Adhyaya 104
Varaha PuranaAdhyaya 10420 Shlokas

Adhyaya 104: The Eulogy and Procedure of the ‘Honey-Cow’ Gift (Madhudhenudāna)

Madhudhenudāna-māhātmya

Ritual-Manual (Dāna-vidhi) with Soteriological/Merit Discourse

वराह–पृथ्वी संवाद में यह अध्याय ‘मधुधेनुदान’ (मधुर पदार्थों से निर्मित प्रतीक गौ का दान) की विधि और महिमा बताता है, जिसे पातक-नाशक कहा गया है। सोना, ताँबा, गुड़-शक्कर आदि मधुर द्रव्य, धान्य, वस्त्र और आभूषणों से गौ का निर्माण, चारों दिशाओं में कलश/पात्रों की स्थापना, तथा अयन, विषुव, व्यतीपात, संक्रांति, उपराग आदि शुभ अवसरों पर दान का विधान दिया है। पात्र के रूप में निर्धन किन्तु विद्वान श्रोत्रिय ब्राह्मण—आहिताग्नि, आर्यावर्त में जन्मा, वेद-वेदांग में निपुण—का निर्देश है; मंत्र, जल-प्रदान की प्रक्रिया और साथ में दिए जाने वाले दानों का भी वर्णन है। अंत में इसे नैतिक कल्याणकारी, लोक-हितकारी और पृथ्वी-स्थैर्य से जुड़ा कर्म बताकर पाप-मुक्ति और विष्णुलोक-प्राप्ति का फल कहा गया है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivīHotṛ

Key Concepts

madhudhenudāna (ritualized gift of a symbolic cow)dāna-vidhi (procedural donation rules)pātaka-nāśana (removal of demerit)dakṣiṇā and jalapūrva (supplementary fee and water-offering protocol)śrotriya/ahitāgni eligibility (recipient qualifications)kāla-viśeṣa (auspicious times: ayana, viṣuva, vyatīpāta, saṅkrānti, upārāga)merit geography (nadyaḥ madhuvahā; pātāla imagery of pious realms)Viṣṇuloka / Viṣṇusāyujya (post-mortem destination)Āryāvarta (normative cultural geography)

Shlokas in Adhyaya 104

Verse 1

अथ मधुधेनुदानमाहात्म्यम् ॥ होतॊवाच ॥ मधुधेनुं प्रवक्ष्यामि सर्वपातकनाशिनीम् । अनुलिप्ते महीपृष्ठे कृष्णाजिनकुशोत्तरे ॥ १०४-१ ॥ धेनुं मधुमयीं कृत्वा सम्पूर्णघटषोडशाम् । चतुर्थेन तथांशेन वत्सकं परिकल्पयेत् ॥

अब ‘मधुधेनु-दान’ का माहात्म्य। होतृ बोले—मैं सर्व पातकों का नाश करने वाली मधुधेनु का वर्णन करता हूँ। नवीन लेप से शुद्ध की हुई भूमि पर, ऊपर काले मृगचर्म और कुश बिछाकर—(104.1)—मधु से बनी धेनु का निर्माण करे, सोलह पूर्ण घटों सहित; और उसी अनुपात में चौथाई भाग का वत्स भी तैयार करे।

Verse 2

सौवर्णं तु मुखं कृत्वा शृङ्गाण्यगुरुचन्दनैः॥ पृष्ठं ताम्रमयं कृत्वा सास्रां पटमयीं तथा॥

मुख स्वर्ण का बनाकर, सींग अगरु और चन्दन के (द्रव्य) से बनाए। पीठ ताम्र की बनाए, और उसी प्रकार ‘सास्रा’ विधान के अनुसार वस्त्र-रूप आवरण भी बनाए।

Verse 3

पादानिक्षुमयान्कृत्वा सितकम्बलसंवृतान्॥ मुखं गुडमयं कृत्वा जिह्वां शर्करया तथा॥

पाँवों को ईख से बनाकर उन्हें श्वेत कम्बल से ढँके। मुख गुड़ का बनाए और उसी प्रकार जिह्वा शर्करा की बनाए।

Verse 4

ओष्ठौ पुष्पमयौ तस्या दन्ताः फलमयाः स्मृताः॥ दर्भरोममयी देवी खुरैरौप्यैश्च भूषिता॥

उसके ओष्ठ पुष्पमय हों और दाँत फलमय कहे गए हैं। दर्भ को उसके रोम (केश) के रूप में रखकर, रजत खुरों से उस देवी (गौ-रूप) को भूषित करें।

Verse 5

प्रशस्तपत्रश्रवणा प्रमाणात्परितस्तता॥ सर्वलक्षणसंयुक्ता सप्तधान्यान्विता तथा॥

उसके कान प्रशंसनीय पत्तों के समान हों, प्रमाण में सम्यक् और चारों ओर समान रूप से विस्तृत हों। वह समस्त शुभ लक्षणों से युक्त हो तथा सप्त धान्यों से भी संयुक्त हो।

Verse 6

चत्वारि तिलपात्राणि चतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत्॥ छादितां वस्त्रयुग्मेन कण्ठाभरणभूषिताम्॥

चारों दिशाओं में तिल के चार पात्र स्थापित करे। (गौ-रूप) को वस्त्रों के युग्म से आच्छादित कर, कण्ठाभरण से भूषित करे।

Verse 7

कांस्योपदोहिनीं कृत्वा गन्धपुष्पैस्तु पूजिताम्॥ अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये॥

कांस्य की दुहनी (दूध-दोहन पात्र) प्रदान कर, गन्ध और पुष्पों से उसकी पूजा करे। यह अयन, पुण्य विषुव, व्यतीपात तथा दिन-क्षय के समय किया जाए।

Verse 8

संक्रान्त्यामुपरागे च सर्वकाले यदृच्छया॥ द्रव्यब्राह्मणसम्पत्तिं दृष्ट्वा तां प्रतिपादयेत्॥

संक्रांति और ग्रहण के समय, तथा अवसर मिलने पर किसी भी समय—साधन और योग्य ब्राह्मण को देखकर वह दान अर्पित करे।

Verse 9

तादृशाय प्रदातव्या मधु धेनुर्नरोत्तमे॥ पुच्छदेशे विमृश्याथ जलपूर्णां सदक्षिणाम्॥

हे नरश्रेष्ठ! ऐसे पात्र को वैसी ‘मधुधेनु’ देनी चाहिए। फिर पुच्छ-प्रदेश का स्पर्श करके जल-पूर्ण अर्घ्य और दक्षिणा सहित कर्म करे।

Verse 10

दद्याद्विप्राय धेनुं तां मन्त्रपूर्वां विचक्षणः॥ पुच्छदेशोपविष्टस्तु गन्धधूपादिपूजिता॥ आच्छाद्य वस्त्रयुग्मेन मुद्रिकावर्णमात्रकैः॥ स्वशक्त्या दक्षिणां दत्त्वा वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ जलपूर्वं तु कर्त्तव्यं पश्चाद्यानं समर्पयेत्॥ रसज्ञा सर्वदेवानां सर्वभूतहिते रता॥

विवेकी पुरुष मंत्रपूर्वक उस गौ को विद्वान् ब्राह्मण को दे। पुच्छ-प्रदेश के पास बैठकर, गंध-धूप आदि से पूजित, उसे वस्त्र-युग्म से आच्छादित कर तथा मुद्रा-चिह्नित द्रव्य सहित, अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे—धन में कपट न करे। पहले जल-पूर्वक अर्पण करे, फिर यान (वाहन) समर्पित करे। वह सर्वदेवों के लिए रस-ज्ञ और सर्वभूत-हित में रत कही गई है।

Verse 11

प्रीयन्तां पितरो देवा मधुधेनो नमोऽस्तु ते॥ एवमुच्चार्य तां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥

“पितर और देव प्रसन्न हों; हे मधुधेनु! तुम्हें नमस्कार।” ऐसा उच्चारण करके उस धेनु को ब्राह्मण को निवेदित करे।

Verse 12

अहं गृह्णामि त्वां देवि कुटुम्बार्थे विशेषतः ॥ कामं कामदुघे कामान्मधुधेनो नमोऽस्तु ते ॥

“हे देवी! मैं तुम्हें विशेषतः अपने कुटुम्ब-कल्याण के लिए ग्रहण करता हूँ। हे कामदुघे मधुधेनु! इच्छानुसार इच्छित कामनाएँ प्रदान करो; तुम्हें नमस्कार।”

Verse 13

मधुवातेति मन्त्रेण दद्यादाशुचिकेन तु ॥ दत्त्वा धेनुं महाराज छत्रिकोपानहौ तथा ॥

‘मधुवाते…’ मंत्र से, अशुद्ध अवस्था में भी शीघ्र दान देना चाहिए। हे महाराज, गाय दान करके छाता और पादुका (चप्पल) भी देनी चाहिए।

Verse 14

एवं यः कुरुते भक्त्या मधुधेनुं नराधिप ॥ दत्त्वा दानं पायसेन मधुना च दिनं नयेत् ॥

हे नराधिप, जो भक्तिपूर्वक मधुधेनु का विधान करता है—दान देकर—उसे दिन भर खीर और मधु के साथ (व्रत-आहार रूप में) समय बिताना चाहिए।

Verse 15

ब्राह्मणश्च त्रिरात्रं तु मधुपायससंयुतम् ॥ एवं कृते तु यत्पुण्यं तन्निबोध नराधिप ॥

और ब्राह्मण (ग्राही) भी तीन रात्रियों तक मधु और खीर सहित (नियम) का पालन करे। ऐसा करने से जो पुण्य होता है, हे राजा, उसे जानो।

Verse 16

यत्र नद्यो मधुवहा यत्र पायसकर्दमाः ॥ ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र गच्छन्ति धेनुदाः ॥

जहाँ नदियाँ मधु बहाती हैं, जहाँ कीचड़ खीर का है—वहाँ ऋषि, मुनि और सिद्ध रहते हैं; वहीं धेनु-दान करने वाले जाते हैं।

Verse 17

तत्र भोगानथो भुङ्क्ते ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ क्रीडित्वा सुचिरं कालं पुनर्मर्त्यमुपागतः ॥

वहाँ वह भोगों का उपभोग करता है, फिर ब्रह्मलोक को जाता है। बहुत दीर्घ काल तक क्रीड़ा करके, वह पुनः मर्त्य-लोक में लौट आता है।

Verse 18

नयते विष्णुसायुज्यं मधुधेनुप्रदानतः ॥ य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वापि मानवः ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥

मधु-धेनु का दान करने से विष्णु-सायुज्य प्राप्त होता है। जो इसे भक्ति से सुनता या सुनवाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

Verse 19

ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये ॥ आर्यावर्त्ते समुत्पन्ने वेदवेदाङ्गपारगे ॥

(यह दान) उस निर्धन ब्राह्मण को देना चाहिए जो श्रोत्रिय हो, आहिताग्नि हो, आर्यावर्त में जन्मा हो और वेद तथा वेदाङ्गों में पारंगत हो।

Verse 20

स भुक्त्वा विपुलान्भोगान्विष्णुलोकं स गच्छति ॥ दश पूर्वान्दश परानात्मानं चैकत्रिंशकम् ॥

वह महान् भोगों का उपभोग करके विष्णुलोक को जाता है; और दस पूर्वजों, दस उत्तरजों तथा स्वयं को—इकतीसवें रूप में—उद्धार करता है।

Frequently Asked Questions

The chapter frames disciplined giving (dāna) as an ordered social-ethical practice: resources are intentionally fashioned, offered with procedural integrity (mantra, jalapūrva, dakṣiṇā, avoidance of deceit), and directed to a qualified and needy recipient. The text’s internal logic links this regulated redistribution to moral purification (pātaka-nāśana) and to a wider maintenance of worldly order, aligning personal conduct with the stability of Pṛthivī.

The text names ayana (solstitial turning), viṣuva (equinox), vyatīpāta (astronomical yoga/inauspicious–auspicious junction treated as ritually potent), dina-kṣaya (abbreviated day), saṅkrānti (solar ingress), and upārāga (eclipse), and also permits performance at any time when circumstances allow (sarvakāle yadṛcchayā), especially upon seeing the availability of means and a suitable brāhmaṇa recipient.

Although not an explicit ecological treatise, the chapter models a non-extractive ethic: merit is generated through crafted symbolic offerings (a constructed ‘cow’ made of honey/sugar products, metals, grains, cloth) and redistributed wealth rather than through harm to living beings. In the Varāha–Pṛthivī frame, such regulated generosity can be read as supporting terrestrial stability by promoting social provisioning, restraint, and orderly ritual conduct—values that indirectly protect Pṛthivī from disorder and scarcity.

No dynastic lineage is specified in these verses. The culturally marked figures are role-based: the Hotṛ (ritual officiant), the brāhmaṇa recipient characterized as daridra (poor), śrotriya (Veda-trained), ahitāgni (maintainer of sacred fires), and a person ‘born in Āryāvarta’ and ‘versed in Veda and Vedāṅgas’ (vedavedāṅga-pāraga).