Adhyaya 133
Varaha PuranaAdhyaya 13313 Shlokas

Adhyaya 133: Expiations for ritual-time impurity and the offense of defecation/urination in a sacred context

Pūjāsāmāyika-gūdra-vāpūrīṣotsarjana-prāyaścitta

Ritual-Manual (Prāyaścitta) / Ethical-Discourse (Purity and Social Conduct)

अध्याय 133 में वराह भगवान पृथ्वी को पूजा‑सामायिक के समय होने वाली देह‑अशुद्धि तथा पवित्र स्थानों/अनुष्ठान‑संदर्भ में मल‑मूत्र त्याग के अपराध के प्रायश्चित्त बताते हैं। वे कहते हैं कि उनके सान्निध्य‑स्पर्श से वातजन्य क्रिया से जुड़ा दोष भी छूटता है; पर जो व्रत‑प्रतिज्ञा करके नियम तोड़ता है, उसे पशु‑योनि और रौरव नरक का फल मिलता है। पृथ्वी वराह‑कर्म में निष्ठ भक्त के पाप की मात्रा और शुद्धि‑विधि पूछती है। वराह अग्नि‑संबंधी तप, शयन‑व्यवस्था सहित नियत अनुशासन और व्रत बताते हैं; जिनसे शुद्धि, अपराध‑क्षय और वराह‑लोक के अनुरूप आचरण सिद्ध होता है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī (Vasundharā/Dharaṇī/Bhūmi)

Key Concepts

prāyaścitta (expiation and ritual repair)śauca/aśauca (purity and impurity linked to bodily waste)aparādha (ritual-moral offense) and karmic consequencenaraka (Raurava) as deterrent discoursedisciplinary austerity (tapas) and regulated conductterrestrial sanctity (Bhūmi as ethical interlocutor)

Shlokas in Adhyaya 133

Verse 1

अथ पूजासामयिकगुदरवपुरीषोत्सर्जनयोः प्रायश्चित्तम् ॥ श्रीवराह उवाच ॥ स्पृशमानेन मां भूमे वातकर्म प्रमुच्यते ॥ एवं च पुरुषो युक्तो वायुपीडितमानसः ॥

अब नियत समय की पूजा, उदर-रोग तथा मलोत्सर्जन से संबंधित दोषों के प्रायश्चित्त का वर्णन है। श्रीवराह ने कहा— हे भूमे! मुझे स्पर्श करने से वात-सम्बन्धी देह-क्रिया से मुक्ति होती है; और वायु से पीड़ित मन वाला पुरुष इस प्रकार सम्यक् संयमित हो जाता है।

Verse 2

मक्षिका पञ्च वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि मूषकः ॥ श्वा चैव त्रीणि वर्षाणि कूर्मो वै जायते नव ॥

(वह) पाँच वर्षों तक मक्खी, तीन वर्षों तक चूहा, तीन वर्षों तक कुत्ता, और निश्चय ही नौ वर्षों तक कछुआ जन्म लेता है।

Verse 3

एष वै तापनं देवि मोहनं मम सांप्रतम् ॥ यो वै शास्त्रं विजानाति मम कर्मपरायणः ॥

हे देवि! यह मेरा वर्तमान उपदेश है जो ताड़ना भी करता है और मोह भी उत्पन्न करता है; जो शास्त्र को यथार्थ जानता है और मेरे कर्म-नियम में परायण है।

Verse 4

श्रुत्वा वाक्यं हृषीकेशं प्रत्युवाच वसुंधरा ॥ धरण्युवाच ॥ अतुलं लभते पापं तव कर्मपरायणः ॥

हृषीकेश के वचन सुनकर वसुंधरा ने उत्तर दिया। पृथ्वी बोली—जो तुम्हारे कर्म-नियम में आसक्त है, वह अतुल पाप का भागी होता है।

Verse 5

तस्य देव सुखार्थाय विशुद्धिं वक्तुमर्हसि ॥ श्रीवराह उवाच ॥ शृणु कार्त्स्न्येन मे देवि कथ्यमानं मया अनघे ॥

उस व्यक्ति के कल्याण हेतु, हे देव, शुद्धि का उपाय बताना उचित है। श्रीवराह बोले—हे देवी, हे निष्पापे, मेरे द्वारा कही जाने वाली बात को पूर्ण रूप से सुनो।

Verse 6

अपराधमिमं कृत्वा सन्तरेद्येन कर्मणा ॥ पावकेन दिनं त्रीणि नक्तानि च पुनस्त्रयः ॥

यह अपराध कर लेने पर किस कर्म से उसका प्रायश्चित्त हो?—अग्नि द्वारा: तीन दिन और फिर तीन रातें।

Verse 7

कर्म चैवं ततः कृत्वा स च मे नापराध्यति ॥ सर्वसङ्गं परित्यज्य मम लोकं स गच्छति ॥

इस प्रकार वह कर्म करके वह फिर मेरे विधान का अपराध नहीं करता; समस्त आसक्ति त्यागकर वह मेरे लोक को जाता है।

Verse 8

एतत्ते कथितं भद्रे महाकर्मापराधिनः ॥ दोषं चैव गुणं चैव यत्त्वया परिपृच्छितम् ॥

हे भद्रे, महाकर्म में अपराध करने वालों के विषय में—दोष और गुण दोनों—जैसा तुमने पूछा था, वह तुम्हें बता दिया गया है।

Verse 9

शृणु तत्त्वेन मे भूमे कथ्यमानं मया अनघे ॥ पुरीषं मुच्यते यस्तु मम कर्म समाचरन् ॥

हे भूमे, हे अनघे! मेरे द्वारा सत्यपूर्वक कही जा रही बात सुनो। जो मेरे विहित कर्म का आचरण करता है, वह मलरूप अशुद्धि से भी मुक्त हो जाता है।

Verse 10

प्रायश्चित्तं वदाम्यत्र येन मुच्येत किल्बिषात् ॥ मम कर्मपरिभ्रष्टो विह्वलेनान्तरात्मना ॥

यहाँ मैं वह प्रायश्चित्त बताता हूँ जिससे पाप से मुक्ति हो। जो मेरे कर्म-नियम से विचलित हो गया हो और जिसकी अन्तरात्मा व्याकुल हो, वह इससे शुद्ध हो सकता है।

Verse 11

एकां जलमयीं शय्यामेकामाकाशशायिनीम् ॥ एवं कृत्वा विधानं तु सोऽपराधात्प्रमुच्यते ॥

एक बार जलमयी शय्या (जल पर शयन) और एक बार आकाशशायी (खुले आकाश के नीचे शयन) का व्रत करे। इस विधि को करने से वह अपराध से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।

Verse 12

एतत्ते कथितं भद्रे पुरीषं यः समुत्सृजेत् ॥ मद्भक्तेषु विशालाक्षि अपराधविनिश्चयः ॥

हे भद्रे, हे विशालाक्षि! यह तुम्हें कहा गया—जो मेरे भक्तों पर मल/अशुद्धि फेंके, उसके अपराध का यह निर्णय है।

Verse 13

दिव्यवर्षसहस्रं तु रौरवे नरके वसेत् ॥ पुरीषं भक्षयेत्तत्र मम कर्मपरायणः ॥

वह रौरव नरक में एक सहस्र दिव्य वर्षों तक वास करेगा। वहाँ वह मल भक्षण करेगा—भले ही वह मेरे कर्मों में परायण क्यों न रहा हो।

Frequently Asked Questions

The text frames bodily restraint and respect for ritual-terrestrial sanctity as ethical obligations: violations involving impurity and waste-discharge are treated as aparādha requiring prāyaścitta, and disciplined corrective observances are presented as restoring moral-ritual order and social conduct.

The chapter does not specify tithi, lunar month, or seasonal timing. It does, however, quantify durations for observances and consequences (e.g., three days/nights in certain austerities; multi-year animal-rebirth durations; and a thousand divine years in Raurava).

By staging Bhūmi/Pṛthivī as the questioning interlocutor and linking impurity (especially waste-discharge) to moral fault, the narrative implies that bodily waste management is not merely private but impacts the sanctity of the Earth; prāyaścitta functions as a mechanism to re-stabilize the human–terrestrial relationship through regulated conduct.

No royal lineages, dynastic lists, or named sages are referenced in this passage. The only explicit figures are Varāha and Bhūmi (Vasundharā/Dharaṇī), with cosmological reference to Raurava (naraka).