Adhyaya 10
Varaha PuranaAdhyaya 1077 Shlokas

Adhyaya 10: The Threefold Division by the Guṇas, the Deities’ Attainment of Worship, and the Opening of the Durjaya Episode

Triguṇa-vibhāgaḥ, Devapūjyatva-pradānaṃ ca Durjaya-upākhyāna-praveśaḥ

Cosmogony & Guṇa-Theology; Royal-Itihāsa Narrative; Sacred Geography

सृष्टि के विस्तार के बाद प्राचीन देवगण द्वीपों और प्रदेशों में नारायण के लिए महान यज्ञ करते हैं। तब हरि प्रकट होकर उन्हें ‘पूज्य’ होने का वरदान देते हैं और अंतर्धान हो जाते हैं। आगे भगवान् सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों के द्वारा वेदपाठ, कर्मकाण्ड और कालरूप उग्र शक्ति का समन्वय कर त्रिगुणात्मक जगत-व्यवस्था स्थापित करते हैं। फिर कृत, त्रेता, द्वापर और कलि—युगानुसार प्राकट्य-क्रम बताया जाता है। इसके बाद उपाख्यान में राजा सुप्रतीक संतान हेतु आत्रेय ऋषि की शरण लेते हैं; इन्द्र शापग्रस्त होता है; उससे महाबली दुर्जय जन्म लेता है। दुर्जय का दिग्विजय पृथ्वी और देव-लोक की मर्यादा को डगमगा देता है, जिससे देवताओं और तपस्वियों का हस्तक्षेप आरम्भ होता है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivīDevāḥĀtreyaIndraDurjayaVidyutSuvidyutHetṛPrahetṛ

Key Concepts

sṛṣṭi-vistāra (expansion of creation)devayajña and satra (sacrificial cycles)triguṇa (sattva–rajas–tamas) as world-structuring principleyuga-dharma and divine manifestation across yugasśāpa (curse) as juridical-ethical mechanism in narrative causalityroyal conquest vs. lokapāla-order (cosmic governance)asura–deva conflict and divine intervention (Nārāyaṇa/Viṣṇu)earthly sovereignty and ecological-terrestrial stability (Pṛthivī-oriented framing)

Shlokas in Adhyaya 10

Verse 1

श्रीवराह उवाच । एवं सृष्ट्वा जगत्सर्वं भगवान् लोकभावनः । विरराम ततः सृष्टिर्व्यवर्धत धरे तदा ॥ १०.१ ॥

श्रीवराह बोले—इस प्रकार समस्त जगत की सृष्टि करके लोकों को धारण-पोषण करने वाले भगवान् तब विराम को प्राप्त हुए। तत्पश्चात्, हे धरा, उस समय सृष्टि का विस्तार होता गया।

Verse 2

वृद्धायामथ सृष्टौ तु सर्वे देवाः पुरातनम् । नारायणाख्यं पुरुषं यजन्तो विविधैर्मखैः ॥ १०.२ ॥

सृष्टि के विस्तार होने पर सभी देवताओं ने विविध यज्ञों द्वारा नारायण नामक आदिपुरुष की आराधना की।

Verse 3

द्वीपेषु चैव सर्वेषु वर्षेषु च मखैर्हरिम् । देवाः सत्रैर्महद्भिस्ते यजन्तः श्रद्धयान्विताः । तोषयामासुरत्यर्थं स्वं पूज्यं कर्तुमीप्सवः ॥ १०.३ ॥

सभी द्वीपों और समस्त वर्षों में देवताओं ने श्रद्धायुक्त होकर यज्ञों तथा महान् सत्र-यज्ञों से हरि की पूजा की और उन्हें अत्यन्त प्रसन्न किया, अपने पूज्यत्व की स्थापना की इच्छा से।

Verse 4

एवं तोषयतां तेषां बहुवर्षसहस्रिकम् । काले देवस्तदा तुष्टः प्रत्यक्षत्वं जगाम ह ॥ १०.४ ॥

इस प्रकार उन्हें प्रसन्न करते-करते अनेक सहस्र वर्षों के समय बीतने पर वह देव संतुष्ट होकर प्रत्यक्ष प्रकट हो गया।

Verse 5

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रो महागिरेः शृङ्गमिवोल्लिखंस्तदा । उवाच किं कार्यमथो सुरेशो ब्रूतां वरं देववरा वरं वः ॥ १०.५ ॥

तब अनेक भुजाओं, विशाल उदर तथा अनेक मुख-नेत्रों वाले सुरेश्वर ने, मानो महापर्वत की चोटी को खुरचते हुए, कहा—“क्या कार्य है? हे देवश्रेष्ठो, कहो; मैं तुम्हें वर देता हूँ।”

Verse 6

देवा ऊचुः । जयस्व गोविन्द महानुभाव त्वया वयं नाथ वरेण देवाः । मनुष्यलोकेऽपि भवन्तमाद्यं विहाय नास्मान्भवते ह कश्चित् ॥ १०.६ ॥

देव बोले—“जय हो, गोविन्द, हे महानुभाव! हे नाथ, देवों में श्रेष्ठ आप ही के वर से हम देव टिके हैं। मनुष्यलोक में भी, आप आद्य प्रभु को छोड़कर, हमारा कोई रक्षक नहीं है।”

Verse 7

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । सर्वे भवन्तं शरणं गताः स्म कुरुष्व पूज्यानिह विश्वमूर्ते ॥ १०.७ ॥

रुद्र, आदित्य, वसु और साध्य; विश्वेदेव, अश्विन, मरुत तथा उष्मप—हम सबने आपकी शरण ली है। हे विश्वमूर्ति, हमें यहाँ पूज्य बना दीजिए।

Verse 8

एवमुक्तस्तदा तैस्तु महायोगेश्वरो हरिः । करोमि सर्वान् वः पूज्यानित्युक्त्वाऽन्तरधीयत ॥ १०.८ ॥

उनके द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस समय महायोगेश्वर हरि बोले—“मैं तुम सबको पूज्य बनाऊँगा”; ऐसा कहकर वे अंतर्धान हो गए।

Verse 9

देवा अपि निजौकांसि गतवन्तः सनातनम् । स्तुवन्तः परमेशोऽपि त्रिविधं भावमास्थितः ॥ १०.९ ॥

देवता भी अपने-अपने सनातन धामों को चले गए; और स्तुति करते हुए परमेश्वर ने भी त्रिविध भाव (तीन प्रकार की अवस्था) धारण की।

Verse 10

एवं त्रिधा जगद्धाता भूत्वा देवान् महेश्वरः । आराध्य सात्त्विकं राजं तामसं च त्रिधा स्थितम् ॥ १०.१० ॥

इस प्रकार जगद्धाता महेश्वर त्रिविध रूप से स्थित होकर, सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीन अवस्थाओं में स्थित देवताओं का आराधन/सम्मान करने लगे।

Verse 11

सात्त्विकेन पठेद्वेदान् यजेद्यज्ञेन देवताः । आत्मनोऽवयवो भूत्वा राजसेनापि केशवः ॥ १०.११ ॥

सात्त्विक भाव से वेदों का पाठ करना चाहिए और यज्ञ द्वारा देवताओं का पूजन करना चाहिए। केशव भी आत्मा का अवयव बनकर राजस भाव से भी (कार्य करते हैं)।

Verse 12

स कालरूपिणं रौद्रं प्रकृत्या शूलपाणिनम् । आत्मनो राजसीं मूर्तिं पूजयामास भक्तितः । तामसेनापि भावेन असुरेषु व्यवस्थितः ॥ १०.१२ ॥

वह असुरों में स्थित होकर, तामस भाव से भी युक्त रहते हुए, अपने ही राजसी स्वरूप—कालरूप, रौद्र और स्वभावतः शूलधारी—की भक्ति से पूजा करता रहा।

Verse 13

एवं त्रिधा जगद्धाता भूत्वा देवान् महेश्वरः । आराधयामास ततो लोकोऽपि त्रिविधोऽभवत् ॥ १०.१३ ॥

इस प्रकार महेश्वर जगत्-धाता होकर त्रिविध रूप धारण करके देवताओं की आराधना करने लगे; तब लोक भी त्रिविध हो गया।

Verse 14

ब्रह्मविष्णुमहेशानानाम्ना गृहीय व्यवस्थितः । स च नारायणो देवः कृते युगवरे प्रभुः ॥ १०.१४ ॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन नामों को धारण करके वह व्यवस्थित रहा; और वही देव नारायण कृत (सत्य) युग के श्रेष्ठ युग में प्रभु है।

Verse 15

त्रेतायां रुद्ररूपस्तु द्वापरे यज्ञमूर्तिमान् । कलौ नारायणो देवो बहुरूपो व्यजायत ॥ १०.१५ ॥

त्रेता में वह रुद्ररूप हुआ, द्वापर में यज्ञमूर्ति; और कलि में देव नारायण बहुरूप होकर प्रकट हुआ।

Verse 16

तस्यादिकृत्ततो विष्णोश्चरितं भूरितेजसः । श्रृणुष्व सर्वं सुश्रोणि गदतो मम भामिनि ॥ १०.१६ ॥

हे सुश्रोणि, हे भामिनि! भूरितेजस्वी विष्णु के चरित्र को उसके आरम्भ से, मेरे कहने पर, तुम सब विस्तार से सुनो।

Verse 17

आसीत्कृतयुगे राजा सुप्रतीको महाबलः । तस्य भार्याद्वयं चासीदविषिष्टं मनोरमम् ॥ १०.१७ ॥

कृतयुग में सुप्रतीक नाम का महाबली राजा था। उसकी दो रानियाँ थीं, जो गुणों में समान और अत्यन्त मनोहर थीं।

Verse 18

विद्युत्प्रभा कान्तिमती तयोरेते तु नामनी । तयोः पुत्रं समं राजा न लेभे यत्नवानपि ॥ १०.१८ ॥

उन दोनों के नाम विद्युत्प्रभा और कान्तिमती थे। परन्तु राजा ने बहुत प्रयत्न करने पर भी उनसे पुत्र प्राप्त नहीं किया।

Verse 19

यदा तदा मुनिश्रेष्ठमात्रेयं वीतकल्मषम् । तोषयामास विधिना चित्रकूटे नगोत्कमे ॥ १०.१९ ॥

तब उसने विधिपूर्वक चित्रकूट—श्रेष्ठ पर्वत—पर कल्मषरहित मुनिश्रेष्ठ आत्रेय को संतुष्ट किया।

Verse 20

सक ऋषिष्टोषितस्तेन दीर्घकालं वरार्थिना । वरं दिदित्सया यावदब्रवीदत्रिजो मुनिः ॥ १०.२० ॥

वर चाहने वाले उस राजा ने दीर्घकाल तक ऋषि को प्रसन्न रखा। जब वर देने की इच्छा हुई, तब अत्रि-पुत्र मुनि ने कहा।

Verse 21

तावदिन्द्रोऽपि करिणा गतः पार्श्वेन तस्य ह । देवसैन्यैः परिवृतस्तूष्णीमेव महाबलः ॥ १०.२१ ॥

इसी बीच इन्द्र भी हाथी पर आरूढ़ होकर उसके पास आ पहुँचे। देवसेनाओं से घिरे हुए वह महाबली मौन ही रहे।

Verse 22

तं दृष्ट्वा अन्तर्गतप्रीतिमप्रीतिं प्रीतवान् मुनिः । चुकोप देवराजाय शापमुग्रं ससर्ज ह ॥ १०.२२ ॥

उसे देखकर मुनि ने बाहर से प्रसन्नता दिखायी, पर भीतर की अप्रसन्नता जानकर देवराज इन्द्र पर क्रोध किया और भयंकर शाप दे दिया।

Verse 23

यस्मात् त्वया ममावज्ञा कृता मूढ दिवसपते । ततस्त्वं चालितो राज्याद् अन्यलोके वसिष्यसि ॥ १०.२३ ॥

हे मूढ़ दिवसपति! तूने मेरा अपमान किया है; इसलिए तू अपने राज्य से हटाया जाएगा और दूसरे लोक में निवास करेगा।

Verse 24

एवमुक्त्वाऽपि कोपेन सुरेशं तं च भूपतिम् । उवाच राजन् पुत्रस्ते भविता दृढविक्रमः ॥ १०.२४ ॥

ऐसा कहकर भी क्रोध में उसने उस सुरेश और राजा से कहा—हे राजन्, तुम्हारा पुत्र दृढ़ पराक्रम वाला होगा।

Verse 25

इन्द्ररूपोपमः श्रीमानुद्यच्छस्त्रः प्रतापवान् । विद्याप्रभावकर्मज्ञः क्रूरकर्मा भविष्यति । दुर्जयोऽतिबली राजा एवमुक्त्वा गतो मुनिः ॥ १०.२५ ॥

वह इन्द्र के समान रूप वाला, श्रीमान, शस्त्र उठाने वाला, प्रतापी होगा; विद्या-प्रभाव से कर्म जानने वाला, पर कठोर कर्म करने वाला भी होगा। अत्यन्त बलवान, दुर्जेय राजा—ऐसा कहकर मुनि चले गए।

Verse 26

सोऽपि राजा सुप्रतीको भार्यायां गर्भमावहत् । विद्युत्प्रभायां धर्मज्ञः साऽपि काले त्वसूयत ॥ १०.२६ ॥

उस राजा सुप्रतीक ने भी अपनी पत्नी विद्युत्प्रभा के गर्भ में संतान ठहरायी; वह धर्मज्ञा रानी भी समय आने पर प्रसव कर बैठी।

Verse 27

तस्य चेष्टेर् बलेनासौ मुनेः सौम्यो बभूव ह । वेदशास्त्रार्थविद्यायां पारगो धर्मवान् शुचिः ॥ १०.२८ ॥

उस मुनि के संयमित प्रयत्न के बल से वह सचमुच सौम्य स्वभाव वाला हो गया। वेद-शास्त्रों के अर्थ-विद्या में पारंगत, धर्मशील और शुद्ध था।

Verse 28

या द्वितीया अभवत् पत्नी तस्य राज्ञो महात्मनः । नाम्ना कीर्त्तिमती धन्या तस्याः पुत्रो बभूव ह । नाम्ना सुद्युम्न इत्येवं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १०.२९ ॥

उस महात्मा राजा की दूसरी पत्नी का नाम कीर्तिमती था, जो धन्य थी। उससे सुद्युम्न नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो वेद और वेदाङ्गों में पारंगत था।

Verse 29

अथ कालेन महता स राजा राजसत्तमः । सुप्रतीकः सुतं दृष्ट्वा दुर्जयं योग्यं अन्तिके ॥ १०.३० ॥

फिर बहुत समय बीतने पर, राजाओं में श्रेष्ठ राजा सुप्रतीक ने अपने पास योग्य और समर्थ पुत्र दुर्जय को देखकर [उचित निर्णय किया]।

Verse 30

आत्मनो वृद्धभावं च वाराणस्याधिपो बली । चिन्तयामास राज्यार्थं दुर्जयं प्रति भामिनि ॥ १०.३१ ॥

वाराणसी के बलवान अधिपति ने अपने वृद्धावस्था-भाव पर विचार किया; हे सुन्दरी, उसने राज्य के विषय में दुर्जय के प्रति मनन किया।

Verse 31

एवं सञ्चिन्त्य धर्मात्मा तस्य राज्यं ददौ नृपः । स्वयं च चित्रकूटाख्यं पर्वतं स जगाम ह ॥ १०.३२ ॥

इस प्रकार विचार करके धर्मात्मा राजा ने उसे राज्य सौंप दिया; और स्वयं चित्रकूट नामक पर्वत पर चला गया।

Verse 32

दुर्जयोऽपि महद्राज्यं हस्त्यश्व रथवाजिभिः । संयोज्य चिन्तयामास राज्यवृद्धिं प्रति प्रभुः ॥ १०.३३ ॥

दुर्जेय होने पर भी प्रभु ने हाथी, घोड़े, रथ और अश्वारोही सेना से महान राज्य को संगठित करके अपने राज्य-विस्तार का विचार किया।

Verse 33

एवं सञ्चिन्त्य मेधावी हस्त्यश्व रथपत्तिभिः । समेतां वाहिनीं कृत्वा उत्तरां दिशमाश्रितः । तस्य चोत्तरतो देशाः सर्वे सिद्धा महात्मनः ॥ १०.३४ ॥

इस प्रकार विचार करके मेधावी ने हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों से युक्त संयुक्त सेना बनाकर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। और उस महात्मा के उत्तर में स्थित देश सब सिद्ध (समृद्ध) थे।

Verse 34

भारताख्यमिदं वर्षं साधयित्वा सुदुर्जयः । ततः किंपुरुषं नाम वर्षं तेनापि साधितम् ॥ १०.३५ ॥

अत्यन्त दुर्जेय होकर भी उसने ‘भारत’ नामक इस वर्ष को वश में किया; तत्पश्चात ‘किंपुरुष-वर्ष’ नामक प्रदेश भी उसके द्वारा साधित (अधीन) हुआ।

Verse 35

ततः परतरं चान्यद्धरिवर्षं जिगाय सः । रम्यं हिरण्मयं चापि कुरुभद्राश्वमेव च । इलावृतं मेरुमध्यमेतत्सर्वं जिगाय सः ॥ १०.३६ ॥

इसके आगे उसने अन्य परतर प्रदेश ‘हरिवर्ष’ को जीता; तथा ‘रम्यक’, ‘हिरण्मय’ और ‘कुरुभद्राश्व’ को भी। मेरु को मध्य में धारण करने वाले ‘इलावृत’ सहित यह सब उसने जीत लिया।

Verse 36

जित्वा जम्ब्वाख्यमेतद्धि द्वीपं यावदसौ नृपः । जगाम देवराजानं जेतुं सर्वसुरान्वितम् ॥ १०.३७ ॥

इस प्रकार ‘जम्बूद्वीप’ नामक इस द्वीप को जितकर वह नृप, समस्त देवताओं से युक्त देवराज इन्द्र को भी जीतने हेतु आगे बढ़ा।

Verse 37

मेरुपर्वतमारोह्य देवगन्धर्वदानवान् । गुह्यकान् किं नरान् दैत्यान्स्ततो ब्रह्मसुतो मुनिः । नारदो दुर्जयजयम् देवराजाय शंसत ॥ १०.३८ ॥

मेरु पर्वत पर आरूढ़ होकर ब्रह्मपुत्र मुनि नारद ने वहाँ देवों, गन्धर्वों, दानवों, गुह्यकों, मनुष्यों और दैत्यों को संबोधित किया और देवराज इन्द्र को “दुर्जय की विजय” का संदेश सुनाया।

Verse 38

तत इन्द्रस्त्वरायुक्तो लोकपालैः समन्वितः । जगाम दुर्जयं हन्तुं सोऽचिरेणास्त्रनिर्ज्जितम् । विहाय पर्वतं मेरुं मर्त्यलोकमिहागतः ॥ १०.३९ ॥

तब इन्द्र शीघ्रता से युक्त होकर लोकपालों सहित दुर्जय का वध करने चला; वह शीघ्र ही अस्त्रों द्वारा पराजित किया गया। मेरु पर्वत को छोड़कर इन्द्र यहाँ मर्त्यलोक में आ पहुँचा।

Verse 39

पूर्वदेशे च देवेन्द्रो लोकपालैः समं प्रभुः । स्थितवांस्तस्य सुमहच्चरितं सम्भविष्यति ॥ १०.४० ॥

पूर्व दिशा में देवेन्द्र प्रभु इन्द्र लोकपालों के साथ स्थित हुआ; उससे एक अत्यन्त महान चरित (कथा) उत्पन्न होगी।

Verse 40

दुर्जयश्च सुराञ्जित्वा यावत् प्रतिनिवर्तते । गन्धमादनपृष्ठे तु स्कन्धावारनिवेशनम् । कृत्वावस्थितसम्भारमागतं तापसौ तु तम ॥ १०.४१ ॥

देवताओं को जीतकर दुर्जय जब लौटने लगा, तब गन्धमादन पर्वत की ढलानों पर उसने सैन्य-शिविर स्थापित किया। सामग्री-साधन सज्जित थे; तभी तपस्वियों का वह युगल उसके पास आया।

Verse 41

तावगतावथाब्रूतां राजन् दुर्ज्जय लोकपाः । निवारितास्त्वया सर्वं लोकपालैर्विना जगत् । न प्रवर्त्तत तस्मान् नौ देहि तत्पदमुत्तमम् ॥ १०.४२ ॥

वे पास आकर बोले— “राजन् दुर्ज्जय! हम लोकपाल तुम्हारे द्वारा रोके गए हैं; लोकपालों के बिना समस्त जगत् का कार्य-प्रवर्तन नहीं होता। इसलिए हमें वह उत्तम पद (अधिकार) प्रदान करो।”

Verse 42

एवमुक्ते ततस्तौ तु दुर्ज्जयः प्राह धर्मवित् । कौ भवान्ताविति ततस्तावूचतुररिंदमौ । विद्युत्सुविद्युन्नामानावसुराविति मानद ॥ १०.४३ ॥

यह कहे जाने पर धर्मज्ञ दुर्ज्जय ने उन दोनों से कहा—“तुम दोनों कौन हो?” तब शत्रुओं को दबाने वाले उन दोनों ने उत्तर दिया—“हे मानद! हम विद्युत् और सुविद्युत् नामक असुर हैं।”

Verse 43

त्वया सम्प्रति चेच्छामो धर्म्यं सत्सु सुसंस्कृतौ । लोकपालमतं सर्वमावां कुर्म सुदुर्जय ॥ १०.४४ ॥

हे सुदुर्जय! अब हम आपके साथ धर्म्य आचरण—जो सत्पुरुषों में सु-संस्कृत है—करना चाहते हैं, और लोकपालों की समस्त सम्मति/आज्ञा को हम पूर्णतः संपन्न करेंगे।

Verse 44

एवमुक्ते दुर्ज्जयेन तौ स्वर्गे सन्निवेशितौ । लोकपालौ कृतौ सद्यस्ततोऽन्तर्धानं जग्मतुः ॥ १०.४५ ॥

दुर्ज्जय के ऐसा कहने पर वे दोनों स्वर्ग में प्रतिष्ठित किए गए। वे तत्काल लोकपाल नियुक्त हुए, और फिर अंतर्धान होकर अदृश्य हो गए।

Verse 45

तयोरपि महत्कर्म चरितं च धराधरे । भविष्यति महाराजो दुर्जयो मन्दरोपरि ॥ १०.४६ ॥

हे धराधर! उन दोनों के महान कर्म और उनके चरित का वर्णन भी आगे प्रकट होगा; और मन्दर पर्वत पर दुर्जय नामक एक महान राजा भी उत्पन्न होगा।

Verse 46

धनदस्य वनं दिव्यं दृष्ट्वा नन्दनसन्निभम् । मुदा बभ्राम रम्येऽस्मिन् स यावद्राजसत्तमः ॥ १०.४७ ॥

धनद (कुबेर) के दिव्य वन को, जो नन्दन के समान था, देखकर वह राजसत्तम इस रमणीय स्थान में प्रसन्नता से तब तक विचरता रहा, जितनी देर वह वहाँ रहा।

Verse 47

तावत्सुवर्णवृक्षाधः कन्याद्वयमपश्यत । अतीवरूपसम्पन्नमतीवाद्भुतदर्शनम् ॥ १०.४८ ॥

तब स्वर्ण-वृक्ष के नीचे उसने दो कन्याओं को देखा—अत्यन्त रूपसम्पन्न, और अत्यन्त अद्भुत दर्शन वाली।

Verse 48

दृष्ट्वा तु विस्मयाविष्टः क इमे शुभलोचने । एवं संचिन्त्य यावत् स क्षणमेकं व्यवस्थितः । तस्मिन्वने तावदुभौ तापसौ सोऽवलोकयत् ॥ १०.४९ ॥

उन्हें देखकर वह विस्मय से भर गया—“ये दोनों शुभ-लोचनी कौन हैं?” ऐसा विचार कर वह एक क्षण स्थिर रहा; फिर उसी वन में उसने उन दोनों तपस्वियों को देखा।

Verse 49

तौ दृष्ट्वा सहसा राजा ययौ प्रीत्या परां मुदम् । अवतीर्य द्विपात् तूर्णं नमश्चक्रे तयोः स्वयम् ॥ १०.५० ॥

उन दोनों को देखकर राजा सहसा प्रेमपूर्वक परम हर्ष को प्राप्त हुआ। वह शीघ्र ही हाथी से उतरकर स्वयं उन दोनों को प्रणाम करने लगा।

Verse 50

उपविष्टः स ताभ्यां तु कौशे दत्ते वरासने । पृष्टः कस्त्वं कुतश्चासि कस्य वा किमिह स्थितः ॥ १०.५१ ॥

उन दोनों ने रेशम से आच्छादित उत्तम आसन पर उसे बैठाया। तब उससे पूछा गया—“तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? किसके (कुल/स्वामी) हो? और यहाँ किस हेतु ठहरे हो?”

Verse 51

तौ प्रहस्याब्रवीद् राजा सुप्रतीकेतिविश्रुतः । तस्य पुत्रः समुत्पन्नो दुर्जयो नाम नामतः ॥ १०.५२ ॥

तब ‘सुप्रतीक’ नाम से विख्यात राजा मुस्कराकर बोला। उसके यहाँ एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘दुर्जय’ रखा गया।

Verse 52

पृथिव्यां सर्वराजानो जिगीषन्निह सत्तमौ । आगतोऽस्मि ध्रुवं चैव स्मर्तव्योऽहं तपोधनौ ॥ भवन्तौ कौ समाख्यातं ममानुग्रहकाङ्क्षया ॥ १०.५३ ॥

पृथ्वी पर सभी राजा विजय की इच्छा से प्रयत्न करते हैं। मैं निश्चय ही यहाँ आया हूँ; हे तप-धन वाले दोनो, मेरा स्मरण करना चाहिए। मेरी कृपा की कामना से तुम दोनों कौन हो—स्पष्ट बताओ।

Verse 53

तापसावूचतुः । आवां हेतृप्रहेत्राख्यौ मनोः स्वायम्भुवः सुतौ । आवां देवविनाशाय गतौ स्वो मेरुपर्वतम् ॥ १०.५४ ॥

तपस्वियों ने कहा—हम दोनों हेतृ और प्रहेतृ नाम से प्रसिद्ध, स्वायम्भुव मनु के पुत्र हैं। देवताओं के विनाश के लिए हम मेरु पर्वत पर गए हैं।

Verse 54

तत्रावयोर्महासैन्यं गजाश्वरथसंकुलम् । जिगाय सर्वदेवानां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १०.५५ ॥

वहाँ हमारी विशाल सेना—हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी—ने समस्त देवताओं की सेनाओं को पहले सैकड़ों में, फिर हजारों में पराजित किया।

Verse 55

ते च देवाः महत्सैन्यं दृष्ट्वा सर्वं निपातितम् । असुरैरुज्जहितप्राणं ततस्ते शरणं गताः ॥ १०.५६ ॥

वे देवता, उस समस्त महान् सैन्य को गिरा हुआ देखकर—जिसके प्राण असुरों ने हर लिए थे—तब शरण लेने के लिए (रक्षक के पास) गए।

Verse 56

क्षीराब्धौ यत्र देवेशो हरिः शेते स्वयं प्रभुः । तत्र विज्ञापयामासुः सर्वे प्रणतिपूर्वकम् ॥ १०.५७ ॥

क्षीरसागर में, जहाँ देवेश हरि स्वयं प्रभु होकर शयन करते हैं, वहाँ उन सबने प्रणामपूर्वक अपनी विनती निवेदित की।

Verse 57

देवदेव हरे सर्वं सैन्यं त्वसुरसत्तमैः । पराजितं परित्राहि भीतं विह्वल्लोचनम् ॥ १०.५८ ॥

हे देवों के देव, हे हरि! असुरों में श्रेष्ठों ने हमारी सारी सेना को पराजित कर दिया है। हम भयभीत हैं, आँखें घबराहट से डगमगा रही हैं—हमारी रक्षा कीजिए।

Verse 58

त्वया देवासुरे युद्धे पूर्वं त्राताः स्म केशव । सहस्रबाहोः क्रूरस्य समरे कालनेमिनः ॥ १०.५९ ॥

हे केशव! देवों और असुरों के पूर्व युद्ध में आपने ही हमें बचाया था—जब हम क्रूर सहस्रबाहु कालनेमि से रण में भिड़े थे।

Verse 59

इदानीमपि देवेश असुरौ देवकण्टकौ । हेतृप्रहेतृनामानौ बहुसैन्यपरिच्छदौ । तौ हत्वा त्राहि नः सर्वान् देवदेव जगत्पते ॥ १०.६० ॥

हे देवेश! अभी भी देवताओं के काँटे समान दो असुर हैं—हेतृ और प्रहेतृ नाम वाले—जो विशाल सेनाओं से युक्त हैं। उन्हें मारकर हम सबकी रक्षा कीजिए, हे देवदेव, जगत्पते।

Verse 60

एवमुक्तस्ततो देवो विष्णुर्नारायणः प्रभुः । अहं यास्यामि तौ हन्तुमित्युवाच जगत्पतिः ॥ १०.६१ ॥

इस प्रकार कहे जाने पर प्रभु—विष्णु, नारायण, जगत्पति—ने कहा: “मैं जाकर उन दोनों का वध करूँगा।”

Verse 61

एवमुक्तास्ततो देवा मेरुपर्वतसन्निधौ । प्रातस्थुस्तेऽथ मनसा चिन्तयन्तो जनार्दनम् ॥ १०.६२ ॥

ऐसा सुनकर देवता मेरु पर्वत के निकट से चल पड़े और मन ही मन जनार्दन का स्मरण करते रहे।

Verse 62

तैः सञ्चिन्तितमात्रस्तु देवश्चक्रगदाधरः । आवयोः सैन्यमाविश्य एक एव महाबलः ॥ १०.६३ ॥

उनके केवल स्मरण करते ही चक्र और गदा धारण करने वाले देव हमारे दोनों के सैन्य में प्रविष्ट हुए; वे अकेले ही महाबली होकर प्रकट हुए।

Verse 63

एकधा दशधात्मानं शतधा च सहस्रधा । लक्षधा कोटिधा कृत्वा स्वभूत्याऽच जगत्पतिः ॥ १०.६४ ॥

जगत्पति अपनी स्वशक्ति से अपने स्वरूप को एक, दस, सौ, हजार; फिर लाख और करोड़ रूपों में भी कर लेते हैं।

Verse 64

एवं स्थिते देववरे अस्मत्सैन्ये महाबलः । यः कश्चिदसुरो राजन्नावयोर्बलमाश्रितः । स हतः पतितो भूमौ दृश्यते गतचेतनः ॥ १०.६५ ॥

ऐसी स्थिति में, हे देवश्रेष्ठ, हमारे सैन्य में वह महाबली उपस्थित है। हे राजन्, जो भी असुर हम दोनों के बल पर आश्रित हुआ, वह मारा गया—भूमि पर गिरा, चेतनाहीन दिखाई देता है।

Verse 65

एवं तत् सहसा सैन्यं मायया विश्वमूर्तिना । निहतं साश्वकलिलं पत्तिद्विपसमाकुलम् ॥ १०.६६ ॥

इस प्रकार विश्वरूपधारी ने अपनी माया से क्षणभर में उस सेना को नष्ट कर दिया—जो घोड़ों से भरी, अव्यवस्था से घिरी, और पैदल सैनिकों व हाथियों से व्याकुल थी।

Verse 66

चतुरङ्गं बलं सर्वं हत्वा देवो रथाङ्गधृक् । आवां शोषावथो दृष्ट्वा गतोऽन्तर्द्धानमीश्वरः ॥ १०.६७ ॥

समस्त चतुरंगिणी सेना का वध करके चक्रधारी देव ने, हम दोनों को क्षीण हुआ देखकर, ईश्वर अंतर्धान हो गए।

Verse 67

अवयोरिदृशं कर्म दृष्टं देवस्य शार्ङ्गिणः । ततस्तमेव शरणं गतावाराधनाय वै ॥ १०.६८ ॥

हम दोनों का ऐसा कर्म देव शार्ङ्गिण (शार्ङ्गधनुर्धर) ने देख लिया है। इसलिए हम उसी को शरण मानकर, आराधना हेतु उसके पास आए हैं।

Verse 68

त्वं चास्मन्मित्रतनयः सुप्रतीकात्मजो नृप । इमे चावयोः कन्ये गृहाण मनुजेश्वर । हेतृकन्या सुकेशी तु मिश्रकेशी प्रहेतृणः ॥ १०.६९ ॥

और हे नृप! तुम हमारे मित्र के पुत्र, सुप्रतीक के आत्मज हो। हे मनुजेश्वर! हमारी ये दोनों कन्याएँ स्वीकार करो—हेतृ की पुत्री सुकेशी और प्रहेतृ की (पुत्री) मिश्रकेशी।

Verse 69

दुर्जयस्त्वेवमुक्तस्तु हेतॄणा ते उभे शुभे । कन्ये जग्राह धर्मेण भार्यार्थं मनुजेश्वरः ॥ १०.७० ॥

हेतृ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मनुजेश्वर दुर्जय ने उन दोनों शुभ कन्याओं को धर्मानुसार पत्नी-रूप में ग्रहण किया।

Verse 70

ते लब्ध्वा सहसा राजा मुदा परमया युतः । आजगाम स्वकं राष्ट्रं निजसैन्यसमावृतः ॥ १०.७१ ॥

उन्हें तुरंत प्राप्त करके राजा परम हर्ष से युक्त हुआ और अपनी सेना से घिरा हुआ अपने राज्य में लौट आया।

Verse 71

ततः कालेन महता तस्य पुत्रद्वयं बभौ । सुकेश्याः सुप्रभः पुत्रो मिश्रकेश्याः सुदर्शनः ॥ १०.७२ ॥

फिर बहुत समय बीतने पर उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए—सुकेशी से सुप्रभ नामक पुत्र और मिश्रकेशी से सुदर्शन (नामक पुत्र)।

Verse 72

स राजा दुर्जयः श्रीमान् लब्ध्वा पुत्रद्वयं शुभम् । स्वयं कालान्तरे श्रीमान् जगामारण्यं अन्तिके ॥ १०.७३ ॥

वह श्रीमान् दुर्जय राजा शुभ दो पुत्रों को पाकर, कुछ समय बीतने पर स्वयं निकट के वन-आश्रम को चला गया।

Verse 73

तत्रस्थो वनजातीर् हि बाधयन् वै भयंकराः । ददर्शारण्यामाश्रित्य मुनिं स्थितमकल्मषम् ॥ १०.७४ ॥

वहाँ रहते हुए, वन में उत्पन्न भयंकर प्राणी जब बाधा पहुँचा रहे थे, तब उसने अरण्य में निवास करने वाले निष्कलंक मुनि को देखा।

Verse 74

तपस्यन्तं महाभागं नाम्ना गौरमुखं शुभम् । ऋषिवृन्दस्य गोप्तारं त्रातारं पापिनः स्वयम् ॥ १०.७५ ॥

उसने तपस्या में रत, महाभाग, शुभ ‘गौरमुख’ नामक मुनि को देखा—जो ऋषि-समुदाय के रक्षक और पापियों के भी उद्धारक थे।

Verse 75

तस्याश्रमे विमलजलाविलेमरुत्सुगन्धिवृक्षप्रवरे द्विजन्मनः । रराज जीमूत इवाम्बरान्महीमुपागतः प्रवरविमानवद्गृहः ॥ १०.७६ ॥

उसके आश्रम में—निर्मल जल, सुगंधित पवन और श्रेष्ठ वृक्षों से युक्त—उस द्विज का गृह ऐसे शोभित था मानो आकाश से उतरा हुआ मेघ, या उत्तम विमान-सा।

Verse 76

ज्वलनमखाग्निप्रतिभाषिताम्बरः सुशुद्धसंवासितवेषकुट्टकः । शिष्यैः समुच्चारितसामनादकः सुरूपयोषिदृषिकन्याकाकुलः । इतीदृशोऽस्यावसाथो वराश्रमे सुपुष्पिताशेषतरुप्रसूनः ॥ १०.७७ ॥

उस उत्तम आश्रम में उसका निवास ऐसा था—यज्ञाग्नि की ज्वाला से दीप्त-सा वस्त्र, संयमित निवास से अति-शुद्ध तपोवेष; शिष्यों के स्पष्ट सामगान से गूँजता; सुन्दर स्त्रियों और ऋषि-कन्याओं से परिपूर्ण; और सब वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे।

Verse 77

तस्याः पुत्रः समभवद् दुर्जयाख्यो महाबलः । जातकर्मादिसंस्कारं तस्य चक्रे मुनिः स्वयम् ॥ (दुर्वासा नाम तपसो तस्य देहमकल्मषः

उसके यहाँ दुर्जय नाम का महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ। उसके जातकर्म आदि संस्कार स्वयं मुनि ने किए—तपस्या से निष्कलंक देह वाले दुर्वासा ऋषि ने।

Frequently Asked Questions

The chapter frames social and cosmic order through a triadic (sāttvika–rājasa–tāmasa) model: Vedic study and ritual are aligned with sattva and rajas, while fierce/time-formed power is associated with tamas. Within the narrative logic, legitimacy and stability arise when power (royal or divine) remains integrated with ritual-ethical norms; disruptive conquest that bypasses established cosmic governors (lokapālas) triggers corrective interventions (curses, divine action).

No explicit tithi, lunar month, or seasonal observance is specified in the provided passage. Time is marked narratively through long durations (bahuvarṣa-sahasrikam), yuga divisions (Kṛta, Tretā, Dvāpara, Kali), and generational/“after a long time” transitions (kālena mahatā), rather than calendrical ritual scheduling.

Terrestrial balance is implied through the governance network of lokapālas and the ordering of the world by the three guṇas. Durjaya’s conquest is portrayed as so expansive that it inhibits the normal functioning of the world under the lokapālas, prompting appeals for restoration. In a Pṛthivī-oriented reading, the text links ethical restraint, rightful governance, and cosmic administration to the maintenance of stable conditions for the inhabited world.

The narrative references King Supratīka of Vārāṇasī; his queens Vidyutprabhā and Kīrtimatī; his sons Durjaya and Sudyumna; sage Ātreya; Indra (devarāja); Nārada (as messenger); and the asura figures Vidyut and Suvidyut, as well as Hetṛ and Prahetṛ (identified as sons of Svāyambhuva Manu).