
Guḍadhenu-māhātmya
Ritual-Manual (Dāna-vidhi and Phalaśruti)
इस अध्याय में वराह–पृथ्वी संवाद के अंतर्गत गुड़धेनु-दान की विधि बताई गई है। भूमि-शुद्धि और आसन-विन्यास के बाद गुड़ से बनी गौ का निर्माण—सींग, मुख, दाँत, ग्रीवा, पूँछ, खुर, आवरण और आभूषण आदि का सूक्ष्म विधान; साथ ही नवनीत-स्तन, फल-आभूषण जैसे शुभ लक्षण जोड़े जाते हैं। दान को सामर्थ्य/भार के अनुसार श्रेष्ठ, मध्यम और अधम रूपों में बाँटकर गृहस्थ की संपन्नता के अनुरूप दान पर बल दिया गया है। गंध-पुष्पादि से पूजन करके श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान, विशेष मंत्र का जप, तथा छत्र-पादुका आदि उपदान देने का निर्देश है। फलश्रुति में अनिष्ट-नाश, समृद्धि-प्राप्ति और विष्णुलोक-गमन कहा गया है; अयन, विषुव, व्यतीपात तथा दिन के अंत का समय विशेष शुभ बताया गया है।
Verse 1
गुडधेनुमाहात्म्यम् होतॊवाच— गुडधेनुं प्रवक्ष्यामि सर्वकामार्थसाधिनीम् । अनुलिप्ते महीपृष्ठे कृष्णाजिनकुशास्तृते ॥ १०२-१ ॥ तस्योपरिकृतं वस्त्रं गुडमानिय पुष्कलम् । कृत्वा गुडमयीं धेनुं सवसाङ्कास्यदेहिनीम् ॥
होता ने कहा—मैं ‘गुडधेनु’ का वर्णन करूँगा, जो समस्त कामनाओं के अर्थ को सिद्ध करने वाली है। लेपित भूमि पर, कृष्णाजिन और कुश बिछाकर, उसके ऊपर वस्त्र रखे; फिर प्रचुर गुड़ लाकर, अंग-उपांग सहित देह-रूप वाली गुड़मयी धेनु का निर्माण करे।
Verse 2
सौवर्णे मुखशृङ्गे च दन्ताश्च मणिमौक्तिकैः । ग्रीवा रत्नमयी त्वस्या घ्राणं गन्धमयं तथा ॥
उसका मुख और शृंग सुवर्ण के हों; दाँत मणि और मोतियों के हों। उसकी ग्रीवा रत्नमयी हो, तथा उसका घ्राण भी सुगन्धिमय पदार्थों से निर्मित हो।
Verse 3
शृङ्गे त्वगुरुकाष्ठेन पृष्ठं ताम्रमयं तथा । पुच्छं क्षौममयं तस्याः सर्वाभरणभूषिताम् ॥
उसके सींग अगुरु-काष्ठ के हों और पीठ भी ताम्र की हो। उसकी पूँछ क्षौम (सन/लिनन) की हो; और उसे समस्त आभूषणों से विभूषित किया जाए।
Verse 4
इक्षुपादां रौप्यखुरां कम्बलं पट्टसूत्रकम् । आच्छाद्य पट्टवस्त्रेण घण्टाचामरभूषिताम् ॥
उसके पाँव ईख के हों और खुर रजत के हों; कम्बल तथा पट्ट-सूत्र (रेशमी डोर) की सज्जा हो। उसे पट्ट-वस्त्र (रेशमी वस्त्र) से ढँककर, घण्टाओं और चामरों से अलंकृत किया जाए।
Verse 5
प्रशस्तपत्रश्रवणां नवनीतस्तनीं बुधः । फलैर्नानाविधैस्तस्या उपशोभाम्प्रकल्पयेत् ॥
बुद्धिमान व्यक्ति उसके कान उत्तम पत्तों के समान बनाए और उसके स्तन नवनीत (ताज़े मक्खन) के बनाए। तथा नाना प्रकार के फलों से उसकी अतिरिक्त शोभा की व्यवस्था करे।
Verse 6
उत्तमा गुडधेनुः स्यात्सदा धाराचतुष्टयम् । भागार्धेन तु तौल्येन चतुर्थांशेन वत्सकम् ॥
‘उत्तमा’ गुडधेनु में सदा गुड़ की चार धाराएँ (निरन्तर प्रवाह) कही गई हैं। तौल के अनुसार मुख्य भाग आधे-भाग से और बछड़ा चौथाई-भाग से बनाया जाए।
Verse 7
मध्यमाच तदर्धेन भारेणैकेन चाधमा । वित्तहीनो यथाशक्त्या शतैरष्टाभिरेव च ॥
मध्यम (दाता) उस माप के आधे से करे, और अधम (दाता) एक भारे से करे। तथा जो वित्तहीन हो, वह यथाशक्ति आठ सौ (के परिमाण) से भी अर्पण करे।
Verse 8
अत ऊर्ध्वन्तु कर्तव्या गृहीवित्तानुसारतः । गन्धपुष्पादिभिः पूज्य ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ श्रोत्रियाय प्रदातव्या सहस्रकनकेन तु । तदर्धेन महाराज तस्याप्यर्धेन वा पुनः ॥
इसके बाद गृहस्थ को अपनी संपत्ति के अनुसार यह कर्म करना चाहिए। गंध, पुष्प आदि से पूजन करके इसे ब्राह्मण को निवेदित करे। श्रोत्रिय ब्राह्मण को सहस्र स्वर्ण देकर दान दे; अथवा, हे महाराज, उसका आधा, या फिर उसका भी आधा।
Verse 9
शतेन वा शतार्धेन यथाशक्त्या निवेदयेत् । गन्धपुष्पादिभिः पूज्य मुद्रिकाकर्णपत्रकैः ॥
या सौ से, या पचास से—अपनी शक्ति के अनुसार—निवेदन करे। गंध, पुष्प आदि से तथा मुद्रिका और कर्णपत्र (कुंडल) आदि से पूजन करके (अर्पित करे)।
Verse 10
छत्रिकापादुके दत्त्वा इमं मन्त्रं उदीरयेत् । गुडधेनो महावीर्ये सर्वसम्पत्प्रदे शुभे ॥
छत्री और पादुका देकर यह मंत्र उच्चारे: “हे गुडधेनु! महावीर्यवती, शुभे, सर्वसम्पत्ति प्रदान करने वाली।”
Verse 11
दानादस्माच्च भो देवि भक्ष्यभोज्यं प्रयच्छ मे । प्राङ्मुखोऽपि दाता च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥
“हे देवी! इस दान से मुझे भक्ष्य और भोज्य प्रदान करें।” दाता पूर्वमुख होकर ब्राह्मण को निवेदन करे।
Verse 12
वाचा कृतं कर्मकृतं मनसा यद्विचिन्तितम् । मानकूटं तुलाकूटं कन्यागोऽर्थे उदाहृतम् ॥
वाणी से किया हुआ, कर्म से किया हुआ, और मन में जो विचारित हो—माप में छल और तराजू में छल, ये यहाँ लाभ के लिए किए गए दुष्कर्म के उदाहरण कहे गए हैं।
Verse 13
अनृतं नाशमायाति गुडधेनो द्विजार्पिता । दीयमानां प्रपश्यन्ति ते यान्ति परमां गतिम् ॥ यत्र क्षोरवहा नद्यः घृतपायसकर्दमाः । ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र गच्छन्ति धेनुदाः ॥
जब गुड़धेनु द्विज (ब्राह्मण) को अर्पित की जाती है, तब असत्य का नाश हो जाता है। जो उसे दान होते हुए देखते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं। जहाँ दूध की नदियाँ बहती हैं और घी तथा पायस का कीचड़ है—वहाँ ऋषि, मुनि और सिद्ध जाते हैं; उसी लोक को गौ-दान करने वाले भी प्राप्त करते हैं।
Verse 14
दश पूर्वान्दश परानात्भानञ्चैकविंशतिम् । विष्णुलोकं नयत्याशु गुडधेनोः प्रसादतः ॥
गुडधेनु की कृपा से वह दस पूर्वजों, दस वंशजों और स्वयं को—इक्कीसवें सहित—शीघ्र ही विष्णुलोक को ले जाती है।
Verse 15
अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये । सर्वदैव प्रदातव्या पात्रं दृष्ट्वा महामते ॥
अयन, विषुव, पुण्य व्यतीपात और दिन के क्षय (समाप्ति) पर—और वास्तव में सदा ही—हे महामते, योग्य पात्र देखकर इसका दान करना चाहिए।
Verse 16
श्रद्धान्वितेन दातव्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । सर्वकामप्रदा नित्यं सर्वपापहरास्मृता ॥
इसे श्रद्धायुक्त होकर देना चाहिए; यह भोग और मोक्ष—दोनों के फल प्रदान करती है। यह नित्य सब कामनाएँ देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली स्मृत है।
Verse 17
गुडधेनोः प्रसादात्तु सौभाग्यमखिल भवेत् । वैष्णवं पदमाप्नोति दौर्गत्यन्तस्य नश्यति ॥
गुडधेनु के प्रसाद से समस्त सौभाग्य उत्पन्न होता है। वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है और उसका दुर्भाग्य नष्ट हो जाता है।
Verse 18
दशद्वादशसाहस्रा दश चाष्टौ च जन्मनि । न शोकदुःखदौर्गत्यं तस्य सञ्जायते क्वचित् ॥
दस या बारह हजार वर्षों तक, तथा दस और आठ जन्मों तक भी, उस व्यक्ति को कभी शोक, दुःख और दुर्गति नहीं होती।
Verse 19
इति पठति शृणोति चेह सम्यक् मतिमपि ददाति योजनानाम् । स इह विभवैश्चिरं वसित्वा वसति चिरं दिवि देवतादिपूज्यः ॥
इस प्रकार जो यहाँ ठीक से पाठ करता और सुनता है, और योजनों तक फैली समझ भी प्रदान करता है, वह इस लोक में दीर्घकाल तक वैभव से रहकर, स्वर्ग में भी दीर्घकाल तक देवताओं आदि द्वारा पूजित होकर निवास करता है।
The text frames prosperity and social stability as outcomes of disciplined redistribution: household resources are converted into a structured donation (guḍadhenu) and transferred to a qualified recipient (śrotriya brāhmaṇa). The internal logic emphasizes proportional giving (yathā-śakti), ritual accountability (warnings about deceit in measures), and the conversion of private wealth into public merit through regulated generosity—an ethic that can be read as sustaining communal welfare and reducing hardship.
The chapter recommends giving at ayana (solstitial transition points), viṣuva (equinox), vyatīpāta (a calendrical/astronomical conjunction regarded as potent), and dina-kṣaya (the close of the day). It also states that the gift may be offered “always,” provided a worthy recipient (pātra) is identified.
Although the passage is primarily a donation-ritual manual, its earth-centered implication lies in regulating consumption and converting agricultural/food-value goods (guḍa, dairy symbolism, fruits, textiles) into a socially redistributed offering. The repeated emphasis on measured, means-based giving (gṛha-vitta-anusāra) and avoidance of fraudulent weighing (tulā-kūṭa) can be interpreted as an early normative framework for sustainable household economy that indirectly supports terrestrial well-being—consistent with the Varāha–Pṛthivī discourse tradition.
No dynastic lineages are specified in the provided passage. Cultural roles invoked include the donor (dātā), the qualified Vedic recipient (śrotriya brāhmaṇa), and generalized sacred communities (ṛṣayaḥ, munayaḥ, siddhāḥ) in the phalaśruti’s otherworldly landscape. A royal addressee is implied by the vocative “mahārāja,” but without identification.