
इस अध्याय में स्कन्द मैत्रावरुण को विरजा-नामक पीठ पर स्थित त्रिलोचन के रत्नमय प्रासाद का पूर्ववृत्त सुनाते हैं। वहाँ एक कबूतर-दंपति नित्य प्रदक्षिणा करता है और वाद्य-ध्वनि, आरती-दीप आदि के सतत भक्तिमय वातावरण में रहता है। एक बाज उनकी चाल-ढाल पर दृष्टि रखकर मार्ग रोक देता है और संकट खड़ा हो जाता है। कबूतरी बार-बार स्थान बदलने का आग्रह करती है और व्यावहारिक नीति कहती है—जीवन बचा रहे तो परिवार, धन, घर सब फिर मिल सकते हैं; स्थान-आसक्ति बुद्धिमानों को भी नष्ट कर देती है। साथ ही वह काशी, ओंकार-लिंग और त्रिलोचन को परम पावन बताकर पवित्र-स्थान और प्राण-रक्षा के बीच धर्म-संकट को तीव्र करती है। कबूतर पहले नहीं मानता; विवाद होता है और बाज दोनों को पकड़ लेता है। तब पत्नी उपाय बताती है—उड़ते हुए बाज के पैर को चोंच से काटो; उपाय सफल होता है, वह छूट जाती है और पति भी गिरकर बच निकलता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि उdyam (सतत प्रयास) भाग्य के साथ मिलकर विपत्ति में भी अनपेक्षित उद्धार करा देता है। आगे कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रसंग आता है—दंपति अन्यत्र उच्च अवस्था को प्राप्त होता है। फिर परिमालालय नामक विद्याधर का आदर्श आता है, जो कठोर व्रत लेकर काशी में त्रिलोचन-पूजा किए बिना भोजन न करने का संकल्प करता है; तथा रत्नावली नामक नागकन्या सखियों सहित पुष्प, संगीत और नृत्य से त्रिलोचन की आराधना कर दिव्य दर्शन पाती है। अंत में फलश्रुति है—त्रिलोचन-कथा का श्रवण पाप-भार से दबे जनों को भी शुद्ध कर उच्च गति की ओर ले जाता है।
Verse 1
स्कंद उवाच । शृणुष्व मैत्रावरुणे पुराकल्पे रथंतरे । इतिहास इहासीद्यः पीठे विरजसंज्ञिते
स्कन्द बोले—हे मैत्रावरुण! सुनो। प्राचीन काल में, रथन्तर कल्प के समय, यहाँ विरजा नामक पीठ पर यह पुरातन इतिहास घटित हुआ था।
Verse 2
त्रिलोचनस्य प्रासादे मणिमाणिक्यनिर्मिते । नानाभंगि गवाक्षाढ्ये रत्नसानाविवायते
त्रिलोचन के उस प्रासाद में—जो मणि-माणिक्य से निर्मित था और अनेक भंगिमाओं वाले गवाक्षों से सुशोभित था—वह रत्नों की पर्वत-ढाल-सा प्रतीत होता था।
Verse 3
कदाचिदपि कल्पांते द्यो लोके भ्रंशति क्षये । प्रोत्तंभनं स्तंभ इव दत्तो विश्वकृता स्वयम्
कभी कल्पान्त के क्षय में जब स्वर्गलोक ढहने लगता है, तब यह विश्वकृता द्वारा स्वयं प्रदत्त, मानो एक आधार-स्तम्भ की भाँति, उसे संभाले रहता है।
Verse 4
मरुत्तरंगिताग्राभिः पताकाभिरितस्ततः । सन्निवारयतीवेत्थमघौघान्विशतो मुने
चारों ओर पवन से लहराते अग्रभाग वाली पताकाओं से युक्त होकर, हे मुने, वह मानो भीतर प्रवेश करते पाप-प्रवाहों को रोक रहा हो—ऐसा प्रतीत होता था।
Verse 5
देदीप्यमान सौवर्ण कलशेन विराजिते । पार्वणेन शशांकेन खेदादिव समाश्रिते
वह देदीप्यमान स्वर्ण-कलश से सुशोभित होकर चमकता था; और मानो थकान के बाद मिलने वाले विश्राम की तरह, पूर्णिमा के चन्द्रमा का आश्रय लिए हुए प्रतीत होता था।
Verse 6
तत्र पारावतद्वंद्वं वसेत्स्वैरं कृतालयम् । प्रातःसायं च मध्याह्ने कुर्वन्नित्यं प्रदक्षिणम्
वहाँ कबूतरों का एक जोड़ा स्वतंत्र होकर अपना निवास बनाकर रहता था। वे प्रातः, सायं और मध्याह्न में नित्य प्रदक्षिणा किया करते थे।
Verse 7
उड्डीयमानं परितः पक्षवातेरितस्ततः । रजःप्रासादसंलग्नं दूरीकुर्वद्दिनेदिने
वे चारों ओर उड़ते हुए, अपने पंखों की वायु से इधर-उधर प्रेरित होकर, मंदिर से लगी धूल को दिन-प्रतिदिन झाड़ते रहते थे।
Verse 8
त्रिलोचनेति सततं नाम भक्तैरुदाहृतम् । त्रिविष्टपेति च तथा तयोः कर्णातिथी भवेत्
भक्त निरंतर ‘त्रिलोचन’ नाम का उच्चारण करते थे और वैसे ही ‘त्रिविष्टप’ भी; उन दोनों पक्षियों के कानों में वे ध्वनियाँ अतिथि-सी बनकर बस जाती थीं।
Verse 9
चतुर्विधानि वाद्यानि शंभुप्रीतिकराण्यलम् । तयोः कर्णगुहां प्राप्य प्रतिशब्दं प्रतन्वते
शंभु को प्रसन्न करने वाले चार प्रकार के वाद्य-नाद उन दोनों के कानों की गुहा में पहुँचकर प्रतिध्वनि फैलाते थे।
Verse 10
मंगलारार्तिकज्योतिस्त्रिसंध्यं पक्षिणोस्तयोः । नेत्रांत निर्विशन्नित्यं भक्तचेष्टां प्रदर्शयेत्
तीनों संध्याओं में मंगलमय आरती का प्रकाश उन दोनों पक्षियों की आँखों के कोनों में नित्य प्रवेश करता, मानो भक्तों की पूजा-चेष्टा उन्हें दिखा रहा हो।
Verse 11
प्राणयात्रां विहायापि कदाचित्स्थिरमानसौ । नोड्डीयवांछितं यातः पश्यंतौ कौतुकं खगौ
कभी-कभी वे दोनों पक्षी मन में स्थिर होकर अपनी प्राण-यात्रा (आहार-खोज) भी छोड़ देते; इच्छित स्थानों को उड़कर न जाते, और उस अद्भुत दृश्य को ही देखते रहते।
Verse 12
तत्र भक्तजनाकीर्णं प्रासादं परितो मुने । तंडुलादि चरंतौ तौ कुर्वाते च प्रदक्षिणम्
वहाँ, हे मुनि, मंदिर चारों ओर भक्तजनों से भरा था; वे दोनों चावल आदि चुगते हुए भी प्रदक्षिणा किया करते थे।
Verse 13
देवदक्षिणदिग्भागे चतुःस्रोतस्विनी जलम् । तृषार्तौ धयतो विप्र स्नातौ जातु चिदंडजौ
देवालय के दक्षिण भाग में ‘चतुःस्रोतस्विनी’ का जल था; प्यास से व्याकुल, हे विप्र, वे दोनों पक्षी उसे पीते और कभी-कभी वहीं स्नान भी करते।
Verse 14
तयोरित्थं विचरतोस्त्रिलोचनसमीपतः । अगाद्बहुतिथः कालो द्विजयोः साधुचेष्टयोः
इस प्रकार त्रिलोचन के समीप विचरते हुए, उन साधु-चेष्टा वाले दोनों ‘द्विज’ पक्षियों का बहुत-सा समय बीत गया।
Verse 15
अथ देवालयस्कंधे गवाक्षांतर्गतौ च तौ । श्येनेन केनचिद्दृष्टौ क्रूरदृष्ट्या सुखस्थितौ
फिर देवालय के स्कंध पर स्थित गवाक्ष (झरोखे) के भीतर सुख से बैठे उन दोनों को किसी बाज ने क्रूर दृष्टि से देख लिया।
Verse 16
तच्च पारावतद्वंद्वं श्येनः परिजिघृक्षुकः । अवतीर्यांबरादाशु प्रविष्टोन्यशिवालये
उस कबूतर-युगल को पकड़ने को उत्सुक बाज़ आकाश से शीघ्र झपटा; पर वे तो पहले ही दूसरे शिवालय में प्रविष्ट हो चुके थे।
Verse 17
ततो विलोकयामास तदागमविनिर्गमौ । केन मार्गेण विशतो दुर्गमेतौ पतत्त्रिणौ
तब वह उनके आने-जाने को देखने लगा और सोचने लगा—“किस मार्ग से ये दोनों पक्षी इस दुर्गम स्थान में प्रविष्ट हुए?”
Verse 18
केनाध्वना च निर्यातः क्व काले कुरुतश्च किम् । कथं युगपदे तौ मे ग्राह्यौ स्वैरं भविष्यतः
“और किस पथ से वे निकलते हैं? किस समय, और क्या करते हुए? वे स्वच्छंद हो जाएँ उससे पहले मैं दोनों को एक साथ कैसे पकड़ूँ?”
Verse 19
मध्ये दुर्गप्रविष्टौ च ममवश्याविमौ न यत् । एकदृष्टिः क्षणं तस्थौ श्येन इत्थं विचिंतयन्
“अब दुर्ग के भीतर प्रविष्ट होने से ये दोनों मेरे वश में नहीं रहे।” ऐसा सोचता हुआ बाज़ एकटक दृष्टि से क्षणभर ठहर गया।
Verse 20
अहो दुर्गबलं प्राज्ञाः शंसंत्येवेति हेतुतः । दुर्बलोप्याकलयितुं सहसारिर्न शक्यते
“अहो! इसी कारण बुद्धिमान लोग दुर्ग-बल की प्रशंसा करते हैं; क्योंकि दुर्बल भी सहसा आए शत्रु के आघात से जीता नहीं जा सकता।”
Verse 21
करिणां तु सहस्रेण वराश्वानां न लक्षतः । तत्कर्मसिद्धिर्नृपतेर्दुर्गेणैकेन यद्भवेत्
हज़ार हाथियों और एक लाख उत्तम घोड़ों से भी जो कार्य-सिद्धि राजा को नहीं मिलती, वह एक ही दुर्ग के बल से प्राप्त हो जाती है।
Verse 22
दुर्गस्थो नाभिभूयेत विपक्षः केनचित्क्वचित् । स्वतंत्रं यदि दुर्गं स्यादमर्मज्ञप्रकाशितम्
दुर्ग में स्थित व्यक्ति को शत्रु कहीं भी, कभी भी पराजित नहीं कर सकता—यदि दुर्ग स्वतंत्र हो और उसके मर्म-स्थल अज्ञानी द्वारा प्रकट न किए गए हों।
Verse 23
इति दुर्गबलं शंसञ्श्येनो रोषारुणेक्षणः । असाध्वसौ कलरवौ वीक्ष्य यातो नभोंगणम्
इस प्रकार दुर्ग-बल की प्रशंसा करता हुआ, क्रोध से लाल नेत्रों वाला श्येन उन दोनों कलरव पक्षियों को घूरकर खुले आकाश में उड़ गया।
Verse 24
अथ पारावतीदक्षा विपक्षं प्रेक्ष्य पक्षिणम् । महाबलं दुर्गबला प्राह पारावतं पतिम्
तब दुर्ग-आश्रय के बल से समर्थ, दक्ष पारावती ने उस विरोधी पक्षी को देखकर अपने पारावत-पति से उस महाबली शत्रु के विषय में कहा।
Verse 25
कलरव्युवाच । प्रिय पारावत प्राज्ञ सर्वकामि सुखारव । तव दृग्विषयं प्राप्तः श्येनोय प्रबलो रिपुः
कलरवा बोली—हे प्रिय पारावत! हे प्राज्ञ, मधुर-स्वर, सर्वकाम-प्रदाता! यह प्रबल शत्रु श्येन अब तुम्हारी दृष्टि-सीमा में आ पहुँचा है।
Verse 26
सावज्ञं वाक्यमाकर्ण्य पारावत्याः स तत्पतिः । पारावतीमुवाचेदं का चिंतेति तव प्रिये
पारावती के किंचित् तिरस्कार-युक्त वचन को सुनकर उसके पति ने कहा— “प्रिये, यह कैसी चिंता तुम्हें व्याकुल कर रही है?”
Verse 27
पारावत उवाच । कति नाम न संतीह सुभगे व्योमचारिणः । कति देवालयेष्वेषु खगा नोपविशंति हि
पारावत ने कहा— “सुभगे, यहाँ आकाश में विचरने वाले कितने ही जीव हैं! और इन देवालयों में कितने पक्षी बैठते तक नहीं हैं।”
Verse 28
कति चैव न पश्यंति नौ सुखस्थाविह प्रिये । तेभ्यो यदीह भेतव्यं कुतो नौ तत्सुखं प्रिये
“प्रिये, यहाँ सुख से बैठे हुए हम दोनों को कितने लोग देखते तक नहीं। यदि यहाँ भी उनसे डरना पड़े, तो यह सुख हमारा कैसे रहा, प्रिये?”
Verse 29
रमस्व त्वं मया सार्धं त्यज चिंतामिमां शुभे । अस्य श्येनवराकस्य गणनापि न मे हृदि
“शुभे, मेरे साथ आनंद करो, इस चिंता को छोड़ दो। उस दुष्ट-श्येन की तो मैं अपने हृदय में गिनती भी नहीं करता।”
Verse 30
इत्थं पारावतवचः श्रुत्वा पारावती ततः । मौनमालंब्य संतस्थे पत्युः पादार्पितेक्षणा
पारावत के ऐसे वचन सुनकर पारावती मौन धारण कर स्थिर हो गई; उसकी दृष्टि पति के चरणों पर झुक गई।
Verse 31
हितवर्त्मोपदिश्यापि प्रिय प्रियचिकीर्षया । साध्व्या जोषं समास्थेयं कार्यं पत्युर्वचः सदा
हित का मार्ग बताकर भी, प्रिय के प्रिय की कामना करने वाली साध्वी पत्नी को संयत रहना चाहिए; और पति की आज्ञा सदा पूरी करनी चाहिए।
Verse 32
अन्येद्युरप्यथायातः श्येनो पश्यत्स दंपती । अपरिच्छिन्नया दृष्ट्या यथा मृत्युर्गतायुषम्
अगले दिन भी वह बाज आया और उस दंपती को देखता रहा; उसकी अटल दृष्टि उन पर ऐसी थी जैसे आयु समाप्त हुए जन पर मृत्यु की।
Verse 33
अथ मंडलगत्या स प्रासादं परितो भ्रमन् । निरीक्ष्य तद्गतायातौ यातो गगनमार्गतः
फिर वह महल के चारों ओर मंडलाकार घूमता हुआ, उनके आने-जाने को भलीभाँति देखकर, आकाश-मार्ग से फिर चला गया।
Verse 34
गतेऽथ नभसि श्येने पुनः पारावतांगना । प्रोवाच प्रेयसी नाथ दृष्टो दुष्टस्त्वयाऽहितः
जब वह बाज आकाश में चला गया, तब कबूतरी ने फिर कहा—हे नाथ! वह दुष्ट और अहितकारी तूने देख लिया है।
Verse 35
तस्या वाक्यं समाकर्ण्य पुनः कलरवोब्रवीत् । किं करिष्यत्यसौ मुग्धे मम व्योमविहारिणः
उसकी बात सुनकर मधुर-स्वर वाले ने फिर कहा—भोली! जो मैं आकाश में विचरता हूँ, वह मेरा क्या कर लेगा?
Verse 36
दुर्गं च स्वर्गतुल्यं मे यत्र नास्त्यरितो भयम् । अयं न ता गतीर्वेत्ति या वेदाहं नभोंगणे
मेरा दुर्ग स्वर्ग के समान है; वहाँ शत्रुओं से तनिक भी भय नहीं। यह तो आकाश-मण्डल में जिन गमन-मार्गों को मैं जानता हूँ, उन्हें नहीं जानता।
Verse 37
प्रडीनोड्डीन संडीन कांडव्याडकपाटिकाः । स्रंसनी मंडलवती गतयोष्टावुदाहृताः
प्रडीन, उड्डीन, संडीन, काण्ड, व्याडक, पाटिका, स्रंसनी और मण्डलवती—ये आठ प्रकार की गतियाँ कही गई हैं।
Verse 38
यथैतास्विह कौशल्यं मयि पारावति प्रिये । गतिषु क्वापि कस्यापि पक्षिणो न तथांबरे
हे प्रिये पारावती! इन गतियों में जैसा कौशल मुझमें है, वैसा आकाश में कहीं किसी भी पक्षी में नहीं है।
Verse 39
सुखेन तिष्ठ का चिंता मयि जीवति ते प्रिये । इति तद्वचनं श्रुत्वा सास्थिता मूकवत्सती
हे प्रिये! सुख से रहो; मेरे जीवित रहते तुम्हें कैसी चिंता? यह वचन सुनकर वह मूक-सी होकर स्थिर रह गई।
Verse 40
अपरेद्युरपि श्येनस्तत्र भारशिलातले । कियदंतरमासाद्योपविष्टोऽतिप्रहृष्टवत्
अगले दिन भी वह श्येन वहाँ आया; थोड़ी ही दूरी पर पहुँचकर भारी शिला के तल पर बैठ गया, मानो अत्यन्त प्रसन्न हो।
Verse 41
आयामं तत्र संस्थित्वा तत्कुलायं विलोक्य च । पुनर्विनिर्गतः श्येनः सापि भीताब्रवीत्पुनः
वहाँ कुछ समय ठहरकर और उस घोंसले की ओर देखकर वह श्येन फिर निकल गया; और वह भी भयभीत होकर पुनः बोली।
Verse 42
प्रियस्थानमिदं त्याज्यं दुष्टदृष्टिविदूषितम् । असौ क्रूरोति निकटमुपविष्टोऽतिहृष्टवत्
यह प्रिय स्थान छोड़ देना चाहिए, यह दुष्ट दृष्टि से दूषित हो गया है। वह क्रूर तो बहुत पास बैठा है, मानो अत्यन्त हर्षित हो।
Verse 43
सावज्ञं स पुनः प्राह किं करिष्यत्यसौ प्रिये । मृगाक्षीणां स्वभावोयं प्रायशो भीरुवृत्तयः
वह उपेक्षा से फिर बोला—‘प्रिये, वह क्या कर लेगा? मृगनयनी स्त्रियों का स्वभाव ही ऐसा है; प्रायः वे भयशील होती हैं।’
Verse 44
इतरेद्युरपि प्राप्तः स च श्येनो महाबलः । तयोरभिमुखं तत्र स्थितो याम द्वयावधि
अगले दिन भी वह महाबली श्येन आया; उनके सामने वहाँ दो याम तक खड़ा रहा।
Verse 45
पुनर्विलोक्य तद्वर्त्म शीघ्रं यातो यथागतम् । गतेथ शकुनौ तस्मिन्सा बभाषे विहंगमी
उस मार्ग को फिर देखकर वह जैसे आया था वैसे ही शीघ्र चला गया। उस पक्षी के चले जाने पर वह विहंगमा बोली।
Verse 46
नाथ स्थानांतरं यावो मृत्युर्नौ निकटोत्र यत् । पुनर्दुष्टे प्रणष्टेस्मिन्नावां स्यावः सुखं प्रिय
हे नाथ, चलो किसी अन्य स्थान को चलें; यहाँ हमारे निकट मृत्यु आ खड़ी है। यह दुष्ट उपद्रव नष्ट हो जाए तो, प्रिय, हम फिर सुख से रहेंगे।
Verse 47
प्रिय यस्य सपक्षस्य गतिः सर्वत्र सिद्धिदा । स किं स्वदेशरागेण नाशं प्राप्नोति बुद्धिमान्
प्रिय, जिसके पंख हैं, उसकी सर्वत्र गति सिद्धि देने वाली है। क्या कोई बुद्धिमान अपने ही देश के मोह से विनाश को प्राप्त होगा?
Verse 48
सोपसर्गं निजं देशं त्यक्त्वा योन्यत्र न व्रजेत् । स पंगुर्नाशमाप्नोति कूलस्थित इव द्रुमः
जो अपने देश को विपत्ति से घिरा देखकर छोड़ तो देता है, पर कहीं और नहीं जाता, वह लंगड़े-सा होकर नष्ट हो जाता है—जैसे कटते तट पर खड़ा वृक्ष।
Verse 49
प्रियोदितं निशम्येति स भवित्री दशार्दितः । सरीढं पुनरप्याह प्रिये मा भैः खगात्ततः
प्रिय के वचन सुनकर वह (कपोत) संकट से व्याकुल होकर निकल पड़ा। फिर भी स्नेह से बोला—“प्रिये, उस पक्षी से मत डर।”
Verse 50
अथापरस्मिन्नहनि स श्येनः प्रातरेव हि । तद्द्वारदेशमासाद्य सायं यावत्स्थितो बलः
फिर अगले दिन वह श्येन प्रातःकाल ही आया और घोंसले के द्वार-प्रदेश में पहुँचकर संध्या तक बलपूर्वक डटा रहा।
Verse 51
अस्ताचलस्य शिखरं याते भानौ गते खगे । कुलायाद्बाह्यमागत्योवाच पारावती पतिम्
जब सूर्य अस्ताचल की चोटी पर पहुँच गया और बाज़ चला गया, तब कबूतरी घोंसले से बाहर आकर अपने पति से बोली।
Verse 52
नाथ निर्गमनस्यायं कालः कालोऽतिदूरतः । यावत्तावद्विनिर्याहि त्यक्त्वा मामपि सन्मते
हे नाथ, अब निकलने का समय है; विधि का क्षण दूर नहीं। हे सन्मति, मुझे भी छोड़कर तुरंत बाहर चले जाओ।
Verse 53
त्वयि जीवति दुष्प्राप्यं न किंचिज्जगतीतले । पुनर्दाराः पुनर्मित्रं पुनर्वसु पुनर्गृहम्
जब तक तुम जीवित हो, पृथ्वी पर कुछ भी दुर्लभ नहीं: फिर से पत्नी, फिर से मित्र, फिर से धन और फिर से घर—सब मिल सकते हैं।
Verse 54
यद्यात्मा रक्षितः पुंसा दारैरपि धनैरपि । तदा सर्वं हरिश्चंद्रभूपेनेवेह लभ्यते
यदि मनुष्य अपना प्राण बचा ले—चाहे पत्नी और धन का त्याग ही क्यों न हो—तो यहाँ सब कुछ फिर मिल जाता है, जैसे राजा हरिश्चंद्र को मिला।
Verse 55
अयमात्मा प्रियो बंधुरयमात्मा महद्धनम् । धमार्थकाममोक्षाणामयमात्मार्जकः परः
यह आत्मा ही प्रिय बंधु है, यही आत्मा महान धन है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इनका परम साधन यही आत्मा है।
Verse 56
त्रिलोक्या अपि सर्वस्याः श्रेष्ठा वाराणसी पुरी । ततोपि लिंगमोंकारं ततोप्यत्र त्रिलोचनम्
तीनों लोकों के समस्त तीर्थों में वाराणसी नगरी सर्वोत्तम है। उससे भी श्रेष्ठ ओंकार-लिंग है, और उससे भी बढ़कर यहाँ काशी में त्रिलोचन शिव हैं।
Verse 57
यशोहीनं तु यत्क्षेमं तत्क्षेमान्निधनं वरम् । तद्यशः प्राप्यते पुंभिर्नीतिमार्गप्रवर्तने
जो कल्याण यश से रहित हो, वह कल्याण नहीं; उससे तो मृत्यु भी श्रेष्ठ है। क्योंकि पुरुषों को वही यश धर्मनीति के मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है।
Verse 58
अतो नीतिपथं श्रुत्वा नाथ स्थानादितो व्रज । न गमिष्यसि चेत्प्रातस्ततो मे संस्मरिष्यसि
इसलिए, हे नाथ! नीति-धर्म का मार्ग सुनकर इस स्थान से चले जाओ। यदि तुम प्रातःकाल नहीं जाओगे, तो बाद में मेरे वचन को (पश्चात्ताप से) स्मरण करोगे।
Verse 59
इत्युक्तोपि स वै पत्न्या पारावत्या सुमेधया । न निर्ययौ प्रतिस्थानाद्भवित्र्या प्रतिवारितः
अपनी बुद्धिमती पत्नी पारावती द्वारा ऐसा कहे जाने पर भी वह अपने निवास से नहीं निकला; मानो स्वयं भाग्य ने उसे रोक दिया हो।
Verse 60
अथोषसि समागत्य श्येनेन बलिना तदा । तन्निर्गमाध्वा संरुद्धः किंचिद्भक्ष्यवता मुने
तब उषाकाल में एक बलवान् श्येन (बाज) आ पहुँचा। हे मुने! उस थोड़े-से भक्ष्य वाले श्येन ने उसके निकलने का मार्ग रोक दिया।
Verse 61
दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा श्येनो महामतिः । पारावतमुवाचेदं धिक्त्वां पौरुषवर्जितम्
वहाँ कुछ दिन ठहरकर महाबुद्धिमान् श्येन ने पारावत से कहा— “धिक्कार है तुझ पर, तू पुरुषार्थ-हीन है!”
Verse 62
किंवा युध्यस्व दुर्बुद्धे किंवा निर्याहि मे गिरा । क्षुधाक्षीणो मृतः पश्चान्निरयं यास्यसि ध्रुवम्
“या तो युद्ध कर, अरे दुर्बुद्धि, अथवा मेरे कहने से बाहर निकल। भूख से क्षीण होकर यदि बाद में मरेगा तो निश्चय ही नरक को जाएगा।”
Verse 63
द्वौ भवंतावहं चैकश्चलौ जयपराजयौ । स्थानार्थं युध्यतः सत्त्वात्स्वर्गो वा दुर्गमेव वा
“तुम दोनों और मैं अकेला—जय-पराजय चंचल हैं। इस स्थान के लिए यदि हम सत्त्व से युद्ध करें, तो या स्वर्ग मिलेगा, या फिर दुर्गम (भयानक) अंत।”
Verse 64
पुरुपार्थं समालंब्य ये यतंते महाधियः । विधिरेव हि साहाय्यं कुर्यात्तत्सत्त्वचोदितः
जो महाधीजन पुरुषार्थ का आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, उनके उस सत्त्व से प्रेरित होकर विधाता स्वयं सहायता करता है।
Verse 65
इत्थं स श्येनसंप्रोक्तः पत्न्याप्युत्साहितः खगः । अयुध्यत्तेन श्येनेन स्वदुर्गद्वारमाश्रितः
श्येन के इस वचन से प्रेरित और पत्नी द्वारा भी उत्साहित होकर वह पक्षी अपने दुर्ग के द्वार का आश्रय लेकर उस श्येन से युद्ध करने लगा।
Verse 66
क्षुधितस्तृषितः सोथ श्येनेन बलिना धृतः । चरणेन दृढेनाशु चंच्वा सापि धृता खगी
भूख और प्यास से व्याकुल उस पक्षी को एक बलवान बाज ने पकड़ लिया। उसने अपने मजबूत पंजों और चोंच से उस मादा पक्षी को भी शीघ्रता से जकड़ लिया।
Verse 67
तावादायोड्डयांचक्रे श्येनो व्योमनि सत्वरम् । चिंतयद्भक्षणस्थानमन्यपक्षिविवर्जितम्
उन दोनों को लेकर वह बाज आकाश में तेजी से उड़ चला, और वह भोजन के लिए ऐसे स्थान का विचार कर रहा था जहाँ अन्य पक्षी न हों।
Verse 68
अथ पत्न्या कलरवः प्रोक्तस्तत्र सुमेधया । वचोवमानितं नाथ त्वया मे स्त्रीति बुद्धितः
तब वहाँ उस बुद्धिमती पत्नी ने कलरव (पति) से कहा: 'हे नाथ! आपने यह स्त्री है, ऐसा सोचकर मेरे वचनों का अपमान (तिरस्कार) किया।'
Verse 70
तदा हितं ते वक्ष्यामि कुरु चैवाविचारितम् । ममैकवाक्यकरणात्स्त्रीजितो न भविप्यसि
अब मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगी, उसे बिना विचार किए तुरंत करो। मेरे इस एक कथन का पालन करने से तुम 'स्त्रीजित' (स्त्री से हारा हुआ) नहीं कहलाओगे।
Verse 71
यावदास्यगतास्म्यस्य यावत्खस्थो न भूमिगः । तावदात्मविमुक्त्यैवमरेः पादं दृढं दश
जब तक मैं इसके मुख में हूँ और जब तक यह आकाश में है, भूमि पर नहीं उतरा, तब तक अपनी मुक्ति के लिए तुम शत्रु के पैर को जोर से काट लो।
Verse 72
इति पत्नीवचः श्रुत्वा तथा स कृतवान्खगः । सपीडितो दृढं पादे श्येनश्चीत्कृतवान्बहु
पत्नी के वचन सुनकर उस पक्षी ने वैसा ही किया। पाँव में तीव्र पीड़ा से व्याकुल वह श्येन बार-बार ऊँचे स्वर में चीत्कार करने लगा।
Verse 73
तेन चीत्करणेनाथ मुक्ता सा मुखसंपुटात् । पादांगुलि श्लथत्वेन सोपि पारावतोऽपतत्
उस चीत्कार के कारण वह उसके चोंच के बंद घेरे से छूट गई; और पाँव की उँगलियाँ ढीली पड़ते ही वह कबूतर भी नीचे गिर पड़ा।
Verse 74
विपद्यपि च न प्राज्ञैः संत्या ज्यः क्वचिदुद्यमः । क्व चंचुपुटस्तस्य क्व च तत्पादपीडनम्
विपत्ति में भी प्राज्ञ जन कभी प्रयास नहीं छोड़ते। भला चोंच का छोटा-सा घेरा कहाँ, और उस (श्येन) के पाँव का कुचलना कहाँ!
Verse 75
क्व च द्वयोस्तथाभूता दरेर्मोक्षणमद्भुतम् । दुर्बलेप्युद्यमवति फलं भाग्यं यतोऽर्पयेत्
और ऐसी दशा में उन दोनों का अद्भुत उद्धार कितना आश्चर्यजनक था! दुर्बल के लिए भी, जब प्रयास हो, तब भाग्य फल प्रदान करता है।
Verse 76
तस्माद्भाग्यानुसारेण फलत्येव सदोद्यमः । प्रशंसंत्युद्यमं चातो विपद्यपि मनीषिणः
इसलिए भाग्य के अनुसार निरंतर किया गया प्रयास अवश्य फलता है; इसी कारण मनीषी जन विपत्ति में भी उद्यम की प्रशंसा करते हैं।
Verse 77
अथ तौ कालयोगेन विपन्नौ सरयूतटे । मुक्तिपुर्यामयोध्यायामेको विद्याधरोऽभवत्
फिर काल के योग से वे दोनों सरयू-तट पर विपत्ति को प्राप्त हुए; और उनमें से एक मुक्तिदायिनी पुरी अयोध्या में विद्याधर होकर पुनर्जन्मा।
Verse 78
मृतानां यत्र जंतूनां काशीप्राप्तिर्भवेद्ध्रुवम् । मंदारदामतनयो नाम्ना परिमलालयः
जहाँ देहत्यागी जीवों के लिए काशी-प्राप्ति निश्चय ही होती है, वहाँ मंदारदाम का पुत्र ‘परिमलालय’ नाम से प्रसिद्ध था।
Verse 79
अनेकविद्यानिलयः कलाकौशलभाजनम् । कौमारं वय आसाद्य शिवभक्तिपरोभवत्
वह अनेक विद्याओं का आश्रय और कला-कौशल का पात्र था; युवावस्था को पाकर वह शिव-भक्ति में पूर्णतः तत्पर हो गया।
Verse 80
नियमं चातिजग्राह विजितेंद्रियमानसः । एकपत्नीव्रतं नित्यं चरिष्यामीति निश्चितम्
इन्द्रियों और मन को जीतकर उसने नियम-धर्म ग्रहण किए; और दृढ़ निश्चय किया—“मैं सदा एकपत्नी-व्रत का पालन करूँगा।”
Verse 81
परयोषित्समासक्तिरायुः कीर्ति बलं सुखम् । हरेत्स्वर्ग गतिं चापि तस्मात्तां वर्जयेत्सुधीः
पर-स्त्री में आसक्ति आयु, कीर्ति, बल और सुख को हर लेती है; और स्वर्ग-गति को भी नष्ट कर देती है—इसलिए बुद्धिमान उसे त्याग दे।
Verse 82
अपरं चापि नियमं स शुचिष्मान्समाददे । गतजन्मांतराभ्यासात्त्रिलोचनसमाश्रयात्
उस शुचि-चित्त पुरुष ने एक और नियम धारण किया—पूर्वजन्मों के अभ्यास से तथा त्रिलोचन (शिव) की शरण लेने के कारण।
Verse 83
समस्तपुण्यनिलयं समस्तार्थप्रकाशकम् । समस्तकामजनकं परानंदैककारणम्
वही (त्रिलोचन/शिव) समस्त पुण्य का धाम, समस्त अर्थों का प्रकाशक, समस्त धर्म्य कामनाओं का दाता और परम आनन्द का एकमात्र कारण है।
Verse 84
यावच्छरीरमरुजं यावन्नेंद्रियविप्लवः । तावत्त्रिलोचनं काश्यामनर्च्याश्नामि नाण्वपि
जब तक मेरा शरीर निरोग रहे और इन्द्रियाँ विचलित न हों, तब तक मैं काशी में त्रिलोचन का पूजन किए बिना एक कण भी अन्न नहीं खाऊँगा।
Verse 85
इत्थं मांदारदामिः स नित्यं परिमलालयः । काश्यां त्रिविष्टपं द्रष्टुं समागच्छेत्प्रयत्नवान्
इस प्रकार मांदारदामि का पुत्र परिमलालय नित्य प्रयत्नशील होकर काशी आता—वहाँ ‘त्रिविष्टप’ (स्वर्ग) का दर्शन करने की अभिलाषा से।
Verse 86
पारावत्यपि सा जाता रत्नदीपस्य मंदिरे । नागराजस्य पाताले नाम्ना रत्नावलीति च
और वह भी नागराज के पाताल में स्थित रत्नदीप के महल में पारावती रूप से उत्पन्न हुई, और उसका नाम रत्नावली था।
Verse 87
समस्तनागकन्यानां रूपशीलकलागुणैः । एकैव रत्नभूतासीद्रत्नदीपोरगात्मजा
समस्त नाग-कन्याओं में रूप, शील, कला और गुणों से एक ही अनुपम थी—रत्न-सी दीप्तिमती रत्नावली, जो रत्नदीप नाग की पुत्री थी।
Verse 88
तस्या सखीद्वयं चासीदेका नाम्ना प्रभावती । कलावती तथान्या च नित्यं तदनुगे उभे
उसकी दो सखियाँ थीं—एक का नाम प्रभावती और दूसरी का कलावती; वे दोनों सदा उसके पीछे-पीछे रहकर उसकी सेवा में लगी रहतीं।
Verse 89
स्वदेहादनपायिन्यौ छायाकांती यथा तया । ते द्वे सख्यावभूतांहि रत्नावल्या घटोद्भव
वे दोनों उसके शरीर से कभी अलग न होतीं—जैसे छाया और कांति; हे घटोद्भव! वे दोनों रत्नावली की परम सखियाँ बन गईं।
Verse 90
सा तु बाल्ये व्यतिक्रांते किंचिदुद्रिन्नयौवना । शिवभक्तं स्वपितरं दृष्ट्वा नियममग्रहीत्
जब उसका बाल्यकाल बीत गया और यौवन कुछ-कुछ खिलने लगा, तब अपने पिता को शिव-भक्त देखकर उसने नियमपूर्वक व्रत धारण किया।
Verse 91
पितस्त्रिलोचनं काश्यामर्चयित्वा दिनेदिने । आभ्यां सखीभ्यां सहिता मौनं त्यक्ष्यामि नान्यथा
उसने कहा—‘पिताजी! काशी में त्रिलोचन का प्रतिदिन पूजन करके, इन दोनों सखियों के साथ मैं मौन-व्रत का पालन करूँगी—इसके सिवा नहीं।’
Verse 92
एवं नागकुमारी सा सखीद्वयसमन्विता । त्रिलोचनं समभ्यर्च्य गृहानहरहोव्रजेत्
इस प्रकार वह नागकन्या अपनी दो सखियों सहित त्रिलोचन का विधिपूर्वक पूजन कर, प्रतिदिन घर लौट आती थी।
Verse 93
दिनेदिने सा प्रत्यग्रैः कुसुमैरिष्टगंधिभिः । सुविचित्राणि माल्यानि परिगुंफ्यार्चयेद्विभुम्
दिन-प्रतिदिन वह सुगंधित ताज़े पुष्पों से अत्यंत विचित्र मालाएँ गूँथकर प्रभु का भक्तिभाव से पूजन करती थी।
Verse 94
तिस्रोपि गीतं गायंति लसद्गांधारसुंदरम् । रासमंडलभेदेन लास्यं तिस्रोपि कुर्वते
तीनों चमकते गान्धार-स्वरों से सुन्दर गीत गातीं, और रास-मण्डल की विविध रचनाओं में तीनों ही लास्य-नृत्य करतीं।
Verse 95
वीणावेणुमृदंगांश्च लयतालविचक्षणाः । वादयंति मुदा युक्तास्तिस्रोपीश्वरसन्निधौ
लय-ताल में निपुण वे तीनों आनन्द से परिपूर्ण होकर, ईश्वर के सान्निध्य में वीणा, वेणु और मृदंग बजाती थीं।
Verse 96
यावदात्मनि वै क्षेमं तावत्क्षेमं जगत्त्रये । सोपि क्षेमः सुमतिना यशसा सह वांछ्यते
जितना कल्याण अपने भीतर है, उतना ही कल्याण त्रिलोकी में है; वही कल्याण सुमति के साथ और यश-कीर्ति सहित वांछित होता है।
Verse 97
एकदा माधवे मासि तृतीयायामुपोषिताः । रात्रौ जागरणं कृत्वा नृत्यगीतकथादिभिः
एक बार माधव मास में उन्होंने तृतीया तिथि को उपवास किया। रात भर जागरण करके नृत्य, गीत और पवित्र कथाओं से समय बिताया।
Verse 98
प्रातश्चतुर्थीं स्नात्वाथ तीर्थं पैलिपिले शुभे । त्रिलोचनं समर्च्याथ प्रसुप्ता रंगमंडपे
फिर चतुर्थी की प्रभात बेला में उन्होंने शुभ पैलिपिल तीर्थ में स्नान किया। त्रिलोचन भगवान का विधिवत् पूजन करके वे रंगमंडप में सो गईं।
Verse 99
सुप्तासु तासु बालासु त्रिनेत्रः शशिभूषणः । शुद्धकर्पूरगौरांगो जटामुकुटमंडलः
उन बालिकाओं के सो जाने पर शशिभूषण त्रिनेत्र प्रकट हुए। उनका अंग शुद्ध कर्पूर-सा गौर था और जटाओं का मुकुट-मंडल शोभित था।
Verse 100
तमालनीलसुग्रीवः स्फुरत्फणिविभूषणः । वामार्धविलसच्छक्तिर्नागयज्ञोपवीतवान्
उनका कंठ तमाल-सा नील था, और चमकते सर्प-आभूषणों से वे दीप्त थे। उनके वाम भाग में शक्ति विराजती थी, और सर्प ही उनका यज्ञोपवीत था।
Verse 110
जय श्मशाननिलय जय वाराणसीप्रिय । जयानंदवनाध्यासि प्राणिनिर्वाणदायक
जय हो श्मशान-निलय! जय हो वाराणसी-प्रिय! जय हो आनंदवन-निवासी, हे प्राणियों को निर्वाण देने वाले!
Verse 120
जन्मांतरेपि मे सेवा भवतीभिश्च तेन च । विहिता तेन वो जन्म निर्मलं भक्तिभावितम्
अन्य जन्म में भी तुमने मेरी सेवा की थी; उसी के फल से तुम्हारा यह जन्म निर्मल और भक्ति-भाव से परिपूर्ण ठहराया गया है।
Verse 130
उपरिष्टादधस्ताच्च कृता बह्व्यः प्रदक्षिणाः । व्योम्ना संचरमाणाभ्यां संचरद्भ्यां ममाजिरे
ऊपर से और नीचे से अनेक प्रदक्षिणाएँ की गईं; वे आकाश में विचरते हुए मेरे आँगन में निरंतर परिक्रमा करते रहे।
Verse 140
अप्राप्तयौवनः सोथ समिदाहरणाय वै । गतो विधिवशाद्दष्टो दंदशूकेन कानने
फिर वह, अभी यौवन को न पहुँचा था, समिधा लाने गया; पर विधि के वश से वन में उसे सर्प ने डस लिया।
Verse 150
जातिस्वभावचापल्यात्क्रीडंत्यौ च प्रदक्षिणम् । चक्रतुर्बहुकृत्वश्च लिंगं ददृशतुर्बहु
अपनी जाति के स्वभावजन्य चंचल खेल के कारण वे दोनों बार-बार प्रदक्षिणा करते रहे और बार-बार लिंग के दर्शन करते रहे।
Verse 160
एकदा माधवे मासि महायात्रा समागता । विद्याधरास्तथा नागा मिलिताः सपरिच्छदाः
एक बार माधव मास में महायात्रा का अवसर आया; तब विद्याधर और नाग अपने-अपने परिजन-परिकर सहित एकत्र हुए।
Verse 169
त्रिलोचनकथामेतां श्रुत्वा पापान्वितोप्यहो । विपाप्मा जायते मर्त्यो लभते च परां गतिम्
त्रिलोचन की इस पावन कथा को सुनकर पापों से युक्त मनुष्य भी तत्क्षण पापरहित हो जाता है और परम गति को प्राप्त करता है।