
Kaṅkatāñjana-darpaṇa-vidhiḥ tathā cāturvarṇya-dīkṣā-gaṇāntikā-prakaraṇam
Ritual-Manual
इस अध्याय में वराह भगवान पृथिवी को क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र साधकों के लिए भेदपूर्वक वैष्णव दीक्षा-विधि बताते हैं—आवश्यक सामग्री, निषेध, तथा कर्म-त्याग और संसार-मोक्ष की प्रार्थना हेतु मंत्रों सहित। चारों वर्णों के लिए छत्र (छाता) के रंग का नियम भी दिया गया है। दीक्षा के बाद के आचरण पर पृथिवी के प्रश्न से वराह ‘गणान्तिका’ नामक गुप्त साधना/व्रत का वर्णन करते हैं—उसकी मान्यता, गलत प्रयोग का भय, गुरु से शिष्य को नियमपूर्वक ही प्रदान, तथा विशेष मासों में शुक्ल-द्वादशी आदि तिथि-नियम और अग्निकर्म (होम) का प्रसंग। आगे स्नान-सम्बन्धी उपचारों में कंघी (कङ्कटी), अंजन और दर्पण के प्रयोग तथा उनके मंत्र बताए गए हैं; साथ ही सामाजिक मर्यादा, शुद्धि और पवित्र वस्तुओं के संयमित उपयोग का विधान किया गया है।
Verse 1
अथ कङ्कटाञ्जनदर्पणम्॥ श्रीवराह उवाच॥ क्षत्रियस्य प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व वसुन्धरे॥ त्यक्त्वा प्रहरणान्सर्वान्यत्किञ्चित्पूर्वशिक्षितम्॥
अब ‘कङ्कटाञ्जनदर्पण’ (नामक) प्रकरण। श्रीवराह बोले—हे वसुन्धरे, मैं क्षत्रिय के लिए (विधि) कहूँगा, तुम सुनो। समस्त शस्त्र और जो कुछ पूर्व में शस्त्रविद्या का अभ्यास किया था, उसे त्यागकर…
Verse 2
पूर्वमन्त्रेण मे भूमे तस्य दीक्षां च कारयेत्॥ मया च पूर्वमुक्तानि यानि संसारकाणि च॥
हे भूमे, मेरे पूर्वोक्त मंत्र से उसकी दीक्षा कराई जाए; और मेरे द्वारा पहले कहे गए संसार-सम्बन्धी उपदेशों का भी आचरण कराया जाए।
Verse 3
तानि सर्वाणि चानीय एकं वर्ज्यं यशस्विनि॥ न दद्यत्कृष्णसारस्य चर्म तत्र कदाचन॥
हे यशस्विनि, उन सब वस्तुओं को लाकर, एक को छोड़कर; वहाँ कभी भी कृष्णसार (काला मृग) का चर्म न दे।
Verse 4
पालाशं दण्डकाष्ठं च दीक्षायां न तु कारयेत्॥ छागस्य चैव कृष्णस्य चर्म तत्र प्रदापयेत्॥
दीक्षा में पलाश-लकड़ी का दण्ड न बनवाए। वहाँ, परन्तु, छाग (बकरी) का चर्म तथा काले (वर्ण का) चर्म प्रदान करे।
Verse 5
अश्वत्थं दण्डकाष्ठं तु दीक्षायां तदनन्तरम्॥ कृत्वा द्वादशहस्तां तु वेदिं तत्रोपलेपयेत्॥
फिर दीक्षा के लिए अश्वत्थ (पीपल) की लकड़ी का दण्ड ले। उसके बाद बारह हाथ की वेदी बनाकर वहाँ विधिपूर्वक उसका लेपन करे।
Verse 6
सर्वं ममोक्तं कर्त्तव्यं यच्च मे पूर्वभाषितम्॥ एवं क्षत्रियदीक्षायां सर्वं सम्पाद्य यत्नतः॥
मेरे द्वारा कहा गया सब कुछ और जो मैंने पहले कहा था, वह सब अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार क्षत्रिय की दीक्षा में सब कुछ यत्नपूर्वक तैयार करके…
Verse 7
चरणौ मम संगृह्य इमं मन्त्रमुदाहरेत्॥
मेरे चरणों को पकड़कर वह इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 8
मन्त्रः—त्यक्तानि विष्णो शस्त्राणि त्यक्तं सर्वं क्षत्रियकर्म सर्वम्॥ त्यक्त्वा देवं विष्णुं प्रपन्नोऽथ संसाराद्वै जन्मनां तारयस्व॥
मंत्र— हे विष्णु! शस्त्र त्याग दिए; क्षत्रिय का समस्त कर्म भी त्याग दिया। देव विष्णु की शरण में आया हूँ; अब मुझे संसार, जन्म-जन्म के चक्र से तार दीजिए।
Verse 9
एवं ततो वचश्चोक्त्वा क्षत्रियो मम पार्श्वतः ॥ उभौ च चरणौ गृहीय इमं मन्त्रमुदीरयेत्
इस प्रकार ये वचन कहकर, क्षत्रिय मेरे पास खड़ा होकर मेरे दोनों चरण पकड़ ले और फिर इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 10
तत एवं वचो ब्रूते सर्वं चैवात्र पूजयेत् ॥ विविधैर्गन्धपत्रैश्च धूपैश्चैव यथोदितम्
फिर ऐसे वचन कहकर वहाँ सम्पूर्ण पूजन करे—विविध सुगन्धित द्रव्यों, पत्रों तथा यथोक्त धूप आदि से।
Verse 11
यथोक्तेनैव तान्भूमे भोजयेत् तदनन्तरम् ॥ शुद्धान्भागवतांश्चैव एवमेतन्न संशयः
उसके तुरंत बाद, हे भूमे, यथोक्त विधि से उन्हीं को भोजन कराए—अर्थात् शुद्ध भगवद्भक्तों को; इसमें संशय नहीं।
Verse 12
एषा वै क्षत्रिये दीक्षा देवि संसारमोक्षणम् ॥ मत्प्रसादेन कर्तव्यं यदीच्छेत्सिद्धिमुत्तमाम्
हे देवि! यह क्षत्रिय की दीक्षा है, जो संसार से मोक्ष का साधन है। यदि कोई उत्तम सिद्धि चाहे, तो इसे मेरे प्रसाद से करे।
Verse 13
वैश्यस्य चैव वक्ष्यामि शृणु तत्त्वेन सुन्दरि ॥ दीक्षा च यादृशी तस्य यथा भवति सुन्दरि
अब मैं वैश्य की विधि बताऊँगा; हे सुन्दरी, तत्त्वपूर्वक सुनो—उसकी दीक्षा कैसी है और कैसे होती है।
Verse 14
त्यक्त्वा तु वैश्यकर्माणि मम कर्मपरायणः ॥ यथा च लभते सिद्धिं तृतीया वर्णसंस्थितिः
वैश्यकर्मों को त्यागकर, मेरे कर्म में परायण होकर, तीसरी वर्ण-स्थिति इस साधना में कैसे सिद्धि पाती है (यह कहा जाता है)।
Verse 15
सर्वं तत्र समानीय यन्मया पूर्वभाषितम् ॥ दशहस्तां ततः कृत्वा वेदिं वेदविचेतितः
वहाँ मेरे द्वारा पहले जो कहा गया है, वह सब एकत्र करके, वेद-ज्ञानी पुरुष फिर दस हस्त प्रमाण की वेदी का निर्माण करे।
Verse 16
लेपयेद्गोमयेनादौ पूर्वन्यायेन तत्र वै ॥ चर्मणापि तु छागस्य स्वगात्रं परिवेष्टयेत्
प्रारम्भ में वहाँ पूर्वविधि के अनुसार गोबर से लेपन करे; और बकरे के चर्म से अपने शरीर को भी लपेटे।
Verse 17
उदुम्बरं दन्तकाष्ठं गृहीत्वा दक्षिणे करे ॥ शुद्धभागवतानां च कृत्वा त्रिः परिवर्त्तनम्
दाहिने हाथ में उदुम्बर का दंतकाष्ठ लेकर, शुद्ध भागवत भक्तों की तीन बार परिक्रमा करके (आगे कर्म करे)।
Verse 18
जानुभ्यामवनिङ्गत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत्
घुटनों के बल भूमि पर जाकर, इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 19
मामेवं सोऽपि चोक्त्वा वै मम कर्मप्रसादवान् ॥ गुरोश्च चरणौ गृही इमं मन्त्रं मुदाहरेत् ॥
इस प्रकार मुझसे कहकर, मेरे लिए किए गए कर्म-सेवा के प्रसाद से युक्त वह भी गुरु के चरण पकड़कर इस मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करे।
Verse 20
त्यक्त्वा वै कृषिगोरक्षावाणिज्यक्रयविक्रयम् ॥ लब्धा च त्वत्प्रसादेन विष्णुदीक्षा मयाऽधुना ॥
मैंने कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य तथा क्रय-विक्रय को त्यागकर, आपके प्रसाद से अब वैष्णव दीक्षा प्राप्त की है।
Verse 21
देवाभिवादनं कृत्वा पुरो भागवतेषु च ॥ पश्चात्तु भोजनं दद्यादपराधबहिष्कृतम् ॥
देव को प्रणाम करके और भगवान् के भक्तों में पहले यथोचित आदर दिखाकर, फिर अपराध से दूषित अन्न को छोड़कर भोजन देना चाहिए।
Verse 22
एवं दीक्षा तु वैश्यानां मम मार्गानुसारिणाम् ॥ येन मुच्यन्ति सुश्रोणि घोरसंसारसागरात् ॥
मेरे मार्ग का अनुसरण करने वाले वैश्यों की दीक्षा ऐसी है; जिसके द्वारा, हे सुश्रोणि, वे घोर संसार-सागर से मुक्त हो जाते हैं।
Verse 23
शूद्रस्यापि प्रवक्ष्यामि मद्भक्तस्य वराङ्गने ॥ यस्तु दीक्षां समासाद्य मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥
हे वराङ्गने! मैं अपने भक्त शूद्र की दीक्षा भी बताऊँगा; जो दीक्षा प्राप्त करके समस्त पाप-दोषों से मुक्त हो जाता है।
Verse 24
सर्वसंस्कारद्रव्याणि मया पूर्वोदितानि च ॥ दीक्षाकामस्य शूद्रस्य शीघ्रं तानि प्रकल्पयेत् ॥
मेरे द्वारा पहले बताए गए सभी संस्कार-सामग्री को, दीक्षा चाहने वाले शूद्र के लिए शीघ्र ही तैयार करना चाहिए।
Verse 25
अष्टहस्तां ततो देवि संलिप्य नीयतां ततः ॥ चर्म नीलस्य छागस्य कल्पयेच्छूद्रयोनये ॥
तत्पश्चात्, हे देवी, आठ हाथ की भूमि/स्थान को लेपकर फिर आगे ले जाया जाए; और शूद्र-योनि वाले के लिए नीलवर्ण बकरे का चर्म व्यवस्थित किया जाए।
Verse 26
दण्डं च वैष्णवं दद्यात् नीलं वस्त्रं च तस्य वै ॥ एवं गृहीत्वा शूद्रोऽपि दीक्षायाः कारणं परम् ॥
उसे वैष्णव दण्ड दिया जाए और उसी के लिए नीलवर्ण वस्त्र भी; इस प्रकार इन्हें ग्रहण करके शूद्र भी दीक्षा का परम आधार/योग्य कारण बन जाता है।
Verse 27
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो लब्धसंज्ञो गतस्पृहः ॥ उभौ तौ चरणौ गृही गुरोर्वै तदनन्तरम् ॥
समस्त पापों से मुक्त, (दीक्षा की) संज्ञा प्राप्त, और स्पृहा-रहित होकर—तत्क्षण बाद वह गुरु के दोनों चरणों को ग्रहण करे।
Verse 28
गुरोः प्रसादनार्थाय इमं मन्त्रं मुदाहरेत् ॥
गुरु को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 29
मन्त्रः—विष्णुप्रसादे गुह्यं प्रसन्नात्पूर्ववच्च लब्धा चैव संसारमोक्षणाय करोमि कर्म प्रसीद
मंत्र: “विष्णु की कृपा से यह गुह्य (उपदेश) प्रसन्न (गुरु) से पूर्ववत् प्राप्त हुआ है। संसार-बन्धन से मोक्ष हेतु मैं यह कर्म करता हूँ—प्रसन्न हों।”
Verse 30
एतन्मन्त्रं समुच्चार्य कुर्यात्तत्र प्रदक्षिणम् ॥ चतुरश्च यथान्यायं पुनश्चैवाभिवादयेत् ॥
इस मंत्र का उच्चारण करके वहाँ प्रदक्षिणा करे; विधिपूर्वक चार बार करके फिर से आदरपूर्वक प्रणाम करे।
Verse 31
अनन्तरं ततः कुर्याद्गन्धमाल्येन चार्चनम् ॥ भोजयेच्च यथान्यायमपराधविवर्जितः
इसके बाद सुगंध और मालाओं से पूजन करे; और विधिपूर्वक, किसी भी (अनुष्ठान) अपराध से रहित होकर, भोजन कराए।
Verse 32
दीक्षा एषा च शूद्राणामुपचारश्च ईदृशः ॥ चतुर्णामपि वर्णानां दुःखसंसारमोक्षणम्
यह शूद्रों के लिए भी दीक्षा है और ऐसा ही उपाचार है; यह चारों वर्णों के लिए दुःखमय संसार-चक्र से मोक्ष का साधन है।
Verse 33
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व वसुन्धरे ॥ चतुर्णामपि वर्णानां यथा छत्रं प्रदीयते
और भी मैं तुम्हें बताऊँगा; सुनो, हे वसुंधरा—चारों वर्णों के लिए छत्र (दान/चिह्न) किस प्रकार दिया जाता है।
Verse 34
ब्राह्मणे पाण्डुरं छत्रं क्षत्रिये रक्तमेव च ॥ वैश्याय पीतं वै दद्याद्नीलं शूद्राय दापयेत्
ब्राह्मण को पांडुर/श्वेत छत्र, क्षत्रिय को लाल; वैश्य को पीला देना चाहिए, और शूद्र के लिए नीला छत्र दिलवाना चाहिए।
Verse 35
सूत उवाच ॥ चातुर्वर्ण्यस्य श्रुत्वा वै सा मही संहितव्रता ॥ वराहं पुनरप्याह नत्वा सा धरणी तदा
सूत ने कहा—चातुर्वर्ण्य का वृत्तान्त सुनकर व्रत-निष्ठ पृथ्वी ने फिर से वराह से कहा; तब धरणी ने प्रणाम करके वचन बोला।
Verse 36
ततो महीवचः श्रुत्वा मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ वराहरूपी भगवानुवाच स महाद्युतिः
तब पृथ्वी के वचन सुनकर मेघ-और-दुन्दुभि-सा गम्भीर नाद करने वाले, वराह-रूप भगवान् महाद्युति ने कहा।
Verse 37
श्रीवराह उवाच ॥ शृणु तत्त्वेन कल्याणि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ सर्वत्र चिन्तनीयोऽहं गुह्यमेव गणान्तिकम्
श्रीवराह ने कहा—हे कल्याणी, जो तुम मुझसे पूछती हो उसे तत्त्वतः सुनो। मैं सर्वत्र चिन्तन-योग्य हूँ, परन्तु (मैं) गणान्तिक—अन्तरंगों के निकट—गुप्त भी हूँ।
Verse 38
नारायणवचः श्रुत्वा धरणी शंसितव्रता ॥ हृष्टतुष्टमनास्तत्र श्रुत्वा तच्च महौजसम्
नारायण के वचन सुनकर, व्रत के लिए प्रशंसित धरणी वहाँ उस महौजस्वी उपदेश को सुनकर हर्षित और तृप्त-चित्त हो गई।
Verse 39
शुचिर्भागवतश्रेष्ठा तव कर्मणि नित्यशः ॥ ततः कमलपत्राक्षी भक्ता भक्तेषु वत्सला
वह शुचि है, भक्तों में श्रेष्ठ है, और सदा आपके कर्म/सेवा में निरत रहती है। तब वह कमल-पत्र-नेत्रा, भक्त और भक्तों पर स्नेह करने वाली (आगे बोली/प्रवृत्त हुई)।
Verse 40
कराभ्यामञ्जलिं कृत्वा नारायणमथाब्रवीत्
दोनों हाथों से अंजलि बाँधकर उसने तब नारायण से कहा।
Verse 41
धरण्युवाच ॥ त्वद्भक्तेन महाभाग विधिना दीक्षितेन च ॥ तव चिन्तापरेणात्र किं कर्त्तव्यं च माधव
धरणी बोली—हे महाभाग! आपके भक्त द्वारा, विधिपूर्वक दीक्षित होकर और यहाँ आपका चिंतन करते हुए, क्या करना चाहिए, हे माधव?
Verse 42
केन चिन्तयितव्यस्त्वमचिन्त्यो मानुषैः परः ॥ किंच भागवतैः कार्यं यथावित्तं न शक्यते
आप—जो मनुष्यों के लिए अचिन्त्य और परात्पर हैं—किसके द्वारा और कैसे चिंतित किए जाएँ? और जब अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना संभव न हो, तब भक्तों को क्या करना चाहिए?
Verse 43
ततो भूम्या वचः श्रुत्वा आदिरव्यक्तसम्भवः ॥ मधुरं स्वरमादाय प्रत्युवाच वसुन्धराम्
तब भूमि के वचन सुनकर, अव्यक्त से उत्पन्न आदिपुरुष ने मधुर स्वर धारण कर वसुन्धरा को उत्तर दिया।
Verse 44
श्रीवराह उवाच ॥ देवि तत्त्वेन वक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ येन चिन्तयसि चिन्तां मम कर्मपरायणा
श्रीवराह बोले—हे देवी! जो तुम मुझसे पूछती हो, उसे मैं तत्त्वानुसार कहूँगा; क्योंकि तुम मेरी व्यवस्था-कार्य में तत्पर होकर मेरे विषय में चिंता करती हो।
Verse 45
दीक्षितेन तु शुद्धेन मम निश्चितकर्मणा ॥ गृहीतव्यं विशालाक्षि मन्त्रेण विधिनात्र वै
हे विशालाक्षि! यह यहाँ केवल शुद्ध दीक्षित द्वारा—जो मेरे निश्चित कर्म में दृढ़ है—मंत्र के द्वारा और विधिपूर्वक ही ग्रहण/अनुष्ठान किया जाना चाहिए।
Verse 46
यस्तु भागवतो भूत्वा तद्गृह्णाति गणान्तिकाम् ॥ जनस्य दर्शनस्पर्शसंयुक्तां वामसंयुताम्
पर जो कोई अपने को भागवत (भक्त) कहकर, जनसाधारण के दर्शन‑स्पर्श से जुड़ी और वाम (विपरीत/अशुद्ध) आचरण से संयुक्त उस गणान्तिका को ग्रहण करता है, वह अनुचित करता है।
Verse 47
तस्य धर्मो न विद्येत दीक्षा तस्य महाफला ॥ यस्तु गृह्णाति सुश्रोणि मन्त्रपूतां गणान्तिकाम्
उसके लिए धर्म नहीं रहता; और उसकी दीक्षा को (विडम्बना से) ‘महाफला’ कहा जाता है। पर हे सुश्रोणि! जो मंत्र से पवित्र की हुई गणान्तिका को ग्रहण करता है, वही उचित है।
Verse 48
आसुरी नाम सा दीक्षा यया धर्मः प्रवर्त्तते ॥ यस्माद्गणान्तिकां गुह्यां चिन्तयेच्छुद्धमानसः
जिस दीक्षा से धर्म उस प्रकार प्रवर्तित होता है, वह ‘आसुरी’ नाम की दीक्षा कहलाती है। इसलिए शुद्ध मन वाला व्यक्ति गुप्त गणान्तिका का चिंतन करे।
Verse 49
गुह्यां गणान्तिकां यो मां चिन्तयेत्स बुधोत्तमः ॥ जन्मान्तरसहस्राणि चिन्तिता तेन तेन सः
जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, गुप्त गणान्तिका के द्वारा मुझ पर ध्यान करता है, वह सहस्रों जन्मों तक उसी (दैवी सत्ता) द्वारा बार‑बार स्मरण में रखा जाता है।
Verse 50
ग्रहणस्य प्रवक्ष्यामि यथा शिष्याय दीयते ॥ मन्त्रं लोकसुखार्थाय तच्छृणुष्व वसुन्धरे
मैं ग्रहण-विधि बताता हूँ, जैसे वह शिष्य को दी जाती है। लोक-कल्याण हेतु उस मंत्र को सुनो, हे वसुन्धरे।
Verse 51
कौमुदस्य तु मासस्य मार्गशीर्षस्य वाप्यथ ॥ वैशाखस्यापि मासस्य शुक्लपक्षे तु द्वादशी
कौमुद नामक मास, अर्थात् मार्गशीर्ष में भी; अथवा फिर वैशाख मास में—शुक्ल पक्ष की द्वादशी को।
Verse 52
कुर्यान्निरामिषं तत्र दिनानि त्रीणि निश्चितः ॥ तस्मिङ्गणान्तिकं ग्राह्यं मम धर्मविनिश्चयात्
वहाँ दृढ़ निश्चय से तीन दिन निरामिष (मांस-रहित) आचरण करे। फिर मेरे धर्म-निर्णय के अनुसार गणान्तिका ग्रहण की जाए।
Verse 53
ममाग्रतो वरारोहे प्रज्वाल्य च हुताशनम् ॥ कुशैरास्तरणं कृत्वा स्थापयित्वा गणान्तिकम्
हे वरारोहे! मेरे सामने अग्नि प्रज्वलित करके, कुशा का आसन बिछाकर, गणान्तिका को स्थापित करे।
Verse 54
मन्त्रः— या धारिता पूर्वपितामहेन ब्रह्मण्यदेवेन भवोद्भवेन ॥ नारायणाद्दक्षिणगात्रजातां हे शिष्य गृह्णीष्व स वै त्वमेव
मंत्र: ‘जिसे पूर्व पितामह, ब्रह्मण्यदेव, भवोद्भव (शिव) ने धारण किया; जो नारायण के दक्षिण अंग से उत्पन्न हुई—हे शिष्य, इसे ग्रहण करो; वही तुम स्वयं हो।’
Verse 55
तत एतेन मन्त्रेण गुरुर्गृह्य गणान्तिकम् ॥ शिष्याय दत्त्वा स्निग्धाय इमं मन्त्रमुदीरयेत्
तब गुरु इस मंत्र से गणान्तिका को लेकर, स्नेहयुक्त (भक्त) शिष्य को देकर, आगे का मंत्र उच्चारित करे।
Verse 56
मन्त्रः— नारायणस्य दक्षिणगात्रजातां स्वशिष्य गृह्णीष्व समयेन देवीम् ॥ एतद्विचिन्त्यापर एव भूत्वा भवे पुनर्भावनमेति नैव
मंत्र— हे मेरे शिष्य, नारायण के दक्षिण अंग से उत्पन्न देवी को विधिपूर्वक ग्रहण करो। इसका चिंतन कर, केवल उसी में तत्पर होकर, संसार में पुनर्जन्म को कदापि प्राप्त नहीं होता।
Verse 57
अकर्मण्येन मुच्येत तव कर्मपरायणः ॥ ततो भूम्या वचः श्रुत्वा लोकनाथो जनार्द्दनः
‘जो तुम्हारे कर्म में परायण है, वह अकर्मण्यता (और उसके दोष) से मुक्त हो जाएगा।’ तब भूमि के वचन सुनकर लोकनाथ जनार्दन (ने उत्तर दिया)।
Verse 58
धर्मसंयुक्तवाक्येन प्रत्युवाच वसुन्धराम्
उन्होंने वसुंधरा (पृथ्वी) को धर्मयुक्त वचनों से प्रत्युत्तर दिया।
Verse 59
श्रीवराह उवाच ॥ देवी तत्त्वेन वक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ स्नानस्यैवोपचाराणि यानि कुर्वन्ति कर्मिणः ॥
श्रीवराह बोले— हे देवी, जो तुम मुझसे पूछती हो, उसे मैं तत्त्वतः कहूँगा—स्नान से संबंधित वे उपचार और विधियाँ, जिन्हें कर्मकाण्डी करते हैं।
Verse 60
वृत्तेष्वेवोपचारेषु जलप्राधानिकेषु च ॥ कङ्कतीं चाञ्जनं चैव दर्पणं चैव सुन्दरी ॥
स्थापित उपचारों में—विशेषतः जल-प्रधान सेवाओं में—हे सुन्दरी, कंघी, अंजन तथा दर्पण भी (अर्पित किए जाते हैं)।
Verse 61
यथा मन्त्रेण दातव्यं तच्छृणुष्व वसुन्धरे ॥ स्पृष्ट्वा तु मम गात्राणि क्षौमवस्त्रेण संवृतः ॥
मन्त्र के साथ जैसा अर्पण करना चाहिए, वह सुनो, हे वसुन्धरे। मेरे अंगों का स्पर्श करके, क्षौम (सन) वस्त्र से आच्छादित होकर…
Verse 62
अञ्जलौ कङ्कतीं गृह्य इमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥
अञ्जलि में कंघी लेकर, इस मन्त्र का उच्चारण करे।
Verse 63
मन्त्रः — एतां कङ्कतीमञ्जलिस्थां प्रगृह्य प्रसीद नारायण शिरः प्रसाधि हि ॥
मन्त्र— इस अञ्जलि में स्थित कंघी को ग्रहण करके, हे नारायण, प्रसन्न हो; और निश्चय ही शिर का प्रसाधन कर।
Verse 64
महानुभाव विश्वनेत्रे स्वनेत्रे याभ्यां पश्यसे त्वं त्रिलोकीम् ॥ लोकप्रभो सर्वलोकप्रधान एषो जनमञ्जनं लोकनाथ ॥
हे महानुभाव, हे विश्वनेत्र! जिन अपने नेत्रों से तुम त्रिलोकी को देखते हो; हे लोकप्रभो, समस्त लोकों में प्रधान—हे लोकनाथ, यह प्राणियों के लिए अंजन है।
Verse 65
ततः संस्नापयेद्देवं मन्त्रेणानेन सुव्रतम् ॥
तत्पश्चात्, हे सुव्रत! इस मंत्र से देवता को स्नान कराए।
Verse 66
मन्त्रः — एषा मया माधव त्वत्प्रसादाद्गुरुप्रसादाच्च हि मन्त्रपूजा ॥ प्राप्ता ममैषा वै गणान्तिका च भवेदधर्मो न च मे कदाचित् ॥
मंत्र: हे माधव! आपकी कृपा से और गुरु की कृपा से मुझे यह मंत्र-पूजा प्राप्त हुई है; यह गणों से भी संबद्ध है। मेरे लिए कभी भी अधर्म न हो।
Verse 67
मन्त्रः — देवदेव स्नानीयमिदं मम कल्पितं सुवर्णकलशं गृहाण प्रसीद एषोऽञ्जलिर्मया परिकल्पितः स्नाहि स्नाहीति ॥
मंत्र: हे देवदेव! मेरे द्वारा यह स्नानीय अर्पण तैयार किया गया है; इस स्वर्ण-कलश को ग्रहण करें, प्रसन्न हों। यह अंजलि भी मैंने अर्पित की है; स्नान करें, स्नान करें।
Verse 68
नमो नारायणेत्युक्त्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
‘नमो नारायण’ कहकर इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 69
य एतेन विधानॆन मम कर्मणि दीक्षितः ॥ गुरोर्गृहीत्वा महतो मम लोकाय गच्छति ॥ कुशिष्याय न दातव्या पिशुनाय शठाय च
जो इस विधान के अनुसार मेरे कर्म में दीक्षित होता है—महान गुरु से इसे ग्रहण करके—वह मेरे लोक को प्राप्त होता है। यह कुदिश्य, चुगलखोर और छलिया को नहीं देना चाहिए।
Verse 70
एषा चैव वरारोहे गृहीत्वा गणनान्तिका ॥ सुशिष्याय च दातव्या हस्ते चैव गणान्तिका
हे सुन्दर नितम्बवाली! इस गणनान्तिका को ग्रहण करके उत्तम शिष्य को देना चाहिए, और गणान्तिका को उसी शिष्य के हाथ में स्थापित करना चाहिए।
Verse 71
रुद्राक्षैरुत्तमा सा तु मध्यमा पुत्रजीवकैः ॥ ज्ञेया कनिष्ठा पद्माक्षैर्देवि ते कथिता मया
रुद्राक्ष के दानों से बनी माला उत्तम मानी जाती है; पुत्रजीव के बीजों से बनी मध्यम; और पद्माक्ष के दानों से बनी कनिष्ठ जाननी चाहिए। हे देवी, यह मैंने तुम्हें कहा है।
Verse 72
एतत्कश्चिन्न जानाति जन्मान्तरशतैरपि ॥ सर्वलोकहितां शुद्धां मोक्षकामां गणान्तिकाम्
सैकड़ों जन्मों के बाद भी कोई विरला ही इसे जान पाता है—यह गणान्तिका, जो शुद्ध है, मोक्ष की कामना हेतु है और समस्त लोकों के हितकारी रूप में कही गई है।
Verse 73
नोच्छिष्टः संस्पृशेत् तां तु स्त्रीणां हस्ते न कारयेत् ॥ आकाशे स्थापनं कुर्यान्न च वामेन संस्पृशेत्
उच्छिष्ट अवस्था में उसे स्पर्श न करे; स्त्रियों के हाथों में उसे न दिलाए। उसे भूमि से ऊपर (ऊँचे स्थान) पर रखे, और बाएँ हाथ से उसे न छुए।
Verse 74
न दर्शयेच्च कस्यापि चिन्तयित्वा तु पूजयेत् ॥ एतत्ते परमं गुह्यमाख्यातं मोक्षदायकम्
इसे किसी को न दिखाए; अपितु मन में ध्यान रखकर ही इसकी पूजा करे। यह परम गोपनीय, मोक्षदायक रहस्य मैंने तुम्हें बताया है।
Verse 75
एवं हि विधिपूर्वेण पालयेत गणान्तिकाम् ॥ विशुद्धो मम भक्तश्च मम लोकं स गच्छति
इस प्रकार विधिपूर्वक गणान्तिका का पालन करना चाहिए। शुद्ध होकर और मेरा भक्त बनकर वह मेरे लोक को प्राप्त होता है।
Verse 76
एवं विष्णोर्वचः श्रुत्वा धरणी संहितव्रता ॥ प्रत्युवाच परं श्रेष्ठं लोकनाथं महौजसम्
इस प्रकार विष्णु के वचन सुनकर, व्रतों में स्थिर धरणी ने परम श्रेष्ठ, महातेजस्वी लोकनाथ को उत्तर दिया।
Verse 77
दर्पणं ते कथं देयं तन्ममाख्याहि माधव ॥ येन तुष्टो निजं रूपं पश्यसे चिन्तितः प्रभो
हे माधव! आपको दर्पण कैसे अर्पित किया जाए, यह मुझे बताइए; जिससे प्रसन्न होकर, हे प्रभो, ध्यान किए जाने पर आप अपना स्वरूप दिखाएँ।
Verse 78
धरण्यास्तद्वचः श्रुत्वा वराहः पुनरब्रवीत् ॥ शृणु मे दर्पणविधिं यथावद्देवि सुव्रते
धरणी के वे वचन सुनकर वराह ने फिर कहा—हे सुव्रते देवी! दर्पण-विधि को यथावत् मुझसे सुनो।
Verse 79
नमो नारायणेत्युक्त्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ।
“नमो नारायण” कहकर, फिर इस मंत्र का उच्चारण करे।
Verse 80
य एतेन विधानॆन मम कर्मपरायणः ॥ करोति मम कर्माणि तारितं कुलसप्तकम् ।
जो इस विधि के अनुसार मेरे नियत कर्मों में परायण होकर मेरे अनुष्ठान करता है, उसका सात पीढ़ियों का कुल तर जाता है।
Verse 81
एतेन मन्त्रेण वै भूमे उपचारस्तु ईदृशः॥ हृष्टतुष्टेन कर्तव्यॊ यदीच्छेत्परमां गतिम् ।
हे भूमे! इस मंत्र से उपासना/उपचार की विधि ऐसी है—यदि कोई परम गति चाहता हो तो प्रसन्न और संतुष्ट मन से इसे करना चाहिए।
Verse 82
मन्त्रः— नाहं शस्त्रं देवदेव स्मृशामि परापवादं न च देव ब्रवीमि ॥ कर्म करोमि संसारमोक्षणं त्वया चोक्तमेव वराहसंस्थान ।
मंत्र: हे देवों के देव! मैं शस्त्र नहीं उठाता; और हे प्रभो, मैं पर-निंदा भी नहीं करता। आपके कहे अनुसार, हे वराह-स्वरूप, मैं संसार-मोचन का कर्म करता हूँ।
Verse 83
मन्त्रः— अहं हि वैश्यो भवन्तमुपागतः प्रमुच्य कर्माणि च वैश्ययोगम् ॥ दीक्षा च लब्धा भगवत्प्रसादात्प्रसीदतां मे भवबन्धमोक्षणम् ।
मंत्र: मैं वैश्य हूँ और आपके पास आया हूँ, वैश्य-धर्म के कर्म और बंधन छोड़कर। भगवान की कृपा से दीक्षा मिली है; कृपा करके मुझे भव-बन्धन से मुक्ति प्रदान हो।
Verse 84
भक्ष्याभक्ष्यं ततस्त्यक्त्वा त्यक्त्वा वै शूद्रकर्म च ॥ एवं वदेत् ततो देवं शूद्रो दीक्षाभिकाङ्क्षिणम् ।
तब भक्ष्य-अभक्ष्य का भेद छोड़कर, और शूद्र-कर्म भी त्यागकर, दीक्षा की इच्छा रखने वाला शूद्र इस प्रकार देवता से निवेदन करे।
Verse 85
धरोवाच ॥ श्रुता दीक्षा यथान्यायं चातुर्वर्ण्यस्य केशव ॥ दीक्षितैः किं नु कर्तव्यं तव कर्मपरायणैः ।
धरा बोली—हे केशव! चातुर्वर्ण्य के लिए विधिपूर्वक दीक्षा सुन ली गई। अब जो दीक्षित हैं और आपके कर्मों में तत्पर हैं, उन्हें क्या करना चाहिए?
Verse 86
एषा गणान्तिका नाम दीक्षा अङ्गबीजनिःसृता ॥ एतद्गुह्यां महाभागे मम चिन्तां विचिन्तयेत् ।
यह दीक्षा ‘गणान्तिका’ नाम से कही जाती है, जो अंगों के बीजाक्षरों से प्रकट होती है। हे महाभागे! इस गुप्त उपदेश—मेरे विचारित निर्देश—पर भलीभाँति मनन करना चाहिए।
Verse 87
ततः शिष्यॊ गुरुश्चैव दीक्षितः शुचिरुत्तमः ॥ नमो नारायणेत्युक्त्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ।
तत्पश्चात शिष्य और गुरु—दोनों—दीक्षित होकर परम पवित्र बनें। ‘नमो नारायणाय’ कहकर इस मंत्र का उच्चारण करें।
Verse 88
अञ्जनं कङ्कतीं चैव शीघ्रमेव प्रसादयेत् ॥ ततो जानुस्थितो भूत्वा मम कर्मपरायणः ।
अञ्जन और कङ्कती को शीघ्र ही तैयार/व्यवस्थित करे। फिर घुटनों के बल बैठकर मेरे कर्मों में परायण बना रहे।
Verse 89
उत्तमाष्टाधिकशतं पञ्चाशत्तुर्यमध्यमाः ॥ तदर्धं स्यात्कनिष्ठापि परिमाणेन सुन्दरी ॥
हे सुन्दरी! उत्तम परिमाण एक सौ आठ है; मध्यम पचास और उसका चौथाई (पचास पौन) है। कनिष्ठ परिमाण उसका आधा होता है—नियत माप के अनुसार।
Verse 90
मन्त्रः— श्रुतिर्भागवती श्रेष्ठा श्रुती अग्निद्विजश्च तव मुखं नासेऽश्विनौ नयने चन्द्रसूर्यौ मुखं च चन्द्र इव गात्राणि जगत्प्रधानानीमं च दर्पणं पश्य पश्य रूपम् ।
मंत्र— भागवती श्रुति सर्वोत्तम है। तुम्हारे दोनों कान अग्नि और द्विज हैं; नासिका में अश्विनीकुमार; नेत्रों में चन्द्र और सूर्य; और मुख चन्द्रमा के समान है। अंग जगत् के प्रधान तत्त्व हैं। इस दर्पण में देखो, देखो—रूप का दर्शन करो।
Verse 91
ममैव शरणं गत्वा इमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ मन्त्रः— शूद्रोऽहं शूद्रकर्माणि मुक्त्वाऽभक्ष्यं च सर्वशः ॥
केवल मेरी शरण में जाकर यह मंत्र बोले: “मैं शूद्र हूँ; शूद्र-कर्मों को छोड़कर, और जो अभक्ष्य है उसे सर्वथा त्यागकर…”
Verse 92
धरण्युवाच ॥ स्नानोपकल्पनान्तेषु किं कर्तव्यं नु माधव ॥ प्रसाधनविधिं चैव केन मन्त्रेण कल्पयेत् ॥
धरणी बोली: “हे माधव! स्नान की तैयारी के अंत में क्या करना चाहिए? और किस मंत्र से प्रसाधन-शुद्धि की विधि स्थापित की जाए?”
The text frames liberation-oriented discipline as a regulated renunciation: initiates verbally relinquish varṇa-linked occupational acts (e.g., warfare for kṣatriya, trade/agriculture for vaiśya) and adopt a guru-mediated Vaiṣṇava practice. The ethical emphasis lies in controlled conduct—truthfulness/avoidance of slander, purity constraints, and responsible handling/transmission of secret observances (Gaṇāntikā)—so that social roles are reoriented toward a mokṣa-directed life under ritual and pedagogical oversight.
For receiving Gaṇāntikā, the chapter specifies śukla-pakṣa dvādaśī (waxing twelfth lunar day) in months named as Kaumuda and/or Mārgaśīrṣa, and also Vaiśākha. It further prescribes a three-day nirāmiṣa (non-meat) observance leading up to the rite, performed before a consecrated fire (hutāśana).
Environmental stewardship appears indirectly through the Pṛthivī-centered pedagogical frame: Earth’s questions elicit norms that regulate human behavior (restraint, purity, non-harm implied by dietary restriction, and disciplined use of materials). While the passage does not discuss landscapes or conservation explicitly, it models ‘terrestrial balance’ as the maintenance of orderly, low-conflict social conduct and ritual responsibility—an ethic presented as supportive of Pṛthivī’s well-being by limiting disorder and transgression.
The Gaṇāntikā mantras reference a transmission line involving a ‘pūrvapitāmaha’ (fore-grandfather/ancestor figure) and a ‘brahmaṇya-deva’ associated with Bhava (Śiva) as an origin point, while the practice is said to be connected to Nārāyaṇa’s ‘dakṣiṇa-gātra’ (right-side body) symbolism. No specific kings, dynasties, or geographically anchored historical persons are named in the provided text segment.