
इस अध्याय में ऋषभ के मुख से शैव “शिवमय कवच” का विधिवत् निरूपण है। पहले महादेव को नमस्कार, शुद्ध स्थान में आसन, देह-स्थिति की तैयारी, इन्द्रिय-निग्रह और अविनाशी शिव का निरन्तर ध्यान बताया गया है। फिर हृदय-कमल में महादेव का अन्तर्ध्यान कर षडक्षर-न्यास द्वारा कवच का आरोपण किया जाता है। इसके बाद रक्षात्मक स्तुति में शिव के रूपों को (क) पृथ्वी-जल-अग्नि आदि तत्त्वों में, (ख) पंचवक्त्र शिव—तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव, ईशान—के द्वारा दिशाओं में, (ग) साधक के शरीर में शिर से पाद तक, तथा (घ) दिन-रात्रि के प्रहरों में स्थापित कर सर्वतो रक्षा की प्रार्थना की जाती है। दीर्घ मंत्रात्मक आवाहन में रोग, भय और आपदाओं के नाश की याचना है; फलश्रुति में नित्य पाठ/धारण से विघ्न-शमन, दुःख-निवारण, दीर्घायु और मंगल-वृद्धि कही गई है। अंत में सूत बताते हैं कि ऋषभ ने एक राजकुमार को अभिमंत्रित भस्म, शंख और खड्ग देकर बल-उत्साह बढ़ाया, शत्रुओं को भयभीत किया और विजय व राज्य-रक्षा का आश्वासन दिया।
Verse 1
ऋषभ उवाच । नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् । वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम्
ऋषभ बोले—विश्वव्यापी ईश्वर महादेव को नमस्कार करके, मैं मनुष्यों की सर्वरक्षा करने वाला शिवमय वर्म (कवच) कहूँगा।
Verse 2
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः । जितेंद्रियो जितप्राणश्चिंतयेच्छिवमव्ययम्
शुद्ध स्थान में बैठकर, विधिपूर्वक आसन सजाकर, इन्द्रियों को जीतकर और प्राण को संयमित करके, अव्यय शिव का चिंतन करना चाहिए।
Verse 3
हृत्पुंडरीकांतरसन्निविष्टं स्वतेजसा व्याप्तनभोवकाशम् । अतींद्रियं सूक्ष्ममनंतमाद्यं ध्यायेत्परानंदमयं महेशम्
हृदय-कमल के भीतर विराजमान, अपने तेज से नभ और आकाश को व्याप्त करने वाले, इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म, अनन्त, आद्य—परमानन्दस्वरूप महेश का ध्यान करे।
Verse 4
ध्यानावधूताखिलकर्मबंधश्चिरं चिदानंदनिमग्नचेताः । षडक्षरन्याससमाहितात्मा शैवेन कुर्या त्कवचेन रक्षाम्
ध्यान से समस्त कर्म-बन्धन झाड़कर, चिरकाल चिदानन्द में निमग्न चित्त वाला, षडक्षर-मन्त्र के न्यास से आत्मा को समाहित कर—शैव कवच द्वारा रक्षा करे।
Verse 5
मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे । तन्नाम दिव्यं वरमंत्रमूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम्
अखिल देवताओं के आत्मस्वरूप वह देव मुझे, गहरे संसार-कूप में गिरे हुए को, बचाएँ। उनका दिव्य नाम—श्रेष्ठ मन्त्र का मूल—मेरे हृदयस्थ समस्त पाप को झकझोरकर दूर करे।
Verse 6
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्त्तिर्ज्योतिर्मयानंदघनश्चिदात्मा । अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः स ईश्वरः पातु भयादशेषात्
विश्वमूर्ति, ज्योतिर्मय, आनन्दघन, चिदात्मा प्रभु सर्वत्र मेरी रक्षा करें। अणु से भी अणु-तर, अपरिमित शक्ति वाले वही एक ईश्वर मुझे समस्त भय से निःशेष बचाएँ।
Verse 7
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः । योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति संजीनं सोऽवतु मां जलेभ्यः
जो पृथ्वी-स्वरूप से विश्व को धारण करते हैं, वे अष्टमूर्ति गिरिश भूमितत्त्व द्वारा मेरी रक्षा करें। और जो जल-स्वरूप होकर प्राणियों को संजीवन देते हैं, वे मुझे जलजन्य भय से बचाएँ।
Verse 8
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः । स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात्
कल्प के अंत में समस्त लोकों को दग्ध करके जो महालीला में नृत्य करता है, वह कालरुद्र मुझे दावाग्नि से, आँधी आदि के भय से और समस्त दाहक तापों से रक्षा करे।
Verse 9
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो विद्यावराभीतिकुठारपाणिः । चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम्
प्रज्वलित विद्युत् और सुवर्ण के समान दीप्तिमान, विद्या, वर, अभय और कुठार धारण करने वाले, चतुर्मुख त्रिनेत्र तत्पुरुष पूर्व दिशा में स्थित होकर सदा मेरी रक्षा करें।
Verse 10
कुठारवेदांकुशपाशशूलकपालढक्काक्षगुणान्दधानः । चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम्
कुठार, वेद, अंकुश, पाश, शूल, कपाल, ढक्का, अक्ष-माला और धनुष-डोरी धारण करने वाले, नीलवर्ण त्रिनेत्र चतुर्मुख अघोर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें।
Verse 11
कुंदेन्दुशंखस्फटिकावभासो वेदाक्षमालावरदाभयांकः । त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्योधिजातोवतु मां प्रतीच्याम्
कुंद, चंद्र, शंख और स्फटिक के समान उज्ज्वल, वेद और अक्ष-माला धारण करने वाले, वर और अभय से चिह्नित, त्रिनेत्र चतुर्वक्त्र महाप्रभावी सद्योजात पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें।
Verse 12
वराक्षमालाभयटंकहस्तः सरोजकिंजल्कसमानवर्णः । त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः
वर, अक्ष-माला, अभय और टंक धारण करने वाले, कमल-पराग के समान वर्ण वाले, त्रिलोचन सुन्दर चतुर्मुख वामदेव उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें।
Verse 13
वेदाभयेष्टांकुशटंकपाशकपालढक्काक्षकशूलपाणिः । सितद्युतिः पंचमुखोऽवतान्मामीशान ऊर्द्ध्वं परमप्रकाशः
ऊर्ध्व में परमप्रकाशस्वरूप, श्वेत तेज से दीप्त, पंचमुख, वेद, अभय-मुद्रा, वर, अंकुश, टंका, पाश, कपाल, डक्क, अक्ष-माला और त्रिशूल धारण करने वाले ईशान मेरी रक्षा करें।
Verse 14
मूर्धानमव्यान्मम चंद्रमौ लिर्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः । नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः
मेरे मस्तक की रक्षा चन्द्रमौलि करें; मेरे ललाट की रक्षा भालनेत्र करें; मेरी आँखों की रक्षा भग-नेत्रहारी करें; और मेरी नासिका की सदा विश्वनाथ रक्षा करें।
Verse 15
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः कपोलमव्या त्सततं कपाली । वक्त्रं सदा रक्षतु पंचवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः
मेरे कानों की रक्षा वेदों द्वारा गायी कीर्ति वाले प्रभु करें; मेरे कपोलों की सदा कपाली रक्षा करें; मेरे मुख की पंचवक्त्र सदा रक्षा करें; और मेरी जिह्वा की वेदजिह्व प्रभु सदा रक्षा करें।
Verse 16
कंठं गिरीशोऽवतु नीलकंठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः । दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुर्वक्षःस्थलं दक्षमखांतकोऽव्यात्
मेरे कंठ की रक्षा नीलकंठ गिरीश करें; मेरे दोनों हाथों की रक्षा पिनाकपाणि करें; मेरी भुजाओं की जड़ों की रक्षा धर्मबाहु करें; और मेरे वक्षस्थल की रक्षा दक्ष-यज्ञांतक करें।
Verse 17
ममोदरं पातु गिरींद्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी । हेरंबतातो मम पातु नाभिं पायात्कटी धूर्जटिरीश्वरो मे
मेरे उदर की रक्षा गिरीन्द्रधन्वा करें; मेरे मध्य (कटि-प्रदेश) की रक्षा मदनांतकारी करें; मेरी नाभि की रक्षा हेरम्बतात करें; और मेरी कटि की रक्षा धूर्जटि ईश्वर करें।
Verse 18
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् । जंघायुगं पुंगवकेतुरव्यात्पादौ ममाव्या त्सुरवंद्यपादः
मेरी दोनों जाँघों की रक्षा कुबेर-मित्र करें; मेरे दोनों घुटनों की रक्षा जगदीश्वर करें। मेरी दोनों पिंडलियों की रक्षा पुंगवकेतु करें; और जिनके चरण देवगण वंदित करते हैं, वे मेरे चरणों की रक्षा करें।
Verse 19
महेश्वरः पातु दिनादियामे मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः । त्रियंबकः पातु तृतीययामे वृषध्वजः पातु दिनांत्ययामे
दिन के प्रथम प्रहर में महेश्वर मेरी रक्षा करें; मध्याह्न के प्रहर में वामदेव मेरी रक्षा करें। तृतीय प्रहर में त्र्यम्बक मेरी रक्षा करें; और दिन के अंतिम प्रहर में वृषध्वज मेरी रक्षा करें।
Verse 20
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गंगाधरो रक्षतु मां निशीथे । गौरीपतिः पातु निशावसाने मृत्युंजयो रक्षतु सर्वकालम्
रात्रि के आरम्भ में शशिशेखर मेरी रक्षा करें; मध्यरात्रि में गंगाधर मेरी रक्षा करें। रात्रि के अंत में गौरीपति मेरी रक्षा करें; और सर्वकाल में मृत्युंजय मेरी रक्षा करें।
Verse 21
अंतःस्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् । तदंतरे पातु पतिः पशूनां सदा शिवो रक्षतु मां समंतात्
अंतर में स्थित होकर शंकर मेरी रक्षा करें; बाहर से स्थाणु सदा मेरी रक्षा करें। इनके बीच में पशुपति मेरी रक्षा करें; और चारों ओर से सदा शिव मेरी रक्षा करें।
Verse 22
तिष्ठंतमव्या द्भुवनैकनाथः पायाद्व्रजंतं प्रमथाधिनाथः । वेदांतवेद्योऽवतु मान्निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम्
मैं खड़ा रहूँ तब भुवनैकनाथ मेरी रक्षा करें; मैं चलता रहूँ तब प्रमथाधिनाथ मेरी रक्षा करें। मैं बैठा रहूँ तब वेदान्तवेद्य मेरी रक्षा करें; और मैं शयन करूँ तब अव्यय शिव मेरी रक्षा करें।
Verse 23
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकंठः शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः । अरण्यवासादिमहाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः
मार्गों में नीलकण्ठ मेरी रक्षा करें; पर्वतों और दुर्गम किलों में पुरत्रयारि मेरी रखवाली करें। और वनवास आदि दीर्घ प्रवासों में उदार-शक्तिशाली मृगव्याध-रूप शिव मुझे सुरक्षित रखें।
Verse 24
कल्पांतकाटोपपटुप्रकोपः स्फुटाट्टहासोच्चलितांडकोशः । घोरारिसेनार्णवदुर्निवारमहाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः
कल्पान्त के प्रलय-तुल्य तीक्ष्ण प्रकोप वाले, जिनके स्फुट अट्टहास से ब्रह्माण्ड-कोश कंप उठते हैं, और जो घोर शत्रु-सेना-समुद्र के सामने भी अजेय हैं—वे वीरभद्र हमें उस दुर्निवार महाभय से बचाएँ।
Verse 25
पत्त्यश्वमातंगघटावरूथसहस्रलक्षायुतकोटिभीषणम् । अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिंद्या न्मूढो घोरकुठारधारया
यदि पैदल, अश्व, गज, रथ और कवचधारी दलों के सहस्र-लक्ष-आयुत-कोटि से भीषण, आततायियों की सौ अक्षौहिणियाँ भी आगे बढ़ें, तो भी मोहग्रस्त मनुष्य को चाहिए कि वह भयंकर कुठार की तीक्ष्ण धार से उन्हें काट डाले।
Verse 26
निहंतु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य । शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्संत्रासयत्वीशधनुःपिनाकम्
त्रिपुरान्तक का प्रलयानल-ज्वाला-सा दहकता त्रिशूल दस्युओं का नाश करे; और ईश्वर का धनुष पिनाक व्याघ्र, सिंह, भालू, भेड़िया आदि हिंस्र पशुओं को आतंकित करे।
Verse 27
दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्यदुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि । उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिव्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः
जगतों के अधीश्वर मेरे लिए दुःस्वप्न, दुःशकुन, दुर्गति, दुष्मनस्य, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुःसह कष्ट और दुर्जश—इन सबका नाश करें; तथा उत्पात, ताप, विष-भय, असद्ग्रहों की पीड़ा और व्याधियों को भी दूर करें।
Verse 28
ओंनमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्वात्मकाय सकलतत्त्वविहाराय सकललोकैककर्त्रे सकललौकैकभर्त्रे सकललोकैकहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवरप्रदाय सकलदुरितार्तिभंजनाय सकलजगदभयंकराय सकललोकैकशंकराय शशांकशेखराय शाश्व तनिजाभासाय निर्गुणाय निरुपमाय नीरूपाय निराभासाय निरामयाय निष्प्रपंचाय निष्कलंकाय निर्द्वंद्वाय निःसंगाय निर्मलाय निर्गमाय नित्यरूपविभवाय निरुपमविभवाय निराधाराय नित्यशुद्धबुद्धपरिपूर्णसच्चिदानंदाद्वयाय परमशांतप्रकाशतेजोरूपाय जयजय महारुद्र महारौद्र भद्रावतार दुःखदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वांगखड्गचर्मपाशांकुशडमरुशूलचापबाणगदाशक्तिभिं डिपालतोमरमुसलमुद्गरपट्टिशपरशुपरिघभुशुंडीशतघ्नीचक्राद्यायुधभीषणकरसहस्र मुखदंष्ट्राकराल विकटाट्टहासविस्फारितब्रह्मामण्डल नागेंद्र कुण्डल नागेंद्रहार नागेंद्रवलय नागेंद्रचर्मधर मृत्युंजय त्र्यंबक त्रिपुरांतक विरूपाक्ष विश्वेश्वर विश्वरूप वृषभवाहन विषभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्षरक्ष मां ज्वलज्वल महामृत्युभयमपमृत्युभयं नाशयनाशय रोगभयमुत्सादयोत्सादय विषसर्पभयं शमयशमय चोरभयं मारयमारय मम शत्रूनुच्चा टयोच्चाटय शूलेन विदारयविदारय कुठारेण भिंधिभिंधि खड्गेन छिंधिछिंधि खट्वांगेन विपोथयविपोथय मुसलेन निष्पेषयनिष्पेषय बाणैः संताडय संताडय रक्षांसि भीषयभीषय भूतानि विद्रावयविद्रावय कूष्मांडवेतालमारीगणब्रह्मराक्षसान्संत्रासयसंत्रासय ममाभयं कुरुकुरु वित्रस्तं मामाश्वास याश्वासय नरकभयान्मामुद्धारयोद्धारय संजीवयसंजीवय क्षुत्तृड्भ्यां मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं मामानन्दयानंदय शिवकवचेन मामाच्छादया च्छादय त्र्यंबक सदाशिव नमस्तेनमस्तेनमस्ते । ऋषभ उवाच । इत्येतत्कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया । सर्वबाधाप्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम्
ॐ—भगवान् सदाशिव को नमस्कार है: जो समस्त तत्त्वों के आत्मस्वरूप हैं, समस्त तत्त्वों में विहार करने वाले हैं; जो समस्त लोकों के एकमात्र कर्ता, भर्ता और हर्ता हैं; समस्त लोकों के एकमात्र गुरु और साक्षी हैं; समस्त निगमों (वेदों) के गुह्य सार हैं; समस्त वरों के दाता हैं; समस्त पाप और पीड़ा का भंजन करने वाले हैं; जगत् को अभय देने वाले हैं; समस्त लोकों के एकमात्र शंकर हैं; चन्द्रशेखर, शाश्वत निज-प्रभा; निर्गुण, निरुपम, निराकार, निराभास, निरामय; निष्प्रपंच, निष्कलंक, निर्द्वंद्व, निःसंग, निर्मल, परात्पर; नित्यरूप-वैभवयुक्त, अनुपम वैभव, निराधार; नित्य शुद्ध-बुद्ध-परिपूर्ण सच्चिदानन्द अद्वय; परम शान्त प्रकाश-तेजस्वी स्वरूप। जय जय—महारुद्र, महारौद्र, भद्रावतार, दुःखरूपी दावानल के दारणकर्ता; महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपालमालाधर; असंख्य आयुधों से भीषण—खट्वांग, खड्ग, चर्म, पाश, अंकुश, डमरु, त्रिशूल, धनुष-बाण, गदा, शक्ति, भिंडिपाल, तोमर, मुसल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डी, शतघ्नी, चक्र आदि; सहस्र हाथों, अनेक मुखों, भयानक दंष्ट्राओं और विकट अट्टहास से ब्रह्माण्ड को कम्पित करने वाले। नागेन्द्र-कुण्डल, नागेन्द्र-हार, नागेन्द्र-वलय, नागेन्द्र-चर्मधारी; मृत्युंजय, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक; विरूपाक्ष, विश्वेश्वर, विश्वरूप; वृषभवाहन, विषभूषण; सर्वतोमुख—हे प्रभो, सब ओर से मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। ज्वल ज्वल; महामृत्यु और अपमृत्यु के भय को नाश करो, नाश करो; रोगभय को उखाड़ दो, उखाड़ दो; विष और सर्पभय को शमित करो, शमित करो; चोरभय को मारो, मारो; मेरे शत्रुओं को उच्छाटित करो, उच्छाटित करो। त्रिशूल से विदीर्ण करो; कुठार से भेदो; खड्ग से काटो; खट्वांग से रौंदो; मुसल से चूर्ण करो; बाणों से ताड़ित करो। राक्षसों को भयभीत करो; भूतों को भगाओ; कूष्माण्ड, वेताल, मारीगण और ब्रह्मराक्षसों को संत्रस्त कर दूर करो। मुझे अभय दो; भयभीत मुझे शीघ्र आश्वस्त करो; नरकभय से मेरा उद्धार करो; मुझे संजीवित करो; भूख-प्यास से पीड़ित मुझे पुष्ट करो; दुःखातुर मुझे आनन्दित करो; शिवकवच से मुझे आच्छादित करो। हे त्र्यम्बक, हे सदाशिव—आपको नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार। ऋषभ बोले—यह वरदायी शैव कवच मैंने कहा है; यह सब देहधारियों के लिए रहस्य है और समस्त बाधाओं का शमन करने वाला है।
Verse 29
यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् । न तस्य जायते क्वापि भयं शम्भोरनुग्रहात्
जो मनुष्य सदा इस उत्तम शैव कवच को धारण करता है, शम्भु (शिव) की कृपा से उसे कहीं भी किसी प्रकार का भय उत्पन्न नहीं होता।
Verse 30
क्षीणायुर्मृत्युमापन्नो महारोगहतोऽपि वा । सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विंदति
जिसकी आयु क्षीण हो रही हो, जो मृत्यु के ग्रास में पड़ गया हो, या जो महा-रोग से पीड़ित हो—वह भी तुरंत सुख-स्वास्थ्य पाता है और दीर्घायु को प्राप्त करता है।
Verse 31
सर्वदारिद्र्यशमनं सौमंगल्यविवर्धनम् । यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते
जो शैव कवच धारण करता है—जो समस्त दरिद्रता का शमन और सौभाग्य का संवर्धन करने वाला है—वह देवताओं द्वारा भी पूज्य हो जाता है।
Verse 32
महापातकसंघातैर्मुच्यते चोपपातकैः । देहांते शिवमाप्नोति शिववर्मानुभावतः
शिव-वर्म (शिव के रक्षक कवच) के प्रभाव से मनुष्य महापातकों के समूह तथा उपपातकों (लघु अपराधों) से भी मुक्त हो जाता है; और देहांत में शिव को प्राप्त करता है।
Verse 33
त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं कवच मुत्तमम् । धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि
वत्स, तुम भी श्रद्धा सहित मेरे द्वारा दिया हुआ यह उत्तम शैव-कवच धारण करो; तत्क्षण ही तुम कल्याण और परम श्रेय प्राप्त करोगे।
Verse 34
सूत उवाच । इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिवसूनवे । ददौ शंखं महारावं खड्गं चारिनिषूदनम्
सूत बोले—ऐसा कहकर योगी ऋषभ ने उस राजा के पुत्र को महाघोष करने वाला शंख और रण में शत्रुओं का नाश करने वाली तलवार दी।
Verse 35
पुनश्च भस्म संमंत्र्य तदंगं सर्वतोऽस्पृशत् । गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणं च बलं ददौ
फिर उसने भस्म को मंत्र से अभिमंत्रित करके उसके शरीर को सर्वत्र स्पर्श किया; और उसे छह हजार हाथियों के बल का दुगुना सामर्थ्य प्रदान किया।
Verse 36
भस्मप्रभावात्संप्राप्य बलैश्वर्यधृतिस्मृतीः । स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया
उस भस्म के प्रभाव से बल, ऐश्वर्य, धैर्य और स्मृति पाकर वह राजपुत्र शरद्-काल के सूर्य की भाँति तेज से शोभायमान हुआ।
Verse 37
तमाह प्रांजलिं भूयः स योगी राजनंदनम् । एष खड्गो मया दत्तस्तपोमंत्रानुभावतः
फिर वह योगी हाथ जोड़कर खड़े राजनंदन से बोला—“यह खड्ग मैंने तप और मंत्र के प्रभाव से तुम्हें प्रदान किया है।”
Verse 38
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसि स्फुटम् । स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम्
जिसे तुम यह तीक्ष्णधार खड्ग स्पष्ट दिखाते हो, वह शत्रु उसी क्षण मर जाता है—मानो साक्षात् मृत्यु स्वयं उपस्थित हो।
Verse 39
अस्य शंखस्य निह्रादं ये शृण्वंति तवाहिताः । ते मूर्च्छिताः पतिष्यंति न्यस्तशस्त्रा विचेतना
इस शंख का निनाद जो तुम्हारे विरोधी सुनेंगे, वे मूर्छित होकर गिर पड़ेंगे—हथियार छोड़कर, चेतनाहीन।
Verse 40
खड्गशंखाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशिनौ । आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ
यह दिव्य खड्ग और शंख शत्रु-सेना का विनाश करते हैं, और अपनी सेना तथा स्वपक्षियों के शौर्य-तेज को बढ़ाते हैं।
Verse 41
एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च । द्विषट्सहस्रनागानां बलेन महतापि च
इन दोनों के प्रभाव से, तथा शैव कवच के द्वारा भी, और दो बार छह सहस्र हाथियों के महान बल से भी,
Verse 42
भस्मधारणसामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसि । प्राप्य सिंहासनं पैत्र्यं गोप्तासि पृथिवीमिमाम्
भस्म-धारण से प्राप्त सामर्थ्य द्वारा तुम शत्रु-सेना को जीतोगे; पैतृक सिंहासन पाकर इस पृथ्वी की रक्षा करोगे।
Verse 43
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् । ताभ्यां संपूजितः सोऽथ योगी स्वैरगतिर्ययौ
इस प्रकार भद्रायुṣ को उसकी माता सहित भली-भाँति उपदेश देकर, उन दोनों द्वारा पूजित-सत्कृत वह योगी फिर स्वेच्छानुसार जहाँ चाहे वहाँ स्वतंत्र गति से चला गया।