Adhyaya 5
Vidyesvara SamhitaAdhyaya 531 Verses

Liṅga–Bera Pūjā: Nitya-Arcana and Upacāras as an Accessible Sādhana (लिङ्गबेरपूजा-विधानम्)

इस अध्याय में सूत जी ऋषियों को उपदेश देते हैं कि यदि श्रवण आदि साधनों का पूरा त्रय करना संभव न हो, तब भी शंकर के लिंग या बेर (मूर्ति) की स्थापना करके और नित्य पूजा करके मनुष्य संसार-सागर से तर सकता है। इसमें मण्डप-गोपुर निर्माण, तीर्थ-मठ-क्षेत्र-उत्सव जैसी व्यवस्थाएँ, तथा वस्त्र, गन्ध, माला, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों का विस्तृत वर्णन है; राजोपचार और यथाशक्ति प्रदक्षिणा, नमस्कार, जप जैसे भक्तिमय कर्म भी बताए गए हैं। फिर ऋषि पूछते हैं कि अन्य देवता मुख्यतः मूर्ति-पूजा से पूजे जाते हैं, तो शिव की सर्वत्र लिंग और बेर दोनों से पूर्ण पूजा कैसे होती है? सूत इस प्रश्न को पुण्य मानकर कहते हैं कि इसका अंतिम उत्तर स्वयं महादेव ही देंगे, और आगे गूढ़ तत्त्व की ओर संकेत करते हैं।

Shlokas

Verse 1

सूत उवाच । श्रवणादित्रिकेऽशक्तो लिंगं बेरं च शांकरम् । संस्थाप्य नित्यमभ्यर्च्य तरेत्संसारसागरम्

सूत बोले— जो श्रवण आदि त्रिक में असमर्थ हो, वह शांकर-लिंग और शांकर-बेर (मूर्ति) की स्थापना करके, नित्य भक्ति से उनकी पूजा करे और संसार-सागर को पार कर जाए।

Verse 2

अपि द्र व्यं वहेदेव यथाबलमवंचयन् । अर्पयेल्लिंगबेरार्थमर्चयेदपि संततम्

यदि थोड़ा-सा द्रव्य भी हो, तो अपनी शक्ति के अनुसार, बिना छल के, शिवलिंग और विग्रह-पूजा के लिए अर्पित करे; और श्रद्धा से निरंतर अर्चना करे।

Verse 3

मंडपं गोपुरं तीर्थं मठं क्षेत्रं तथोत्सवम् । वस्त्रं गंधं च माल्यं च धूपं दीपं च भक्तितः

भक्ति से मंडप, गोपुर, तीर्थ, मठ, क्षेत्र और उत्सव (शिव-सेवा में) अर्पित करे; तथा वस्त्र, सुगंध, माला, धूप और दीप भी श्रद्धापूर्वक चढ़ाए।

Verse 4

विविधान्नं च नैवेद्यमपूपव्यंजनैर्युतम् । छत्रं ध्वजं च व्यजनं चामरं चापि सांगकम्

नैवेद्य में विविध अन्न, अपूप (मिष्ठक) और व्यंजन सहित अर्पित करे। साथ ही सम्मान-चिह्न—छत्र, ध्वज, पंखा और चामर—तथा पूजन की समस्त सामग्री भी समर्पित करे।

Verse 5

इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां पंचमोऽध्यायः

इस प्रकार श्री शिवमहापुराण की विद्येश्वरसंहिता का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 6

आवाहनादिसर्गांतं नित्यं कुर्यात्सुभक्तितः । इत्थमभ्यर्च्य यन्देवं लिंगेबेरे च शांकरे

आवाहन से लेकर विसर्जन तक की सम्पूर्ण पूजा-क्रम को प्रतिदिन सच्ची भक्ति से करना चाहिए। इस प्रकार लिङ्ग और प्रतिष्ठित बेरा-प्रतिमा में स्थित भगवान शंकर की अर्चना करके भक्त श्रद्धा में स्थिर रहे।

Verse 7

सिद्धिमेति शिवप्रीत्या हित्वापि श्रवणादिकम् । लिंगबेरार्चनामात्रान्मुक्ताः पुर्वे महाजनाः

शिव की प्रसन्नता से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है, चाहे उसने श्रवण आदि साधन भी छोड़ दिए हों। वास्तव में पूर्वकाल के महाजन केवल लिङ्ग और बेरा-प्रतिमा की अर्चना मात्र से मुक्त हो गए।

Verse 8

मनुय ऊचुः । बेरमात्रे तु सर्वत्र पूज्यंते देवतागणाः । लिंगेबेरे च सर्वत्र कथं संपूज्यते शिवः

मुनियों ने कहा—सर्वत्र देवताओं के गण केवल बेरा-प्रतिमा में ही पूजे जाते हैं। परन्तु शिव तो सर्वत्र लिङ्ग और बेरा—दोनों में पूजित हैं; तब शिव की सम्पूर्ण विधि से पूजा कैसे की जाए?

Verse 9

सूत उवाच । अहो मुनीश्वराः पुण्यं प्रश्नमेतन्महाद्भुतम् । अत्र वक्ता महादेवो नान्योऽस्ति पुरुषः क्वचित्

सूत ने कहा—हे मुनीश्वर! यह प्रश्न पवित्र और अत्यन्त अद्भुत है। यहाँ वक्ता स्वयं महादेव हैं; कहीं भी इसके अतिरिक्त कोई अन्य पुरुष नहीं है।

Verse 10

शिवेनोक्तं प्रवक्ष्यामि क्रमाद्गुरुमुखाच्छ्रुतम् । शिवैको ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलः परिकीर्तितः

अब मैं क्रम से वही कहूँगा जो शिव ने कहा था और जिसे गुरु-मुख से सुना गया। शिव ही एक हैं; ब्रह्मस्वरूप होने के कारण वे निष्कल—अखंड और निरवयव—कहे गए हैं।

Verse 11

रूपित्वात्सकलस्तद्वत्तस्मात्सकलनिष्कलः । निष्कलत्वान्निराकारं लिंगं तस्य समागतम्

रूपवान होने से वह सकल है; इसलिए वह सकल और निष्कल—दोनों है। और अपने निष्कल स्वभाव के कारण उसका लिङ्ग निराकार, निरूप है।

Verse 12

सकलत्वात्तथा बेरं साकारं तस्य संगतम् । सकलाकलरूपत्वाद्ब्रह्मशब्दाभिधः परः

सकल भाव से युक्त होने के कारण उसका बेर (प्रतिमा) साकार ही उचित है। और सकल तथा अकल—दोनों रूपों वाला होने से वही परम ‘ब्रह्म’ शब्द से अभिहित है।

Verse 13

अपि लिंगे च बेरे च नित्यमभ्यर्च्यते जनैः । अब्रह्मत्वात्तदन्येषां निष्कलत्वं न हि क्वचित्

लिङ्ग में और बेर (प्रतिमा) में लोग नित्य शिव की पूजा करते हैं। पर अन्य देवताओं में—वे ब्रह्म न होने से—निष्कलत्व कभी भी वास्तव में नहीं होता।

Verse 14

तस्मात्ते निष्कले लिंगे नाराध्यंते सुरेश्वराः । अब्रह्मत्वाच्च जीवत्वात्तथान्ये देवतागणाः

इसलिए उस निष्कल लिङ्ग में सुरेश्वर भी आराध्य नहीं हैं; और अन्य देव-गण भी—ब्रह्म न होने तथा जीवभाव में रहने के कारण—(वहाँ) पूज्य नहीं हैं।

Verse 15

तूष्णीं सकलमात्रत्वादर्च्यंते बेरमात्रके । जीवत्वं शंकरान्येषां ब्रह्मत्वं शंकरस्य च

समस्त प्रमाणों और भेदों में व्याप्त होने से प्रभु का केवल बेरा-प्रतिमा द्वारा भी मौन में पूजन होता है। शंकर से भिन्न अन्य देवों में जीवभाव है, और शंकर में ही ब्रह्मभाव है।

Verse 16

वेदांतसारसंसिद्धं प्रणवार्थे प्रकाशनात् । एवमेव पुरा पृष्टो मंदरे नंदिकेश्वरः

प्रणव (ॐ) के अर्थ के प्रकाश से वेदान्त का जो सार दृढ़ रूप से सिद्ध है, वह प्रकट होता है। इसी प्रकार, प्राचीन काल में मन्दर पर्वत पर नन्दिकेश्वर से (इसी विषय में) प्रश्न किया गया था।

Verse 17

सनत्कुमारमुनिना ब्रह्मपुत्रेण धीमता । सनत्कुमार उवाच । शिवान्यदेववश्यानां सर्वेषामपि सर्वतः

ब्रह्मा के मानसपुत्र, बुद्धिमान मुनि सनत्कुमार ने कहा—“सर्वत्र, समस्त प्राणियों में, जो शिवभक्त हैं वे किसी अन्य देवता के वश में नहीं होते।”

Verse 18

बेरमात्रं च पूजार्थं श्रुतं दृष्टं च भूरिशः । शिवमात्रस्य पूजायां लिंगं बेरं च दृश्यते

हे भूरीश, पूजा के लिए केवल ‘बेर’ (प्रतिमा) का प्रयोग होता है—ऐसा बहुत बार सुना और देखा गया है। परन्तु शिव की पूजा में लिङ्ग और प्रतिमा—दोनों ही पूजाधार के रूप में मान्य हैं।

Verse 19

अतस्तद्ब्रूहि कल्याण तत्त्वं मे साधुबोधनम् । नंदिकेश्वर उवाच । अनुत्तरमिमं प्रश्नं रहस्यं ब्रह्मलक्षणम्

अतः, हे कल्याण, वह तत्त्व मुझे बताइए—मेरे सद्बोधन हेतु उचित उपदेश दीजिए। नन्दिकेश्वर बोले—यह प्रश्न अनुत्तर है; यह रहस्य-शिक्षा है, जो ब्रह्म के लक्षण से युक्त है।

Verse 20

कथयामि शिवेनोक्तं भक्तियुक्तस्य तेऽनघ । शिवस्य ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलत्वाच्च निष्कलम्

हे निष्पाप! मैं तुम्हें वह कहता हूँ जो भक्तियुक्त जन के लिए स्वयं शिव ने कहा है—शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल हैं; इसलिए वह परम तत्त्व भी निष्कल ही है।

Verse 21

लिंगं तस्यैव पूजायां सर्ववेदेषु संमतम् । तस्यैव सकलत्वाच्च तथा सकलनिष्कलम्

उसी (शिव) की पूजा में लिंग की प्रतिष्ठा सभी वेदों में स्वीकृत है। और वह सर्वरूप-आधार होने से लिंग ‘सकल’ भी है और ‘निष्कल’ भी—अर्थात् सकल-निष्कल।

Verse 22

सकलं च तथा बेरं पूजायां लोकसंमतम् । शिवान्येषां च जीवत्वात्सकलत्वाच्च सर्वतः

पूजा में सकल (साकार) और बेर (प्रतिष्ठित विग्रह) दोनों ही लोक-स्वीकृत हैं। क्योंकि शिव आदि में सजीव सन्निधि है और वे सर्वथा भक्तों के लिए पूर्णतः प्रकट हैं।

Verse 23

बेरमात्रं च पूजायां संमतं वेदनिर्णये । स्वाविर्भावे च देवानां सकलं रूपमेव हि

पूजा में वेदों के निश्चय के अनुसार केवल बेर (प्रतिष्ठित विग्रह) ही अनुमत है। और जब देवता स्वयं प्रकट होते हैं, तब वे निश्चय ही सकल, पूर्ण रूप में ही प्रकट होते हैं।

Verse 24

शिवस्य लिंगं बेरं च दर्शने दृश्यते खलु । सनत्कुमार उवाच । उक्तं त्वया महाभाग लिंगबेरप्रचारणम्

दर्शन में शिव का लिंग और बेर—दोनों ही निश्चय से देखे जाते हैं। सनत्कुमार बोले: हे महाभाग! आपने लिंग और बेर द्वारा पूजा-प्रचार का वर्णन किया है।

Verse 25

शिवस्य च तदन्येषां विभज्य परमार्थतः । तस्मात्तदेव परमं लिंगबेरादिसंभवम्

शिव और उनसे भिन्न समस्त तत्त्वों का परमार्थतः विवेक करके, यह निश्चय होता है कि वही परम है—जिससे लिंग, बेर आदि सभी रूप उत्पन्न होते हैं।

Verse 26

श्रोतुमिच्छामि योगींद्र लिंगाविर्भावलक्षणम् । नंदिकेश्वर उवाच । शृणु वत्स भवत्प्रीत्या वक्ष्यामि परमार्थतः

हे योगीन्द्र, मैं लिङ्ग के आविर्भाव के लक्षण सुनना चाहता हूँ। नन्दिकेश्वर बोले: वत्स, सुनो; तुम्हारे प्रति स्नेह से मैं परम सत्य के अनुसार इसका वर्णन करूँगा।

Verse 27

पुरा कल्पे महाकाले प्रपन्ने लोकविश्रुते । आयुध्येतां महात्मानौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्

पूर्व कल्प के उस महाकाल, लोक-प्रसिद्ध समय में महात्मा ब्रह्मा और विष्णु परस्पर युद्ध में प्रवृत्त हो गए।

Verse 28

तयोर्मानं निराकर्तुं तन्मध्ये परमेश्वरः । निष्कलस्तंभरूपेण स्वरूपं समदर्शयत्

उन दोनों के अभिमान को दूर करने हेतु उनके मध्य परमेश्वर निष्कल, अचल स्तम्भ-रूप में प्रकट होकर अपना स्वरूप दिखाने लगे।

Verse 29

ततः स्वलिंगचिह्नत्वात्स्तंभतो निष्कलं शिवः । स्वलिंगं दर्शयामास जगतां हितकाम्यया

तत्पश्चात्, वह स्तम्भ अपने ही लिङ्ग-चिह्न से युक्त होने के कारण, निष्कल शिव ने समस्त जगत् के हित की कामना से उसी स्तम्भ के भीतर से अपना लिङ्ग प्रकट किया।

Verse 30

तदाप्रभृति लोकेषु निष्कलं लिंगमैश्वरम् । सकलं च तथा बेरं शिवस्यैव प्रकल्पितम्

तभी से लोकों में शिव का ऐश्वर्य-युक्त लिङ्ग निष्कल (निर्गुण) तत्त्व के रूप में, और शिव की प्रतिमा (बेर) सकल (सगुण) रूप में भी विधिवत् प्रतिष्ठित मानी गई।

Verse 31

शिवान्येषः तु देवानां बेरमात्रं प्रकल्पितम् । तत्तद्बेरं तु देवानां तत्तद्भोगप्रदं शुभम् । शिवस्य लिंगबेरत्वं भोगमोक्षप्रदं शुभम्

अन्य देवताओं के लिए ‘बेर’ केवल पूजारूप प्रतिमा के रूप में कल्पित है; और प्रत्येक देवता की वही प्रतिमा उसके अनुरूप भोगों को शुभ रूप से प्रदान करती है। परन्तु शिव के लिए स्वयं लिङ्ग ही बेर है—शुभ, और भोग तथा मोक्ष दोनों का दाता।

Frequently Asked Questions

It argues that even without extensive śravaṇa-ādi disciplines, one can attain siddhi and cross saṃsāra through devoted, regular worship of Śiva via liṅga and bera, supported by offerings and acts of reverence performed according to one’s capacity.

The pair functions as a theological bridge: the liṅga encodes Śiva’s transpersonal, non-figurative absoluteness, while the bera supports relational devotion and liturgical detail; together they authorize multiple cognitive and devotional entry-points into the same Śiva-Tattva.

Śiva is foregrounded as Śaṅkara and Mahādeva—titles emphasizing auspiciousness and supreme divinity—rather than a localized avatāra; the focus is on his worshipable presence through liṅga/bera rather than a narrative form.