
प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेद की प्रमुख उपनिषदों में है, जिसमें ऋषि पिप्पलाद के पास आए छह साधक छह गहन प्रश्न पूछते हैं। उपनिषद् पहले तप, ब्रह्मचर्य और अनुशासन द्वारा पात्रता पर बल देती है, फिर संवाद-शैली में ब्रह्मविद्या का क्रमबद्ध विवेचन करती है। यहाँ वैदिक प्रतीकों को बाह्य कर्मकाण्ड से हटाकर अंतःकरण और साधना के स्तर पर अर्थवान बनाया गया है। इस ग्रंथ का केंद्रीय विषय ‘प्राण-विद्या’ है। प्राण को केवल श्वास नहीं, बल्कि इंद्रियों, मन और जीवन-क्रियाओं का अधिष्ठान माना गया है; इंद्रियों के ‘विवाद’ प्रसंग में प्राण की प्रधानता स्थापित होती है। ‘रयि’ (अन्न/पदार्थ) और ‘प्राण’ (जीवन-शक्ति) की युग्म-कल्पना से सृष्टि और पोषण का दार्शनिक ढाँचा बनता है, जिसमें सूर्य-चंद्र के प्रतीक भी आते हैं। उपनिषद् ओंकार (अ-उ-म) की उपासना को साधन के रूप में प्रस्तुत करती है और चेतना की अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति—के संदर्भ में उसके अर्थ खोलती है। अंत में ‘षोडश कलाएँ’ (व्यक्ति के घटक) अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न होकर उसी में लीन होती हैं—यह शिक्षा मृत्यु-भय के अतिक्रमण और मोक्ष की दिशा में ले जाती है।
Start Reading- **Sixfold inquiry (ṣaṭ-praśna)** as a pedagogical method: disciplined questioning grounded in tapas and brahmacarya.
- **Prāṇa as the chief life-principle** coordinating senses and mind; microcosm–macrocosm correspondence.
- **Rayi and prāṇa** (matter/food and life/energy) as complementary principles in cosmic manifestation.
- **Prajāpati and creation** interpreted inwardly: cosmology serves contemplative self-knowledge.
- **Oṃ (Praṇava) upāsanā**: A-U-M and the whole Oṃ as supports for graded realization and transcendence.
- **States of consciousness** (waking
dream
deep sleep) and the analysis of the inner person.
- **Ṣoḍaśa-kalā (sixteen parts)**: the person as a composite that arises from and returns to the imperishable (akṣara).
- **Death and the path beyond death**: knowledge of the source of prāṇa and the self as the means to overcome fear and mortality.
- **Integration of ritual and contemplation**: external Vedic motifs are interiorized into yogic-psychological meanings.
- **Brahmavidyā as liberating knowledge**: not mere doctrine but transformative realization.
16 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
अथ हैनं सैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तम् ओङ्कारम् अभिध्यायीत् । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति । तस्मै स होवाच ॥१॥
तब सैब्य सत्यकाम ने उनसे पूछा—“भगवन्, मनुष्यों में जो कोई जीवन के अन्त तक ओंकार का ध्यान करता रहे, वह उसके द्वारा वास्तव में किस लोक को जीतता है?” तब उन्होंने उसे उत्तर दिया॥१॥
Oṃ-upāsanā; gati (post-mortem destiny) shaped by meditation at death; saguṇa-brahman meditation as a meansVerse 2
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यद् ओङ्कारः । तस्माद् विद्वान् एतेनैवायतनेनैकतरम् अन्वेति ॥२॥
हे सत्यकाम, ओंकार ही पर और अपर—दोनों प्रकार की ब्रह्म-तत्त्व है। इसलिए ज्ञानी पुरुष इसी आधार के द्वारा उन दोनों में से किसी एक की प्राप्ति करता है॥२॥
Para–apara Brahman; praṇava as ālambana (support) for graded realizationVerse 3
स यद्येकमात्रामभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥३॥
जो ओंकार की एक मात्रा का ध्यान करता है, वह उसी से प्रकाशित होकर शीघ्र ही इस जगत् (मनुष्यलोक) को प्राप्त होता है। ऋग्वेद की ऋचाएँ उसे मनुष्यलोक में ले जाती हैं; वहाँ वह तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से सम्पन्न होकर एक प्रकार की महिमा का अनुभव करता है॥३॥
Upāsanā of Oṃ (Praṇava) with graded results; karma/upāsanā leading to limited loka vs. higher realizationVerse 4
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥४॥
फिर यदि वह दो मात्राओं द्वारा मन में स्थिर हो जाए, तो यजुर्मन्त्रों से उसे अन्तरिक्ष-लोक, सोमलोक तक उठाया जाता है। वहाँ सोमलोक की विभूति का अनुभव करके वह पुनः लौट आता है।
Gradation of upāsanā and its phala (loka); saṃsāric ascent and return (punarāvṛtti)Verse 5
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्भुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्भुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् पर...
परन्तु जो इस ‘ॐ’ अक्षर को तीन मात्राओं सहित लेकर परम पुरुष का ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्य-लोक में प्रतिष्ठित होता है। जैसे सर्प अपनी केंचुली से छूट जाता है, वैसे ही वह पाप से मुक्त हो जाता है। सामगानों द्वारा उसे ब्रह्मलोक तक उन्नत किया जाता है; और इस जीवन-घन (देह) से परे, परात्पर, हृदय-पुर में स्थित पुरुष का वह दर्शन करता है। इस विषय में ये दो श्लोक हैं।
Praṇava as Brahman/Puruṣa-indicator; progressive purification; brahma-loka and (by higher knowledge there) liberation; vision of the inner PuruṣaVerse 6
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ताः अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥६॥
तीनों मात्राएँ, जो ‘मृत्यु-सम्बन्धी’ कही गई हैं, जब परस्पर संयुक्त और अविच्छिन्न होकर प्रयुक्त होती हैं—बाह्य, आन्तरिक और मध्य क्रियाओं में—और जब वे सम्यक् रूप से लगाई जाती हैं, तब ज्ञानी नहीं काँपता।
Oṁ-upāsanā leading to fearlessness (abhaya) and steadiness of the jñānīVerse 7
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत् तत् कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥७॥
जिस तत्त्व को ऋग्-मंत्रों, यजुः-यज्ञसूक्तों और साम-गानों द्वारा ऋषि जानते हैं, उसी को विद्वान् केवल ‘ॐ’ को आधार (आयतन) बनाकर प्राप्त करता है—वह शान्त, अजर, अमृत, अभय और परम है।
Brahman as śānta–ajara–amṛta–abhaya–para; Oṁ as āyatana (support) for attaining BrahmanVerse 8
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयित...
पृथ्वी और पृथ्वी का मात्र-आधार; जल और जल का मात्र-आधार; तेज और तेज का मात्र-आधार; वायु और वायु का मात्र-आधार; आकाश और आकाश का मात्र-आधार; नेत्र और दृश्य; कर्ण और श्रव्य; घ्राण और घ्रातव्य; रसना और रसनीय; त्वचा और स्पर्शनीय; वाणी और वक्तव्य; हाथ और ग्रहणीय; उपस्थ और आनन्दनीय; पायु और विसर्जनीय; पाँव और गन्तव्य; मन और चिन्तनीय; बुद्धि और बोधनीय; अहंकार और ‘मैं’ करके ग्रहणीय; चित्त और चेतनीय; प्रकाश और प्रकाशित करने योग्य; तथा प्राण और धारण करने योग्य।
Adhyāsa of body–mind functions on the Self; prāṇa as cosmic/individual support; analysis of tattvas and indriyasVerse 9
संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयि...
संवत्सर ही प्रजापति है; उसके दो अयन हैं—दक्षिण और उत्तर। जो लोग उसे ‘इष्ट और पूर्त से उत्पन्न पुण्य’ मानकर उपासना करते हैं, वे केवल चन्द्रलोक को ही जीतते हैं और फिर लौट आते हैं। इसलिए ये ऋषि, प्रजा की कामना से, दक्षिणायन को अपनाते हैं। यही रयि है—अर्थात् पितृयाण का मार्ग।
Karma/upāsanā and saṃsāra; pitṛyāṇa vs devayāṇa; rayi (matter/food/wealth) as the lunar-ancestral trajectoryVerse 10
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥
हे प्राण! जब तुम वर्षा करते हो, तब तुम्हारी ये प्रजाएँ आनन्दस्वरूप होकर स्थित रहती हैं और ऐसा मानती हैं कि इच्छा के अनुसार अन्न अवश्य प्राप्त होगा।
Prāṇa as sustainer of life and prosperity; dependence of beings on prāṇa and anna (food)Verse 11
य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति । तदेषः श्लोकः ॥११॥
जो इस प्रकार जानकर प्राण को जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती; वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। इस विषय में यह श्लोक है।
Prāṇa as the cosmic and individual life-principle; amṛtatva (immortality) through knowledgeVerse 12
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मा उत्क्रमीः ॥१२॥
हे प्राण! तुम्हारा जो स्वरूप वाणी में प्रतिष्ठित है, जो श्रोत्र में, जो नेत्र में, और जो मन में विस्तृत है—उसको शुभ बनाए रखो; तुम प्रस्थान मत करो।
Prāṇa as the sustaining power of the senses and mind; life-force as upholder of embodied experienceVerse 13
अहोरात्रो वै प्रजापतिः। तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः। प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते। ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते॥१३॥
अहोरात्र ही प्रजापति है। उसमें दिन प्राण-स्वरूप है और रात रयि (अन्न/पदार्थ)-स्वरूप। जो लोग दिन में रति के साथ संयोग करते हैं, वे अपना प्राण क्षीण करते हैं; पर जो रात में रति के साथ संयोग करते हैं, वही नियत संयम रूप ब्रह्मचर्य है।
Brahmacarya; conservation and right-direction of prāṇa; Prajāpati as cosmic order (ṛta)Verse 14
अन्नं वै प्रजापतिः। ततो ह वै तद्रेतः। तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति॥१४॥
अन्न ही प्रजापति है; उसी से वह रेतस् (बीज/सृजन-तत्त्व) उत्पन्न होता है। इसलिए उसी की उत्पत्ति से ये समस्त प्रजाएँ जन्म लेती हैं।
Rayi/anna (matter, food) as creative principle; Prajāpati as material cause in cosmological teachingVerse 15
तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते। तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्॥१५॥
जो उस प्रजापति-व्रत का आचरण करते हैं, वे मिथुन (युग्म/संतति) को उत्पन्न करते हैं। उन्हीं के लिए यह ब्रह्मलोक है—जिनमें तप और ब्रह्मचर्य है, और जिनमें सत्य प्रतिष्ठित है।
Tapas–brahmacarya–satya as sādhana; Brahmaloka as fruit of disciplined life; dharma as support for higher attainmentVerse 16
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥१६॥
उनके लिए वह निर्मल ब्रह्मलोक प्राप्त होता है—जिनमें न कुटिलता है, न असत्य, और न ही माया का प्रवर्तन।
Moksha; Brahmaloka; purity (śuddhi) as fitness for Brahma-realization; Māyā as delusion