Adhyaya 7
Brahma KhandaBrahmottara KhandaAdhyaya 7

Adhyaya 7

इस अध्याय में प्रदोष-काल में शिव-पूजा की विधि का तकनीकी और क्रमबद्ध विधान आता है। ब्राह्मणी के प्रश्न पर शाण्डिल्य ऋषि बताते हैं और सूत इसे परम्परा से सुनाते हैं। शुक्ल/कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को उपवास, सूर्यास्त से पहले स्नान, शुद्धि, संयम और वाणी-निग्रह जैसे पूर्वाचार बताए गए हैं। फिर पूजा-स्थान की शुद्धि, मण्डल-रचना, सामग्री-विन्यास, पीठ-आवाहन, आत्म-शुद्धि व भूत-शुद्धि, प्राणायाम, मातृका-न्यास और देवता-भावना का क्रम दिया गया है। इसके बाद चन्द्रशेखर रूप में भगवान शिव का तथा देवी पार्वती का ध्यान-वर्णन आता है। दिशानुसार आवरण-पूजा में शक्तियों, देवताओं, सिद्धियों और रक्षक-गणों का विन्यास बताया गया है। पंचामृत व तीर्थोदक से अभिषेक, रुद्रसूक्त-पाठ, बिल्वादि पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य, होम और अंत में ऋण, पाप, दरिद्रता, रोग व भय-निवारण की प्रार्थनाएँ निर्दिष्ट हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि शिव-पूजा से भारी दोष भी नष्ट होते हैं; साथ ही शिव-द्रव्य के अपहरण की गंभीरता बताकर, विधि का पालन करने वालों की सफलता—धन-निधि की प्राप्ति और अन्य वरदान—का वर्णन किया गया है, जिससे यह अनुष्ठान धर्म और मोक्ष—दोनों का साधन ठहरता है।

Shlokas

Verse 1

सूत उवाच । इत्युक्ता मुनिना साध्वी सा विप्रवनिता पुनः । तं प्रणम्याथ पप्रच्छ शिवपूजाविधेः क्रमम्

सूत बोले—मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह साध्वी ब्राह्मण-स्त्री फिर से उन्हें प्रणाम करके शिव-पूजा की विधि का क्रम पूछने लगी।

Verse 2

शांडिल्य उवाच । पक्षद्वये त्रयोदश्यां निराहारो भवेद्यदा । घटीत्रयादस्तमयात्पूर्वं स्नानं समाचरेत्

शाण्डिल्य बोले—दोनों पक्षों की त्रयोदशी को जब निराहार व्रत किया जाए, तब सूर्यास्त से तीन घटी पूर्व स्नान अवश्य करना चाहिए।

Verse 3

शुक्लांबरधरो धीरो वाग्यतो नियमान्वितः । कृतसंध्याजपविधिः शिवपूजां समारभेत्

श्वेत वस्त्र धारण कर, धीर और वाणी-संयमी, नियमों से युक्त होकर, संध्या-वंदन तथा जप-विधि पूर्ण कर शिव-पूजन आरम्भ करे।

Verse 4

देवस्य पुरतः सम्यगुपलिप्य नवांभसा । विधाय मंडलं रम्यं धौतवस्त्रादिभिर्बुधः

देव के सम्मुख स्थान को नवीन जल से भलीभाँति लीपकर-शुद्ध कर, बुद्धिमान भक्त धुले वस्त्र आदि शुद्ध द्रव्यों से रमणीय मण्डल बनाए।

Verse 5

वितानाद्यैरलंकृत्य फलपुष्पनवांकुरैः । विचित्रपद्ममुद्धृत्य वर्णपंचकसंयुतम्

वितान आदि से अलंकृत कर, फल-फूल और नवीन अंकुरों से सजाकर, पाँच रंगों से युक्त विचित्र कमल-आकृति को उभारकर स्थापित करे।

Verse 6

तत्रोपविश्य सुशुभे भक्तियुक्तः स्थिरासने । सम्यक्संपादिताशेष पूजोपकरणः शुचिः

वहाँ सुशोभित स्थिर आसन पर भक्ति सहित बैठकर, शुद्ध होकर, पूजन की समस्त सामग्री को भलीभाँति व्यवस्थित कर तत्पर रहे।

Verse 7

आगमोक्तेन मंत्रेण पीठमामंत्रयेत्सुधीः । ततः कृत्वात्मशुद्धिं च भूतशुद्ध्यादिकं क्रमात्

आगमों में कथित मंत्र से बुद्धिमान साधक पीठ का आवाहन करे; तत्पश्चात क्रम से आत्मशुद्धि तथा भूतशुद्धि आदि विधियाँ संपन्न करे।

Verse 8

प्राणायामत्रयं कृत्वा बीजवर्णैः सबिंदुकैः । मातृका न्यस्य विधिवद्ध्यात्वा तां देवतां पराम्

त्रिविध प्राणायाम करके, बिंदुयुक्त बीजाक्षरों का प्रयोग करते हुए, विधिपूर्वक मातृका-न्यास करे; तत्पश्चात उस परम देवता का ध्यान करे।

Verse 9

समाप्य मातृका भूयो ध्यात्वा चैव परं शिवम् । वामभागे गुरुं नत्वा दक्षिणे गणपं नमेत्

मातृका-न्यास पूर्ण करके, फिर से परम शिव का ध्यान करे। तत्पश्चात बाईं ओर गुरु को प्रणाम करके, दाईं ओर गणपति को नमस्कार करे।

Verse 10

अंसोरुयुग्मे धर्मादीन्न्यस्य नाभौ च पार्श्वयोः । अधर्मादीननंतादीन्हृदि पीठे मनुं न्यसेत्

कंधों और जंघाओं के युग्म पर धर्म आदि का न्यास करे; तथा नाभि और दोनों पार्श्वों पर अधर्म आदि और अनन्त आदि का; फिर हृदय-पीठ में मंत्र (मनु) का न्यास करे।

Verse 11

आधारशक्तिमारभ्य ज्ञानात्मानमनुक्रमात् । उक्तक्रमेण विन्यस्य हृत्पद्मे साधुभाविते

आधार-शक्ति से आरम्भ करके, क्रमशः ज्ञान-तत्त्व तक, उक्त क्रम के अनुसार विन्यास करे—उस साधना से सुविकसित हृदय-कमल में।

Verse 12

नवशक्तिमये रम्ये ध्यायेद्देवमुमापतिम् । चन्द्रकोटिप्रतीकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम्

नव-शक्ति से युक्त उस रमणीय (अन्तर) लोक में, उमापति देव का ध्यान करे—करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रकाशमान, त्रिनेत्र, चन्द्रशेखर।

Verse 13

आपिंगलजटाजूटं रत्नमौलिविराजितम् । नीलग्रीवमुदारांगं नागहारोपशोभितम्

उस परमेश्वर का ध्यान करो जिनकी आपिंगल जटाएँ जूट में बँधी हैं, जिनका रत्नजटित मौलि दमकता है; जिनका कण्ठ नील है, जिनका अंग उदात्त है, और जो नागहार से सुशोभित हैं।

Verse 14

वरदाभयहस्तं च धारिणं च परश्वधम् । दधानं नागवलयकेयूरांगदमुद्रिकम्

उनका ध्यान करो जिनके हाथ वर देने वाले और अभय देने वाले हैं, और जो परशु धारण करते हैं; जो नागवलय, केयूर, अंगद और मुद्रिकाएँ धारण किए हुए हैं।

Verse 15

व्याघ्रचर्मपरीधानं रत्नसिंहासने स्थितम् । ध्यात्वा तद्वाम भागे च चिंतयेद्गिरिकन्यकाम्

व्याघ्रचर्म धारण किए, रत्नसिंहासन पर स्थित उन प्रभु का ध्यान करके, फिर उनके वामभाग में गिरिकन्या पार्वती का चिंतन करे।

Verse 16

भास्वज्जपाप्रसूनाभामुदयार्कसमप्रभाम् । विद्युत्पुंजनिभां तन्वीं मनोनयननंदिनीम्

जपा-पुष्प के समान दीप्त, उदय होते सूर्य के तुल्य प्रभामयी, विद्युत्-पुंज जैसी कान्ति वाली, तन्वी, मन और नेत्रों को आनंद देने वाली देवी का ध्यान करे।

Verse 17

बालेंदु शेखरां स्निग्धां नीलकुंचितकुन्तलाम् । भृंगसंघातरुचिरां नीलालकविराजिताम्

बालचन्द्र को शेखर रूप में धारण करने वाली, स्निग्ध, नील व कुंचित केशों वाली; भृंग-समूह-सी रमणीय, नील अलकों से विराजित देवी का चिंतन करो।

Verse 18

मणिकुंडलविद्योतन्मुखमंडलविभ्रमाम् । नवकुम्कुमपंकांक कपोलदलदर्पणाम्

रत्नजटित कुंडलों की प्रभा से उसका मुखमंडल दमक रहा था; उसके कपोल दर्पण-से पंखुड़ियों के समान थे, जिन पर नव कुंकुम का अरुण लेप अंकित था।

Verse 19

मधुरस्मितविभ्राजदरुणाधरपल्लवाम् । कंबुकंठीं शिवामुद्यत्कुचपंकजकुड्मलाम्

उसकी मधुर मुस्कान से उसके अरुण अधर कोमल पल्लव-से दमक उठे; कंबु-सी कंठवाली वह शुभा शिवा, उन्नत स्तनों को कली बने कमल-सा धारण करती थी।

Verse 20

पाशांकुशाभयाभीष्टविल सत्सु चतुर्भुजाम् । अनेकरत्नविलसत्कंकणांकितमुद्रिकाम्

वह चतुर्भुजा थी—हाथों में पाश, अंकुश, अभय-मुद्रा और अभीष्ट-वरद संकेत शोभित थे; और उसके करों में अनेक रत्नों से दमकते कंगन तथा मुद्रिकाएँ सजी थीं।

Verse 21

वलित्रयेण विलसद्धेमकांचीगुणान्विताम् । रक्तमाल्यांबरधरां दिव्यचंदनच र्चिताम्

त्रिवली की शोभा और दमकती स्वर्ण-कांची से युक्त वह देवी रक्तमाल्य और रक्तवस्त्र धारण किए थी, तथा दिव्य चंदन से चर्चित थी।

Verse 22

सर्वसंगीतविद्यासु न मत्तोऽन्यास्ति काचन । मम योगेन तुष्यंति सर्वा अपि सुरस्त्रियः

संगीत-विद्याओं में मेरे समान कोई अन्य नहीं; मेरे योग-प्रभाव से समस्त देवपत्नीगण भी संतुष्ट और प्रसन्न हो उठती हैं।

Verse 23

एवं ध्यात्वा महादेवं देवीं च गिरि कन्यकाम् । न्यासक्रमेण संपूज्य देवं गंधादिभिः क्रमात्

इस प्रकार महादेव और गिरिराजकन्या देवी का ध्यान करके, न्यास-क्रम से विधिपूर्वक पूजन करे और फिर चन्दन आदि उपचार क्रमशः अर्पित कर देव का अर्चन करे।

Verse 24

पंचभिर्ब्रह्मभिः कुर्यात्प्रोक्तस्थानेषु वा हृदि । पृथक्पुष्पांजलिं देहे मूलेन च हदि त्रिधा

पाँच ब्रह्म-मंत्रों से बताए हुए स्थानों में—या हृदय में—विधि करे। शरीर में अलग-अलग पुष्पांजलि अर्पित करे, और मूल-मंत्र से हृदय में तीन बार अर्पण करे।

Verse 25

पुनः स्वयं शिवो भूत्वा मूलमंत्रेण साधकः । ततः संपूजयेद्देवं बाह्यपीठे पुनः क्रमात्

फिर साधक मूल-मंत्र से स्वयं शिवरूप होकर, उसके बाद बाह्य पीठ (वेदी) पर क्रम से देव का पुनः पूजन करे।

Verse 26

संकल्पं प्रवदेत्तत्र पूजारंभे समाहितः । कृतांजलिपुटो भूत्वा चिंतयेद्धृदि शंकरम्

पूजा के आरम्भ में एकाग्र होकर वहाँ संकल्प बोले। फिर अंजलि बाँधकर हृदय में शंकर का चिंतन करे।

Verse 27

ऋणपातकदौर्भाग्यदारिद्र्यविनिवृत्तये । अशेषाघविनाशाय प्रसीद मम शंकर

ऋण, पाप, दुर्भाग्य और दरिद्रता की निवृत्ति के लिए, तथा समस्त अघ का नाश करने हेतु, हे शंकर! मुझ पर प्रसन्न होइए।

Verse 28

दुःखशोकाग्निसंतप्तं संसारभयपीडितम् । बहुरोगाकुलं दीनं त्राहि मां वृषवाहन

दुःख और शोक की अग्नि से दग्ध, संसार-भय से पीड़ित, अनेक रोगों से व्याकुल और दीन मुझको—हे वृषवाहन (शिव), मेरी रक्षा करो।

Verse 29

आगच्छ देवदेवेश महादेवाभयंकर । गृहाण सह पार्वत्या तव पूजां मया कृताम्

आइए, हे देवों के देवेश! हे अभय प्रदान करने वाले महादेव! पार्वती सहित मेरे द्वारा की गई आपकी पूजा स्वीकार कीजिए।

Verse 30

इति संकल्प्य विधिवद्ब्राह्मपूजां समाचरेत् । गुरुं गणपतिं चैव यजेत्सव्यापसव्ययोः

इस प्रकार संकल्प करके विधिपूर्वक ब्राह्म-पूजा करे। फिर क्रम से शुभ (दक्षिण) और अपशुभ/वाम (विपरीत) पक्षों में गुरु और गणपति का भी पूजन करे।

Verse 31

क्षेत्रेशमीशकोणे तु यजेद्वास्तोष्पतिं क्रमात् । वाग्देवीं च यजेत्तत्र ततः कात्यायनीं यजेत्

ईशान कोण में क्षेत्रेश का पूजन करे; फिर क्रम से वास्तु-स्वामी का पूजन करे। वहीं वाग्देवी का भी पूजन करे, तत्पश्चात् कात्यायनी का पूजन करे।

Verse 32

धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं च नमोंऽतकैः । स्वरैरीशादिकोणेषु पीठपादाननुक्रमात् । आभ्यां बिंदुविसर्गाभ्यामधर्मादीन्प्रपूजयेत्

‘नमो’ के अन्त्याक्षरों तथा स्वरों के द्वारा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य का पूजन करे—पीठ और उसके पादों के क्रम के अनुसार ईशान आदि कोणों में स्थापित करके। बिन्दु और विसर्ग—इन दो चिह्नों से अधर्म आदि (विपरीत तत्त्वों) का भी विधिवत् पूजन करे।

Verse 33

सत्त्वरूपैश्चतुर्दिक्षु मध्येऽनंतं सतारकम् । सत्त्वादींस्त्रिगुणांस्तं तु रूपान्पीठेषु विन्यसेत्

चारों दिशाओं में सत्त्व-रूपों की स्थापना करे और मध्य में तारक सहित अनन्त को रखे। फिर सत्त्व आदि त्रिगुणात्मक रूपों को पीठों पर विन्यस्त करे।

Verse 34

अत ऊर्ध्वच्छदे मायां सह लक्ष्म्या शिवेन च

इसके ऊपर, ऊपरी आवरण पर, लक्ष्मी और शिव सहित माया की स्थापना करे।

Verse 35

तदंते चांबुजं भूयः सकलं मंडलत्रयम् । पत्रकेसरकिंजल्कव्याप्तं ताराक्षरैः क्रमात्

उसके अंत में फिर एक कमल बनाए, जिसमें तीनों मण्डलों का पूर्ण समावेश हो। उसके दल, केसर और पराग क्रमशः तारक-अक्षरों से व्याप्त हों।

Verse 36

पद्मत्रयं तथाभ्यर्च्य मध्ये मंडलमादरात् । वामां ज्येष्ठां च रौद्रीं च भागाद्यैर्दिक्षु पूजयेत्

इस प्रकार तीनों कमलों की पूजा करके, मध्य के मण्डल की आदरपूर्वक आराधना करे। दिशाओं में ‘भाग’ आदि विभाग-चिह्नों से वामा, ज्येष्ठा और रौद्री की पूजा करे।

Verse 37

वामाद्या नव शक्तीश्च नवस्वरयुता यजेत् । हृदि बीजत्रयाद्येन पीठमंत्रेण चार्चयेत्

वामा से आरम्भ करके, नौ स्वरों से युक्त नौ शक्तियों की विधिपूर्वक पूजा करे। हृदय-स्थान में तीन बीजों से आरम्भ होने वाले पीठ-मन्त्र से भी अर्चना करे।

Verse 38

आवृत्तैः प्रथमांगैश्च पंचभिर्मूर्त्तिशक्तिभिः । त्रिशक्तिमूर्त्तिभिश्चान्यैर्निधिद्वयसमन्वितैः

सदाशिव की उपासना प्रथम आवरणों में स्थित पाँच मूर्तिशक्तियों से तथा तीन शक्तियों से युक्त अन्य मूर्तिशक्तियों और निधान-द्वय सहित आवृत रूप में करनी चाहिए।

Verse 39

अनंताद्यैः परीताश्च मातृभिश्च वृषादिभिः । सिद्धिभिश्चाणिमाद्याभिरिंद्राद्यैश्च सहायुधैः

उन्हें अनन्त आदि, मातृगण, वृष आदि, अणिमा आदि सिद्धियाँ तथा इन्द्र आदि देवगण अपने-अपने आयुधों सहित—इनसे घिरा हुआ ध्यान में रखना चाहिए।

Verse 40

वृषभक्षेत्रचंडेशदुर्गाश्च स्कंदनंदिनौ । गणेशः सैन्यपश्चैव स्वस्वलक्षणलक्षिताः

वृषभ, क्षेत्रपाल, चण्डेश और दुर्गा; स्कन्द और नन्दी; गणेश तथा सेनापति—इन सबको अपने-अपने चिह्नों और लक्षणों से युक्त करके स्थापित कर पूजना चाहिए।

Verse 41

अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा । ईशित्वं च वशित्वं च प्राप्तिः प्राकाम्यमेव च

अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा; ईशित्व, वशित्व; प्राप्ति और प्राकाम्य—इन सिद्धियों का ध्यान करना चाहिए।

Verse 42

अष्टैश्वर्याणि चोक्तानि तेजोरूपाणि केवलम् । पंचभिर्ब्रह्मभिः पूर्वं हृल्लेखाद्यादिभिः क्रमात

इस प्रकार आठ ऐश्वर्य कहे गए—वे केवल तेजोमय रूप हैं। उनसे पूर्व क्रमशः हृल्लेख आदि पाँच ब्रह्मा स्थित हैं।

Verse 43

अंगैरुमाद्यैरिंद्राद्यैः पूजोक्ता मुनिभिस्तु तैः । उमाचंडेश्वरादींश्च पूजयेदुत्तरादितः

उमा आदि दिव्य अंगों तथा इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा जो पूजा मुनियों ने बताई है, उसी के अनुसार आगे क्रम से उमा, चण्डेश्वर आदि का पूजन करे।

Verse 44

एवमावरणैर्युक्तं तेजोरूपं सदाशिवम् । उमया सहितं देवमुपचारैः प्रपूजयेत्

इस प्रकार आवरणों की व्यवस्था करके, तेजोमय स्वरूप वाले सदाशिव को उमा सहित, समस्त उपचारों द्वारा विधिपूर्वक पूजे।

Verse 45

सुप्रतिष्ठितशंखस्य तीर्थैः पंचामृतैरपि । अभिषिच्य महादेवं रुद्रसूक्तैः समाहितः

सुप्रतिष्ठित शंख के द्वारा तीर्थजल और पंचामृत से महादेव का अभिषेक करे, और रुद्रसूक्तों का पाठ करते हुए एकाग्रचित्त रहे।

Verse 46

कल्पयेद्विविधैर्मंत्रैरासनाद्युपचारकान् । आसनं कल्पयेद्धैमं दिव्यवस्त्रसमन्वितम्

विविध मंत्रों से आसन आदि उपचारों की विधिवत् कल्पना करे। दिव्य वस्त्र से युक्त स्वर्णमय आसन की व्यवस्था करे।

Verse 47

अर्घ्यमष्टगुणोपेतं पाद्यशुद्धोदकेन च । तेनैवाचमनं दद्यान्मधुपर्कं मधूत्तरम्

आठ गुणों से युक्त अर्घ्य अर्पित करे और शुद्ध जल से पाद्य दे। उसी जल से आचमन कराए, फिर मधु से उत्कृष्ट मधुपर्क अर्पित करे।

Verse 48

पुनराचमनं दत्त्वा स्नानं मंत्रै प्रकल्पयेत् । उपवीतं तथा वासो भूषणानि निवेदयेत् । गंधमष्टांगसंयुक्तं सुपूतं विनिवेदयेत्

फिर से आचमन कराकर मंत्रों सहित स्नान की विधि कराए। तत्पश्चात यज्ञोपवीत, वस्त्र और भूषण अर्पित करे तथा अष्टांग-संयुक्त, भली-भाँति शुद्ध सुगंधि समर्पित करे।

Verse 49

ततश्च बिल्वमंदारकह्लारसरसीरुहम् । धत्तूरकं कर्णिकारं शणपुष्पं च मल्लिकाम्

इसके बाद बिल्वपत्र, मंदार-पुष्प, काह्लार तथा सरोवर के कमल, और धत्तूरा, कर्णिकार, शण-पुष्प तथा मल्लिका (चमेली) अर्पित करे।

Verse 50

कुशापामार्गतुलसीमाधवीचंपकादिकम् । बृहतीकरवीराणि यथालब्धानि साधकः

साधक को उपलब्धतानुसार कुश, अपामार्ग, तुलसी, माधवी, चंपक आदि तथा बृहती और करवीर—जो भी प्राप्त हो—अर्पित करना चाहिए।

Verse 51

निवेदयेत्सुगंधीनि माल्यानि विविधानि च । धूपं कालागरूत्पन्नं दीपं च विमलं शुभम्

विविध प्रकार की सुगंधित मालाएँ अर्पित करे; काला-अगरु से निर्मित धूप तथा निर्मल, शुभ दीपक भी समर्पित करे।

Verse 52

विशेषकम् । अथ पायसनैवेद्यं सघृतं सोपदंशकम् । मोदकापूपसंयुक्तं शर्करागुडसंयुतम्

विशेष अर्पण के रूप में पायस का नैवेद्य दे; घृत सहित तथा उपदंश (सह-व्यंजन) के साथ, मोदक और आपूप भी अर्पित करे, जो शर्करा और गुड़ से युक्त हों।

Verse 53

मधुनाक्तं दधियुतं जलपानसमन्वितम् । तेनैव हविषा वह्नौ जुहुयान्मंत्रभाविते

शहद से लिप्त, दही से मिश्रित और जल-पान सहित उसी हवि से, मंत्र-संस्कारित अग्नि में आहुति दे।

Verse 54

आगमोक्तेन विधिना गुरुवाक्यनियंत्रितः । नैवेद्यं शंभवे भूयो दत्त्वा तांबूलमुत्तमम्

आगमों में बताए विधि के अनुसार, गुरु-वचन से नियंत्रित होकर, शंभु को फिर नैवेद्य अर्पित करे और उत्तम तांबूल निवेदित करे।

Verse 55

धूपं नीराजनं रम्यं छत्रं दर्पणमुत्तमम् । समर्पयित्वा विधिवन्मंत्रैर्वेदिकतांत्रिकैः

धूप, रम्य नीराजन, छत्र और उत्तम दर्पण विधिपूर्वक अर्पित करके, वैदिक और तांत्रिक मंत्रों से कर्म को यथाविधि करे।

Verse 56

यद्यशक्तः स्वयं निःस्वो यथाविभवमर्चयेत् । भक्त्त्या दत्तेन गौरीशः पुष्पमात्रेण तुष्यति

यदि स्वयं असमर्थ और निर्धन हो, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजन करे। भक्ति से दिया हुआ—एक पुष्प मात्र भी—गौरीश को तृप्त करता है।

Verse 57

अथांगभूतान्सकलान्गणेशादीन्प्रपूजयेत् । स्तवैर्नानाविधैः स्तुत्वा साष्टांगं प्रणमेद्बुधः

तदनंतर गणेश आदि समस्त अंगभूत देवताओं का यथाविधि पूजन करे। नाना प्रकार के स्तवों से स्तुति करके, बुद्धिमान भक्त साष्टांग प्रणाम करे।

Verse 58

ततः प्रदक्षिणीकृत्य वृषचंडेश्वरादिकान् । पूजां समर्प्य विधिवत्प्रार्थयेद्गिरिजापतिम्

तत्पश्चात वृष, चण्डेश्वर आदि शिव-परिचरों की प्रदक्षिणा करके, विधिपूर्वक पूजा अर्पित कर, गिरिजापति शंकर से भक्तिभाव से प्रार्थना करे।

Verse 59

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत । जय सर्व सुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित

जय हो, हे देव! हे जगन्नाथ! जय हो, हे शाश्वत शंकर! जय हो, हे समस्त देवों के अधिपति! जय हो, हे सर्व देवताओं से पूजित!

Verse 60

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्य निराधार जय विश्वंभराव्यय

जय हो, हे समस्त गुणों से परे! जय हो, हे सब वर देने वाले! जय हो, हे नित्य, निराधार! जय हो, हे विश्व के धारणकर्ता, अव्यय!

Verse 61

जय विश्वैकवेद्येश जय नागेंद्रभूषण । जय गौरीपते शंभो जय चंद्रार्धशेखर

जय हो, हे विश्व के एकमात्र ज्ञेय ईश्वर! जय हो, हे नागराज से भूषित! जय हो, हे गौरीपते शम्भु! जय हो, हे अर्धचन्द्रधारी शेखर!

Verse 62

जय कोट्यर्कसंकाश जयानंतगुणाश्रय

जय हो, हे कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी! जय हो, हे अनन्त गुणों के आश्रय!

Verse 63

जय रुद्र विरूपाक्ष जयाचिंत्य निरंजन । जय नाथ कृपासिंधो जय भक्तार्तिभञ्जन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो

जय हो रुद्र विरूपाक्ष! जय हो अचिन्त्य निरंजन! जय हो नाथ, करुणा-सागर! जय हो भक्तों के दुःख-हर्ता! जय हो प्रभो, जो दुस्तर संसार-सागर से पार उतारते हो!

Verse 64

प्रसीद मे महादेव संसारार्त्तस्य खिद्यतः । सर्वपापभयं हृत्वा रक्ष मां परमेश्वर

हे महादेव, मुझ पर प्रसन्न होइए; मैं संसार-पीड़ा से व्याकुल और शोक से क्लान्त हूँ। समस्त पापों से उत्पन्न भय को हरकर, हे परमेश्वर, मेरी रक्षा कीजिए।

Verse 65

महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च । महाशोकविनष्टस्य महारोगातुरस्य च

जो महान दरिद्रता में डूबा हो, जो घोर पाप से आहत हो; जो प्रचण्ड शोक से नष्ट हो, और जो भयंकर रोग से पीड़ित हो—(उस पर भी) कृपा कीजिए।

Verse 66

ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः । ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर

हे शंकर, मुझ पर प्रसन्न होइए—मैं ऋण-भार से घिरा हूँ, कर्मों के फल से दग्ध हो रहा हूँ, और प्रतिकूल ग्रहों से अत्यन्त पीड़ित हूँ।

Verse 67

दरिद्रः प्रार्थयेदेवं पूजांते गिरिजापतिम् । अर्थाढ्यो वापि राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम्

इस प्रकार पूजा के अन्त में दरिद्र जन गिरिजापति से ऐसी प्रार्थना करे; और धनवान हो या राजा—सबको भी देव-ईश्वर, परम शासक से प्रार्थना करनी चाहिए।

Verse 68

दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः । ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शंकर

हे शंकर! आपकी कृपा से मुझे दीर्घायु, निरोगता, धन-समृद्धि और बल-उन्नति प्राप्त हो; तथा मेरे भीतर सदा नित्य आनन्द बना रहे।

Verse 69

शत्रवः संक्षयं यांतु प्रसीदन्तु मम ग्रहाः । नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः संतु निरापदः

मेरे शत्रु नष्ट हों, मेरे ग्रह अनुकूल हों; राज्य में डाकू-लुटेरे विनष्ट हों, और प्रजा सर्वदा निरापद रहे।

Verse 70

दुर्भिक्षमारीसंतापाः शमं यांतु महीतले । सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः

पृथ्वी पर दुर्भिक्ष, महामारी और संताप शांत हों; सब प्रकार के अन्न की समृद्धि हो, और सभी दिशाएँ कल्याणमयी हों।

Verse 71

एवमाराधयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्दक्षिणाभिश्च तोषयेत्

इस प्रकार प्रदोषकाल में गिरिजापति भगवान् का विधिपूर्वक पूजन करे; फिर ब्राह्मणों को भोजन कराए और दक्षिणा देकर उन्हें संतुष्ट करे।

Verse 72

सर्वपापक्षयकरी सर्वदारिद्र्यनाशिनी । शिवपूजा मया ख्याता सर्वाभीष्टवरप्रदा

मेरे द्वारा कही गई यह शिव-पूजा समस्त पापों का क्षय करने वाली, सब प्रकार के दारिद्र्य का नाश करने वाली और सभी अभीष्ट वर देने वाली है।

Verse 73

महापातकसंघातमधिकं चोपपातकम् । शिवद्रव्यापहरणादन्यत्सर्वं निवारयेत्

महापातकों का ढेर और उससे भी अधिक उपपातक—सबका निवारण हो सकता है; परंतु शिव के द्रव्य का अपहरण छोड़कर ही सब टलते हैं।

Verse 74

ब्रह्महत्यादिपापानां पुराणेषु स्मृतिष्वपि । प्रायश्चित्तानि दृष्टानि न शिवद्रव्यहारिणाम्

ब्रह्महत्या आदि पापों के लिए पुराणों और स्मृतियों में प्रायश्चित्त बताए गए हैं; पर शिव के द्रव्य का हरण करने वालों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं मिलता।

Verse 75

बहुनात्र किमुक्तेन श्लोकार्धेन ब्रवीम्यहम् । ब्रह्महत्याशतं वापि शिवपूजा विनाशयेत्

बहुत कहने से क्या लाभ? मैं आधे श्लोक में कहता हूँ—शिव-पूजा ब्रह्महत्या के सौ पापों को भी नष्ट कर देती है।

Verse 76

मया कथितमेतत्ते प्रदोषे शिवपूजनम् । रहस्यं सर्वजंतूनामत्र नास्त्येव संशयः

मैंने तुम्हें यह कहा है—प्रदोष काल में शिव-पूजन; यह समस्त प्राणियों के लिए परम रहस्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं।

Verse 77

एताभ्यामपि बालाभ्यामेवं पूजा विधीयताम् । अतः संवत्सरादेव परां सिद्धिमवाप्स्यथ

इन दोनों बालकों से भी इसी विधि से यह पूजा कराई जाए; इससे तुम एक वर्ष के भीतर ही परम सिद्धि प्राप्त करोगे।

Verse 78

इति शांडिल्यवचनमाकर्ण्य द्विजभामिनी । ताभ्यां तु सह बालाभ्यां प्रणनाम मुनेः पदम्

शाण्डिल्य मुनि के वचन सुनकर वह ब्राह्मणी, उन दोनों बालकों सहित, श्रद्धापूर्वक मुनि के चरणों में प्रणाम करने लगी।

Verse 79

विप्रस्त्र्युवाच । अहमद्य कृतार्थास्मि तव दर्शनमात्रतः । एतौ कुमारौ भगवंस्त्वामेव शरणं गतौ

ब्राह्मणी बोली—“आज केवल आपके दर्शन से ही मैं कृतार्थ हो गई हूँ। हे भगवन्, ये दोनों कुमार केवल आपकी ही शरण में आए हैं।”

Verse 80

एष मे तनयो ब्रह्मञ्छुचिव्रत इतीरितः । एष राजसुतो नाम्ना धर्मगुप्तः कृतो मया

“हे ब्रह्मन्, यह मेरा पुत्र है, जो ‘शुचिव्रत’ नाम से प्रसिद्ध है। और यह राजपुत्र है, जिसे मैंने ‘धर्मगुप्त’ नाम दिया है।”

Verse 81

एतावहं च भगवन्भवच्चरणकिंकराः । समुद्धरास्मिन्पतितान्घोरे दारिद्र्यसागरे

“हे भगवन्, ये दोनों और मैं आपके चरणों के दास हैं। इस भयानक दरिद्रता-सागर में गिरे हुए हम लोगों का उद्धार कीजिए।”

Verse 82

इति प्रपन्नां शरणं द्विजांगनामाश्वास्य वाक्यैरमृतोपमानैः । उपादिदेशाथ तयोः कुमारयोर्मुनिः शिवाराधनमंत्र विद्याम्

इस प्रकार शरणागत ब्राह्मणी को अमृत-तुल्य वचनों से आश्वस्त करके, मुनि ने उन दोनों कुमारों को शिव-आराधना की मंत्र-विद्या का उपदेश दिया।

Verse 83

अथोपदिष्टौ मुनिना कुमारौ ब्राह्मणी च सा । तं प्रणम्य समामंत्र्य जग्मुस्ते शिवमंदिरात्

तब मुनि ने उन दोनों कुमारों और उस ब्राह्मणी को उपदेश दिया। वे उन्हें प्रणाम कर, आदरपूर्वक विदा लेकर शिव-मंदिर की ओर चले गए।

Verse 84

ततः प्रभृति तौ बालौ मुनिवर्योपदेशतः । प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजां चक्रतुरंजसा

उस समय से वे दोनों बालक श्रेष्ठ मुनि के उपदेशानुसार प्रदोष-काल में पार्वतीपति भगवान शिव की पूजा सहज ही करने लगे।

Verse 85

एवं पूजयतोर्देवं द्विजराजकुमारयोः । सुखेनैव व्यतीयाय तयोर्मासचतुष्टयम्

इस प्रकार ब्राह्मण-पुत्र और राजकुमार—दोनों के द्वारा देवाधिदेव की पूजा करते-करते उनके चार मास सुखपूर्वक बीत गए।

Verse 86

कदाचिद्राजपुत्रेण विनासौ द्विजनंदनः । स्नातुं गतो नदीतीरे चचार बहुलीलया

एक बार वह ब्राह्मण-पुत्र राजकुमार के बिना ही स्नान करने नदी-तट पर गया और वहाँ बहुत क्रीड़ा-भाव से घूमने लगा।

Verse 87

तत्र निर्झरनिर्घातनिर्भिन्ने वप्र कुट्टिमे । निधानकलशं स्थूलं प्रस्फुरंतं ददर्श ह

वहाँ झरने के प्रहार से फूटे हुए टीले के पत्थरीले पक्के भाग में उसने एक बड़ा, चमकता हुआ निधि-कलश देखा।

Verse 88

तं दृष्ट्वा सहसागत्य हर्षकौतुकविह्वलः । दैवोपपन्नं मन्वानो गृहीत्वा शिरसा ययौ

उसे देखकर वह हर्ष और कौतुक से विह्वल होकर तुरंत दौड़ा। इसे दैव-प्रदत्त उपहार मानकर उसने उसे श्रद्धापूर्वक सिर पर रख लिया और ले गया।

Verse 89

ससंभ्रमं समानीय निधाय कलशं बलात् । निधाय भवनस्यांते मातरं समभाषत

वह अत्यंत उतावलेपन से उसे ले आया और बलपूर्वक कलश को रख दिया। घर के किनारे उसे स्थापित करके फिर उसने अपनी माता से कहा।

Verse 90

मातर्मातरिमं पश्य प्रसादं गिरिजापतेः । निधानं कुम्भरूपेण दर्शितं करुणात्मना

माँ, माँ—इसे देखो! यह गिरिजापति (शिव) का प्रसाद है। करुणामय प्रभु ने खजाने को कलश-रूप में प्रकट किया है।

Verse 91

अथ सा विस्मिता साध्वी समाहूय नृपात्मजम् । स्वपुत्रं प्रतिनंद्याह मानयन्ती शिवार्चनम्

तब वह साध्वी स्त्री विस्मित हुई और राजा के पुत्र को बुलाया। अपने पुत्र को आशीर्वाद देकर, शिव-पूजन का मान रखते हुए उसने कहा।

Verse 92

शृणुतां मे वचः पुत्रौ निधानकलशीमिमाम् । समं विभज्य गृह्णीतं मम शासनगौरवात्

पुत्रो, मेरी बात सुनो; इस निधान-कलश को समान रूप से बाँटकर ग्रहण करो, मेरे आदेश के गौरव का मान रखते हुए।

Verse 93

इति मातुर्वचः श्रुत्वा तुतोष द्विज नंदनः । प्रत्याह राजपुत्रस्तां विस्रब्धः शंकरार्चने

माता के वचन सुनकर ब्राह्मण-पुत्र प्रसन्न हुआ। तब शंकर-पूजन में निष्ठा से दृढ़, शांत विश्वास के साथ राजकुमार ने उससे कहा।

Verse 94

मातस्तव सुतस्यैव सुकृतेन समागतम् । नाहं ग्रहीतुमिच्छामि विभक्तं धनसंच यम्

माँ, यह तो केवल तुम्हारे अपने पुत्र के पुण्य से प्राप्त हुआ है। इस संचित धन में से विभाजित भाग मैं लेना नहीं चाहता।

Verse 95

आत्मनः सुकृताल्लब्धं स्वयमेव भुनक्त्वसौ । स एव भगवानीशः करिष्यति कृपां मयि

जो उसने अपने पुण्य से पाया है, उसे वही स्वयं भोगे। वही भगवान ईश अवश्य मुझ पर भी कृपा करेंगे।

Verse 96

एवमर्चयतोः शंभुं भूयोपि परया मुदा । संवत्सरो व्यतीयाय तस्मिन्नेव गृहे तयोः

इस प्रकार वे दोनों परम आनंद से बार-बार शम्भु की आराधना करते रहे; और उसी घर में उनका एक वर्ष बीत गया।

Verse 97

अथैकदा राजसूनुः सह तेन द्विजन्मना । वसंतसमये प्राप्ते विजहार वनां तरे

फिर एक दिन, वसंत ऋतु आने पर, राजपुत्र उस द्विज के साथ वन में विहार करने गया।

Verse 98

अथ दूरं गतौ क्वापि वने द्विजनृपात्मजौ । गन्धर्वकन्याः क्रीडंती शतशस्तावपश्यताम्

फिर वे दोनों—ब्राह्मण-पुत्र और राजपुत्र—बहुत दूर किसी वन-प्रदेश में गए, और वहाँ क्रीड़ा करती हुई सैकड़ों गन्धर्व-कन्याओं को उन्होंने देखा।

Verse 99

ताः सर्वाश्चारुसर्वांग्यो विहरंत्यो मनोहरम् । दृष्ट्वा द्विजात्मजो दूरादुवाच नृपनंदनम्

उन सबको—सुन्दर सर्वाङ्गी और मनोहर रीति से विहार करती हुई—देखकर ब्राह्मण-पुत्र ने दूर से ही राजनन्दन से कहा।

Verse 100

इतः पुरो न गंतव्यं विहरंत्यग्रतः स्त्रियः । स्त्रीसंन्निधानं विबुधास्त्यजंति विमलाशयाः

‘यहाँ से आगे नहीं जाना चाहिए; आगे स्त्रियाँ क्रीड़ा कर रही हैं। जिनका आशय निर्मल है, ऐसे बुद्धिमान स्त्रियों के निकट-सान्निध्य का त्याग करते हैं।’

Verse 110

तत्र गत्वा वनं सर्वाः संचीय कुसुमोत्करम् । भवत्यः पुनरायांतु तावत्तिष्ठाम्यहं त्विह

‘तुम सब वहाँ वन में जाओ और पुष्पों के ढेर चुनकर लाओ। फिर लौट आओ; तब तक मैं यहीं ठहरता हूँ।’

Verse 120

अस्त्येको द्रविकोनाम गंधर्वाणां कुलाग्रणीः । तस्याहमस्मि तनया नाम्ना चांशुमती स्मृता

‘गन्धर्वों में द्रविक नाम का एक कुलाग्रणी है। मैं उसी की तनया हूँ, और मेरा नाम अंशुमती प्रसिद्ध है।’

Verse 130

गच्छ स्वभवनं कांत परश्वः प्रातरेव तु । आगच्छ पुनरत्रैव कार्यमस्ति च नो मृषा

हे प्रिय, अपने घर जाओ; परसों प्रातः ही फिर यहीं लौट आना। हमारा एक कार्य है—यह असत्य नहीं है।

Verse 140

तस्य त्वमपि साहाय्यं कुरु गन्धर्वसत्तम । अथासौ निजराज्यस्थो हतशत्रुर्भविष्यति

हे गन्धर्वश्रेष्ठ, तुम भी उसे सहायता प्रदान करो। तब वह अपने राज्य में प्रतिष्ठित होगा और उसके शत्रु नष्ट हो जाएंगे।

Verse 150

अस्त्राणां च सहस्राणि तूणी चाक्षय्यसायकौ । अभेद्यं वर्म सौवर्णं शक्तिं च रिपुमर्दिनीम्

[उसे] हजारों अस्त्र मिले; और दो तरकश जिनमें अक्षय बाण थे; अभेद्य स्वर्ण-कवच; तथा शत्रु-मर्दिनी शक्ति।

Verse 160

एवमन्ये समाराध्य प्रदोषे गिरिजापतिम् । लभंतेभीप्सितान्कामान्देहांते तु परां गतिम्

इसी प्रकार अन्य लोग भी प्रदोष-काल में गिरिजापति (शिव) की विधिपूर्वक आराधना करके इच्छित कामनाएँ पाते हैं और देहांत में परम गति को प्राप्त होते हैं।

Verse 164

ये प्राप्य दुर्लभतरं मनुजाः शरीरं कुर्वंति हंत परमेश्वरपादपूजाम् । धन्यास्त एव निजपुण्यजितत्रिलोकास्तेषां पदांबुजरजो भुवनं पुनाति

जो मनुष्य यह अत्यन्त दुर्लभ मानव-शरीर पाकर भी, हाय, परमेश्वर के चरणों की पूजा करते हैं—वे ही धन्य हैं। अपने पुण्य से उन्होंने त्रिलोकी को जीत लिया है; ऐसे भक्तों के चरण-कमलों की रज समस्त जगत को पवित्र करती है।