
Trisandhyā-mantra-upasthāna-vidhiḥ
Ritual-Manual (Sandhyā, Mantra, Devotional Discipline)
इस अध्याय में वराह भगवान पृथ्वी देवी से संवाद में ‘परम गोपनीय’ उपदेश देते हैं, जो संसार-तरण में सहायक है। विधि यह है कि शुद्ध स्नान के बाद संयमी और भक्त साधक श्रद्धापूर्वक उपासना के लिए आए। वराह स्वयं को ऊपर-नीचे और चारों दिशाओं में व्याप्त बताकर दिशानुसार कर्मों का आधार बताते हैं। फिर त्रिसंध्या-उपासना का क्रम सिखाते हैं—भिन्न दिशाओं की ओर मुख करके, अंजलि में जल लेकर, नारायण/पुरुषोत्तम को प्राचीन, अनंत और मोक्षदायक मानकर निर्दिष्ट स्तुति-मंत्रों का जप। यह ज्ञान दीक्षित, निष्ठावान शिष्यों को ही देने योग्य कहा गया है; नियमित आचरण से पापक्षय, धर्मवृद्धि और जीवनोद्धार का फल बताया गया है।
Verse 1
अथ त्रिसन्ध्यामन्त्रोपस्थानम् ॥ श्रीवराह उवाच ॥ शृणुष्व परमं गुह्यं पूर्वं पृष्टं त्वया धरे ॥ देवि सर्वं प्रवक्ष्यामि संसारतरणं महत्
अब त्रिसंध्या में मंत्र-उपस्थान का विधान। श्रीवराह बोले—हे धरा-देवि, तुमने जो पहले पूछा था वह परम गोपनीय रहस्य सुनो। मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा—संसार से पार कराने वाला महान उपाय।
Verse 2
स्नानं कृत्वा यथान्यायं मम कर्मपरायणाः ॥ उपसर्पन्ति ये भक्त्या कदान्नाशा जितेन्द्रियाः
विधिपूर्वक स्नान करके, मेरे कर्मों में तत्पर लोग—भक्ति से मेरे समीप आते हैं; वे सादा अन्न खाने वाले और इन्द्रियों को जीतने वाले होते हैं।
Verse 3
यश्चैवमुच्यते भद्रे मम रूपं सनातनम् ॥ अहमेव वरारोहे सर्वभूतसनातनम्
हे भद्रे, जो इस प्रकार कहा गया है वही मेरा सनातन स्वरूप है। हे वरारोहे, मैं ही समस्त प्राणियों में स्थित सनातन तत्त्व हूँ।
Verse 4
अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च अहमेव व्यवस्थितः ॥ दिशां च विदिशां चैव उपर्युपरि भामिनि
नीचे, ऊपर और तिर्यक् (चारों ओर) मैं ही स्थित हूँ; दिशाओं और विदिशाओं में भी—हे भामिनि—ऊपर-ऊपर सर्वत्र।
Verse 5
सर्वथा वन्दनीयास्ते मम भक्तेन सर्वदा ॥ क्रियासमूह युक्तेन यदीच्छेत्परमां गतिम्
यदि कोई परम गति चाहता हो, तो मेरे भक्त द्वारा—समस्त विधि-क्रियाओं से युक्त होकर—तुम्हें सदा हर प्रकार से वन्दनीय मानकर पूजना चाहिए।
Verse 6
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि गुह्यं लोके महद्यशः ॥ यथा वै वन्दनीयास्ते मम मार्गानुसारिणः
मैं तुम्हें एक और बात बताऊँगा—जो गुप्त है, पर लोक में महान् यश वाली—कि मेरे मार्ग का अनुसरण करने वाले किस प्रकार वन्दनीय हैं।
Verse 7
कृत्वापि परमं कर्म बुद्धिमादाय तद्विधाम् ॥ ततः पूर्वमुखो भूत्वा पुनर्गृह्य जलाञ्जलिम्
प्रधान कर्म कर लेने पर, उसी विधि के अनुरूप बुद्धि-भाव धारण करके, फिर पूर्वाभिमुख होकर पुनः जल की अञ्जलि ग्रहण करे।
Verse 8
ॐ नमो नारायणेत्युक्त्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत्
“ॐ नमो नारायण” कहकर इस मन्त्र का उच्चारण करे।
Verse 9
यजामहे धर्मपरायणोद्भवं नारायणं सर्वलोकप्रधानम् ॥ ईशानमाद्यं पुरुषं पुराणं संसारमोक्षाय कृपाकरं तम्
हम धर्मपरायणता से उद्भूत, समस्त लोकों के प्रधान, नारायण का यजन करते हैं—जो ईशान, आद्य पुरुष, पुराण पुरुष हैं; संसार से मोक्ष के लिए जो करुणाकर हैं, उन्हीं का।
Verse 10
मन्त्राः ऊचुः ॥ यथा तु देवः प्रथमादिकर्ता पुराणकल्पश्च यथा विभूतिः ॥ तथा स्थितं चादिमनन्तरूपममोघसङ्कल्पमनन्तमीḍe ॥
मन्त्रों ने कहा: जैसे देव प्रथम और आदिकर्ता हैं, वैसे ही पुराण-व्यवस्था, कल्प और उनकी विभूति है। उसी प्रकार स्थित, आदि-रहित, अनन्तरूप, अमोघसंकल्प, अनन्त—उसकी मैं स्तुति करता हूँ।
Verse 11
ततस्तेनैव कालेन पुनर्गृह्य जलाञ्जलिम् ॥ तेनैव चास्य योगेन भूत्वा चैवोत्तरामुखः ॥ नमो नारायणेत्युक्त्वा इमं मन्त्र मुदीरयेत् ॥
फिर उसी समय पुनः जल की अंजलि लेकर, उसी योग-नियम से उत्तरमुख होकर, “नमो नारायणाय” कहकर इस मन्त्र का उच्चारण करे।
Verse 12
यजामहे दिव्यं परं पुराणमनादिमध्यान्तमनन्तरूपम् ॥ भवोद्भवं विश्वकरं प्रशान्तं संसारमोक्षावहमद्वितीयम् ॥ १३॥ ततस्तेनैव कालेन भूत्वा वै दक्षिणामुखः ॥ नमः पुरुषोत्तमायेत्युक्त्वा इमं मन्त्र मुदीरयेत् ॥
हम उस दिव्य, परम, पुरातन को पूजते हैं जो आदि-मध्य-अन्त से रहित, अनन्त रूपों वाला, भव का उद्गम, विश्व का कर्ता, प्रशान्त, संसार से मोक्ष देने वाला, अद्वितीय है। फिर उसी समय दक्षिणमुख होकर “नमः पुरुषोत्तमाय” कहकर इस मन्त्र का उच्चारण करे।
Verse 13
यजामहे यज्ञमहो रूपं तु सत्यं ऋतं च कालादिमरूपमाद्यम् ॥ अनन्यरूपं च महानुभावं संसारमाक्षोय कृतावतारम् ॥
हम उस यज्ञस्वरूप—अद्भुत रूप वाले—को पूजते हैं, जो सत्य और ऋत (धर्म-नियम) है; जो काल और आदि से परे आद्य रूप है; जिसकी उपमा नहीं, जो महान प्रभावशाली है, और जिसने संसार-व्यवस्था के हेतु अवतार धारण किया है।
Verse 14
काष्ठकृत्यस्ततो भूत्वा कृत्वा चेन्द्रियनिग्रहम् ॥ अच्युते तु मनः कृत्वा इमं मन्त्र मुदाहरेत् ॥
फिर काष्ठ के समान स्थिर होकर, इन्द्रियों का निग्रह करके, अच्युत में मन को स्थिर कर, इस मन्त्र का उच्चारण करे।
Verse 15
यजामहे सोमपं भवन्तं ते सोमार्कनेत्रं शतपत्रनेत्रम् ॥ जगत्प्रधानं ननु लोकनाथं मृत्युत्रिसंसारविमोक्षणं च ॥
हम आपको पूजते हैं, हे सोमप! जिनके नेत्र चन्द्र और सूर्य हैं, जिनकी दृष्टि शतपत्र (कमल) के समान है; जो जगत् का आधार, लोकनाथ हैं, और मृत्यु तथा त्रिविध संसार-बंधन से विमोचन करने वाले हैं।
Verse 16
त्रिषु सन्ध्यास्वनेनैव विधिना कुर्यान्मम च कर्म तत् ॥ बुद्ध्या युक्त्या च मत्या च यदीच्छेत्परमां गतिम् ॥
तीनों संध्याओं में इसी विधि से मेरे इस कर्म का आचरण करे। जो परम गति चाहता हो, वह बुद्धि, युक्ति और संकल्प से युक्त होकर करे।
Verse 17
गुह्यानां परमं गुह्यं योगानां परमो निधिः ॥ सांख्यानां परमं सांख्यं कर्मणां कर्म चोत्तमम् ॥
यह रहस्यों में परम रहस्य है; योगों में सर्वोच्च निधि है; सांख्यों में परम सांख्य है; और कर्मों में उत्तम कर्म है।
Verse 18
एतन्मरणकालेऽपि गुह्यं विष्णुप्रभाषितम् ॥ बुद्ध्या धारयितव्यं न विस्मर्तव्यं कदाचन ॥
मरणकाल में भी इस विष्णु-प्रभाषित गुह्य उपदेश को बुद्धि में धारण करना चाहिए और कभी भी नहीं भूलना चाहिए।
Verse 19
य एतत्पठते नित्यं कल्पोच्छ्रायी दृढव्रतः ॥ ममापि हृदये नित्यं स तिष्ठति न संशयः ॥
जो इसे नित्य पढ़ता है—दृढ़व्रती और कल्पपर्यन्त उन्नत—वह नित्य मेरे हृदय में भी निवास करता है; इसमें संशय नहीं।
Verse 20
य एतेन विधानॆन त्रिसन्ध्यं कर्म कारयेत् ॥ तिर्यग्योनिविनिर्मुक्तो मम लोकं स गच्छति ॥
जो इस विधान के अनुसार त्रिसंध्या में यह कर्म कराता/करता है, वह तिर्यक्-योनि के जन्म से मुक्त होकर मेरे लोक को प्राप्त होता है।
Verse 21
ततः पश्चान्मुखो भूत्वा पुनर्गृह्य जलाञ्जलिम् ॥ द्वादशाक्षरमुच्चार्य इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
तब पश्चिम की ओर मुख करके, फिर से जुड़ी हुई हथेलियों में जल लेकर, द्वादशाक्षरी का उच्चारण करके, इस मंत्र का पाठ करे।
Verse 22
एतन्न दद्यान्मूर्खाय पिशुनाय शठाय च ॥ दीक्षितायैव दातव्यं सुशिष्याय दृढाय च ॥
यह (मंत्र) मूर्ख को, चुगलखोर को और कपटी को नहीं देना चाहिए; केवल दीक्षित, उत्तम और दृढ़ शिष्य को ही देना चाहिए।
The text frames disciplined daily practice—purification (snāna), self-restraint (jitendriya), and reverent mantra-recitation—as a method for saṃsāra-taraṇa (crossing cyclic existence). Philosophically, it emphasizes a pervading divine presence across all directions and states that consistent, properly performed trisandhyā observance supports moral steadiness and liberation-oriented life.
No tithi, nakṣatra, month, or seasonal markers are specified. The timing is structured by the three daily sandhyās (twilight junctions), implying routine observance at the standard dawn, midday junction, and dusk periods rather than a calendrical festival schedule.
While it does not present explicit ecological prescriptions, the Varāha–Pṛthivī dialogic frame and the emphasis on purification, restraint, and orderly daily rites can be read as an ethic of terrestrial stability: regulated human conduct is portrayed as harmonizing the practitioner with the world’s directional/cosmological order, indirectly supporting the maintenance of balance associated with Pṛthivī.
No royal dynasties, sages’ lineages, or administrative figures are named. The chapter’s references are primarily theological and liturgical, centered on Nārāyaṇa/Puruṣottama and on the qualified teacher-to-disciple transmission (dīkṣita, suśiṣya) of secret ritual knowledge.