपेतो गोव्रजं स मया स्थितः ॥

हे विप्रर्षि! तुम नहीं जानते—नन्दिकेश्वर उत्पन्न हो चुका है। माया और योगबल से युक्त उसे मैंने गोव्रज में स्थापित किया है।

Verse 26

मथुरायाः समानीय आमुष्यायणसंज्ञितम् ॥ तव शिष्यं पुरस्कृत्य शूलपाणिरवस्थितः ॥

मथुरा से ‘आमुश्यायण’ नाम से प्रसिद्ध (व्यक्ति) को लाकर, तुम्हारे शिष्य को आगे रखकर, शूलपाणि वहाँ स्थित हुआ।

Verse 27

तत्राश्रमे महाभाग स्थित्वा त्वं तपसां निधे ॥ पुत्रेण परमप्रीतो मत्क्षेत्रेऽस्मत्समो भव ॥

हे महाभाग! उस आश्रम में निवास करके, हे तपोनिधि! पुत्र के कारण परम प्रसन्न होकर, मेरे पवित्र क्षेत्र में हमारे समान पद को प्राप्त हो।

Verse 28

शालग्राममिति ख्यातं तन्निबोध मुने शुभम् ॥ योऽयं वृक्षस्त्वया दृष्टः सोऽहमेव न संशयः ॥

यह ‘शालग्राम’ नाम से प्रसिद्ध है—हे मुनि, उस शुभ तत्त्व को जानो। यह जो वृक्ष तुमने देखा है, वही मैं हूँ; इसमें संशय नहीं।

Verse 29

एतत्कोऽपि न जानाति विना देवं महेश्वरम् ॥ माययाऽहं निगूढोऽस्मि त्वत्प्रसादात्प्रकाशितः ॥

इस रहस्य को देव महेश्वर के सिवा कोई नहीं जानता। मैं माया से गुप्त था; तुम्हारे प्रसाद से प्रकट हुआ हूँ।

Verse 30

एवं तस्मै वरं दत्त्वा सालङ्कायनकाय वै ॥

इस प्रकार उस सालङ्कायनक को वरदान देकर (आगे कथा चलती है)।

Verse 31

पश्यतस्तस्य वसुधे तत्रैवान्तरहितोऽभवम् ॥ वृक्षं दक्षिणतः कृत्वा जगाम स्वाश्रमं मुनिः ॥

हे वसुधे! उसके देखते-देखते मैं वहीं अंतर्धान हो गया। फिर मुनि उस वृक्ष को दाहिने रखकर अपने आश्रम को चले गए।

Verse 32

मम तद्रोचते स्थानं गिरिकूटशिलोच्चये ॥ शालग्राम इति ख्यातं भक्तसंसारमोक्षणम् ॥

मुझे वह स्थान प्रिय है—पर्वत-शिखरों और शिलाओं की ऊँची उठान पर स्थित। वह ‘शालग्राम’ नाम से प्रसिद्ध है और भक्तों को संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है।

Verse 33

तत्र गुह्यानि मे भूमे वक्ष्यमाणानि मे शृणु ॥ तरन्ति मनुजा येभ्यो घोरं संसारसागरम् ॥

हे पृथ्वी, वहाँ मेरे गुप्त उपदेश सुनो, जिन्हें मैं अब कहने वाला हूँ; जिनके द्वारा मनुष्य भयानक संसार-सागर को पार करते हैं।

Verse 34

गुह्यानि तत्र वसुधे तीर्थानि दश पञ्च च ॥ नाद्यापि किञ्चिज्जानन्ति मुच्यन्ते यैरिह स्थिताः ॥

हे वसुधा, वहाँ पंद्रह तीर्थ गुप्त हैं। आज भी लोग उन्हें बहुत कम जानते हैं; जिनके द्वारा वहाँ रहने वाले मुक्त हो जाते हैं।

Verse 35

तत्र बिल्वप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्रं मम प्रियम् ॥ कुञ्जानि तत्र चत्वारि क्रोशमात्रे यशस्विनि ॥

वहाँ ‘बिल्वप्रभ’ नाम का एक गुप्त क्षेत्र है, जो मुझे प्रिय है। हे यशस्विनी, वहाँ एक क्रोश की परिधि में चार कुञ्ज (उपवन) हैं।

Verse 36

हृद्यं तत्परमं गुह्यं भक्तकर्मसुखावहम् ॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत अहोरात्रोषितो नरः ॥

वह स्थान हृदय को प्रिय है, अत्यन्त गुप्त है और भक्तिपूर्ण कर्म का सुख देने वाला है। वहाँ मनुष्य को एक दिन-रात निवास करके स्नान करना चाहिए।

Verse 37

अश्वमेधफलं भुक्त्वा मम लोके स मोदते ॥ चक्रस्वामीति विख्यातं तस्मिन्क्षेत्रे परं मम ॥

अश्वमेध का फल प्राप्त करके वह मेरे लोक में आनंदित होता है। उस क्षेत्र में मेरा परम स्वरूप ‘चक्रस्वामी’ नाम से प्रसिद्ध है।

Verse 38

चक्राङ्कितशिलास्तत्र दृश्यन्ते च इतस्ततः ॥ चक्राङ्कितशिला यत्र वरवर्णिनि तिष्ठति ॥

वहाँ चक्र-चिह्नित शिलाएँ इधर-उधर दिखाई देती हैं। हे सुन्दर वर्ण वाली, जहाँ वह चक्र-चिह्नित शिला स्थित है।

Verse 39

तदेतद्विद्धि वसुधे समन्ताद्योजनत्रयम् ॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥

हे वसुधे, इसे जानो—यह चारों ओर तीन योजन तक फैला है। तीन रात उपवास करके मनुष्य को वहाँ स्नान करना चाहिए।

Verse 40

त्रयाणामपि यज्ञानां फलं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम कर्म परायणः ॥

वह निश्चय ही तीनों यज्ञों का फल प्राप्त करता है। और फिर यहाँ, मेरे कर्मों में परायण होकर, प्राण त्याग देता है।

Verse 41

वाजपेयफलं भुक्त्वा मम लोकं च गच्छति॥ तत्र विष्णुपदं नाम क्षेत्रं गुह्यं परं मम॥

वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करके वह मेरे लोक को जाता है। वहाँ ‘विष्णुपद’ नामक क्षेत्र है—मेरा परम और गुह्य तीर्थ।

Verse 42

तिस्रो धाराः पतन्त्यत्र हिमकूटं समाश्रिताः॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥

यहाँ हिमकूट से सम्बद्ध तीन धाराएँ गिरती हैं। जो पुरुष तीन रात उपवास करे, वह वहाँ स्नान करे।

Verse 43

त्रयाणामपि रात्रीणां फलं प्राप्नोति निष्कलम्॥ तथैव मुञ्चते प्राणान्मुक्तसङ्गो गत क्लमः॥

वह उन तीनों रातों का फल पूर्णतः प्राप्त करता है; और वैसे ही आसक्ति से मुक्त, थकान-रहित होकर प्राण त्याग देता है।

Verse 44

अतिरात्रफलं भुक्त्वा मम लोके महीयते॥ तत्र कालीह्रदं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम॥

अतिरात्र यज्ञ का फल भोगकर वह मेरे लोक में सम्मानित होता है। वहाँ ‘कालीह्रद’ नामक मेरा परम, गुप्त क्षेत्र है।

Verse 45

अत्र चैव ह्रदस्रोतो बदरीवृक्षनिःसृतः॥ तत्र स्नानं तु कुर्वीत षष्टिकालोषितो नरः॥

यहाँ ही सरोवर की धारा बदरी-वृक्ष से निकलती है। जो पुरुष षष्टिकाल-व्रत का पालन करे, वह वहाँ स्नान करे।

Verse 46

नरमेधफलं भुक्त्वा मम लोके च मोदते॥ अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि महाश्चर्यं वसुन्धरे॥

नरमेध यज्ञ का फल भोगकर वह मेरे लोक में आनंदित होता है। और हे वसुन्धरा, मैं तुम्हें एक और महान् आश्चर्य बताऊँगा।

Verse 47

तत्र शङ्खप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम॥ श्रूयते शङ्खशब्दश्च द्वादश्यामर्द्धरात्रके॥

वहाँ मेरा परम और गोपनीय क्षेत्र ‘शङ्खप्रभ’ नाम से प्रसिद्ध है; द्वादशी की अर्धरात्रि में शंख-ध्वनि भी सुनाई देती है।

Verse 48

गदाकुण्डमिति ख्यातं तस्मिन्क्षेत्रे परं मम॥ यत्र वै कम्पते स्रोतः दक्षिणां दिशमाश्रितम्॥

उस मेरे परम क्षेत्र में ‘गदाकुण्ड’ नाम से प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ धारा दक्षिण दिशा की ओर झुककर काँपती-सी बहती है।

Verse 49

तत्र स्नानं तु कुर्वीत त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ वेदान्तगानां विप्राणां फलं प्राप्नोति मानवः॥

जो पुरुष तीन रात उपवास करके वहाँ स्नान करे, वह वेदान्त का पाठ करने वाले ब्राह्मणों के समान पुण्यफल प्राप्त करता है।

Verse 50

अथ वै मुञ्चते प्राणान्कृतकृत्यो गुणान्वितः॥ गदापाणिर्महाकायो मम लोकं प्रपद्यते॥

तब वह कृतकृत्य और गुणसम्पन्न होकर प्राण त्याग देता है; और गदा-धारी महाकाय (भगवान्) के मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 51

पुनश्चाग्निप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम ॥ धारा पतति तत्रैका पूर्वोत्तरसमा श्रिता ॥

फिर मेरा परम और गोपनीय क्षेत्र ‘अग्निप्रभ’ नाम से है; वहाँ एक ही धारा गिरती है, जो ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा की ओर स्थित है।

Verse 52

यस्तत्र कुरुते स्नानं चतुरात्रोषितो नरः ॥ अग्निष्टोमात्पञ्चगुणं फलं प्राप्नोति मानवः ॥

जो पुरुष वहाँ चार रात ठहरकर स्नान करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ के फल से पाँच गुना फल प्राप्त करता है।

Verse 53

अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम कर्मसु निष्ठितः ॥ अग्निष्टोमफलं भुक्त्वा मम लोकं प्रपद्यते ॥

और जो वहाँ मेरे विधानानुसार कर्मों में निष्ठ होकर प्राण त्यागता है, वह अग्निष्टोम का फल भोगकर मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 54

तत्राश्चर्यं महाभागे कथ्यमानं मया शृणु ॥ हेमन्ते चोष्णकं तीर्थं ग्रीष्मे भवति शीतलम् ॥

हे महाभागे, वहाँ का एक आश्चर्य सुनो: शीत ऋतु में वह तीर्थ उष्ण रहता है और ग्रीष्म में शीतल हो जाता है।

Verse 55

तत्र स्नानं प्रकुर्वीत सप्त रात्रोषितो नरः ॥ राजा भवति सुश्रोणि सवार्युधकलान्वितः ॥

हे सुश्रोणि, जो पुरुष वहाँ सात रात ठहरकर स्नान करता है, वह घुड़सवार सेना, शस्त्र और युद्धकलाओं से युक्त राजा बनता है।

Verse 56

अथ वै मुञ्चते प्राणान्मम कर्माविनिश्चितः ॥ स भुक्त्वा राज्यभोज्यानि मम लोकं च गच्छति ॥

और निश्चय ही, जो वहाँ मेरे विधानानुसार कर्मों में दृढ़ होकर प्राण त्यागता है, वह राज्यसुख भोगकर मेरे लोक को भी जाता है।

Verse 57

तत्र देवप्रभं नाम गुह्यं क्षेत्रं परं मम ॥ धाराः पञ्चमुखास्तत्र पतन्ति गिरिसंश्रिताः ॥

वहाँ ‘देवप्रभ’ नामक मेरा परम, गुप्त तीर्थ-क्षेत्र है। वहाँ पर्वत से आश्रित पाँच मुखों वाली धाराएँ नीचे गिरती हैं।

Verse 58

तत्र स्नानं तु कुर्वीत त्वष्टकालोषितो नरः ॥ चतुर्णामपि वेदानां याति पारं न संशयः ॥

जो मनुष्य त्वष्टकाल-पर्यन्त वहाँ निवास करके स्नान करता है, वह चारों वेदों के भी पार तट को प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 59

अथात्र मुञ्चते प्राणाँल्लोभमोहविवर्जितः ॥ वेदकर्म समुत्सृज्य मम लोके महीयते ॥

और जो वहाँ लोभ और मोह से रहित होकर प्राण त्यागता है, वह वेद-संबद्ध कर्मों को त्यागकर मेरे लोक में सम्मानित होता है।

Verse 60

गुह्यं विद्याधरं नाम तत्र क्षेत्रं परं मम ॥ पञ्च धाराः पतन्त्यत्र हिमकूटविनिःसृताः ॥

वहाँ ‘विद्याधर’ नामक मेरा परम, गुप्त तीर्थ-क्षेत्र है। यहाँ हिमकूट से निकली पाँच धाराएँ नीचे उतरती हैं।

Verse 61

यस्तत्र कुरुते स्नानं मेकरात्रोषितो नरः ॥ याति वैद्याधरं लोकं कृतकृत्यो न संशयः ॥

जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है और एक रात्रि निवास करता है, वह कृतकृत्य होकर विद्याधरों के लोक को जाता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 62

अथात्र मुंचते प्राणान्वीतरागो गतक्लमः ॥ भुक्त्वा वैद्याधरान्भोगान्मम लोकं स गच्छति ॥

तब जो वहाँ प्राणों का त्याग करता है—आसक्ति-रहित और क्लेश-रहित—विद्याधरों के भोगों का उपभोग करके वह मेरे लोक को जाता है।

Verse 63

तत्र पुण्यनदी नाम गुह्यक्षेत्रे परे मम ॥ शिलाकुञ्जलताकीर्णा गन्धर्वाप्सरसेविता ॥

वहाँ मेरे परम गुह्य-क्षेत्र में ‘पुण्यनदी’ नाम की (एक नदी) है, जो शिलाकुञ्जों और लताओं से व्याप्त है तथा गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा सेवित है।

Verse 64

अथात्र मुंचते प्राणान्मम कर्मानुसारकः ॥ सप्तद्वीपान् समुत्सृज्य मम लोकं स गच्छति ॥

तब जो वहाँ प्राणों का त्याग करता है—मेरे कर्म/विधानों का अनुसरण करने वाला—सप्तद्वीपों को त्यागकर वह मेरे लोक को जाता है।

Verse 65

गन्धर्वेति च विख्यातं तस्मिन् क्षेत्रं परं मम ॥ एकधारा पतत्यत्र पश्चिमां दिशमाश्रिता ॥

उस स्थान में मेरा परम क्षेत्र ‘गन्धर्व’ नाम से प्रसिद्ध है; वहाँ एक ही धारा पश्चिम दिशा की ओर आश्रित होकर गिरती है।

Verse 66

तत्र स्नानं तु कुर्वीत चतुरात्रोषितो नरः ॥ मोदते लोकपालेषु स्वच्छन्दगमनालयः ॥

जो पुरुष वहाँ स्नान करे और चार रात्रि निवास करे, वह लोकपालों के बीच आनंदित होता है और स्वेच्छा से गमन करने योग्य धाम में वास करता है।

Verse 67

अथात्र मुंचते प्राणान्मम कर्मपरायणः ॥ लोकपालान्परित्यज्य मम लोकं स गच्छति ॥

तब वहाँ जो मेरे विहित कर्मों में परायण होकर प्राण त्यागता है, वह लोकपालों को भी छोड़कर मेरे लोक को प्राप्त होता है।

Verse 68

तत्र देवह्रदं नाम मम क्षेत्रं वसुन्धरे ॥ यत्र कान्तासि मे भूमे बलिर्यज्ञविनाशनात् ॥

हे वसुन्धरा! वहाँ ‘देवह्रद’ नामक मेरा क्षेत्र है, जहाँ हे भूमे! बलि के यज्ञ के विनाश से तुम मुझे प्रिय हुईं।

Verse 69

स ह्रदो वरदः श्रेष्ठो मनोज्ञः सुखशीतलः ॥ अगाधः सौख्यदश्चापि देवानामपि दुर्लभः ॥

वह सरोवर वर देने वाला, श्रेष्ठ, मनोहर, सुखद शीतल है; अगाध है, कल्याण देने वाला भी—और देवताओं को भी दुर्लभ है।

Verse 70

तस्मिन् ह्रदे महाभागे मम वै नियमोदके ॥ मत्स्याश्चक्रांकिताश्चैव पर्यटन्ते इतस्ततः ॥

उस परम भाग्यशाली सरोवर में—जो वास्तव में मेरे नियम-जल से युक्त है—चक्र-चिह्नित मछलियाँ इधर-उधर विचरती हैं।

Verse 71

अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व वसुंधरे ॥ महाश्चर्यं विशालाक्षि यत्र तत्परिवर्तते ॥

और भी मैं तुम्हें बताऊँगा—सुनो, हे वसुन्धरा। हे विशालाक्षि! वहाँ एक महान आश्चर्य है, जहाँ वह (अद्भुत घटना) घटित/परिवर्तित होती है।

Verse 72

पश्येति श्रद्धधानस्तु न पश्यत्पापपूरुषः ॥ तस्मिन्देवह्रदे पुण्यं चतुर्विंशतिर्द्वादश ॥

‘देखो!’—श्रद्धावान देखता है; पापी पुरुष नहीं देखता। उस देवह्रद में पुण्य का मान ‘चौबीस और बारह’ (संक्षिप्त रूप से) कहा गया है।

Verse 73

यत्र स्नाता दिवं यान्ति शुद्धा वाक्कायजैर्मलैः ॥ तत्र स्नानं प्रकुर्वीत दशरात्रोषितो नरः ॥

जहाँ स्नान करके लोग वाणी और शरीर से उत्पन्न मलिनताओं से शुद्ध होकर स्वर्ग जाते हैं, वहाँ दस रात नियमपूर्वक ठहरने वाला पुरुष स्नान करे।

Verse 74

दशानामश्वमेधानां प्राप्नोत्यविकलं फलम् ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम चिन्ताव्यवस्थितः ॥

वह दस अश्वमेध यज्ञों का अविकल फल प्राप्त करता है। और फिर यहीं, मुझमें ध्यानस्थ होकर, अपने प्राणों का त्याग करता है।

Verse 75

अश्वमेधफलं भुक्त्वा भूमे मत्समतां व्रजेत् ॥ अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि क्षेत्रं गुह्यं परं मम ॥

हे पृथ्वी! अश्वमेध का फल भोगकर वह मेरी समता को प्राप्त होता है। और आगे मैं तुम्हें अपना एक गुह्य, परम तीर्थ-क्षेत्र बताऊँगा।

Verse 76

सम्भेदो देवनद्योस्तु समस्तसुखवल्लभः ॥ दिवोऽवतीर्य तिष्ठन्ति देवा यत्र सहप्रियाः ॥

वहाँ देव-नदियों का संगम है, जो समस्त सुखों का प्रिय स्रोत है। जहाँ स्वर्ग से उतरकर देवता अपने प्रियजनों सहित निवास करते हैं।

Verse 77

गन्धर्वाप्सरसश्चैव नागकन्याः सहोरगैः ॥ देवर्षयश्च मुनयः समस्तसुरनायकाः ॥

वहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ, नागकन्याएँ सर्पों सहित; देवर्षि, मुनि तथा समस्त देव-नायक भी उपस्थित रहते हैं।

Verse 78

सिद्धाश्च किन्नराश्चैव स्वर्गादवतरण्ति हि ॥ नेपाले यच्छिवस्थानं समस्तसुखवल्लभम् ॥

सिद्ध और किन्नर भी निश्चय ही स्वर्ग से उतरते हैं—नेपाल में स्थित उस शिव-धाम में, जो समस्त सुखों का प्रिय आश्रय है।

Verse 79

तेभ्यस्तेभ्यश्च स्थानेभ्यस्तीर्थेभ्यश्च विशेषतः ॥ महादेवजटाजूटान्नीलकण्ठाच्छिवालयः ॥

उन-उन स्थानों से, और विशेषतः उन तीर्थों से—महादेव की जटाजूट से तथा नीलकण्ठ से सम्बद्ध शिवालय (प्रकट/स्थित) है।

Verse 80

श्वेतगङ्गेति या प्रोक्ता तया सम्भूय सादरम् ॥ नाना नद्यः समायाता दृश्यादृश्यतया स्थिताः ॥

जिसे ‘श्वेत-गङ्गा’ कहा गया है, उससे आदरपूर्वक मिलकर अनेक नदियाँ आ पहुँचीं, जो दृश्य और अदृश्य रूपों में स्थित हैं।

Verse 81

गण्डक्याः कृष्णया चैव या कृष्णस्य तनूद्भवा ॥ तया सम्भेदमापन्ना या सा शिवतनूद्भवा

गण्डकी के साथ वह ‘कृष्णा’ भी—जो कृष्ण के शरीर से उत्पन्न कही गई है—और जो धारा शिव-तनु से उत्पन्न कही जाती है, वह भी; ये सब उसके/उसमें संगम को प्राप्त हुईं।

Verse 82

मम क्षेत्रे समाख्यातं पुण्यं परमपावनम् ॥ वसुधे त्वं विजानीहि देवानामपि दुर्लभम्

मेरे क्षेत्र में एक पुण्य-तीर्थ प्रसिद्ध है, जो परम पावन है। हे वसुधा, इसे जानो—यह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

Verse 83

यच्च सिद्धाश्रम इति विख्यातः पुण्यवर्द्धनः ॥ शम्भोस्तपोवनं तत्र सर्वाश्रमवरं प्रति

और वहाँ ‘सिद्धाश्रम’ नाम से विख्यात स्थान है, जो पुण्य बढ़ाने वाला है। वहीं शम्भु का तपोवन भी है, जो समस्त आश्रमों में श्रेष्ठ माना जाता है।

Verse 84

नानापुष्पफलोपेतं कदलीषण्डमण्डितम् ॥ निचुलैश्चैव पुन्नागैः केसरैश्च विराजितम्

वह स्थान नाना पुष्प-फलों से युक्त है, केले के झुरमुटों से सुशोभित है; और निचुल, पुन्नाग तथा केसर वृक्षों से भी शोभायमान है।

Verse 85

खर्जूराशोकबकुलैश्चूतैश्चैव प्रियालकैः ॥ नारिकेलैश्च पूगैश्च चम्पकैर्जम्बुभिर्धवैः

खर्जूर, अशोक, बकुल, आम और प्रियालक वृक्षों से; नारिकेल, पूग, चम्पक, जम्बू तथा धव वृक्षों से भी वह वन परिपूर्ण है।

Verse 86

नारङ्गैर्बदरिभिश्च जम्बीरैर्मातुलुङ्गकैः ॥ केतकीमल्लिकाजातीयूथिकाराजिराजितम्

नारंग, बदरी, जम्बीर और मातुलुङ्ग वृक्षों से; तथा केतकी, मल्लिका, जाती और यूथिका के पुष्प-समूहों की पंक्तियों से वह स्थान सुशोभित है।

Verse 87

कुन्दैः कुरवकैर्नागैः कुटजैर्दाडिमैरपि ॥ आगत्य यत्र क्रीडन्ति देवानां मिथुनानि च

कुंद, कुरवक, नाग, कुटज और दाड़िम (अनार) वृक्षों से युक्त उस स्थान में आकर देव-युगल क्रीड़ा करते हैं।

Verse 88

तस्मिन्ह्रदे महापुण्ये पुण्यनद्यॊस्तु संगमे ॥ स्नानाच्छताश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः

उस महापुण्य ह्रद में, पवित्र नदियों के संगम पर, स्नान करने से मनुष्य सौ अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

Verse 89

स्नात्वा तत्र तु वैशाखे गोसहस्रफलं भवेत् ॥ माघमासे पुनः स्नात्वा प्रयागस्नानजं फलम्

वहाँ वैशाख में स्नान करने से सहस्र गोदान का फल होता है; और माघ मास में पुनः स्नान करने से प्रयाग-स्नान का फल प्राप्त होता है।

Verse 90

कार्त्तिके मासि यः स्नाति तुलासंस्थे दिवाकरे ॥ विधिना नियतः सोऽपि मुक्तिभागी न संशयः

कार्त्तिक मास में, जब सूर्य तुला राशि में स्थित हो, जो विधिपूर्वक संयमित होकर स्नान करता है, वह भी मुक्ति का भागी होता है—इसमें संशय नहीं।

Verse 91

यज्ञस्तपोऽथवा दानं श्राद्धमिष्टस्य पूजनम् ॥ यत्किञ्चित्क्रियते कर्म तदनन्तफलं भवेत् ॥

यज्ञ, तप, दान, श्राद्ध अथवा इष्टदेव का पूजन—यहाँ जो भी कर्म किया जाता है, वह अनन्त फल देने वाला होता है।

Verse 92

भूमे तस्यापराधांश्च सर्वानेव क्षमाम्यहम् ॥ गङ्गायमुनयोऱ्यद्वत्सङ्गमो मर्त्यदुर्लभः ॥

हे भूमि, मैं उस पुरुष के सभी अपराधों को क्षमा करता हूँ। जैसे गंगा-यमुना का संगम मनुष्यों के लिए दुर्लभ है, वैसे ही यह मिलन भी दुर्लभ है।

Verse 93

तथैवायं देवनद्यो सङ्गमः समुदाहृतः ॥ एतद्गुह्यं परं देवि मम क्षेत्रे वसुन्धरे ॥

उसी प्रकार देव-नदियों का यह संगम कहा गया है। हे देवी वसुंधरा, मेरे क्षेत्र में यह परम गुह्य रहस्य है।

Verse 94

अहमस्मिन्महाक्षेत्रे धरे पूर्वमुखः स्थितः ॥ शालग्रामे महाक्षेत्रे भूमे भागवतप्रियः ॥

हे धरा, इस महाक्षेत्र में मैं पूर्वमुख होकर स्थित हूँ। हे भूमि, शालग्राम के इस महाक्षेत्र में मैं भागवत-भक्तों को प्रिय हूँ।

Verse 95

अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व वसुन्धरे ॥ अन्तर्गुह्यं परं श्रेष्ठं यन्न जानन्ति मोहिताः ॥

और भी मैं तुमसे कहूँगा—सुनो, हे वसुंधरा: एक अंतर्गुह्य, परम श्रेष्ठ रहस्य, जिसे मोहित लोग नहीं जानते।

Verse 96

शिवो मे दक्षिणस्थाने तिष्ठन्वै विगतज्वरः ॥ लोकानां प्रवरः श्रेष्ठः सर्वलोकवरो हरः ॥

मेरे दक्षिण स्थान में शिव विराजते हैं, निश्चय ही क्लेशरहित। वे लोकों में अग्रणी और श्रेष्ठ हैं—हर, जो समस्त लोकों को वर देने वाले हैं।

Verse 97

तं ये विन्दन्ति ते देवि नूनं मामेव विन्दति ॥ ये मां विदन्ति देवेशि ते विदन्ति शिवं परम् ॥

हे देवी! जो उन्हें प्राप्त करते हैं, वे निश्चय ही मुझे भी प्राप्त करते हैं। हे देवेशी! जो मुझे जानते हैं, वे परम शिव को जानते हैं।

Verse 98

अहं यत्र शिवस्तत्र शिवो यत्र वसुन्धरे ॥ तत्राहमपि तिष्ठामि आवयोर्नान्तरं क्वचित् ॥ शिवं यो वन्दते भूमे स हि मामेव वन्दते ॥ लभते पुष्कलां सिद्धिमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ॥

हे वसुन्धरा! जहाँ मैं हूँ वहाँ शिव हैं; और जहाँ शिव हैं वहाँ मैं भी निवास करता हूँ—हम दोनों के बीच कहीं भी भेद नहीं। हे भूमे! जो शिव की वन्दना करता है, वह वास्तव में मेरी ही वन्दना करता है। जो इसे तत्त्वतः जानता है, वह महान सिद्धि प्राप्त करता है।

Verse 99

मुक्तिक्षेत्रं प्रथमतॊ रुरुखण्डं ततः परम् ॥ सम्भेदो देवनद्यॊश्च त्रिवेणी च ततः परम् ॥

प्रथम ‘मुक्तिक्षेत्र’ है; उसके बाद ‘रुरुखण्ड’ है; फिर दिव्य नदियों का संगम है; और उसके बाद त्रिवेणी है।

Verse 100

क्षेत्रं प्रमाणं विज्ञेयं गण्डकी सङ्गतं परम् ॥ एवं सा गण्डकी देवि नदीनामुत्तमा नदी ॥

क्षेत्र का प्रमाण और निर्धारण गण्डकी के परम संगमों के आधार पर जानना चाहिए। इस प्रकार, हे देवी, वह गण्डकी नदियों में उत्तम नदी है।

Verse 101

गङ्गया मिलिता यत्र भागीरथ्या महाफला ॥ अपरं तन्महत्क्षेत्रं हरिक्षेत्रमिति स्मृतम् ॥

जहाँ गङ्गा भागीरथी से मिलती है और महान फल प्रदान करती है, वह दूसरा महान क्षेत्र ‘हरिक्षेत्र’ के नाम से स्मरण किया गया है।

Verse 102

आदौ सा गण्डकी पुण्या भागीरथ्या च सङ्गता ॥ तस्य तीर्थस्य महिमा ज्ञायते न सुरैरपि ॥

प्रारम्भ में वह पुण्य गण्डकी भागीरथी से संगम करती है; उस तीर्थ की महिमा देवताओं द्वारा भी पूर्णतः नहीं जानी जाती।

Verse 103

एतत्ते कथितं भद्रे शालग्रामस्य सुन्दरी ॥ गण्डक्याश्चैव माहात्म्यं सर्वकल्मषनाशनम् ॥

हे भद्रे, हे सुन्दरी, मैंने तुम्हें शालग्राम का यह वृत्तान्त तथा गण्डकी का वह माहात्म्य कहा है जो समस्त कल्मषों का नाश करता है।

Verse 104

पूर्वपृष्टं तया यच्च पुण्यं भागवतप्रियम् ॥ आख्यानानां महाख्यानं द्युतीनां परमा द्युतिः ॥

उसने जो पहले पूछा था—वह पुण्य आख्यान, जो भागवत-भक्तों को प्रिय है—आख्यानों में महाख्यान है और ज्योतियों में परम ज्योति है।

Verse 105

पुण्यानां परमं पुण्यं तपसां च महत्तपः ॥ गुह्यानां परमं गुह्यं गतीनां परमा गतिः ॥

यह पुण्यों में परम पुण्य है, तपों में महान तप है; रहस्यों में परम रहस्य है और गतियों में परम गति है।

Verse 106

महालाभस्तु लाभानां नास्त्यस्मादपरं महत् ॥ पिशुनाय न दातव्यं न शठाय गुरुद्रुहे ॥

यह लाभों में महालाभ है; इससे बढ़कर कोई महान वस्तु नहीं। इसे चुगलखोर को, कपटी को, और गुरु-द्रोही को नहीं देना चाहिए।

Verse 107

लोभमोहमदाद्यैर्ये वर्जिताः पुण्यबुद्धयः ॥ य एतत्पठते नित्यं कल्यमुत्थाय मानवः ॥

जो पुण्यबुद्धि हैं और लोभ, मोह, मद आदि से रहित हैं—जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातः उठकर इसका पाठ करता है, वह बताए गए फल को प्राप्त करता है।

Verse 108

कुलानि तारितान्येवं सप्त सप्त च सप्त च ॥ एवं मरणकाले तु न कदाचिद्विमुह्यते ॥

इस प्रकार कुलों का उद्धार होता है—सात, सात और सात; और इसी प्रकार मृत्यु-काल में वह कभी भी मोहग्रस्त नहीं होता।

Verse 109

यदीच्छेत्परामां सिद्धिं मम लोकं स गच्छति ॥ क्षेत्रस्य शालग्रामस्य माहात्म्यं परमं मया ॥

जो परम सिद्धि की इच्छा करता है, वह मेरे लोक को जाता है। शालग्राम-क्षेत्र की परम महिमा मैंने कही है।

Verse 110

कथितं ते महादेवि किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥

हे महादेवि, तुम्हें कहा जा चुका; अब और क्या सुनना चाहती हो?

Verse 111

वृक्षस्य दक्षिणे पार्श्वे गतस्तावदहं धरे ॥ पूर्वस्थानं परित्यज्य स ऋषिः संशितव्रतः

“हे धरा, तब मैं वृक्ष के दक्षिण पार्श्व की ओर गया। अपना पूर्व स्थान छोड़कर वह ऋषि—दृढ़ व्रत वाला—(आगे बढ़ा)।”

Verse 112

यस्त्रिरात्रमुषित्वा तु नियते नियता शनः ॥ राजसूयफलं प्राप्य मोदते देववद्दिवि

जो व्यक्ति संयमित आचरण के साथ नियमानुसार तीन रात्रियाँ ठहरता है, वह धीरे-धीरे राजसूय यज्ञ का फल पाकर स्वर्ग में देवतुल्य आनन्दित होता है।

Verse 113

एवमेतन्महाभागे क्षेत्रं हरिहरात्मकम् ॥ मृताः येऽत्र गतिं यान्ति मम कर्मानुसारिणः

हे महाभागे, ऐसा ही है—यह क्षेत्र हरि और हर दोनों के स्वरूप वाला है। जो यहाँ मरते हैं, वे अपने कर्मों के अनुसार अपनी गति को प्राप्त होते हैं।

Verse 114

ये च पापाः कृतघ्नाश्च द्विजदेवापराधिनः ॥ कुशिष्याय न दातव्यं न दद्याच्छास्त्रदूषके ॥१ १९॥ नीचाय न च दातव्यं ये न जानन्ति सेवितुम् ॥ सुशिष्याय च दातव्यं धीराय शुभबुद्धये

जो पापी, कृतघ्न तथा ब्राह्मणों और देवताओं के अपराधी हों—उन्हें दान न देना चाहिए। कुपात्र शिष्य को, और शास्त्र का दूषण करने वाले को भी न देना चाहिए। नीच जन को, तथा जो सेवा करना नहीं जानते, उन्हें भी न देना चाहिए। परन्तु सुशिष्य को—धीर और शुभबुद्धि वाले को—दान देना चाहिए।

Verse 115

यदि तुष्टोऽसि मे देव सर्वशान्तिकरः परः ॥ यदि देयो वरो मह्यं तपसाराधितेन च

हे देव, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं—आप परम हैं और सर्वशान्ति के कर्ता हैं—तो यदि मुझे वर देना हो, तो तपस्या से आराधित होकर वह वर मुझे प्रदान करें।

Verse 116

अन्यच्च गुह्यं वक्ष्यामि सालङ्कायन तच्छृणु ॥ तव प्रीत्या प्रवक्ष्यामि येनैतत्क्षेत्रमुत्तमम्

और एक अन्य गुह्य बात मैं कहूँगा; हे सालङ्कायन, उसे सुनो। तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं वह बताऊँगा, जिससे यह क्षेत्र उत्तम (माना जाता) है।

Verse 117

चतुर्णामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मम कर्मसु निष्ठितः

मनुष्य चार अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है; और फिर यहाँ मेरे कर्मों/विधानों में निष्ठावान होकर प्राण त्याग देता है।

Verse 118

नरमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ अथात्र मुञ्चते प्राणान्मुक्तरागो गतक्लमः

मनुष्य नरमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है; और फिर यहाँ आसक्ति से मुक्त, क्लेश-थकान से रहित होकर प्राण त्याग देता है।

Verse 119

गुह्यं सर्वायुधं नाम तत्र क्षेत्रे परं मम ॥ पतन्ति सप्त स्रोतांसि हिमवन्निःसृतानि वै

वहाँ मेरे परम क्षेत्र में ‘सर्वायुध’ नामक एक गुप्त स्थान है; हिमवान से निकली सात धाराएँ वहाँ आकर गिरती हैं।

Verse 120

तत्र स्नानं तु कुर्वीत अष्ट रात्रोषितो नरः ॥ सप्तद्वीपेषु भ्रमति स्वच्छन्दगमनालयः

वहाँ स्नान करना चाहिए; जो पुरुष आठ रात्रियाँ वहाँ निवास करता है, वह स्वच्छन्द गमन-स्थिति वाला होकर सात द्वीपों में भ्रमण करता है।

Verse 121

सौवर्णानि च पद्मानि दृश्यन्ते भास्करोदये ॥ तावत्पश्यन्ति भूतानि यावन्मध्यन्दिनं भवेत् ॥

सूर्योदय पर स्वर्णमय कमल दिखाई देते हैं; प्राणी उन्हें तभी तक देखते हैं, जब तक मध्याह्न नहीं हो जाता।

Verse 122

त्रिशूलगङ्गेति आख्याता सापि तत्र महानदी ॥ एवं नदीसमुद्भेदः सर्वतीर्थकदम्बकम् ॥

वहाँ ‘त्रिशूल-गंगा’ नाम की एक महान नदी भी प्रसिद्ध है। इस प्रकार नदी के प्राकट्य का वर्णन समस्त तीर्थों के गुच्छे-सा संक्षेप है।

Frequently Asked Questions

The text frames Śālagrāma as a disciplined moral-ecological space where liberation is linked to regulated conduct (vrata), reverent engagement with rivers and water-bodies (tīrtha), and responsible transmission of knowledge (adhikāra). Philosophically, it emphasizes a Harihara model: realizing Viṣṇu entails recognizing Śiva’s presence as non-separate within the same kṣetra, presented as a unifying doctrinal lens for practice and interpretation.

Key markers include Vaiśākha śukla-dvādaśī (the sage’s darśana moment). The chapter also specifies month-based bathing benefits in Vaiśākha, Māgha, and Kārttika, and notes seasonal inversion at a tīrtha (warm in hemanta, cool in grīṣma). Multiple vow-durations are prescribed as night-stays with fasting/observance: trirātra, caturātra, saptarātra, aṣṭa-rātra, daśa-rātra, and other specified counts (e.g., ṣaṣṭi-kāla wording in one passage).

Through Pṛthivī as interlocutor and the detailed catalog of rivers, streams, groves, and lakes, the narrative sacralizes terrestrial and hydrological systems as sites requiring restraint, cleanliness, and time-bound observance. The kṣetra is depicted as a network of fragile, ‘guhya’ (protected/hidden) waterscapes whose benefits are contingent on disciplined human behavior, effectively presenting an early model of environmental stewardship via ritual regulation and ethical eligibility.

The central human figure is the sage Sālaṅkāyana, whose tapas leads to the birth of a son named Nandikeśvara. The chapter also references Mahādeva/Śiva (including epithets such as Nīlakaṇṭha and Hara) in relation to a Nepal-associated Śiva-sthāna, and situates the narrative within broader cultural geographies by mentioning Mathurā and the Gaṇḍakī river complex.